लेखक परिचय

डॉ. मधुसूदन

डॉ. मधुसूदन

मधुसूदनजी तकनीकी (Engineering) में एम.एस. तथा पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त् की है, भारतीय अमेरिकी शोधकर्ता के रूप में मशहूर है, हिन्दी के प्रखर पुरस्कर्ता: संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती के अभ्यासी, अनेक संस्थाओं से जुडे हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अमरिका) आजीवन सदस्य हैं; वर्तमान में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्‍था UNIVERSITY OF MASSACHUSETTS (युनिवर्सीटी ऑफ मॅसाच्युसेटस, निर्माण अभियांत्रिकी), में प्रोफेसर हैं।

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-डॉ. मधुसूदन-
modiji

वडोदरा में हिन्दी भाषण:

मोदीजी ने, ऐतिहासिक जीत के पश्चात, वडोदरा में मतदाताओं का आभार व्यक्त करनेवाला भाषण हिंदी में प्रारंभ किया, तो कुछ श्रोताओं ने उन से गुजराती में बोलने का आग्रह किया। ऐसे प्रसंग पर मोदी जी, यदि मतदाताओं ऋण चुकाने, गुजराती में बोल देते तो शायद ही कोई उसे अनुचित मानता। पर भारत माता के इस पुत्र ने ऐसा नहीं किया।

प्रादेशिकता से ऊपर उठी हुयी राष्ट्रीय दृष्टि:

इस अवसर पर, मोदीजी ने जिस चतुराई का और राष्ट्रीय वृत्ति का परिचय दिया; उससे मैं हर्षित हुए बिना न रह सका। क्या किया उन्होंने? उन्होंने नम्रतापूर्वक, हाथ जोड़कर, श्रोताओं से कहा कि “आप ही (वडोदरा की जनता) ने मुझे मत देकर, सारे देश का बना दिया है। कुछ धैर्य रखिए।” और ऐसा कहकर हिंदी में बोलना अबाधित रखा। श्रोताओं के प्रेम भरे आग्रह उपरांत, मतदाताओं को ही, गौरवान्वित करते हुए, अनुमति माँग कर, उनका आभार व्यक्त किया और हिंदी में बोलना अबाधित रखा। यह मेरे लिए, अतीव हर्ष की बात है।
वैसे बोलनेवाले शायद न हो, पर गुजरात में हिंदी समझनेवाले बहुत हैं। समझ प्रायः सभी जाते हैं। और फिर वडोदरा की नगरी कुछ पढ़ी लिखी भी है।
मैं यहाँ उनकी प्रादेशिकता से ऊपर उठी हुयी राष्ट्रीय दृष्टि को अधोरेखित करना चाहता हूँ।

अचरज:

उनकी इस राष्ट्रीय दृष्टि को, किसी समाचार पत्र ने आज तक कैसे, उजागर नहीं किया? क्या यह सत्य इतना नगण्य था? प्रादेशिकता को उजागर कर, सस्ती राजनीति प्रोत्साहित करनेवाले समाचार तो बहुत पढ़े जाते हैं। प्रादेशिकता ने राष्ट्रीयता को निगल रखा है। ऐसा राष्ट्रीयता का परिचय देनेवाला बिन्दू भी समाचारों से ओझल हो गया। पर, मेरे मत में, मोदी जी पहले ही उनकी स्पष्ट राष्ट्रीय दृष्टि के कारण सम्मान्य थे, पर इस घटना ने मेरी दृष्टि में वे और भी ऊंचे उठ गये। सोचिए; कितना बड़ा अंतर है, एक ओर ममता, जयललिता, चिदम्बरम, इत्यादि प्रादेशिक नेता और दूसरी ओर राष्ट्रीय दृष्टि रखनेवाले मोदीजी ? क्या ममता, जय ललिता या चिदम्बरम से ऐसी दृष्टि की अपेक्षा की जा सकती थी?
वैसे, मोदी जी का नेतृत्व समन्वयवादी है। संघर्ष को भी समन्वय से मिला लेता है। पर उनके लिए, समन्वय से भी ऊंची वरीयता राष्ट्रनिष्ठा की ही होगी। यही मेरे लिए विशेष है। इसी के कारण धीरे-धीरे ६५ वर्षों का अँधेरा भी छँटेगा।

चुनावी सफलता और हिन्दी:

साथ साथ, एक दूसरी अप्रत्यक्ष सच्चाई भी उजागर करना चाहता हूँ। हिंदी से ही, जुड़ी हुयी एक और सच्चाई है,जिसको किसी समाचार ने भी विशेष महत्व दिया हो, ऐसा पढा नहीं है। वो है, मोदी जी की, चुनावी सफलता के पीछे, उन के हिन्दी प्रयोग का गौण पर अति महत्त्वपूर्ण योगदान।
इस अप्रत्यक्ष सच्चाई की ओर, शायद आपका ध्यान न गया हो। ऐसी अनदेखी सहज संभव है, और आप भी उन की सफलता को केवल गुजरात के विकास, और भ्रष्टाचार रहित शासन जैसे और अनेक कारण गिनाते रहे; पर हिंदी में उन्हों ने जो प्रचार किया, वह भूल जाएँ। यह शायद आपके, ध्यान में तब तक नहीं आता, जब तक इस सत्य को कोई उजागर कर के न दिखाए।
मैं स्वयं, मोदी जी के चुनावी अभियान की सफलता का एक अति मह्त्त्वपूर्ण पर गौण कारण उनके हिंदी प्रयोग को मानता हूँ। मोदी जी गुजरात से बाहर, गुजराती में, ऐसा प्रचार कर ही नहीं सकते थे।
उनकी चुनावी सफलता में, विकास, भ्रष्टाचार रहित पारदर्शी शासन, और अन्य अनेक विकास कार्यों का योगदान अवश्य है, पर हिंदी-भाषी प्रदेशों में उनका हिंदी में अभियान चलाना; अभियान-यात्राएं (रैलियाँ) निकालना इत्यादि का प्रचण्ड योगदान मैं मानता हूँ।
अंग्रेज़ी बोलनेपर, हिंदी क्षेत्र का मतदाता, उनसे बिलकुल ना जुड़ता, न आत्मीयता का अनुभव करता।हिंदी ही मतदाता के चेतस को भावना से जोड सकती है। और भावनासे जुड़े बिना मत प्राप्त करना असंभव। अंग्रेज़ी हमें भावना की गहराई से, हृदय तल से, जोडने में असमर्थ है।अंग्रेज़ी कृत्रिमता की भाषा है। मोदी जी का चुनाव अभियान अधिकतर हिंदी के कारण सफल हुआ।
यह दिवाल पर लिखा अतिस्पष्ट संदेश, समाचार पत्रों ने कैसे पढा नहीं? और जुड़ी हुयी, सच्चाई यह भी है कि हिंदी बहुल क्षेत्र को जीते बिना, आप बहुमति नहीं प्राप्त कर सकते। और प्रधानमंत्री नहीं बन सकते। इसलिए, कहा जाता है कि दिल्ली की सत्ता (लोकसभा) का मार्ग उत्तर प्रदेश से होकर निकलता है। अन्य हिंदी भाषी प्रदेशों को भी उपेक्षित नहीं किया जा सकता।

चिदम्बरम, जयललिता, ममता, या राहुल।

अब आप ताड़ गए होंगे कि क्यों किसी और पक्ष ने अपना प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी पहले से घोषित नहीं किया? उनके पास, हिंदी में प्रचार करने वाला कुशल प्रत्याशी था ही नहीं। शहजादे की योग्यता का प्रश्न था। वह पैरों पर खड़े-खड़े सोचकर बोल भी नहीं सकता। चिदम्बरम, ममता, जयललिता तो हिंदी जानते नहीं। और भी कोई मोदी को टक्कर देने योग्य दिखाई नहीं देता था। यही सब सोचकर, कोई पर्याय जब नहीं उपलब्ध हुआ तो, उलटे भाजपा को अपना प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित करने पर दोष दे रहे थे। ये कांग्रेस की, अपनी दुर्बलता को छिपाने का पारदर्शी कारण आप भी ताड ही गए होंगे।

क्या अंग्रेज़ी में प्रचार सफल हो सकता था?

चिदम्बरम प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी बनकर, तमिलनाडु के बाहर ऐसा सफल प्रचार तमिल में तो कर ही नहीं सकता। तो फिर उसका प्रचार, उत्तर-प्रदेश या अन्य हिंदी बहुल क्षेत्र में सफल होता तो किस भाषा में होता ? जब तमिल प्रजा भी मात्र ७% की जनसंख्या रखती है।
तमिलनाडु के बाहर, अंग्रेज़ी में प्रचार होता तो उत्तर प्रदेश का मतदाता भावना से उनसे जुडना और भी कठिन था।

अंग्रेज़ी हमें भावना से जोड़ती नहीं है।

अंग्रेज़ी द्वारा भारत का कोई भी मतदाता भावना से जुडना नितान्त असंभव। और सोचिए कि क्या जयलालिता तमिल में और ममता बंगला में ऐसा प्रचार कर सकती थीं? ये राज्यों के चुनावों की बात नहीं है। ये प्रधानमंत्री पद के चुनाव का प्रचार था।

लिखके रखिए।
आप अधिकतम जनता से कभी अंग्रेज़ी में जुड़ नहीं सकते। कभी नहीं। आपका चुनाव प्रचार अधिकतम सामान्य जनता तक अंग्रेज़ी में कभी पहुंचा नहीं सकते; न और किसी प्रादेशिक भाषा में।
मोदीजी की सफलता का एक ही विशेष कारण मैं उनकी हिंदी मानता हूँ।
जब आपको अधिकाधिक मतदाताओं से जुडना है, तो, बिना हिंदी कोई पर्याय नहीं।
अंग्रेज़ी के भक्तों को विशेष टिप्पणी के लिए आमंत्रित करता हूँ।

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19 Comments on "मोदी: चुनावी सफलता और हिन्दी"

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ken
Guest

Here is a PM’s speech in English.

PM Narendra Modi’s address at Plenary Session of Sixth BRICS Summit
http://youtu.be/dyI83N2FtTk

How many past PMs of India ran political campaign the way Mr.Modi did?

डॉ. मधुसूदन
Guest

How many of them, were contesting election as declared P M candidates before election?
Please read the newer article on Devanagari and Roman. It relates to your arguments. You may comment on that article. Thanks

Umeshwar Shrivastava
Guest

परमादरणीय मधुसूदन जी,
आपका विश्लेषण, तार्किकता व पैनी दृष्टि का मैं कायल हूँ। अक्सर आपको पढ़ता हूँ। काश ! सही मायने में हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा बन पाती। मैं तो उस दिन के इंतज़ार में हूँ, जब सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय हिंदी में सुनाए जाएँगे, देवनागरी में उसकी प्रतिलिपि मिलेगी। आपका सादर अभिवादन।
हिंदी का सिपाही।

डॉ. मधुसूदन
Guest
हिंदी प्रेमी उमेश्वर जी, नमस्कार। आप के विचारों का मैं भी सह-भागी हूँ। दुर्भाग्य से, नेतृत्व के महाकाय ऐतिहासिक दोष का कुफल हम भोग रहे हैं। एक परम्परा जब आपाद-मस्तक बदल जाती है, तो, पुनर्स्थापना करना, असंभव नहीं तो कठिन अवश्य हो जाता है। आगे कभी आलेख सोचता हूँ। मैं तर्काधारित प्रमाणों के कारण,मानता हूँ,कि,हिंदी भारत के लिए २ से ३ गुना प्रगतिकारक है। १०-१५ वर्ष पहले नहीं मानता था; आज निःसंदेह मानता हूँ। समस्या ऊपर से ही नहीं, नीचे से भी सुलझानी होगी। कानून के साथ साथ, जन जागृति भी चाहिए। और जन जागृति भी जनता को सक्रिय बनाने… Read more »
डॉ. मधुसूदन
Guest

सभी टिप्पणीकार –सर्व श्री madhu ji, डॉ. शर्मा जी, आ. विश्वमोहन जी, मोहन गुप्ता जी, प्रशान्त होले जी, डॉ. प्रतिभा सक्सेना जी, डॉ. धनाकर ठाकुर जी, और अभिषेक उपाधाय।
सभी ने समय निकाल कर मात्र आलेख पढा ही नहीं, साथ टिप्पणी के लिए अतिरिक्त समय भी दिया।
आपका शतशः धन्यवाद करता हूँ।
इसी प्रकार अनुग्रह करते रहें।

डॉ. मधुसूदन
Guest

आदरणीय मधुसूदन जी,
आपका आलेख स्वत: प्रमाणित ,अकाट्य और तर्कसंगत है । आपके विचारों से मेरी पूर्णरूपेण सहमति है । राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रति समर्पित आपका ये आलेख सदा की भाँति पठनीय और सराहनीय है ।
सादर,
शकुन्तला बहादुर
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इ मैल से आया हुआ यह संदेश, बिना काट छाट ऊपर प्रस्तुत है।
विदुषी शकुन्तला जी को संदेश के लिए कृतज्ञता सह धन्यवाद।—मधुसूदन

अभिषेक उपाध्याय
Guest

चरण स्पर्श,

यह लेख यहाँ प्रकाशित होने के पूर्व आपके ही श्री मुख से आपके ही निज निवास पर एक-एक शब्द, पंक्ति का भावार्थ सहित आनंद लेने का सौभाग्य पूर्व सप्ताह मुझे प्राप्त हुआ !

इतना ही कहूँगा की इस सर्वाधिक महत्वपूर्ण छिपे कारण की ओर अभी तक किसी लेखक का ध्यान नहीं गया, ध्यानाकर्षण हेतु हार्दिक आभार !

उत्कृष्ट होगा यदि यह लेख का अंग्रेजी भाषांतर अंग्रेजी पत्रिका, समाचार पत्र के माध्यम से अंग्रेजीदां लोगों तक भी पहुंचे, शायद कुछ का ह्रदय परिवर्तन हो सके शोध परक इस लेख से !

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