लेखक परिचय

तनवीर जाफरी

तनवीर जाफरी

पत्र-पत्रिकाओं व वेब पत्रिकाओं में बहुत ही सक्रिय लेखन,

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-तनवीर जाफ़री

ग्लोबल वार्मिंग संबंधी समाचारों को सुन-सुन कर पूरा विश्व चिंतित हो उठा है। ग्लेशियर कालगातार पिघलना,समुद्र के जलस्तर का बढ़ना, सूखा, बाढ़ जैसी विपदाएं मनुष्य को अपने व अपनी भावी पीढ़ियों के विषय में बहुत कुछ सोचने को मजबूर कर रही हैं। सूर्य का तापमान वर्ष दर वर्ष बढ़ता ही जा रहा है। इसके कारण आमतौर पर पृथ्वी के गर्म क्षेत्रों में पड़ने वाली गर्मी का तापमान भी बढ़ने लगा है। सर्दी के मौसम में जहां अधिक सर्दी पड़ा करती थी वहां का तापमान पहले की तुलना में अधिक रहने लगा है। और जिन क्षेत्रों के लोग विशेषकर रेगिस्तानी व मरुस्थलीय गर्म प्रदेशों के लोग जो तो सर्दी के बारे में जानते ही नहीं थे ऐसे इलाक़ों से भीषण सर्दी के समाचार प्राप्त होने लगे हैं। यहां तक कि ऐसे कई शुष्क प्रदेशों व देशों में बंर्फबारी होने तक के समाचार प्राप्त हो रहे हैं। इसी प्रकार के नाममात्र बारिश होने वाले कई क्षेत्रों को न केवल भारी बारिश बल्कि बाढ़ का भी सामना करना पड़ रहा है। उपरोक्त सभी परिवर्तनों को प्राकृतिक घटनाओं व मौसम के बदलते व बिगड़ते मिजाज का परिणाम बताया जा रहा है।

गत् कई वर्षों से मौसम के इसी ‘बदलते मिजाज’ के परिणास्वरूप वर्षा ऋतु के दौरान होने वाली सामान्य बारिश में भी लगातार कमी आती जा रही थी। इसके कारण तमाम क्षेत्रों में सूखे की स्थिति पैदा हो रही थी। और इसके चलते खाद्यान्न का संकट गहरा रहा था। जिसकी वजह से मंहगाई भी बढ़ती जा रही थी। कुल मिलाकर बारिश की कमी या सामान्य बारिश का न होना आम लोगों के लिए मुसीबत का कारण बनता जा रहा था। लगता है प्रकृति ने बारिश की कमी के कारण प्रभावित लोगों द्वारा की जाने वाली फरियाद सुन ली है। शायद इसी का परिणाम है कि इस वर्ष केवल भारतवर्ष ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया से सामान्य से अधिक बारिश रिकॉर्ड किए जाने के समाचार प्राप्त हो रहे हैं। नि:संदेह इन दिनों अथवा पिछले कुछ पखवाड़ों के बीच हुई बारिश जहां वैज्ञानिकों, किसानों, उद्यमियों तथा आम लोगों के लिए खुशी तथा संपन्नता तथा उज्‍जवल भविष्य का संदेश लेकर आई है वहीं इसी बारिश ने बाढ़ का रूप धारण कर लाखों लोगों का जीना भी दूभर कर दिया है।

कहीं से ऐसी खबरें आ रही हैं कि पूरा का पूरा शहर डूब गया है तो कहीं गांव के गांव बह जाने के समाचार हैं। कहीं नदी का कटाव किसानों का खेत ही बहा कर ले गया तो कहीं कई राजमार्ग अथवा मु य मार्ग नदी के अथवा बाढ़ के पानी के बहाव में समा गए। गोया आमतौर पर वरदान समझी जाने वाली बारिश, बाढ़ का रूप धारण कर तमाम लोगों के लिए बड़ी मुसीबत का कारण भी बन गई है। नदी के अथवा पहाड़ी नदियों व नालों के किनारे बसे तमाम खेतों व घरों के उजड़ने के समाचार मिल रहे हैं तो कई जगहों से नदी के किनारे बने तटबंधों में दरारें पड़ने की खबरें आ रही हैं। तटबंधों में दरारें कस्बों, गांवों,शहरों अथवा राजमार्गों को बाढ़ की चपेट में ले लेती हैं। और बाढ़ का प्रकोप अपनी तीव्रता के अनुसार किसी भी हद तक जा सकता है। जान व माल की तबाही व बरबादी, पशुधन का नुंकसान, फसलों का चौपट होना, खेत-खलिहान, मकान आदि सब कुछ प्रलय रूपी बाढ़ की भेंट चढ़ जाना और इन सब के बाद फैलने वाली महामारी रूपी बीमारियों की चपेट में आना आदि ऐसे और भी कई गंभीर परिणाम आम लोगों को भुगतने पड़ते हैं।

यहां प्रश्न यह है कि पूर्व में जहां पहले सामान्य बारिश हुआ करतीथी वहीं कभी-कभार सामान्य से अधिक वर्षा का होना भी कोई इतनी अचंभित करने वाली बात नहीं मानी जाती थी। हम सभी को अपने जीवन के वे दिन भली-भांति याद होंगे जबकि सप्ताह,दस दिन और कभी-कभी 15 दिन लगातार बारिश होती रहती थी। आम लोग बारिश के रुकने के लिए मन्नतें मांगते थे। इसी वर्षा ऋतु में लोग सूर्यदेवता के दर्शन के लिए तरस जाया करते थे। उन दिनों में भी सामान्य से अधिक बारिश रिकॉर्ड की जाती थी। परंतु ऐसी तो व लगातार होने वाली बारिश के बावजूद न तो कहीं से बाढ़ की खबर सुनाई देती थी न ही किसी के घर, खेत, गांव आदि के बारिश के पानी में बहने का समाचार मिलता था। न ही तटबंधों में दरार पड़ने की खबरें इतनी अधिकता के साथ सुनाई देती थीं। परंतु अब तो सामान्य से अधिक बारिश की तो बात ही क्या करनी सामान्य से कम बारिश से भी आम आदमी डरने लगा है। यहां तक कि आसमान पर छाए घने बादलों को देखकर भी आम आदमी अब यह सोचने पर मजबूर हो जाता है कि कहीं बारिश के बाद बाढ़ न आ जाए। गोया बाढ़ और बारिशएक दूसरे के पूरक बन चुके हैं।

उपरोक्त परिस्थितियों में प्रत्येक व्यक्ति के मन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि आंखिर पृथ्वी की सहनशक्ति अचानक इतनी कैसे परिवर्तित हो गई है कि मामूली सी बारिश भी प्रलयरूपी बाढ़ का रूप धारण कर लेती है? इसमें प्रकृति का दोष है या प्राकृतिक संसाधनों में अपनी भरपूर दंखलअंदाजी करने वाले हमारे आपके सगे संबंधी कहे जा सकने वाले मानव जाति के लोगों का? जैसा कि अपने इस आलेख में मैं ऊपर स्पष्ट कर चुका हूं कि पूर्व में सामान्य से अधिक वर्षा होने पर भी बाढ़ जैसे विनाशकारी दौर से मनुष्य को आमतौर पर नहीं गुजरना पड़ता था। अत: इसी से यह साफ हो जाता है कि जब तक प्रकृति के वश में था तब तक प्रकृति ने अपना संतुलन प्रत्येक मौसम व क्षेत्र में बराबर बनाए रखा। और जब प्रकृति की व्यवस्था में छेड़छाड़ की इंतेहा हो गई तब ऐसे में उसी प्रकृति ने अपना रौद्र रूप भी धारण कर लिया। उदाहरण के तौर पर भारत में चारों ओर राष्ट्रीय राजमार्ग बनाए जा रहे हैं। दूसरे शब्दों में विकास की राह पर चल रहा है। नई रेल लाईनें बिछ रही हैं। दिल्ली में राष्ट्रमंडल खेल आयोजित हो रहे हैं। तमाम राज्‍यों में नए-नए एक्सप्रेस हाईवे का निर्माण हो रहा है। तमाम नए शहर नए एक्सप्रेस हाईवे के किनारे बसाए जा रहे हैं। कहीं औद्योगिक नगर बन रहे हैं तो कहीं हाईटेक सिटी बनाए जा रहे हैं। आलीशान होटल, बड़े से बड़े मल्टीप्लेक्स, गगनचुंबी इमारतें,मैट्रो परियोजनाएं, सीलिंक ब्रिज, कोंकण रेल परियोजना, कश्मीर घाटी रेल परियोजना तमाम नए डैम आदि सब कुछ विकास के नाम पर निर्मित हो रहा है। अब जरा आप ही सोचिए कि उपरोक्त निर्माण कार्यों में लगने वाला कोई भी कच्चा माल विशेषकर मिट्टी, रेत, बजरी,पत्थर और सीमेंट आदि का स्त्रोत क्या है? यही नदियां, पहाड़ी नाले व पहाड़ी नदियां तथा पथरीले पहाड़। अर्थात् हम कह सकते हैं किप्राकृतिक संपदा का अथाह व बेहिसाब दोहन ही हमें ऐसे बाढ़रूपी हालात का सामना करने के लिए मजबूर कर रहा है।

जब नदियों से अथवा पहाड़ी नदियों व पहाड़ी नालों से रेत पत्‍थर व बजरी की बाज़ार की ओर निकासी होती है तब इसका दोहन करनेवाला माफि़या रूपी नेटवर्क अपनी सुविधा के अनुसार नदी व नालों के मध्‍य पहुंचने के लिए कहीं किसी तटबंध को काटकर रास्‍ता बनाता है तो कहीं उस तटबंध को छीलकर इतना नीचा कर देता है कि उसके ट्रेक्‍टर व ट्रक आदि आसानी से नदी-नालों के बीच जाकर रेत, बजरी व पत्‍थर आदि की ढुलाई कर सकें।

यही परिस्थितियां नदियों के प्राकृतिक बहाव के रुख़ को भी एक दिशा से दूसरी दिशा की ओर मोड़ देती हैं। और इसी नतीजे में कभी कोई किसान बैठे-बिठाए भूमिहीन हो जाता है तो कभी कोई गांव या मोहल्‍ला जलमग्‍न हो जाता है। गोया खनन माफि़या ही प्रलयरूपी बाढ़ को अनचाही जगहों तक पहुंचाने के लिए सबसे बड़ा दोषी व जिम्‍मेदार हैं। अब प्रश्‍न यह है कि छोटे से छोटे खनन माफि़या से लेकर बेल्‍लारी रेड्डी बंधुओं जैसे देश के सबसे बड़े खनन उद्यमी तक के लंबे राजनैतिक हाथों को देखकर आप स्‍वयं इस बात का अंदाज़ा लगा सकते हैं कि अवैध, अप्राकृतिक तथा असीमित खनन का यह सिलसिला यूं ही जल्‍द ख़त्‍म नहीं होने वाला है। और यदि यह सिलसिला यूं ही जारी रहेगा तो कोई आश्‍चर्य नहीं कि भविष्‍य में बरसात और वर्षा ऋतु के मौसम में हमें इससे भी बदतर हालात से जूझना पड़े। कुल मिलाकर हमें बाढ़ जैसे विनाशकारी हालात के लिए प्रकृति पर दोष मढ़ने के बजाए मानव निर्मित समस्‍याओं को अधिक दोषी ठहराना चाहिए।

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2 Comments on "प्राकृतिक कम, मानव निर्मित अधिक हैं बाढ़ के कारण"

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sunil patel
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वाकई स्तिथि बहुत चिंताजनक है. श्री जाफरी साहब जी ने बहुत अच्छा विश्लेचन लिया है.

कहते है की प्रकृति अपने आप को खुद संतुलित कर लेती है. जब जब ऐसा होता है तो प्राणी जगत में बहुत बड़ा बदलाब आता है, हम खुद इसके जिम्मेदार होंगे.

Anil Sehgal
Guest
प्राकृतिक कम, मानव निर्मित अधिक हैं बाढ़ के कारण -by-तनवीर जाफ़री (१) जाफरी साहेब ने भीषण बाढ़ के कारण पर एक सिधांत प्रस्तुत किया है. (२) होटल, मल्टीप्लेक्स, इमारतें,मैट्रो, सीलिंक, रेल, डैम आदि निर्मित हो रहे हैं. (३) निर्माण कार्यों में लगने वाला कच्चा माल मिट्टी, रेत, बजरी,पत्थर और सीमेंट आदि का स्त्रोत नदियां, नाले तथा पथरीले पहाड़ हैं. (४) प्राकृतिक संपदा का दोहन बाढ़ के कारण है. (५) नदियों, नालों से रेत पत्‍थर व बजरी की बाज़ार की ओर निकासी होती है. (६) दोहन करनेवाला माफि़या नदी व नालों पहुंचने के लिए तटबंध काटकर रास्‍ता बनाता है. (७) कहीं… Read more »
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