लेखक परिचय

प्रवीण दुबे

प्रवीण दुबे

विगत 22 वर्षाे से पत्रकारिता में सर्किय हैं। आपके राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय विषयों पर 500 से अधिक आलेखों का प्रकाशन हो चुका है। राष्ट्रवादी सोच और विचार से प्रेरित श्री प्रवीण दुबे की पत्रकारिता का शुभांरम दैनिक स्वदेश ग्वालियर से 1994 में हुआ। वर्तमान में आप स्वदेश ग्वालियर के कार्यकारी संपादक है, आपके द्वारा अमृत-अटल, श्रीकांत जोशी पर आधारित संग्रह - एक ध्येय निष्ठ जीवन, ग्वालियर की बलिदान गाथा, उत्तिष्ठ जाग्रत सहित एक दर्जन के लगभग पत्र- पत्रिकाओं का संपादन किया है।

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भाग खड़े हुए सोज और आजाद
कश्मीर का चुनाव चक्रब्यूह
प्रवीण दुबे
जम्मू-कश्मीर विधानसभा की 87 सीटों के लिए चुनाव प्रचार चरम पर जा पहुंचा है। 25 नवंबर को यहां प्रथम चरण के लिए वोट डाले जाएंगे। शायद कश्मीर चुनाव में ऐसा पहली बार देखने को मिल रहा है कि यहां अलगाववादी अलग-थलग से पड़ गए हैं और यहां की जनता उस दल का समर्थन करती दिखाई दे रही है जिस पर मुस्लिम विरोधी और प्रबल राष्ट्रवादी दल होने का आरोप लगता रहा है। जम्मू-कश्मीर के राजनैतिक परिदृश्य की चर्चा की जाए तो सामान्यत: यहां तीन प्रभावकारी राजनैतिक दल माने जाते रहे हैं। इनमें कांग्रेस, नेशनल कांफ्रेंस और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी शामिल है। वर्तमान में यहां नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस गठबंधन की सरकार सत्तासीन है। पीडीपी विपक्षी दल की भूमिका में है। जहां तक भारतीय जनता पार्टी का सवाल है। 1952 से लेकर अब तक भाजपा का विधानसभा में सबसे बेहतर प्रदर्शन 11 का रहा है। लेकिन कश्मीर चुनाव में इस बार तस्वीर उलट दिखाई दे रही है। जम्मू संभाग की  37 और लद्दाख की 4 विधानसभा सीटों पर भाजपा खासी मजबूत दिखाई दे रही है। इस क्षेत्र में भाजपा की मजबूत स्थिति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि छह माह पूर्व हुए लोकसभा चुनाव में जम्मू-कश्मीर की कुल छह लोकसभा सीटों में से जम्मू व लद्दाख की तीन अर्थात राज्य की आधी लोकसभा सीटों पर भाजपा ने विजय परचम लहराया था। जम्मू में पार्टी कितनी मजबूत है इसका प्रमाण इस बात से लग जाता है कि यहां की बीस विधानसभा क्षेत्रों में से 16 में भाजपा को बढ़त मिली थी।
महत्वपूर्ण बात यह है कि जम्मू-कश्मीर में सत्तासीन कांग्रेस नेशनल कांफ्रेंस गठबंधन का राजनैतिक विकल्प होने का ढिंढोरा पीटने वाली पीडीपी असफल दिखाई दी और सरकार विरोधी लहर का लाभ भाजपा के पक्ष में गया था। जहां तक नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस का सवाल है वह दोनों दल अब अलग-अलग होकर चुनाव मैदान में हैं। लोकसभा चुनाव में तो इन दलों का खाता ही नहीं खुल सका था। वर्तमान में जो लहर कश्मीर में चल रही है उसे देख यह कतई नहीं लगता कि इन दलों का प्रदर्शन उन्हें सत्ता तक ले जाएगा।
यह दोनों दल विधानसभा चुनावों को लेकर किस कदर निराशा में डूबे हैं इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि नैशनल कांफ्रेंस के उमर अब्दुल्ला अपने परिवार की परम्परागत सीट गांदरवल छोड़कर भाग खड़े हुए हैं। वे इस बार श्रीनगर की सोनावर और बडग़ाम जिले की बीरवाह सीट से चुनाव मैदान में हैं। यहां बताना उपयुक्त होगा कि अब्दुल्ला परिवार 1975 से ही इस परम्परागत सीट से चुनाव लड़ता आया है और यह इनकी पुश्तैनी सीट मानी जाती रही है। उमर अब्दुल्ला का यहां से भागना और दो स्थानों से भाग्य आजमाना इस बात का संकेत है कि वे अपनी संभावित हार को महसूस कर रहे हैं।
इस दृष्टि से कांग्रेस की हालत तो नेशनल कांफ्रेंस से भी गई बीती लगती है। कश्मीर में कांग्रेस के मुख्यत: दो दिग्गज नेता माने जाते हैं। यह हैं गुलाम नबी आजाद और प्रो. सैफुद्दीन सोज, यह दोनों ही नेता तो चुनावी रण से ही भाग खड़े हुए हैं। हालांकि इसके पीछे पार्टी द्वारा यह कारण बताया जा रहा है कि पार्टी को मजबूत करने और चौतरफा चुनाव प्रचार के लिए वे स्वयं चुनाव मैदान में नहीं कूदे हैं। परन्तु सच तो यह है कि डूबते जहाज की कोई सवारी नहीं करना चाहता, यह नेता भली प्रकार यह भांप चुके हैं कि चुनाव में ऊंट किस करवट बैठने वाला है।

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पांच चरणों में होगा मतदान
जम्मू-कश्मीर विधानसभा के लिए पांच चरणों में चुनाव होंगे। प्रथम चरण का चुनाव 25 नवंबर को पहला चरण, दूसरा चरण का चुनाव 2 दिसंबर, तीसरे चरण का चुनाव 9 दिसंबर, चौथे चरण का चुनाव 14 दिसंबर और पांचवे चरण का चुनाव 20 दिसम्बर को होगा। 87 सदस्यीय जम्मू-कश्मीर विधानसभा का कार्यकाल 19 जनवरी को समाप्त हो रहा है। मौजूदा जम्मू-कश्मीर विधानसभा का कार्यकाल छह वर्ष था।

किसी को नहीं मिला बहुमत
2008 में जम्मू-कश्मीर की 87 सीटों के लिए हुए विधानसभा चुनाव में किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला था। नेशनल कॉन्फ्रेंस 28 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। एन सी ने कांग्रेस के समर्थन से राज्य में उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व में सरकार बनाई।

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