लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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होली आते ही मौसम सुहावना हो जाता है। हर तरफ बसंती उल्लास। नाचते-गाते लोग। मस्ती करते पशु और चहचहाते पक्षी। स्वच्छ धरती और मुक्त आकाश। डालियों पर हंसते फूल और कलियां। शीतल और गुनगुनी हवा में अठखेलियां करती गेहूं की बालियां। ऐसा लगता है मानो अल्हड़ नवयौवनाएं एक दूसरे के गले में हाथ डाले पनघट से ‘पनिया भरन को’ जा रही हों। इस फागुनी मौसम में जिसका मन तरंगित न हो, उसे युवा कहना यौवन का ही अपमान है। कवि कैलाश गौतम ने ठीक ही लिखा है –

फागुन आया गांव में, उड़ी सभी की नींद

आंखों में सौदे हुए, होठों कटी रसीद।

मौसम में गरमी बढ़ते ही खेतों में सुनहरा कालीन बिछ जाता है। ताजे गेहूं की सुगंध मानव तो क्या, देवताओं तक को मदमस्त कर देती है। जो लोग अपनी जीवन-यात्रा पूरी कर ऊपर जा चुके हैं, उन्हें तो क्या कहें; पर जिन्हें वहां जाना नसीब नहीं हुआ, उनका भी मन करता है कि काश वे धरती फाड़कर इस माहौल का मजा ले सकें; पर ये उनके हाथ में तो है नहीं। इसलिए बेचारे मजबूर हैं। सरदी, गरमी हो या फिर बरसात। पड़े हैं कयामत की प्रतीक्षा में। किस्मत के इन मारों को ये भी नहीं पता कि इससे पहले कयामत कब हुई थी, और आगे भी होगी या नहीं ? कोई ठीक-ठीक ये बताने का दावा भी नहीं करता। किसी किताब में भी ये नहीं लिखा। खुदा रहम करे। मुझे इन दुखी आत्माओं पर बहुत तरस आता है।

लेकिन जीवित और मुरदों के बीच में एक श्रेणी और होती है। जो व्यक्ति इस श्रेणी में हो, चिकित्सक उसे ‘बेहोश’ या ‘कोमा’ में बताते हैं। साहित्य में उसे क्या कहेंगे, मुझे पता नहीं। जब से पांच राज्यों के चुनाव परिणाम आये हैं, हमारे प्रिय शर्मा जी भी इसी स्थिति में हैं। हर बार वे होली काफी धूमधाम से मनाते थे। तैयारी तो इस बार कुछ अधिक ही थी। कई किलो रंग, गुलाल, मिठाइयां और पटाखे मंगवा लिये थे। तिरंगे गुब्बारों से घर की सजावट हो गयी थी। बैंड वालों को भी अग्रिम दे दिया था; पर सब धरा रह गया। तब से आज तक वे न जाने कहां हैं ? कोई घर जाए, तो मैडम अंदर से ही मना कर देती हैं। पुराना फोन उन्होंने पिछले साल हटवा दिया था। अब मोबाइल भी बंद है। बेचारे शर्मा जी..। भगवान किसी को ऐसे दिन न दिखाए।

शर्मा जी की इस अनुपस्थिति से सभी मित्र दुखी हो गये। सबने मुझे यह जिम्मेदारी दी कि मैं वास्तविकता का पता लगाऊं। मैं ठहरा उनका लंगोटिया यार। सो मैं अगले दिन सुबह ही उनके घर जा पहुंचा। मुझे देखकर भाभी जी ने दरवाजा खोल दिया।

अंदर का हाल देखकर कलेजा मुंह को आ गया। शर्मा जी बिस्तर पर निढाल पड़े थे। मलीन वस्त्रों से लग रहा था मानो कैकेयी कोपभवन में हो। भाभी जी ने बताया कि ये कई दिन से नहाए नहीं हैं। मैंने शर्मा जी को जबरदस्ती बिस्तर से उठाकर गरम पानी से नहलाया। साफ कपड़े पहनाये और फिर हम साथ-साथ चाय पीने बैठ गये।

– शर्मा जी, चुनाव तो आते-जाते रहते हैं। इसमें इतना दुखी होने की जरूरत नहीं है।

– नहीं वर्मा। मेरा दिल टूट गया है। मैं सोच रहा हूं कि राजनीति छोड़ दूं।

– शर्मा जी, राजनीति तो वे छोड़ें, जिन्हें अयोग्य होते हुए भी वहां बैठा दिया गया है।

– देखो वर्मा, अगर तुम्हारा इशारा राहुल बाबा की तरफ है, तो ये मैं बिल्कुल नहीं सह सकता। वे हमारी पार्टी का वर्तमान भी हैं और भविष्य भी।

– शर्मा जी, बहुत साल पहले एक फिल्म आयी थी, ‘‘दुल्हन वही जो पिया मन भाये।’’ अब उसका नया संस्करण आ गया है।

– अच्छा …. ?

– जी हां। भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में नेता वही माना जाता है, जो वोट दिला सके। कांग्रेस में एक समय इंदिरा जी और राजीव गांधी वोट खींचने वाले नेता थे। इसलिए लाख कमियां होते हुए भी पार्टी उन्हें सिर पर बैठाए रही। फिर सोनिया मैडम सहानुभूति के वोट लेती रहीं; पर अब वे बीमार हैं। वोट खींचने के मामले में राहुल बाबा और पिंकी दीदी फेल हो चुके हैं। इसलिए अगर पार्टी चलानी है, तो इन दोनों को सम्मान सहित कूड़े में फेंककर जमीनी नेताओं को आगे लाओ, तब पार्टी बचेगी। वरना आत्महत्या करने की तो किसी को मनाही नहीं है।

– मैं तो ऐसा नहीं मानता। ये परिवार हमारी आंखों का नूर है।

– ये आपका दोष नहीं है। आपके यहां सबको मोतियाबिंद हो चुका है। इसलिए उन्हें कुएं से आगे दिखायी ही नहीं देता।

– तुम साफ-साफ बताओ वर्मा कि कहना क्या चाहते हो ?

– शर्मा जी, मैं तो एक ही बात कहना चाहता हूं कि –

दुल्हन वही जो पिया मन भाए,

और नेता वही जो वोट दिलाए।

इतना कहकर मैं वापस चला आया। शर्मा जी का तो पता नहीं; पर सुना है कि बचे-खुचे कांग्रेसी अपनी हड्डियां सेकते हुए इस सूत्र पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं।

 

– विजय कुमार

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