लेखक परिचय

शैलेन्द्र चौहान

शैलेन्द्र चौहान

कविता, कहानी, आलोचना के साथ पत्रकारिता भी। तीन कविता संग्रह ; 'नौ रुपये बीस पैसे के लिए'(1983), श्वेतपत्र (2002) एवं, 'ईश्वर की चौखट पर '(2004) में प्रकाशित। एक कहानी संग्रह; नहीं यह कोई कहानी नहीं (1996) तथा एक संस्मरणात्मक उपन्यास पाँव जमीन पर (2010) में प्रकाशित। धरती' नामक अनियतकालिक पत्रिका का संपादन। मूलतः इंजीनियर। फिलहाल जयपुर में स्थायी निवास एवं स्वतंत्र पत्रकार।

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शैलेन्द्र चौहान

वर्ष 2002 के गुजरात के दंगा पीड़ितों ने तीस्ता सीतलवाड और अन्य के ख़िलाफ़ उनके एनजीओ सिटीजन फॉर जस्टिस एंड पीस के लिए विदेशी चंदा लेने और उसके दुरुपयोग का आरोप लगाया है। दंगाइयों ने 28 फरवरी 2002 में अहमदाबाद की गुलबर्ग सोसायटी पर हमला कर दिया था। इसमें करीब 69 लोग मारे गए थे। मारे गए लोगों की याद में सोसायटी में स्मारक बनाने के लिए वहीं के लोगों ने सीतलवाड की अगुवाई में 1.51 करोड़ रुपए जमा किए थे। लेकिन स्मारक बनाने की योजना रद्द कर दी गई। आरोप है कि इन पैसों से तीस्ता ने पाकिस्तान, अबुधाबी, कूवैत, स्विट्जरलैंड, यूएई जैसे देशों की यात्रा की। यही नहीं, निजी ऑनलाइन खरीदी में भी इन पैसों का इस्तेमाल किया। यह सर्वविदित है कि गुजरात दंगों के पीड़ितों को न्याय दिलाने में मदद कर रही सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड गुजरात पुलिस और गुजरात सरकार की आँखों की किरकिरी रही हैं। इसलिए किसी एक एनजीओ पर यह कार्यवाही मंतव्य-प्रेरित लगती है जबकि इस देश में लाखों एनजीओ सक्रिय हैं और उनकी विश्वसनीयता व गतिविधियां संदेह से पर नहीं हैं। लेकिन सरकार बाकी एनजीओ को मिलाने वाले फंड और उसके उपयोग की कोई जांच नहीं कराती जबकि इनपर अकसर गड़बड़ियों के आरोप लगते हैं। इन संस्थाओं के बारे में ध्यान देने योग्य कुछ तथ्यों पर यदि चर्चा की जाए तो हमें इनकी असली कार्यप्रणाली पता चलेगी। दो वर्ष पहले  सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने भारत में सक्रिय एनजीओ यानी गैर सरकारी संस्थाओं के बारे में जो जानकारी जुटाई, वह चौंकाने वाली है। इस सूचना के मुताबिक इस वक्त भारत में करीब 20 लाख एनजीओ सक्रिय हैं। जिसमें लगभग आधे उत्तर प्रदेश और केरल में ही हैं। रिपोर्टो के अनुसार जांच से सामने आ रही जानकारियां बहुत चौंकानेवाली हैं। केंद्रीय जांच ब्यूरो ने अपनी एक जांच रिपोर्ट में अनुमान लगाया है कि हर 600 व्यक्तियों पर एक एनजीओ! जबकि हर 1700 लोगों के लिए सिर्फ एक डॉक्टर और 943 लोगों के लिए सिर्फ एक पुलिसकर्मी की उपलब्धता है। इन स्वयंसेवी संस्थाओं को केंद्र और राज्य सरकारों से औसतन एक हजार करोड़ रुपये का वार्षिक अनुदान मिलता है। गृह मंत्रालय की एक रिपोर्ट बताती है कि विदेशों से मिलनेवाले अनुदान की रकम दस हजार करोड़ सालाना है। आरोप है,  कि बहुत से एनजीओ उन्हें मिले अनुदान और अपने खर्चों का ब्योरा आय कर विभाग को नहीं सौंपते।
एनजीओ के प्रति आकर्षण का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि मौजूदा समय में हमारे देश में सक्रिय सूचीबद्घ एनजीओ की संख्या एक रिपोर्ट के मुताबिक 33लाख के आसपास है। यानी हर 365 भारतीयों पर एक एनजीओ। महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा एनजीओ हैं, करीब 4.8 लाख। इसके बाद दूसरे नंबर पर आंध्रप्रदेश है। यहां 4.6 लाख एनजीओ हैं। उत्तर प्रदेश में 4.3 लाख, केरल में 3.3 लाख, कर्नाटक में 1.9 लाख, गुजरात 1.7,  पश्चिम बंगाल में 1.7 लाख, तमिलनाडु में 1.4 लाख, उड़ीसा में 1.3 लाख तथा राजस्थान में एक लाख एनजीओ सक्रिय हैं। इसी तरह अन्य राज्यों में भी बड़ी तादाद में गैर सरकारी संगठन काम कर रहे हैं। दुनिया भर में सबसे ज्यादा सक्रिय एनजीओ हमारे ही देश में हैं। 2010-11 में 22,000 एनजीओज को लगभग सवा खरब रुपए का विदेशी अनुदान मिला था। उस धन का करीब एक तिहाई हिस्सा अमेरिका से आया। इतना धन आखिर कहां खर्च होता है? इस रकम का बड़ा  हिस्सा मानदेय, यात्रा, छपाई और स्टेशनरी पर खर्च कर दिया गया। यह कथा ज्यादातर बड़े या छोटे एनजीओज में देखी जा सकती है। हकीकत यही है कि एनजीओ नौकरशाही ढांचे में चलने वाले ऐसे संगठन बन गए हैं, जहां धन का दुरुपयोग और भ्रष्टाचार आम है। वे खर्च का ब्योरा देने की वैधानिक आवश्यकताएं भी पूरी नहीं करते। सीबीआई की जांच से ऐसी गड़बड़ियों की कई परतें खुली हैं। अब जरूरत इन पर लगाम लगाने या एनजीओज को जवाबदेह बनाने के लिए जरूरी उपाय करने की है। खुद राजनेताओं या उनसे जुड़े लोगों और रिटायर्ड नौकरशाहों में अपना एनजीओ खोलने की प्रवृत्ति बढ़ती गई है। उनके प्रभाव के कारण एनजीओज पर नकेल नहीं कसी जाती। क्या सुप्रीम कोर्ट अब उचित दिशा-निर्देश तैयार कर उन पर अमल सुनिश्चित कराएगा?  भारत में गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) का जैसा जाल फैला हुआ है, उसके मद्देनजर भारत को आज सामाजिक एवं आर्थिक समस्याओं से मुक्त देश होना चाहिए था। आखिर ये एनजीओ बड़े मकसदों को लेकर स्थापित होते हैं और उनके पास संसाधनों की कोई कमी नहीं होती। फिर भी उनसे आम आदमी की जिंदगी में कोई खास बदलाव नहीं हुआ, तो इसका मतलब यह हुआ कि ये संगठन अपने घोषित उद्देश्यों के मुताबिक काम नहीं कर रहे हैं। धन की बात करें तो किसी भी एनजीओ को सरकारी, गैर-सरकारी, देसी-विदेशी किसी भी स्रोत से चंदा लेने में कोई गुरेज नहीं है।  दान, सहयोग और विभिन्न फंडिंग एजेंसियों के जरिये एनजीओ क्षेत्र में अरबों रुपया आता है। अनुमान है कि हमारे देश में हर साल सारे एनजीओ मिल कर 40 हजार से लेकर 80 हजार करोड़ रुपये तक जुटा ही लेते हैं। सबसे ज्यादा पैसा सरकार देती है। ग्यारहवीं योजना में सामाजिक क्षेत्र के लिए 18 हजार करोड़ रुपये का बजट रखा गया था। दूसरा स्थान विदेशी दानदाताओं का है। सिर्फ सन् 2005 से 2008 के दौरान ही विदेशी दानदाताओं से यहां के गैर सरकारी संगठनों को 28876 करोड़ रुपये (करीब 6 अरब डॉलर) मिले। इसके अलावा कॉरपोरेट सेक्टर से भी सामाजिक दायित्व के तहत काफी धन गैर सरकारी संगठनों को प्राप्त होता है। लेकिन सरकार इनके धन का ऑडिट नहीं कराती। दर असल इसके पीछे एक छुपा हुआ तथ्य यह है कि देश के अधिसंख्य एनजीओ या तो ब्यूरोक्रेट्स के संबंधी या मित्रों द्वारा संचालित हैं या नेताओं के परिजनों के नाम से बने हैं। समय समय पर इनमें घपलों और अनियमितताओं की बात उठती रही है लेकिन इसे ठीक करने के गंभीर प्रयत्न निहित स्वार्थों के चलते कभी नहीं किए गए। ग़ैर सरकारी संगठन मुख्यतः 20 वीं सदी में नज़र आए, यद्यपि मुट्ठीभर ग़ैर सरकारी संगठन 19 वीं सदी में भी मौजूद थे। पहले विश्व युद्ध के दौरान पश्चिम में 344 ग़ैर सरकारी संगठन मौजूद थे। इन ग़ैर सरकारी संगठनों का मुख्य उद्देश्य उपनिवेशों में औपनिवेशिक शक्तियों की संस्कृति और मूल्यों का प्रचार और फैलाव करना था, इसके साथ-साथ वे आवश्यक सूचनाएं इकट्ठी करने में और खुफिया गतिविधियों में भी संलिप्त रहते थे। अतः उन्हें औपनिवेशिक सरकारों का समर्थन हासिल रहता था। चर्च जैसे मिशनरी संस्थान उस वक्त ग़ैर सरकारी संगठनों का मुख्य स्वरूप होते थे। ये सभी औपनिवेशिक शासकों को हर प्रकार का समर्थन उपलब्ध करवाते थे। यह काम अब भी बहुत से विदेशी एनजीओ यथावत कर रहे हैं। इस प्रसंग में फोर्ड फाउंडेशन जैसी संस्थाओं का नाम कई बार उछला है। असल में एनजीओ मुनाफाखोर पूंजीवाद का वह मानवीय चेहरा हैं, जहां पूंजीपति अपनी बेतहाशा मुनाफाखोरी का एक छोटा सा हिस्सा सामाजिक कार्यों के लिए अपनी कुछ विशेष मंतव्य तथा आकांक्षाओं हेतु इन्हें सौंप देते हैं।
गैरसरकारी संगठन जिस प्रकार का काम करते हैं उसके आधार पर उन्हें तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है। ग़ैर सरकारी संगठनों की पहली श्रेणी में वे संगठन आते हैं जो युद्ध, प्राकृतिक आपदाओं, दुर्घटनाओं आदि के शिकार व्यक्तियों को फौरी राहत उपलब्ध करवाते हैं। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद यूरोपीय पुनर्निर्माण के समय तक इस प्रकार के ग़ैर सरकारी संगठन ही सबसे प्रमुख थे। गैरसरकारी संगठनों की दूसरी श्रेणी अपना ध्यान दीर्घावधि के सामाजिक और आर्थिक विकास पर केन्द्रित करती है। वे 1960 के दशक में यूरोप में प्रमुख रुप से उभरे। तीसरी दुनिया के देशों में इस प्रकार के ग़ैर सरकारी संगठन तकनीकी प्रशिक्षण देने में, स्कूलों, अस्पतालों, शौचालयों आदि के निर्माण में लगे हुए हैं। वे आत्मनिर्भरता, स्थानीय उत्पादक संसाधनों के विकास को, ग्रामीण बाज़ार के विकास को, विकास गतिविधियों में जनता की भागीदारी को प्रोत्साहित करने का दावा करते हैं। वे स्वयं सहायता समूहों, छोटे पैमाने की क़र्ज़ देनेवाली संस्थाओं आदि को बढ़ावा देते हैं।
ग़ैर सरकारी संगठनों की तीसरी श्रेणी सामाजिक कार्रवाइयों पर ध्यान केन्द्रित करती हैं। वे जनता की क्षमताओं को मजबूत करने की, उनमें अन्तर्निहित संभावनाओं को तलाशने की, जनता की सामाजिक चेतना को बढ़ाने की, पूर्व पूंजीवादी व्यवस्थाओं के प्रभाव से उबरने की बात करते हैं। ये ग़ैर सरकारी संगठन विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व व्यापार संगठन और अन्य संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों के साथ समझौता करते हैं और सुधारों की वकालत करते हैं, जनता को शांतिपूर्ण ढंग से लामबंद करते हैं और इन साम्राज्यवादी एजेंसियों तथा सरकारों पर सुधार लाने और नीतियों में बदलाव लाने के लिए दबाव बनाते हैं। ग़ैर सरकारी संगठनों की पहली और तीसरी श्रेणी  में मुख्यतः ईसाई धार्मिक संस्थान जैसे कि चर्च आदि आते हैं। यद्यपि ये ग़ैर सरकारी संगठनों की दूसरी श्रेणी में भी मौजूद रहते हैं। मोटे तौर पर ग़ैर सरकारी संगठनों की पहली श्रेणी को सहायतार्थ संगठन का नाम दे सकते हैं, दूसरी श्रेणी को विकास संगठनों और तीसरी को सामूहिक (पार्टीसिपेटरी) और वैश्विक संगठनों का नाम दे सकते हैं। ग़ैर सरकारी संगठनों की पहली श्रेणी प्रत्यक्ष औपनिवेशिक शासन के काल की विशेषता थी, दूसरी श्रेणी शीतयुद्ध काल की विशेषता थी और तीसरी श्रेणी वैश्वीकरण के युग में सक्रिय है। यद्यपि कुछ ग़ैर सरकारी संगठनों के मामलों में इनके काम मिश्रित हैं, इसके बावजूद इनका श्रेणीकरण इनकी प्रमुख गतिविधि के आधार पर किया गया है। यह ध्यान में रखने की बात है कि अलग-अलग कालों में ग़ैर सरकारी संगठनों के काम साम्राज्यवादियों की बदलती ज़रूरतों के हिसाब से तय किये जाते रहे हैं। एक समय था जब सारे एनजीओ खुद को राजनीति से अलग बताते थे, हालांकि ‘नो पॉलिटिक्स प्लीज’ की भी अपनी एक राजनीति होती है। बहरहाल, हाल के वर्षों में कई एनजीओ राजनीति को सुधारने के काम में लग गए। आश्चर्य यह भी कि एक बाल मजदूरों पर काम करने वाले एनजीओ संचालक को नोबेल पुरस्कार भी मिल गया। जबकि यह कोई नहीं जानता कि इस एनजीओ की असल भूमिका और उपलब्धियां कितनी बड़ी हैं। क्या वे नोबेल पुरस्कार योग्य हैं ? ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर एनजीओ की असल राजनीति क्या है क्या यह वाकई समाजहित  और जनहित में है ?

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2 Comments on "एनजीओ का मायाजाल"

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sureshchandra.karmarkar
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sureshchandra.karmarkar
आपका जानकारी से भरा लेख आँखे खोलनरवाला है. अगर हम समय पर सजग नहीं होंगे तो स्थितियां भयावह हो जाएंगी. ऍन जी ओ के मायाजाल के अलावा धर्म का मायाजाल भी जबरदस्त चुनौती है. शहर शहर और देहात देहात में धर्म के ठेकेदारों ने अपने अड्डे बना रखे हैं. विशालकाय मठ ,आश्रम ,सत्संग हाल. एएन जीओ की तरह इन्हे विदेशों से भी पैसा आता है और भोली भली जनता अपनी गाढ़ी कमाई का पैसा दान देकर इन्हे अर्थी रूप से प्रबल बनाती है.पिछले दिनों हरियाणा के एक संत को गिरफ्तार करने के लिए सरकार को कितने करोड़ रुख़र्च करने पड़े?एक… Read more »
डॉ. मधुसूदन
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आज शैलेन्द्र कुमार का आलेख पढकर आश्वस्त अनुभव कर रहा हूँ। (१) हो सकता है, कि, कुछ एन जी ओ भारत के हित में हो; पर हमें प्रत्येक एन जी ओ की गति विधियों पर ध्यान देना ही चाहिए। (२)इनका ७५% से अधिक खर्च (कुछ एन जी ओ का ९०% से ऊपर) प्रवास, खान पान इत्यादि में बताया जाता है। मेधा पाटकर का ९० % खर्च प्रवास का अनुमानित हुआ है। (३) कोई न कोई पर्यावरण इत्यादि का बहाना बनाकर, ये सारी एन जी ओ भारत को हानि पहुंचाने के काम में विदेशी महा शक्तियाँ लगी हुयी है। (४)कुछ अच्छी… Read more »
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