लेखक परिचय

सिद्धार्थ शंकर गौतम

सिद्धार्थ शंकर गौतम

ललितपुर(उत्तरप्रदेश) में जन्‍मे सिद्धार्थजी ने स्कूली शिक्षा जामनगर (गुजरात) से प्राप्त की, ज़िन्दगी क्या है इसे पुणे (महाराष्ट्र) में जाना और जीना इंदौर/उज्जैन (मध्यप्रदेश) में सीखा। पढ़ाई-लिखाई से उन्‍हें छुटकारा मिला तो घुमक्कड़ी जीवन व्यतीत कर भारत को करीब से देखा। वर्तमान में उनका केन्‍द्र भोपाल (मध्यप्रदेश) है। पेशे से पत्रकार हैं, सो अपने आसपास जो भी घटित महसूसते हैं उसे कागज़ की कतरनों पर लेखन के माध्यम से उड़ेल देते हैं। राजनीति पसंदीदा विषय है किन्तु जब समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का भान होता है तो सामाजिक विषयों पर भी जमकर लिखते हैं। वर्तमान में दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, हरिभूमि, पत्रिका, नवभारत, राज एक्सप्रेस, प्रदेश टुडे, राष्ट्रीय सहारा, जनसंदेश टाइम्स, डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट, सन्मार्ग, दैनिक दबंग दुनिया, स्वदेश, आचरण (सभी समाचार पत्र), हमसमवेत, एक्सप्रेस न्यूज़ (हिंदी भाषी न्यूज़ एजेंसी) सहित कई वेबसाइटों के लिए लेखन कार्य कर रहे हैं और आज भी उन्‍हें अपनी लेखनी में धार का इंतज़ार है।

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सिद्धार्थ शंकर गौतम 

सुशासन की कथित राह पर अग्रसर बिहार में अधिकार यात्रा निकाल रहे नीतीश कुमार का विरोध अब और मुखर हो चला है। हालांकि उनकी अधिकार यात्रा का मकसद बिहार को विशेष राज्य का दर्ज़ा दिलाना है मगर आम आदमी की मूलभूत आवश्यकताओं की अनदेखी और कागजों पर कथित विकास के बड़े-बड़े दावे करना उन्हें अब भारी पड़ रहा है। भागलपुर में जहाँ नीतीश को काले झंडे दिखाए गए वहीँ नवादा में उनका स्वागत चप्पलों से हुआ। हद तो तब हो गयी जब एक सभा में उनके ऊपर एक युवक ने कुर्सी तक फेंक दी। विवाद तो उस वक़्त भी बहुत हुआ था जब पूर्व विधायक व वर्त्तमान में विधायक पूनम यादव के पति ने सरे आम लोगों पर बन्दूक तानते हुए गोलियां चला दी थीं। हालांकि उन्हें शासन द्वारा क्लीनचिट मिलना भी नीतीश की अदूरदर्शिता का परिचायक बना। बढ़ते विरोध के बीच मुख्यमंत्री सचिवालय की ओर से यह घोषणा हुई कि किसी भी व्यक्ति का काले रंग के कपडे या अन्य वस्तुओं के साथ सभा स्थल में प्रवेश वर्जित कर दिया गया है। इसे लेकर नीतीश राष्ट्रीय मीडिया में भी आलोचना का शिकार बने। अब ऐसी खबरें आई हैं कि नीतीश की सभा में आईं महिलाओं और युवतियों के दुपट्टे पुलिस द्वारा उतरवा दिए गए हैं। और यह सब उस जांच के तहत हुआ जिसमें कहा जा रहा है कि यह मुख्यमंत्री की सुरक्षा हेतु अनिवार्य है। आखिर नीतीश बिहार की जनता के बीच जाने से इतना क्यों डरने लगे हैं? क्या कारण है कि जिस राज्य को मीडिया सहित तमाम राष्ट्रीय एजेंसियां विकास के पथ पर अग्रसर बताते नहीं अघाती थीं, आज उसी राज्य का आम आदमी अपनी उपेक्षा से दुखी होकर बदलाव की मांग करने लगा है? क्या नीतीश का जादू अब उतार पर है? क्या बिहार की जनता सच में परिवर्तन चाहती है? और यदि हाँ, तो क्या उसे यह भान है कि वह परिवर्तन किसे सत्ता के नजदीक लाएगा? नीतीश की अधिकार यात्रा के विरोध में पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव परिवर्तन यात्रा निकाल रहे हैं और उनकी सभा में उमड़ती भीड़ यह संकेत कर रही है कि नीतीश के दावे और वादे; दोनों छलावा सिद्ध हुए हैं। क्या ये परिस्थितियाँ एकायक बनी हैं या वर्षों से दबा गुस्सा अब सड़कों पर फूट रहा है?

दरअसल बिहार की राजनीति को समझना आसान नहीं है। वर्गों, जातियों और समाज में व्याप्त असमानता ने यहाँ राजनीति को विकासोन्नमुखी बनाने की बजाए सत्ता प्राप्ति का साधन बना दिया है। लालू यादव माई समीकरण पर टिके हैं तो राम विलास पासवान दलित वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं। नीतीश कुमार ने दोनों की राजनीतिक ताकत को ध्वस्त करते हुए महादलित वर्ग का निर्माण और कब्रिस्तानों की घेराबंदी कर कई हित साध लिए। यानी नीतीश से बिहार की आम जनता को जो उम्मीद थी वह वर्गों-जातियों की राजनीति के भंवर में उलझकर टूट गयी। फिर विकास हुआ भी तो सिर्फ कागजों पर। हाँ, बिहार में अपराध कम हुए हैं पर उसका भी कारण है। चूँकि नीतीश ने तमाम छोटे-बड़े अपराधियों को ठेकेदारी के काम में उलझा दिया लिहाजा राज्य में अपहरण से लेकर हत्या के मामलों में कमी आई। मगर इन सब प्रयासों से आम आदमी का कोई भला नहीं हुआ। आज भी बिहार से पलायन जारी है क्योंकि राज्य में उद्योग धंधे चौपट हैं। बिजली, पानी, सड़क की सुविधा जैसे तैसे चल रही है। नीतीश के पहले कार्यकाल ने जिस विकास के मॉडल को अपनाने की कोशिश की थी और उसका काफी हद तक क्रियान्वयन भी हुआ था उससे नीतीश दोबारा सत्ता में तो आ गए मगर अपने पूर्व कार्यकाल के करिश्मे को इस बार दोहराने में नाकामयाब रहे। फिर नीतीश के हालिया विरोध की एक वजह और समझ में आती है। नीतीश ने जदयू-भाजपा गठबंधन की मूल भावनाओं से इतर जाकर राष्ट्रीय राजनीति में स्थापित होने और प्रधानमन्त्री की दौड़ में खुद को शामिल कर गाहे-बगाहे विपक्षी दलों के साथ ही सहयोगी दलों की नाराजगी भी मोल ले ली। यह तो स्पष्ट दृष्टिगत हो रहा है कि नीतीश के विरोध के चलते उनके अपने साथियों ने उनका साथ छोड़ना शुरू कर दिया है। जब अपने ही मुसीबत में साथ छोड़ दें तो विरोधियों को तो मौका भर चाहिए। नकारात्मक प्रचार की वजह से भी नीतीश की छवि पर कुठाराघात हुआ है। बिहार में नीतीश के विरोध ने यह साबित किया है कि अपनों के बीच लोकप्रिय होना और जनता के बीच लोकप्रिय होने में अंतर है। चूँकि ऐसे कई कारण हैं जिनकी वजह से नीतीश अकेले पड़ गए हैं लिहाजा उन्हें आत्म-मंथन करना चाहिए कि ३ वर्षों में ही ऐसा क्या परिवर्तन हुआ जो जनता बदलाव को उतारू हो गयी है। यह समय वाकई नीतीश के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है।

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