लेखक परिचय

डा. अरविन्द कुमार सिंह

डा. अरविन्द कुमार सिंह

उदय प्रताप कालेज, वाराणसी में , 1991 से भूगोल प्रवक्ता के पद पर अद्यतन कार्यरत। 1995 में नेशनल कैडेट कोर में कमीशन। मेजर रैंक से 2012 में अवकाशप्राप्त। 2002 एवं 2003 में एनसीसी के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित। 2006 में उत्तर प्रदेश के सर्वश्रेष्ठ एनसीसी अधिकारी के रूप में पुरस्कृत। विभिन्न प्रत्रपत्रिकाओं में समसामयिक लेखन। आकाशवाणी वाराणसी में रेडियोवार्ताकार।

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-डॉ. अरविन्द कुमार सिंह-    humanity
विश्व प्रसिद्ध मर्फी एडगर जूनियर के सिद्धांत किसी तार्किक परिणिती के आधार नहीं बनते हैं, पर प्रत्येक सिद्धांत सच के करीब दिखाई देता है। जैसे मर्फी कहते हैं यदि आप कही किसी कार्य से गये हुये हैं और आप को कतार में खड़े होना है तो विश्वास जानिये, यदि आपका काम छोटा और सरल है तो निश्चय ही आपके आगे खड़े व्यकित का कार्य बड़ा और कठिन होगा। अब इस बात का कोई तार्किक आधार नहीं है। हां, ये सच के करीब है, ऐसा हमने अनुभव के अंतर्गत जाना है।
ऐसा ही एक अनुभव तकरीबन 13 वर्ष पूर्व मेरी जिन्दगी में गुजरा। सिद्धांत थोड़ा अलग था। आप जैसा सोचते हैं, वैसा होता नहीं और जैसा होता है, वैसा आप सोचते नहीं। चलिये इस सिंद्धात को आप अपने जेहन में रखिये और मेरे अनुभव को सुनिये। छुट्टियों में मैं अपने ससुराल गोरखपुर गया था। जून का महीना था। गोरखपुर से वाराणसी बस की यात्रा तकरीबन सात घंटे का वक्त लेती है। कुछ ऐसी मजबूरी उपसिथत हुयी कि हमें बस से वाराणसी की यात्रा करनी पड़ी। मेरे साथ मेरी पत्नी और तीन साल की बेटी थी।
बहुत मुश्किल से बस में जगह मिली। गर्मी के चलते बस में बुरा हाल था। साढ़े तीन घंटे की यात्रा कर हमारी बस आजमगढ़ के मऊ नामक स्थान पर आकर खड़ी हुयी। भीड़ का एक रेला बस में चढ़ा। तील धरने की जगह नहीं थी। गर्मी ने वैसे ही बुरा हाल कर रखा था। बस में भीड़ इतनी थी की कोई व्यक्ति अपने स्थान से मूवमेन्ट करने की स्थिति में नहीं था। गर्मी से बेहाल मेरी बेटी ने रोना शुरू कर दिया। बोतल का पानी हमारा समाप्त हो चुका था। मैंने खिड़की से थोड़ी दूर स्थित एक दुकानदार से पानी देने का अनुरोध किया। दुकानदारी की आड़ में उसने अपनी मजबूरी व्यक्त की। बस से निकलना सम्भव नहीं था। बस जल्द ही खुलने वाली थी। एक अजीब सी बेबसी थी। मैंने पत्नी से बस से उतरने को कहा, सोचा बच्ची को पानी पिलाऊंगा, फिर किसी दूसरी बस से वाराणसी के लिये रवाना होऊंगा। बेटी की प्यास मेरे लिये ज्यादा महत्वपूर्ण थी।
तभी क्या देखता हूं, एक व्यक्ति जो चारखाने की लुंगी पहने था तथा सिर पर गोल टोपी थी। एक गिलास पानी लेकर मेरे खिड़की के करीब आया। मैंने पानी लेकर बच्ची को पिलाया तथा गिलास उस व्यक्ति को वापस किया। बच्ची को अपने गोद से पत्नी को देने के बाद मैं पलटा, उस व्यक्ति को धन्यवाद देने के लिये। तब तक देखता हूं, वो व्यक्ति पानी का गिलास दुकानदार को देकर जा रहा था। जाते हुये उस व्यक्ति ने एक बार भी मुड़कर पीछे नहीं देखा। मेरे शब्द मेरे गले में ही रह गये। मेरी निगाहें दूर तक उस व्यक्ति का पीछा करती रही, जब तक वो व्यक्ति मेरी आंखों से ओझल नहीं हो गया। आज भी जब भी कभी मैं गोरखपुर से वाराणसी आता हूं और मेरी बस मऊ में रूकती है तो मेरी निगाहें उस व्यक्ति को तलाशती हैं। तू जहां कही भी है मेरे दोस्त, मैं इतना ही तेरे लिये कहूंगा – ”तूने मेरे बच्ची को पानी नहीं पिलाया, वरन कर्बला के तपते रेगिस्तान पर प्यास से तड़पते छह माह के मासूम को पानी पिलाया। तेरी इंसानियत तुझे मजहब की कतार से निकालकर तुझे फरिश्ते का दर्जा देती है। हो सकता है, यह घटना आपको छोटी लग रही हो। मेरी जिन्दगी में इस घटना का स्वरूप अविस्मरणीय है। मेरी एक धारणा उस दिन टूटी थी। वैचारिक धरातल पर एक गाठ मन के अन्दर खुली थी। सच मानिये पूरी इमानदारी से यह बात कह रहा हूं। देश के अन्दर आतंकी घटनाओं के चलते एक समुदाय विशेष के प्रति मेरे मन में नकारात्मक भाव थे। आज वह भाव जाता रहा है। उस गर्मी में अपनी बच्ची को पानी पिलाने वाले को मैं कैसे किसी समुदाय या मजहब में कैद कर सकता हूं?
वैसे भी इंसानियत किसी मजहब की दिवारो में कैद नहीं होती। कोई तार्किक आधार तो नहीं, पर यह बात अपनी जगह सच है – हम जो सोचते हैं वो होता नहीं और जो होता है वो हम सोचते नहीं, क्योंकि होगा वही जो वो चाहेगा, बगैर उसकी इजाजत के पूरी कायनात में एक पत्ता भी हरकत नहीं करता है। उस अजीमतर सत्ता के कारनामे हैरतअंगेज हैं। श्रद्धा से उसके सामने सर झुकाता हूं।

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1 Comment on "इंसानियत किसी मजहब की दिवारों में कैद नहीं"

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govind keshari
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समाज कार्य का विद्यार्थी होने के नाते मै इस लेख पर सिर्फ यही कह सकता हु कि भारतीयो को सेवा सीखने कि आवस्यकता नहीं होती बल्कि यह भाव उनके खून में होता है / जय हिन्द

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