लेखक परिचय

एडवोकेट मनीराम शर्मा

एडवोकेट मनीराम शर्मा

शैक्षणिक योग्यता : बी कोम , सी ए आई आई बी , एल एल बी एडवोकेट वर्तमान में, 22 वर्ष से अधिक स्टेट बैंक समूह में अधिकारी संवर्ग में सेवा करने के पश्चात स्वेच्छिक सेवा निवृति प्राप्त, एवं समाज सेवा में विशेषतः न्यायिक सुधारों हेतु प्रयासरत

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सलमान  खुर्शीद ,

माननीय विधि एवं न्याय मंत्री ,

भारत सरकार ,

नई दिल्ली 

 

मान्यवर,

न्यायिक कर्मचारियों और न्यायधीशों  के लिए आदर्श आचार संहिता

आपको ज्ञात ही है कि हाल ही में भारत में न्यायिक  दुराचरण के मामले बढे हैं|  अमेरिका में न्यायिक कर्मचारियों और न्यायधीशों के लिए आचार संहिता भी बनी हुई है| इसी आचार संहिता के आधार पर भारतीय न्यायिक कर्मचारियों और न्यायधीशों के लिए एक आदर्श आचार संहिता  निम्नानुसार बनायीं जा सकती है :-   

 

सिद्धांत :1: न्यायिक कर्मचारियों को न्यायपालिका एवं न्यायिक कर्मचारी के पद की निष्ठा व स्वतंत्रता बनाये रखनी चाहिए :हमारे समाज में न्याय के लिए स्वतंत्र व सम्माननीय न्यायपालिका अपरिहार्य है|एक न्यायिक कर्मचारी को व्यक्तिगत रूप से आचरण के उच्च मानक पालन करने चाहिए ताकि न्यायपालिका की निष्ठा और स्वतंत्रता संरक्षित हो सके और न्यायिक कर्मचारियों का पद जनता की सेवा को समर्पण प्रदर्शित करे| न्यायिक कर्मचारियों को ऐसे कार्मिक मानदंडों की अनुपालना करनी चाहिए जो उनके निर्देशन व नियंत्रण हेतु हों| इस संहिता के प्रावधानों का अभिप्राय व लागू किया जाना इन उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के लिए  समझा जाना चाहिए| इस संहिता में समाहित मानकों का नियुक्ति अधिकारी, न्यायालय के आदेश या कानून द्वारा अपेक्षित अन्य अधिक कड़े मानकों पर प्रभाव नहीं पड़ेगा|

सिद्धांत :2: एक न्यायिक कर्मचारी को सभी गतिविधियों में अनौचित्य व अनुचित प्रदर्शन टालना चाहिए  : एक न्यायिक कर्मचारी को किसी भी  ऐसी गतिविधि में संलिप्त नहीं होना चाहिए जो न्यायिक कर्मचारी के अपने पदीय कर्तव्यों के निर्वहन हेतु आचरण पर प्रश्न चिन्ह लगाते हों| एक न्यायिक कर्मचारी को अपने परिवार के सदस्यों, सामाजिक, या अन्य रिश्तों से शासकीय आचरण या निर्णय प्रभावित नहीं होने देने चाहिए| एक न्यायिक कर्मचारी को अपनी पदीय प्रतिष्ठा को व्यक्तिगत हित के लिए प्रयोग नहीं करने देना चाहिए या अन्यों के हित के लिए प्रयोग करते दिखाई नहीं देनी  चाहिए| एक न्यायिक कर्मचारी को अपने सार्वजनिक पद को निजी लाभ के लिए प्रयोग नहीं करना चाहिए|

सिद्धांत:3:एक न्यायिक कर्मचारी को अपने पदीय कर्तव्यों के निर्वहन में उपयुक्त मानकों की अनुपालना करनी चाहिए : एक न्यायिक कर्मचारी को कानून और इन सिद्धांतों का सम्मान व अनुपालना करनी  चाहिए|यदि  एक न्यायिक कर्मचारी को यदि इन सिद्धांतों का उल्लंघन करने के लिए प्रेरित भी किया जाय तो उसे उपयुक्त पर्यवेक्षी अधिकारी को  रिपोर्ट करनी चाहिए| एक न्यायिक कर्मचारी को पेशेवर मानकों के प्रति निष्ठावान होना चाहिए और न्यायिक कर्मचारी के पेशे में सक्षमता रखनी चाहिए|

एक न्यायिक कर्मचारी को धैर्यशाली, गरिमामयी, आदरणीय, और उन सभी लोगों के प्रति जिनसे उसका शासकीय हैसियत में, जन सामान्य सहित, वास्ता पडता हो के प्रति विनम्र होना चाहिए और  न्यायिक कर्मचारी के लिए निर्देश एवं नियंत्रण के अध्यधीन कार्मिक का ऐसा ही आचरण होना चाहिए| एक न्यायिक कर्मचारी को अपने पदीय कर्तव्य का निष्पादन बुद्धिमतापूर्वक शीघ्रता, दक्षता, समानता, उचित और पेशेवर ढंग से करना चाहिए| एक न्यायिक कर्मचारी को मामलों की सुपुर्दगी  को कभी भी प्रभावित नहीं करना चाहिए, या प्रभावित करने का कभी भी प्रयास नहीं करना चाहिए, या न्यायालय के किसी भी मंत्रालयिक या विवेकाधिकारी कृत्य को इस प्रकार संपन्न नहीं करना चाहिए कि जिससे किसी वकील या विवाद्यक का अनुचित पक्षपोषण होता हो, न ही एक न्यायिक कर्मचारी को यह समझना चाहिए कि वह ऐसा करने की स्थिति में है| एक न्यायिक कर्मचारी को विधि द्वारा निषिद्ध भाईभतीजावाद में संलग्न नहीं होना चाहिए|

हित टकराव :एक न्यायिक कर्मचारी को शासकीय कर्तव्यों के निर्वहन में हितों के टकराव को टालना चाहिए| एक हित टकराव का उद्भव तब होता है जब न्यायिक कर्मचारी जनता है कि वह (या उसका जीवन साथी, न्यायिक कर्मचारी के घर में रह रहा अवयस्क बच्चा, या न्यायिक कर्मचारी के अन्य नजदीकी रिश्तेदार) आर्थिक या व्यक्तिगत रूप से किसी मामले से इस प्रकार प्रभावित हो सकता है कि एक सुसंगत तथ्यों से परिचित तर्कसंगत व्यक्ति न्यायिक कर्मचारी द्वारा शासकीय कृत्य के निष्पक्ष  तरीके से निष्पादन की सक्षमता के औचित्य पर प्रश्न उठ सके|

सिद्धान्त:4: बाहरी गतिविधियों की संलिप्सा में, एक न्यायिक कर्मचारी को शासकीय कर्तव्यों से टकराव की जोखिम और अनौचित्य के प्रदर्शन को टालना  चाहिए, व प्रकटन की आवश्यकताओं की अनुपालना करनी चाहिए  : एक न्यायिक कर्मचारी की न्यायिक से बाहरी गतिविधियां  न्यायालय की गरिमा को घटानेवाली नहीं होनी चाहिए, शासकीय गतिविधियों में हस्तक्षेप करने वाली नहीं होनी चाहिए, या न्यायालय या न्यायिक कर्मचारी के पद की गरिमा और संचालन पर विपरीत प्रभाव नहीं डालनी चाहिए  |

एक न्यायिक कर्मचारी को उन बाहरी वित्तीय और व्यावसायिक लेनदेनों से परहेज करना चाहिए जो न्यायालय की गरिमा को घटाते हैं, शासकीय कृत्यों के उचित निर्वहन में हस्तक्षेप करते हैं, स्थिति का दोहन करते हैं, या न्यायिक कर्मचारी को, वकीलों या अन्य संभावित लोगों जो न्यायिक कर्मचारी या न्यायालय या न्यायिक कर्मचारी द्वारा सेवित पद  के समक्ष आने वाले हों, के साथ सारभूत वित्तीय व्यवहार में संलग्न नहीं होना चाहिए|

सिद्धांत:5: एक न्यायिक कार्मिक समस्त अनुशासनिक एजेंसियों के प्रति स्पष्टवादी और ईमानदार रहेगा तथा उन्हें सहयोग देगा| न्यायिक कार्मिक को यदि किसी दूसरे न्यायाधीश या न्यायिक कर्मचारी  द्वारा आचार संहिता के उल्लंघन का तर्कसंगत विश्वास है तो उसे जैसे ही उसके लिए व्यावहारिक रूप से संभव हो इस, आशय के लिखित आरोप सक्षम अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत करने चाहिए|

न्यायाधीशों के लिए आचार संहिता

 

सिद्धांत :1: न्यायाधीश को न्यायपालिका की निष्ठा व स्वतंत्रता बनाये रखनी चाहिए: हमारे समाज में न्याय के लिए स्वतंत्र व सम्माननीय न्यायपालिका अपरिहार्य है| एक न्यायाधीशको व्यक्तिगत रूप से आचरण के उच्च मानक पालन करने चाहिए ताकि न्यायपालिका की निष्ठा और स्वतंत्रता संरक्षित हो सके| इस संहिता के प्रावधानों का अभिप्राय व लागू किया जाना इन उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के लिए  समझा जाना चाहिए|

टिपण्णी: निर्णयों एवं व्यवस्थाओं के प्रति सम्मान पर ही न्यायाधीशों की स्वत्नत्रता और निष्ठा पर  जनविश्वास आधारित है| न्यायाधीशों की स्वत्नत्रता और निष्ठा, बदले में, उनके भय या पक्षपात रहित कार्य करने पर निर्भर करती है| यद्यपि न्यायाधीशों को स्वतंत्र होना चाहिए, किन्तु उन्हें कानून और इस संहिता का पालन करना चाहिए| इस दायित्व की अनुपालना न्यायपालिका की निष्पक्षता में जन विश्वास बनाये रखने में सहायता करती है| इसके विपरीत, इस संहिता का उल्लंघन न्यायपालिका में जनविश्वास को घटाती है और कानून के अधीन शासन के निकाय को क्षति पहुंचाती है|

 

 

सिद्धांत :2: एक न्यायाधीश को सभी गतिविधियों में अनौचित्य व अनुचित प्रदर्शन टालना चाहिए: एक  न्यायाधीश को कानून का सम्मान और अनुपालन करना चाहिए और हमेशा इस प्रकार कार्य करना चाहिए जिससे न्यायपालिका की निष्पक्षता और निष्ठा में जनविश्वास प्रोन्नत होता हो| एक न्यायाधीश को पारिवारिक, सामाजिक, राजनैतिक, वित्तीय, या अन्य संबंधों को न्यायिक आचरण या निर्णय को प्रभावित करने की अनुमति नहीं देनी चाहिए| एक न्यायाधीश को न तो अपनी पदीय प्रतिष्ठा को न्यायाधीश या अन्य के हितार्थ काम में लेने देना चाहिए और न ही ऐसा संदेश  देना या अन्यों को प्रभावित करने देना अनुमत करना चाहिए कि वे न्यायाधीश को प्रभावित करने की विशेष स्थिति में हैं| एक न्यायाधीश को ऐसे संगठन की सदस्यता नहीं रखनी चाहिए जो जाति, लिंग, धर्म, या मूल राष्ट्र के आधार पर भेदभाव करता हो|

 

टिपण्णी: एक अनौचित्य तब होता है जब तर्कसंगत मानस तर्कसंगत जांच से प्रकट समस्त सुसंगत परिस्थितियों के ज्ञान से, निष्कर्ष निकलेगा कि न्यायधीश की ईमानदारी, निष्ठा, निष्पक्षता, मिजाज़, या न्यायाधीश के रूप में सेवा करते हुए उपयुक्तता को क्षीण करता हो| न्यायपालिका में जनविश्वास न्यायाधीश द्वारा गैरजिम्मेदार या अनुचित आचरण से क्षीण होता है| एक न्यायाधीश को समस्त अनौचित्य और अनुचित प्रदर्शन को टालना चाहिए| यह निषेध पेशेवर व व्यक्तिगत आचारण दोनों पर लागू होता है| एक न्यायाधीश से अपेक्षा है कि वह लगातार जन संवीक्षा के अध्यधीन हो और जो प्रतिबन्ध एक सामान्य नागरिक द्वारा भारी समझे जायं, उन्हें वह स्वेच्छापूर्वक और मुक्त रूप से स्वीकार करे| चूँकि समस्त निषिद्ध कार्यों को यहाँ सूचीबद्ध करना व्यावहारिक नहीं है , सामान्य शर्त के रूप  में निषेध उस सीमा तक न्यायाधीशों द्वारा आचारण हेतु आवश्यक हैं जो कि  हानिकारक है यद्यपि वे इस संहिता में विशेष रूप से उल्लिखित नहीं है| इस मानक के अंतर्गत वास्तविक अनौचित्य  में कानून, न्यायालयी  नियम , या इस संहिता के अन्य विशिष्ट नियम का उल्लंघन समाहित है|

 

एक न्यायाधीश को न्यायिक पद को न्यायाधीश या अन्यों के व्यक्तिगत हित साधने में काम में लेने से दूर रहना चाहिए| उदाहरणार्थ, एक न्यायाधीश को न्यायिक स्थिति या पद, मित्र या न्यायाधीश के पारिवारिक सदस्य की संलिप्सा वाले मामले में लाभ प्राप्त करने के लिए प्रयोग नहीं करना चाहिए| एक न्यायाधीश को पदीय प्रतिष्ठा के संभावित दुरुपयोग के प्रति संवेदनशील होना चाहिए|

सिद्धांत:3: एक न्यायाधीश को अपने पदीय कर्तव्य उचित, निष्पक्ष और बुद्धिमतापूर्वक निभाने चाहिए:

न्यायिक पद के कर्तव्य समस्त गतिविधियों से सर्वोपरि हैं| कानून द्वारा निर्धारित कर्तव्यों के निर्वहन में एक न्यायधीश को निम्नांकित  मानकों की अनुपालना करनी चाहिए:

. निर्णयात्मक दायित्व

एक न्यायाधीश को कानून के प्रति विश्वासपात्र होना चाहिए, और व्यावसायिक सक्षमता बनाये रखनी चाहिए और हित के अंधे समर्थन, जन कोलाहल या आलोचना के भय के आगे झुकना नहीं चाहिए| एक न्यायाधीश को, यदि निर्योग्य न हो तो, सौंपे गए मामले सुनने और विनिश्चित करने चाहिए और सभी न्यायिक मामलों में व्यवस्था व शिष्टाचार बनाये रखना चाहिए|

एक न्यायाधीश को विवाद्यकों, गवाहों, वकीलों, और अन्यों जिनसे न्यायाधीश को शासकीय हैसियत में व्यवहार करना पडता है के प्रति धैर्यशाली, गरिमामयी, सम्माननीय, और शालीन होना चाहिए| एक न्यायाधीश को ऐसे ही व्यवहार की स्वयं के, वकीलों सहित,  नियंत्रणाधीन लोगों से प्रतिकूल प्रक्रिया की भूमिका में सुसंगत सीमा तक अपेक्षा करनी चाहिए| एक न्यायाधीश को प्रत्येक व्यक्ति से जिसका कानूनी प्रक्रिया में हित हो को अवसर देना चाहिए, और उस व्यक्ति के वकील को कानून के अनुसार पूर्ण सुनवाई का अवसर देना चाहिए| एक न्यायाधीश को पक्षकारों या उनके प्रतिनिधियों की अनुपस्थिति में, सिवाय अपवाद के, संचार पर विचार नहीं करना चाहिए| यदि एक न्यायाधीश को कोई एक तरफा अनधिकृत संचार (सन्देश) मिलता है जिसका मामले पर प्रभाव पडता हो तो  न्यायधीश को पक्षकार को यह तुरंत ही सूचित करना चाहिए और पक्षकार को, यदि निवेदन करे तो, उसका जवाब देने का अवसर देना चाहिए|

प्रशासकीय दायित्व: एक न्यायाधीश को प्रशासकीय दायित्वों का उन्मोचन बुद्धिमतापूर्वक करना चाहिए, न्यायिक प्रशासन में पेशेवर सक्षमता बनाये रखनी चाहिए, और अन्य न्यायाधीशों व न्यायालय कार्मिकों द्वारा प्रशासकीय दायित्वों का निष्पादन सुकर बनाना चाहिए| एक न्यायाधीश को न्यायालय कार्मिकों को न्यायाधीश की ओर से या न्यायाधीश के प्रतिनिधि के तौर पर आचरण करने के लिए निर्देश नहीं देने चाहिए जब यदि वह न्यायाधीश द्वारा संपन्न किया जाय तो वह आचरण इस संहिता का उल्लंघन करता हो| अन्य न्यायाधीशों पर पर्यवेक्षणीय अधिकार रखते हुए एक न्यायाधीश को तर्कसंगत उपाय करने चाहिए कि वे अपने कर्तव्यों का निष्पादन समय पर  और दक्षतापूर्वक करते हैं| एक न्यायाधीश को, विश्वसनीय साक्ष्य से ज्ञात होने पर कि किसी  न्यायाधीश ने इस संहिता का उल्लंघन किया है या एक वकील ने लागू पेशेवर नियमों  का उल्लंघन किया है, उसे उचित कार्यवाही करनी चाहिए|

मामलों के त्वरित, दक्षतापूर्वक, और उचित  निपटान में न्यायाधीश को पक्षकारों के सुने जाने के अधिकारों को महत्त्व प्रदर्शित करना चाहिए और मुद्दों को अनावश्यक खर्चे या विलम्ब के बिना सुलझाना चाहिए| न्यायाधीश को मामलों में चक्कर लगवाने की परिपाटी, परिहार्य विलम्ब और अनावश्यक खर्चों को  घटाने या समाप्त  करने के लिए अनुश्रवण और पर्यवेक्षण करना चाहिए| न्यायालय के कार्य के त्वरित निपटान के लिए न्यायाधीश का न्यायिक कर्तव्यों के लिए पर्याप्त समय देने, न्यायालय में उपस्थित होने में समयनिष्ठ और प्रस्तुत मामलों के विनिश्चय में फुर्ती, और यह सुनिश्चित करने के लिए तर्कसंगत उपाय करने के लिए  की अपेक्षा रखता है कि न्यायालय कार्मिक, विवाद्यक, और उनके वकील इस ओर न्यायाधीश से सहयोग करें|

सिद्धांत:4: न्यायाधीश न्यायिकेतर गतिविधियों में संलग्न हो सकता है जो उसके न्यायिक पद के दायित्वों से सुसंगत हों:  एक न्यायाधीश, विधि से सम्बंधित और नागरिक बातों, पुण्यार्थ, शैक्षिक, धार्मिक, सामाजिक, वितीय, विश्वसाश्रित, और सरकारी सहित न्यायिकेतर गतिविधियों में संलग्न हो सकता है, और कानून से सम्बंधित व कानूनी से भिन्न विषयों पर बोल, लिख और अध्यापन कर सकता है| किन्तु एक न्यायाधीश को ऐसी न्यायिकेतर गतिविधियों में भाग नहीं लेना चाहिए जिनसे न्यायाधीश के पद की गरिमा में गिरावट आती हो, न्यायाधीश के शासकीय कर्तव्यों के निष्पादन में हस्तक्षेप होता हो, न्यायाधीश की निष्पक्षता पर प्रतिकूलता प्रकट होती हो, बारबार निर्योग्यता बनती हो, या दी गयी सीमाओं का उल्लन्घन होता हो|

सिद्धांत:5: न्यायाधीश को राजनीति नहीं करनी चाहिए :

न्यायाधीश  किसी भी राजनैतिक संगठन में कोई पद धारण अथवा नेता की तरह कार्य नहीं करेगा,या  किसी राजनैतिक पार्टी या उम्मीदवार के लिए भाषण नहीं देगा, या किसी लोक पद के लिए सार्वजानिक रूप से विरोध या पक्षपोषण नहीं करेगा| यदि एक न्यायाधीश किसी प्राथमिक या आम चुनाव में किसी पद के लिए उम्मीदवार बन जाता है तो उसे अपने पद से त्याग पत्र दे देना चाहिए |

सिद्धांत:6: एक न्यायाधीश समस्त अनुशासनिक एजेंसियों के प्रति स्पष्टवादी और ईमानदार रहेगा तथा उन्हें सहयोग देगा| न्यायाधीश को यदि किसी दूसरे न्यायाधीश या न्यायिक कर्मचारी  द्वारा आचार संहिता के उल्लंघन का तर्कसंगत विश्वास है तो उसे जैसे ही उसके लिए व्यावहारिक रूप से संभव हो इस, आशय के लिखित आरोप सक्षम अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत करने चाहिए|

 

सेवानिवृत न्यायाधीश : सेवानिवृत या जिसे न्यायिक सेवार्थ वापिस बुलाया गया हो को इस संहिता के समस्त प्रावधानों की अनुपालना करनी चाहिए किन्तु एक न्यायाधीश को न्यायिकेतर  नियुक्ति के दौरान न्यायिक सेवा से दूर रहना चाहिए|

भारत में तो सम्पूर्ण न्यायिक क्षेत्र आज इतना अपदूषित प्रतीत होता है कि उसमें चरित्रवान कर्मचारी/न्यायाधीश का दम घुटने लगेगा और वह इस अपदूषित वातावरण के कुचक्र से समझौता करके ही इस निकाय में अपना स्थान सुरक्षित रख सकता है अन्यथा उसे कदम कदम पर संघर्ष का सामना करना पड़ेगा| अभिप्रायः यह है कि यदि भारत में कोई न्यायिक कर्मचारी/न्यायाधीश  स्वयं ईमानदार है तो भी उस अकेले के लिए अन्य (कनिष्ठ या वरिष्ठ) साथियों की भ्रष्टता को सहन/नजरअंदाज करना/प्रश्रय देना एक विवशता सी  है| न्यायिक सुधार की दिशा में प्रथम कदम उठाने के लिए इस संहिता को आदर्श संहिता का दर्जा देकर इसे कानूनी रूप दिया जा सकता है| मेरा यह दृढ विश्वास है कि इस संहिता को लागू करने से, कम से कम, न्यायालयों में मंत्रालयिक स्तर पर भ्रष्टाचार और अकर्मण्यता पर तो प्रभावी नियंत्रण स्थापित किया जा सकता है|

 

उक्त के परिपेक्ष्य में आप से निवेदन है कि  न्यायपालिका के विद्यमान अनियंत्रित आचारण पर नियंत्रण हेतु आचार संहिता का निर्माण कर उसे कानूनी रूप दिया जाय| यदि आवश्यक हो तो संविधान या अन्य कानून में भी उचित संशोधन किया जावे| इस प्रसंग में आप द्वारा की गयी कार्यवाही से अवगत करावें तो मुझे प्रसन्नता होगी|

सादर ,

दिनांक: 25/11/2011                                                          भवदीय    

मनीराम  शर्मा

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3 Comments on "न्यायिक कर्मचारियों और न्यायधीशों के लिए आदर्श आचार संहिता"

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इक़बाल हिंदुस्तानी
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बहुत शानदार लेख है. शर्मा जी आपको मुबारकबाद.

SARKARI VYAPAR BHRASHTACHAR
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SARKARI VYAPAR BHRASHTACHAR
Jaideo Aryaक्रप्या ध्यानदें::::::::::::::मित्रों मै अन्ना बाबुराव हजारेहो समझने में बिल्कुलअसमर्थ हूँ कोई मुझे समझाये……. … कभी ये बाबा रामदेव के साथ हैंकभी नहीं हैं lकभी कहते हैं की शराब पीनेवालों को चौराहे पर मारो कभी येअहिंसा के पुजारी हैं l भाई…..अमेरिका से लाखदो लाख डोलर का अनुदानलो और फिर इसमें कितने हिस्सेदार रखोगे…सोचो …..और कोई नया हिस्सेदार बाबा राम देव की तरह आता दिखे तो क्या करोगे सोचो ….डोलर की कीमत को समझो अन्ना को अपने आप समझ जाओगे …बाबु …आज अन्ना हजारे ..हजारे …नहीं रहे ….करोड़े हो गए है ……नहीं तो जो प्रशांत भूषण अपने बाप को नहीं पूछता… Read more »
डॉ. मधुसूदन
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सूक्ष्मता से अध्ययन पूर्वक लेख लिखा लगता है। ऐसे विशेष विषय के, विद्वत्तापूर्ण लेख पर व्यावसायिक अधिवक्ताओं से टिप्पणियां आनी चाहिए। स्वैच्छिक निवृत्ति में अच्छी सेवा के लिए साधुवाद।

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