लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

शिक्षा : एम.ए. राजनीति शास्त्र, मेरठ विश्वविद्यालय जीवन यात्रा : जन्म 1956, संघ प्रवेश 1965, आपातकाल में चार माह मेरठ कारावास में, 1980 से संघ का प्रचारक। 2000-09 तक सहायक सम्पादक, राष्ट्रधर्म (मासिक)। सम्प्रति : विश्व हिन्दू परिषद में प्रकाशन विभाग से सम्बद्ध एवं स्वतन्त्र लेखन पता : संकटमोचन आश्रम, रामकृष्णपुरम्, सेक्टर - 6, नई दिल्ली - 110022

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पिछले दिनों अमरीकी राष्ट्रपति श्री बराक हुसेन ओबामा हमारे गणतंत्र दिवस समारोह के मुख्य अतिथि बनकर यहां आये थे। उनके प्रवास के दौरान खूब गहमागहमी रही। समाचार पत्र उनके साथ हुई चर्चा और समझौतों से भरे रहे। रेडियो और टी.वी. भी उनके दर्शन करने और कराने में व्यस्त रहे। प्रवास के अंतिम दिन दिल्ली के ‘श्रीफोर्ट सभागार’ में हुए एक कार्यक्रम में उनकी कुछ टिप्पणियों से नरेन्द्र मोदी विरोधियों की बांछें खिल गयीं। वे ओबामा के इन वाक्यों को लेकर मोदी को घेरने लगे।

ओबामा ने एक ओर तो भारत की धर्मनिरपेक्षता की प्रशंसा करते हुए कहा कि हिन्दू बहुल देश होने पर भी यहां मिल्खा सिंह, शाहरुख खान और मैरी कॉम..आदि को भरपूर प्यार मिलता है; पर साथ ही यह भी कह दिया कि भारत तेजी से तभी उन्नति कर सकता है, जब यहां धर्म के आधार पर लोगों के बीच भेद न किया जाए।

ओबामा ने यह क्यों कहा, इस पर लोगों के अलग-अलग मत हैं। पिछले दिनों भारत में हिन्दू संस्थाओं द्वारा कराये जा रहे ‘घर वापसी’ कार्यक्रमों का खूब हल्ला हुआ। आगरा के एक कार्यक्रम पर तो हिन्दू विरोधियों ने खूब छाती पीटी। इसी प्रकार दिल्ली के कुछ चर्चों में चोरी और तोड़फोड़ भी हुई। ये समाचार नमक-मिर्च के साथ अमरीका भी पहुंचे होंगे। ओबामा को इसी से बेचैनी हुई।

आज तक तो दुनिया में ईसाई और मुसलमान ही धर्मान्तरण कराते थे। इसके लिए छल और बल का प्रयोग होता ही रहा है। दूसरों के धर्मस्थलों को तोड़ने पर भी मानो उनका ही एकाधिकार था; पर भारत में यह उल्टी गंगा कैसे बहने लगी ? ईसाई और मुसलमान अपना मजहब कैसे छोड़ने लगे ? वे बिना किसी हिंसा, लालच या दबाव के अपने पूर्वजों के पवित्र हिन्दू धर्म में क्यों लौटने लगे ? चर्च के आसपास रहने वालों का कहना है कि जिन गरीबों को पादरियों ने शादी, नौकरी या अन्य कोई लालच देकर ईसाई बनाया था, अपनी आकांक्षा पूरी न होने पर उन्होंने ही चर्च में तोड़फोड़ की है। यह भी संभव है कि मोदी सरकार को बदनाम करने के लिए पादरियों ने स्वयं ही यह षड्यन्त्र किया हो। अपने मजहब के हित के लिए किसी भी प्रकार की धोखाधड़ी को वहां खराब नहीं माना जाता।

ईसाई संस्थाओं को विदेशी पैसा तो भरपूर आता ही है। इनके द्वारा चलने वाले सेवा केन्द्र ही धर्मान्तरण का आधार तैयार करते हैं। भारत में परार्वतन और घर वापसी जैसे कार्यक्रमों की चर्चा सुनकर धन देने वाले दानदाता इन संस्थाओं को डांटते हैं कि इतना पैसा झोंकने के बावजूद पर्याप्त धर्मान्तरण तो हुआ नहीं, उल्टे ‘घर वापसी’ होने लगी। इससे बचने और पहले से अधिक पैसा वसूलने के लिए ही पादरी और इन संस्थाओं के प्रबन्धक ऐसे षड्यन्त्र रचते हैं।

एक दूसरा तथ्य यह भी है कि मिशनरी लोग झुग्गियों आदि में प्रचार करते समय किसी घर के एक कमरे में ईसा का चित्र टांग देते हैं। हिन्दू घरों में दो-चार देवी-देवताओं के चित्र होते ही हैं। अतः वे एक और चित्र को भी स्थान दे देते हैं। उस कमरे का प्रयोग वह परिवार ही करता है; पर सप्ताह या महीने में एक बार वहां ईसाई प्रचारक आकर प्रवचन करते हैं। इस कमरे के लिए वे या तो कुछ किराया देते हैं या उसके मालिक को अन्य किसी तरह आर्थिक लाभ पहुंचाने लगते हैं। उस प्रवचन में वहां के और आसपास की बस्तियों के निर्धन लोग आते हैं। धीरे-धीरे वहां धर्मान्तरण की चर्चा होने लगती है। इससे नाराज होकर बस्ती वाले स्वयं ही वहां तोड़फोड़ कर देते हैं। बस, उसी को पादरी और मीडिया वाले चर्च पर हुआ हमला कह देते हैं।

जहां तक धर्म या मजहब के आधार पर होने वाले भेदभाव की बात है, तो भारत दुनिया का एकमात्र देश है, जहां बहुसंख्यक हिन्दुओं को दो नंबर का नागरिक माना जाता है। अल्पसंख्यक आयोग बनाकर यहां मुसलमान और ईसाइयों को अनेक सुविधाएं दी गयी हैं, जबकि वे सब भारत के ही मूल नागरिक हैं। इस लालच में सिख, बौद्ध और अब जैन भी अल्पसंख्यक बन गये हैं।

दूसरी ओर अमरीका में शासन-प्रशासन के शीर्ष पदों पर कोई गैर ईसाई नहीं बैठ सकता। ओबामा का पूरा नाम ‘बराक हुसेन ओबामा’ उनके मुस्लिम मूल को बताता है। यद्यपि वे अब ईसाई हैं। इसी से उन्हें अमरीकी राजनीति में आगे बढ़ने का अवसर मिला। अमरीका में अगले साल राष्ट्रपति का चुनाव है। रिपब्लिकन पार्टी की ओर से जो लोग इसके दावेदार हैं, उनमें लुइजियाना प्रांत के गवर्नर बॉबी जिन्दल भी हैं। उनका मूल नाम पीयूष जिन्दल है। उनके माता-पिता मूलतः पंजाबी हैं, जो अमरीका में जा बसे। पीयूष का जन्म अमरीका में ही हुआ। आगे बढ़ने की आकांक्षा के चलते वे भी ईसाई हो गये और नाम ‘बॉबी’ रख लिया। अब वे नये मुल्ला की तरह ज्यादा प्याज खा रहे हैं। पिछले दिनों उन्होंने कहा कि उन्हें भारतीय मूल का अमरीकी न कहें। वे अमरीकी मूल के ही अमरीकी हैं। भारत में अमरीका के राजदूत रिचर्ड वर्मा की भी यही कहानी है।

ऐसे देश के राष्ट्रपति श्री ओबामा किस मुंह से हमें धर्मनिरपेक्षता सिखा रहे हैं ? सच तो यह है कि अमरीका हो या इंग्लैंड, कोई भी ईसाई देश चर्च के विचारों से आगे नहीं जा सकता; और चर्च की एकमात्र योजना विश्व का ईसाइकरण है। यदि ओबामा में साहस है, तो सबसे पहले वे दुनिया भर में मिशनरियों द्वारा किये गये नरसंहारों की माफी मांगे। इसके बाद वे पोप को धर्मनिरपेक्षता का पाठ पढ़ायें; और फिर दुनिया के उन मुस्लिम देशों में जाएं, जहां अल्पसंख्यक हिन्दुओं और ईसाइयों पर बर्बर अत्याचार हो रहे हैं।

भारत प्रवास से लौटने के कुछ दिन बाद ‘नेशनल प्रेयर ब्रेकफास्ट कार्यक्रम’ में ओबामा ने फिर कुछ ऐसी ही टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि भारत में पिछले कुछ वर्षों में धार्मिक असहिष्णुता इतनी बढ़ी है कि यदि आज गांधी जी होते, तो उन्हें भी इससे धक्का लगता। अब इस पर भी मोदी और संघ विरोधी हल्ला कर रहे हैं। गांधी जी को आज की परिस्थिति में कैसा लगता, ये तो कल्पना ही की जा सकती है; पर गांधी जी ने अपने जीवनकाल में ईसाइयों को क्या-क्या कहा है, ये छिपा नहीं है। गांधी जी का पूरा लेखन व भाषण आदि प्रकाशित हुए हैं, जिसे कोई भी देख सकता है।

गांधी जी ने लगभग 20 वर्ष विदेश में बिताये थे। स्वाधीनता संग्राम में सक्रिय होने के बाद भी वे विदेश जाते रहे। ईसाई मिशनरियों ने उनसे सम्पर्क कर उन्हें भी ईसाई बनाने का प्रयास किया; पर वे विफल रहे। गांधी जी हर धर्म में अच्छा देखने और ग्रहण करने का प्रयास करते थे। इसलिए वे ‘पर्वत प्रवचन’ के समर्थक थे। उन्हें इससे बहुत कष्ट होता था कि मिशन वाले हिन्दुओं के देवी-देवताओं और उनके निजी विश्वासों पर गंदी टिप्पणी करते थे। गांधी जी ने उनके बारे में जो कहा है, उसके कुछ नमूने प्रस्तुत हैं, जो ‘गांधी जी और ईसाइयत’ (लेखक रामेश्वर मिश्र ‘पंकज’ और कुसुमलता केडिया, प्रभात प्रकाशन, दिल्ली) से लिये गये हैं।

Û ईसा कोई अवतार या प्रभु के एकमात्र पुत्र नहीं, बल्कि एक अच्छे शिक्षक थे। ईसाई प्रचारक भी आध्यात्मिक व्यक्ति नहीं, बल्कि कुशल वक्ता होते हैं।

Û यह सोच अनुचित है कि ईसा सबके बुरे कर्मों की सजा पाकर सूली चढ़ गये। इससे तो ईसाई को आजीवन दुष्कर्म करने की छूट मिल जाती है।

Û ओल्ड टेस्टामेंट में कुछ गूढ़ सत्य हैं; पर न्यू टेस्टामेंट के शब्द स्वयं प्रभु के हैं, यह मैं नहीं मानता। मैं उनके तीन प्रमुख पदों फादर, सन और होली घोस्ट को उस अर्थ में नहीं मानता, जैसा पादरी बताते हैं।

Û यह विचार ठीक नहीं है कि काम भावना पाप का मूल है तथा इस प्रक्रिया में से पैदा होने के कारण मानव जन्मजात पापी है। स्त्रियांे को आत्माहीन तथा पुरुषों के मुकाबले द्वितीय श्रेणी का प्राणी मानना भी गलत है।

Û ईसाइयत के इतिहास में युद्धों की प्रधानता रही है। उन्होंने विश्व के सर्वाधिक सभ्य तथा सुसंस्कृत लोगों को कंगाल बनाया है। हिन्दुओं में अस्पृश्यता की तरह ईसाइयों में युद्धप्रियता भी कलंक है।

Û भारत में ईसाइयत अराष्ट्रीयता और यूरोपीकरण का पर्याय है। मिशनरी ब्रिटिश साम्राज्य के सेवक और विस्तारित एजेंट हैं। इसलिए स्वतंत्र भारत में उनका कोई स्थान नहीं होगा।

Û धर्मान्तरण मानवता के लिए भयंकर विष है। यदि सत्ता मेरे हाथ में हो, तो मैं धर्मान्तरण का यह सारा धन्धा ही बंद करा दूं। धर्मान्तरित करते समय गोमांस और शराब का सेवन कराना घृणित है।

Û शिक्षा में उनकी रुचि पवित्र उद्देश्य से नहीं, वरन ईसाइयत के पापपूर्ण प्रचार और विस्तार के लिए है।

Û मिशनरियों द्वारा बांटा जा रहा पैसा धनपिशाच का फैलाव है।

ऐसे सैकड़ों उद्धरण दिये जा सकते हैं। इस बारे में स्व. श्री रामस्वरूप जी ने भी बहुत कुछ लिखा है। श्री ओबामा भारत और हिन्दू धर्म की महान परम्पराओं पर कुछ कहने से पहले यदि अपने गिरेबान में झांक लें, तो अच्छा रहेगा।

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2 Comments on "ओबामा की बेचैनी"

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sureshchandra.karmarkar
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sureshchandra.karmarkar
भारत में कभी भी धर्म या उपासना के आधार पर किसी व्यक्ति को पद से विचलित नहीं किया गया. और भारत में मुस्लिम हों ,इस्सयी हों या सनातन धर्म से निकले जैनियों,बौद्धों, सिक्खों को कभी भी उनकी उपासन पद्धति के आधार पर दोयम दर्जे का नहीं माना गया. सर्वोच्च न्यायलय के मुख्य न्यायाधीश, राष्ट्रपति. रक्षा और अनुसन्धान क्षेत्र के अध्यक्ष ,सभी जातियों और धर्मो के लोग रह चुके हैं यह शायद ओबामा जी को मालूम नहीं होगा. क्रिकेट ,हॉकी ,और कई खेलों के कप्तान सभी समुदायों से रहें हैं. फिल्म जगत में कितने ही प्रतिभाशाली अभिनेता,गायक, सभी वर्गों,जातियों के हैं… Read more »
mahendra gupta
Guest

ओबामा भी कोई दूध के धुले नहीं है, वे भी जातिगत रंगभेद व धार्मिक राजनीति से ग्रसित देश के ही राष्ट्रपति है इसलिए उन की बात पर भी ज्यादा कान देना भी नासमझी ही होगी ,हमारे यहाँ तो कांग्रेस व अन्य विपक्षी दलों के पास और कोई मुद्दा है नहीं बेचारे ऐसी बातें व उनमें सांप्रदायिक अर्थ ढूंढते रहते हैं

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