लेखक परिचय

नवीन देवांगन

नवीन देवांगन

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में जन्म। पत्रकारिता में बी.जे.एम.सी.की डिग्री बिलासपुर तथा एम.बी.जे प्रसारण पत्रकारिता की डिग्री भोपाल के माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय से ली। दिल्ली और मुंबई के अनेक टेलिविज़न प्रोडक्शन हाऊस में कार्य करने के बाद रामोजी फिल्म सिटी के इंटरटेनमेन्ट् सेक्शन में चार वर्ष एडीटर के पद पर कार्य। दिल्ली के विभिन्न मीडिया शैक्षणिक संस्थानों में टेलिविज़न प्रोडक्शन में गेस्ट फैकेल्टी के रुप में कार्यानुभव। लेखन में रुचि। फिलहाल पिछले 6 वर्षो से सहारा समय के क्रिएटीव विभाग में सीनियर एडिटर के पद पर कार्य कर रहे है।

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-नवीन देवांगन

लो एक और इंसान का जीते जी एक और मंदिर बन कर तैयार है। हमारी भावी पीढ़ी नारियल फूल माला ले कर इस मंदिर के घंटा बजाकर न जाने कौन-कौन सा वरदान मांगे? धन्य है भारतनगरी? और धन्य है यहां रहने वाले? यहां ये सवाल उठना लाज़मी है कि जिस निर्विकार को हम कभी पत्थर, कभी पेड़ तो कभी पानी के रुप में पूजते है वहां एक जीते जागते इंसान की मूर्ति स्थापित कर उसे पूजने में भला हर्ज ही क्या है ये बात तमिलनाडु के जिला पंचायत सलाहकार जी आर कृष्णमूर्ति अच्धि तरह समझते है तभी तो उन्होंने तामिलनाडु के गुदियाथम के पास लाखों रुपयें खर्च कर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और द्रमुक अध्यक्ष एम.करुणानिधि का एक विशालकाय मंदिर बनवाया है। वे देश के नागरिकों की नब्ज़ अच्‍छी तरह से समझते है उन्हें मालूम है कि हर तरह से परेशान लोग अपनी समस्या का निदान पाने के लिए आखिर में मंदिर का ही रुख करते है यही उनके हर दुखों से मुक्ति मिलती है फिर क्यों न मंदिर बनवाया जाए इस तरह से उन्होंने अपनी स्वामी भक्ति और आम जनता के प्रति अपना जिम्मेंदारी दोनों का ईमानदारी से निर्वहन किया है।

वैसे भी हमारे देश मे महापुरूषों का मंदिर बनवाने की परंपरा बरसों से चली आ रही है चाहे फिल्म अदाकार रजनीकांत की बात हो या अमिताभ बच्चन की इनका मंदिर आपको अवश्य मिल जाएगा फिर राजनीति के किरदार क्यों पीछे रहे, भाई इनका भी तो हक है कि अपने मूर्तियों के आगे धुपबत्ती जलवाएं। इतिहास गवाह है जो भी महापुरुष की श्रेणी में आता है हम तो या उसके नाम से चौराहा बना देते है रोड का नामकरण कर देते है जिले का नाम उसके नाम पर रखते है या हितकारी योजनाओ में इनका नाम जोड देते है इस पर हम इतना ईमानदार और कर्तव्यपरायण रहते है कि इसमे जरा सी भी गलती हम स्वीकार नहीं कर सकते। ये हमारी देश की प्रति वफादारी और हमेशा जागरुक रहने का एक सशक्त उदाहरण है। पिछले दिनों की ही बात ले लीजिए, उत्तरप्रदेश सरकार ने अमेठी को जिला बना कर इसका नाम दलित महापुरुष छत्रपति शाहूजी महाराज पर रख दिया अब भला ये बात पिछले कई वर्षों तक राज करने वाले कांग्रेस को कैसे रास आ सकता था। इसकी वजह भी साफ है। अमेठी दरअसल नेहरु गांधी परिवार के सियासी पहचान का अहम हिस्सा बन चुका है इसलिए ये मांग उठ रही है कि इस जिले का नाम महापुरुष राजीव गांधी के नाम पर हो। अब कोई भला ये कैसे स्वीकार कर सकता है कि जिस इलाके को जगह गांधी परिवार का गढ़ माना जाए जाता है उस इलाके का नाम किसी और के नाम पर हो।

खैर, मैडम मायावती इस मामले को सियासी तौर पर देखना बिल्कुल पंसद नहीं करती उनका मानना है कि महापुरुष सिर्फ सवर्णवर्ग से नहीं आते। दलित समुदाय को भी देश के चौराहो में, सड़कों में, योजनाओं में, जिलो में अपना नाम जुडवाने का पूरा अधिकार है माननीय काशीराम के नाम पर करोडों रुपये पार्को और मूर्तियों पर खर्च कर मायावती यही जताना चाहती है। पर हमें इन सब को सियासी चश्मों से नहीं देखना चाहिए हम तो एक आम मतदाता है हम तो एक सीधे साधे भक्त की तरह है जिन्हें मंदिर में रखे भगवान के प्रति आगाध आस्था रहती है हमे इस बात से कोई मतलब नहीं रहता कि इस मंदिर का निर्माण किसने करवाया है।

कई शहरों का नाम भी आए दिन बदलते रहते है पुराने डायरी में लिखे कई रिश्तेदारों के पते पर लिखे शहरो के नामो पर कई बदलाव करने पडते है बंबई से मुंबई, बंगलौर से मैंगलोर और न जाने क्या क्या, कइयों के तो कई बार मुहल्लों चौराहों तक के नाम बदलने पड़ते है ये सिलसिला कब रुकेगा कह पाना जरा मुश्किल है। मजे की बात ये है कि किसी जगह, रोड, चौराहों, संस्थानों के किसी भी नाम पर आम जनता को आज तक किसी प्रकार की कोई तकलीफ नहीं होती और न ही आज तक इसको लेकर कोई विरोध हुआ हो ऐसा भी देखने में नही आता, पर सियासी तौर पर ये बहुत मायने रखती है नाम, समुदाय और वोटबैक की राजनीति ही इन्हें ऐसा करने को मजबूर करती है किसी पार्टी के सत्ता में ही आते ही धडाधड पार्टी महापुरुषों के नाम की राजनीति शुरु हो जाती है सडकों, चौराहों पर इन महापुरुषों की विशालकाय मूर्तिया मुस्कराते हुए दिखने लगती है पर आम जनता को इससे कोई सरोकार नहीं होता उनके लिए तो महापुरुष महापुरुष ही रहते है उन्हें इस बात का जरा भी इल्म नही रहता कि फला महापुरुष के नाम पर उसके मोहल्ले का नाम क्यो रखा गया।

नाम की राजनीति का इतिहास हमारे देश में कोई नया नहीं है। इतिहास गवाह है कि इस तरह के काम आए दिन होते रहते है और इससे देश के स्वास्थ्य पर कोई असर नहीं पड़ता, असर पड़ता है तो जात-पांत की राजनीति करने वाले राजनीतिक पार्टियों पर जिनके पैरोकार इन्हीं के बदौलत अपनी राजनीतिक रोटीयां सेकते आए है और आगे भी सेकते रहेंगे।

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