लेखक परिचय

पंकज झा

पंकज झा

मधुबनी (बिहार) में जन्म। माखनलाल चतुर्वेदी राष्‍ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर की उपाधि। अनेक प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में राजनीतिक व सामाजिक मुद्दों पर सतत् लेखन से विशिष्‍ट पहचान। कुलदीप निगम पत्रकारिता पुरस्‍कार से सम्‍मानित। संप्रति रायपुर (छत्तीसगढ़) में 'दीपकमल' मासिक पत्रिका के समाचार संपादक।

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महात्मा गाँधी ने कभी कहा था कि यह धरती हर व्यक्ति की ज़रूरत पूरा कर सकता है लेकिन किसी एक के भी लोभ को नहीं. वास्तव में आदमी का लोभ उसे किस हद तक गिरा सकता है सोचकर आपका मन वितृष्णा से भर जाएगा. एक शायर के शब्द में कहू तो गरीबों की कुटिया के मुक़ाबिल आठ मंजिल का मकान बना उनके हिस्से की धूप भी खा जाने वाले भ्रष्टाचारी ऐसे लोगों के लिए आप सभ्य भाषा में कहाँ से शब्द खोज कर लायेंगे? अभी हाल ही में छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के कुछ प्रशासनिक अधिकारियों के ठिकानों से निकले अरबों की काली कमाई के बारे में जानकर आपका लहू उबाल मारने लगेगा. दुःख और अफ़सोस इस बात का है कि समाज का कोई भी कोना लोकतंत्र का कोई भी पद आज शक के दायरे से बाहर नहीं रह पाया है. अभी-अभी खबर आयी की राष्ट्रपति के पति को एक ज़मीन घोटाले के मामले का दोषी पाया गया है और उनके नाम की ज़मीन को छीन लिए जाने का आदेश महाराष्ट्र के राजस्व बोर्ड ने दिया है. तो राष्ट्रपति-पति से लेकर “बाबू” तक अगर लुटेरों का समूह हो जाने से कोई भी वंचित नहीं रह पाया है तब कैसे गर्व करें हम अपने लोकतंत्र पर? मुद्दा कानूनी से ज्यादा सामाजिक और नैतिक है. अगर थोडा सा व्यावहारिक हो कर सोचे तो ये सही है कि शत-प्रतिशत ईमानदार रह कर इस तंत्र में कोई भी (अपवादों को छोड़ दें तो) नहीं रह सकता. लेकिन क्या कुकर्मों की भी कोई सीमा नहीं होनी चाहिए? लोगों के मुंह का निवाला छीन खुद के लिए भूख भी नहीं खरीद पाने की विवशता, उनके हिस्से का धूप छीन खुद को खुली हवा में सांस भी न ले पाने की मजबूरी सामने रहते हुए भी आखिर कौन सी ऐसे हवस है जिसके कारण लोग समाज के साथ-साथ खुद की भी शांति दाव पर लगाने को आतुर हैं,समझ में नहीं आता. आज अगर आप रायपुर में हैं तो देश के किसी और कोने में बात करके देखिये सब आपको केवल “बाबूलाल अग्रवाल” का हाल पूछते ही नज़र आयेंगे. अगर भोपाल में हैं तो सारा देश आपसे भ्रष्टाचारी आईएएस दंपत्ति की खबर लेना चाहेगा. सवाल ये है कि विश्व के सबसे कठिन माने जाने वाले प्रतियोगिता में से चुनकर आने वाले ऐसे अधिकारियों को भी अपनी दुर्गति का पूर्वाभास नहीं रहता? या आयकर का छपा पड़ना उनके लिए ‘स्टेटस सिम्बाल’ जैसा ही होता है. उस चोर की तरह जिसे शहर में गधे पर बैठा के घुमाया जा रहा था तो अपने घर के सामने से गुजरते हुए अपनी बीवी को कहता है कि चाय बना कर रखना अब बस दो चक्कर लगाना ही बाकी रह गया है.

तो क्या आज समाज में लुटेरों को ऐसी स्वीकार्यता मिल गयी है कि उन्हें भी सम्मान की नज़र से ही देखा जाता है या सब लोगों की चमड़ी ऐसी मोटी हो गयी है कि अब किसी भी तरह के अपयश के लिए कोई हया बांकी नहीं रह गयी. वाल्मीकि रामायण में भगवन राम से कहलवाया गया है…न भीतो मरनादश्मी, केवलं दूशितो यशः..यानी मैं मरने से नहीं डरता लेकिन कलंक से बहुत डर लगता है. क्या अब ऐसी शर्मो हया के लिए कोई जगह ही नहीं बची? हालांकि भ्रष्टाचार एकबारगी सामने आ गयी कोई समस्या हो ऐसी बात नहीं है. मानव सभ्यता में गलत आचरण वाले लोगों की कमोवेश उपस्थित से कभी भी इनकार नहीं किया जा सकता. लेकिन आज खास बात यहाँ है की आज न चोरों में कोई संकोच बच गया है और न ही समाज में ऐसे लोगों के प्रति कोई आक्रोश बचा है. बस यही एक ऐसा सोचनीय बिंदु है जो समाजशास्त्रीय विश्लेषण की मांग करता है. सवाल केवल किसी शेखावत पाटिल या अग्रवाल का नहीं है. जैसे कि हर आरोपी कहता है वैसे ही बाबू का कहना भी सही हो सकता है की किसी साज़िश के तहत फसाया गया हो या ये की एक भ्रष्ट को जनम देने वाली व्यवस्था में संदेह का लाभ किसी को नहीं दिया जा सकता. कम से कम नैतिक जिम्मेदारी से तो कोई भी वंचित नहीं रह सकता. आखिर इस लोकतंत्र ने तो “बाबू लाल” के बदले वो “लाल बहादुर” भी देखा है जिन्होंने महज़ एक रेल दुर्घटना हो जाने पर इस्तीफ़ा देने में पल भर भी देर नहीं लगाया. पर ये तो बात नैतिकता की हुई जिसकी उम्मीद आज के जमाने में तो किसी से भी नहीं की जा सकती. लेकिन यहाँ तो सीधे सवाल तो उस पूरे ही कुएँ का है जिसमे भांग घोल दी गयी है. तो आखिर जब लोकराज में लोकलाज के लिए कोई जगह नहीं बची हो, जहां कमाई का मतलब घूस और कमीशन होता हो. घोटाले के आरोप में जेल यात्रा जहां (बकौल लालू यादव) कृष्ण के कारागार में जनम लेने के बराबर निरूपित किया जाता हो, जहां एक सामान्य नक्सली की गिरफ्तारी पर ताबडतोड़ तहलका मचा देने वाले लोग बड़े-बड़े घोटाले पर भी चूहे की तरह दुबक जाते हो, जहां न्यायालय खुद घोटालेबाज़ी के कठघरे में खड़ा नज़र आता हो वहाँ पर तो बस ऊपरवाले की न्याय के तरफ ही हाथ उठाना होगा, क़ानून पर भी भरोसा करने का कारण यहाँ खतम होते जा रहा है.

सभ्य समाज के किसी क़ानून में “सज़ा” का मतलब “सबक” होता है “बदला” नहीं. सबक इसलिए कि आगे कोई भी अन्य व्यक्ति अपराध करने से पहले सौ बार सोचे. लेकिन इस व्यवस्था को क्या कहें जिसमें किसी बड़े लूटेरों के दण्डित होने का कोई नजीर ही सामने न हो. यहाँ तो चारा घोटाले के आरोपी मुख्यमंत्री जेल जाने से पहले अपनी अनपढ़ पत्नी को सत्ता सौप जाता है और फिर से सीना तान कर वापस आ कर दुगनी उत्साह और ताकत से राज-काज को सम्हाल लेता है. सांसदों को खरीदने का अपराधी बाद में राज्यपाल बन कर समूचे राज्य को ही बंधक बना लेता है या कोई “कोड़ा” शान से पत्नी को निर्वाचित करा लेता है. ऐसे-ऐसे गंदे उदाहरणों वाले लोकतंत्र में आप न्याय की खोज कहाँ कर पायेंगे? तो आखिर उपाय क्या है अब? अगर क़ानून को लागू करने वाले लोग आंशिक रूप से भी ईमानदार हो तो बस एक रास्ता निकल सकता है और ये की कम से कम क़ानून के अनुपालन में किसी तरह का दोगलापन न दिखे. जैसे आप गौर करें…मोहल्ले का कोई मजनू जो किसी लड़की से छेड़खानी कर बैठता हो, कोई पॉकेटमार कभी पकड़ में आ जाए या कही किसीने कोई छुरेबाजी कर ली हो,तो सरेआम उसकी जुलुस सड़क पर निकाली जाती है. पुलिस के लोग उसको गधे पर बैठा कर मूह काला कर घुमाने में जुट जाते हैं. लेकिन कोई राठौर किसी मासूम को आत्महत्या करने पर विवश करके भी शान से दशकों तक सीना तान कर खड़ा रह सकता है. किसी बड़े अधिकारी अरबों की जेबतरासी कर लेने के बाद भी उसका सम्मान वैसे ही बना रह सकता है. अखबारी रिपोर्ट में भी उसे “श्री” का संबोधन ही दिया जाता है. कम से कम अगर सामान्य अपराधियों की तरह ही (जबकि इनका अपराध उनसे कई गुना ज्यादे गंभीर होता है) इनको सरेआम अपमानित किया जाय तो शायद निश्चय ही कोई और ऐसे किसी बेशर्म आर्थिक या सामाजिक अपराध करने से पहले सौ बार सोचेगा. साथ ही समाज के लोग भी – भले ही राठोड पर हमले करने वाले उत्सव की तरह नहीं– कुकर्मियों का सामजिक बहिष्कार करना शुरू कर दें तो शायद इस केंसर से कुछ हद तक छुटकारा पाया जा सकता है. अंततः घपलो-घोटालों के ऐसे लोकतंत्र में उम्मीद अभी भी समाज के भले लोगों पर ही है.लेकिन शर्त ये की वे भी अपना तटस्थता छोडें. जब तमाम आयकर अधिकारी बाबूलाल के ठिकाने खोजने में व्यस्त थे, उसी समय रायपुर का एक ऑटो चालक अपने उस पेसेंजर को खोजने में अपना काम छोड़ कर लगा हुआ था जिसका ३५ हज़ार रूपये से भरा बैग उसके ऑटो में छूट गया था. खबर ये आई कि ऐसा ईमानदार व्यक्ति को देख सीएसपी ने उसे गले से लगा लिया. अंततः ऐसे ईमानदार लोगों को प्रोत्साहित करने वाला सिस्टम ही इस दे लोकतंत्र को बचाने में कामयाब हो सकता है, ऐसे लोकतंत्र का जिसमे सही अर्थों में किसीके अधिकार पर कुण्डली मार कर बैठ जाने वाले किसी अधिकारी को दण्डित करने की पर्याप्त व्यवस्था हो.

– पंकज झा.

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1 Comment on "ये मेरे हिस्से की शायद धूप भी खा जायेंगे"

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Ranjana
Guest

शत प्रतिशत सही….पूर्णतः सहमत हूँ आपसे…

एक समय था..और यह कोई बहुत पहले की भी बात नहीं की लोग जीवन बिता देते थे अपनी छवि को साफ़ सुथरी रखने में…लोग विख्यात होने में विश्वास रखते थे..पर आज लोगों को कुख्यात होना ज्यादा फायदा जनक लगता है.,.

जब तक समाज में सच्चाई ईमानदारी को प्रोत्साहित नहीं किया जाएगा,यह स्थिति दिनोदिन और बदतर होती ही जायेगी…

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