लेखक परिचय

मयंक चतुर्वेदी

मयंक चतुर्वेदी

मयंक चतुर्वेदी मूलत: ग्वालियर, म.प्र. में जन्में ओर वहीं से इन्होंने पत्रकारिता की विधिवत शुरूआत दैनिक जागरण से की। 11 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय मयंक चतुर्वेदी ने जीवाजी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के साथ हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर, एम.फिल तथा पी-एच.डी. तक अध्ययन किया है। कुछ समय शासकीय महाविद्यालय में हिन्दी विषय के सहायक प्राध्यापक भी रहे, साथ ही सिविल सेवा की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों को भी मार्गदर्शन प्रदान किया। राष्ट्रवादी सोच रखने वाले मयंक चतुर्वेदी पांचजन्य जैसे राष्ट्रीय साप्ताहिक, दैनिक स्वदेश से भी जुड़े हुए हैं। राष्ट्रीय मुद्दों पर लिखना ही इनकी फितरत है। सम्प्रति : मयंक चतुर्वेदी हिन्दुस्थान समाचार, बहुभाषी न्यूज एजेंसी के मध्यप्रदेश ब्यूरो प्रमुख हैं।

Posted On by &filed under जन-जागरण.


 pfडॉ मयंक चतुर्वेदी
एक कर्मचारी अपने जीवन में तिनका-तिनका जोड़कर अपनी जरूरत के लिए रुपयों का संग्रह करता है। उसकी कोशिश यही रहती है कि वह अपने संग्रहित किए गए धन का उपयोग तभी करे, जब उसे उस धन की अत्यधिक आवश्यकता हो। अमूमन भारतीय समाज की जो अर्थ संग्रहण की प्रवृत्ति है, उसमें देखा भी यही गया है कि कोई भी शासकीय या निजी क्षेत्र में काम करने वाला कर्मचारी अपनी भविष्य निधि का उपयोग तभी करता है, जब उसके कार्य धन की अतिरिक्त व्यवस्था किए बगैर किया जाना संभव नहीं होता है। किंतु इन दिनों जिस तरह की खबर निकल कर आ रही है, वह यही संकेत दे रही है कि सेवानिवृत्ति के पूर्व कोई भविष्य निधि (पीएफ) में जमा अपना पूरा धन नहीं निकाल सकेगा। यदि इस प्रकार का कोई निर्णय कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) द्वारा लिया जाने वाला है, तो निश्चित ही यह सभी कर्मचारियों के लिए चिंता का विषय अवश्य है।
वस्तुत: चिंता इसीलिए वाजिब है, क्योंकि ऐसे में कोई कर्मचारी जरूरत के बाद भी अपने श्रम से संग्रहित किए गए पूरे धन का उपयोग नहीं कर पाएगा। भले ही यह कदम सेवानिवृत्ति से पहले ही सदस्यों द्वारा भविष्य निधि (पीएफ) में जमा समूची रकम निकालने की प्रवृत्ति को हतोत्साहित करने के लिए उठाया जा रहा हो, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भारतीय समाज परम्परावादी, उत्सवधर्मी और परस्पर सहयोगात्मक रवैया अपनाने वाला समाज है। जहां भविष्य निधि के मायने हैं, जहां कम वहां हम।
आज आश्चर्य तो इस बात पर हो रहा है कि ईपीएफओ के निर्णय लेने वाले शीर्ष निकाय केंद्रीय न्यासी बोर्ड (सीबीटी) के सभी कर्मचारी प्रतिनिधि परिपक्वता से पहले की निकासी को हतोत्साहित करने के पक्ष में हैं, जबकि वे सभी कर्मचारी भी कहीं ना कहीं कर्मचारी हैं और उसके बाद भी उन्हें अपने साथियों का हित नहीं दिख रहा है।
सरकार अभी आंशिक निकासी सुविधा में बदलाव लाने की तैयारी में लगी है। सेवा काल के दौरान सदस्यों की अन्य जरूरतों को ध्यान में रखते हुए आंशिक निकासी की सुविधा में संशोधन होंगे। भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) यहां आज इस बात पर विचार कर रहा है कि नियमों में ऐसा बदलाव किया जाए, जिससे 50 साल की आयु पूरी होने तक भविष्य निधि खाते की पूरी रकम का भुगतान न किया जाए। वस्तुत: यहां प्रश्न यह है कि संगठन को ऐसा निर्णय लेने की जरूरत आज क्यों आन पड़ी है ? जबकि ईपीएफओ के पास किसी प्रकार की आर्थिक तंगी भी नहीं है, जो कि उसके लिए यह जरूरी हो जाए कि वह अपने पास कर्मचारियों के रुपयों के कुछ भाग अंत तक रोक कर रखे। सरकार इसमें जो ईपीएफओ अंशधारकों की 10 प्रतिशत रकम रोकने की योजना पर जिस प्रकार विचार विमर्श कर रही है, वास्तव में उसकी तो यहां कोई जरूरत कहीं से भी नहीं दिखाई दे रही है।
अभी तक प्राय: यही देखा गया है कि कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) के जरिए कर्मचारियों के हित में ही निर्णय लिए गए हैं। ऑनलाइन पीएफ ट्रांसफर, पीएफ पर ज्यादा ब्याज की तैयारी, पीएफ में देरी पर कार्रवाई जैसे इस संगठन के तमाम लिए गए निर्णय कर्मचारी के लिए मंगलकारी ही रहे हैं, निश्चित ही ऐसे वक्त में इस तरह की खबर आना किसी आश्चर्य से कम नहीं लगता है। अंतत: ईपीएफओ को समझना ही चाहिए कि जो रुपया कर्मचारी का ही है तो वह उसके उपयोग करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है। यदि उसकी जरूरत है कि वह अपना जमा पूरा रुपया निकालकर खर्च करे, तो इसमें किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। यदि रुपया उसका है तो निश्चित ही खर्च के मामले में मर्जी भी उसकी की चलेगी। कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) एक व्यवस्थाभर है, जो केंद्र सरकार की ओर से कर्मचारियों को राहत देने के लिए संचालित है। सरकार का इसमें यही कल्याणकारी भाव निहित है कि शासन स्तर के अलावा निजी स्तर पर किसी प्रकार से कर्मचारियों का शोषण नहीं हो सके।
वस्तुत: कर्मचारियों के तमाम मामलों, श्रम कानूनों, उनके क्रियान्वयन और सुधारों को लेकर यहां भले ही सरकार पूरे तौर पर किसी का शोषण होने से नहीं रोक पा रही हो, किंतु सरकार इस व्यवस्था और संगठन के माध्यम से एक सीमा तक प्रत्येक कर्मचारियों की आर्थिक मदद तो कर ही पा रही है। इसीलिए यह जरूरी है कि कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) ऐसे किसी भी निर्णय को लेकर बचे, जिससे आंशिक तौर पर ही सही किसी कर्मचारी के आर्थिक हित जरूर प्रभावित होते हैं।


Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz