लेखक परिचय

सतीश सिंह

सतीश सिंह

श्री सतीश सिंह वर्तमान में स्टेट बैंक समूह में एक अधिकारी के रुप में दिल्ली में कार्यरत हैं और विगत दो वर्षों से स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। 1995 से जून 2000 तक मुख्यधारा की पत्रकारिता में भी इनकी सक्रिय भागीदारी रही है। श्री सिंह दैनिक हिन्दुस्तान, हिन्दुस्तान टाइम्स, दैनिक जागरण इत्यादि अख़बारों के लिए काम कर चुके हैं।

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-सतीश सिंह

हमारे देश में हर खास दिन को दिवस के रुप में मनाया जाता है। जनसंख्या दिवस उन्हीं दिवसों में से एक है। जो हर साल सन् 1987 से 11 जुलाई को मनाया जा रहा है। दरअसल 11 जुलाई 1987 में ही विष्व की जनसंख्या 5 बिलियन हुई थी, पर हकीकत में इस दिवस में ऐसा कुछ नहीं है कि इसे मनाया जाए। क्योंकि न तो हम 11 जुलाई को जनसंख्या कम करने के लिए कोई प्रण लेते हैं और न ही इस बाबत किसी तरह का सकारात्मक कदम उठाते हैं। केवल 11 जुलाई सन् 1987 में विश्‍व की जनसंख्या को 5 बिलियन के आंकड़े तक पहुँचने के उपलक्ष्य में, इस दिन को ‘किसी खास दिवस’ के रुप मनाया जाना कहीं से भी तार्किक नहीं लगता है।

पारंपरिक रुप से इस बार भी जनसंख्या के दशकीय वृद्धि का वास्तविक आकलन करने के लिए जनगणना (2011) के काम की शुरुआत हो चुकी है। इसका शुभारंभ 10 अप्रैल 2010 को कांग्रेस प्रेसीडेंट श्रीमती सोनिया गाँधी की निजी जानकारी को सरकारी खातों में दर्ज करके किया गया।

ज्ञातव्य है कि आजादी के बाद से यह सातवां जनगणना है और देश में होनेवाला 15वां। उल्लेखनीय है कि भारत में सबसे पहले सन् 1872 में जनगणना हुई थी। जनगणना के द्वारा इंसान की संख्या जानने के अलावा देश के हर व्यक्ति की आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक एवं शैक्षणिक स्थिति की भी गणना की जाती है।

भारत में आबादी इस तेजी से बढ़ रही है कि हर साल हम जनसंख्या की दृष्टि से आस्ट्रेलिया जैसे देश का निर्माण कर लेते हैं और दस सालों में बा्रजील का।

भारत के अनेक राज्यों की जनसंख्या विश्‍व के अनेक देशों से भी अधिक है। मसलन, उत्तरप्रदेश की जनसंख्या ब्राजील के लगभग बराबर है। बिहार की जनसंख्या जर्मनी से भी अधिक है। पश्चिम बंगाल इस मामले में वियतनाम के बराबर है। अन्य राज्यों की जनसंख्या भी विश्‍व के अन्यान्य देशों से या तो अधिक है या फिर बराबर है।

भारत में विश्‍व की 17 फीसद आबादी निवास करती है। जबकि उनके रहने के लिए विश्‍व की 3 फीसद जमीन ही है और इस संबंध में प्राकृतिक संसाधनों की अपनी सीमा है। लिहाजा अगर हम अपनी जनसंख्या वृध्दि को रोकने में असफल रहते हैं तो 2026 तक मौजूदा प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग 371 मिलियन अधिक लोग करेंगे। उस वक्त हमारी स्थिति क्या होगी? इसकी महज कल्पना भी दु:स्वप्न के समान है।

सच कहा जाए तो इस बदहाल स्थिति के मूल में गरीबी, अशिक्षा और गर्भ निरोधक का कम इस्तेमाल करना है। अभी भी भारत के सिर्फ दो राज्यों हिमाचल प्रदेश और पष्चिम बंगाल में गर्भ निरोधक के इस्तेमाल का प्रतिशत थोड़ा बेहतर है और वह 70 फीसद के आंकड़े को पार करता है।

बिहार, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश और राजस्थान में आज भी 50 फीसद लड़कियों की शादी 18 वर्ष से कम उम्र में हो जाती है। पूरे देश में प्रत्येक साल 35 लाख लड़कियाँ किशोरावस्था में ही माँ बन जाती हैं।

स्वास्थ मंत्रालय के अनुसार भारत की महिलाओं में उत्पादकता दर 2.68 पाया जाता है। इसका अर्थ यह है कि बिहार व उत्तरप्रदेश को छोड़ करके भारत के अन्य राज्यों की महिलाएँ बच्चे पैदा करने की उम्र में कम-से-कम तीन बच्चे पैदा कर सकती हैं। वहीं बिहार व उत्तरप्रदेश में यह दर चार है। ताजा पड़ताल से जाहिर है कि 2015 तक ‘हम दो हमारे दो’ की संकल्पना को पूरा करने में भारत के मात्र 14 राज्य ही सफल हो सकते हैं। भारत में एक मात्र राज्य आंध्रप्रदेश ही है जिसने जनसंख्या को रोकने में उल्लेखनीय काम किया है और वह अपने काम में काफी हद तक सफल भी रहा है।

जिस गति से हमारे देश की जनसंख्या बढ़ रही है, यदि वह बरकरार रहती है तो हमारा देश 2030 तक चीन से भी आगे चला जाएगा, जोकि पूर्व में अनुमानित आकलन से 5 साल पहले है।

आज भारत की आबादी 1.15 बिलियन है जोकि 2030 में बढ़कर 1.53 बिलियन हो जाएगी। जबकि आजादी के समय भारत की आबादी मात्र 350 मिलियन थी। जो अब तिगुनी से भी अधिक चुकी है। उल्लेखनीय है कि अगर वर्तमान दर से जनसंख्या में बढ़ोतरी होती रही तो 2050 तक हमारे देश की आबादी 2 अरब से भी अधिक हो जाएगी।

देश के अंदर विगत दो दशकों में जनसंख्या की वृद्धि दर सबसे अधिक नागालैंड में रही है। 1981-91 के बीच इस राज्य में 56.08 फीसद की दर से वृद्धि हुई थी, जोकि 1991-2001 में बढ़कर 64.41 फीसद हो गई थी। बीमारु राज्य उत्तारप्रदेश में यह वृद्धि दर 1981-91 में 25.55 फीसद रही, वहीं 1991-2001 में 25.80 फीसद।

इस तरह से देखा जाए तो उत्तरप्रदेश में जनसंख्या की वृद्धि दर अमूमन स्थिर रही। इसी के बरक्स में बिहार की स्थिति थोड़ी चिंता पैदा करने वाली जरुर है। बिहार में जनसंख्या की वृद्धि दर 1981-91 में जहाँ 23.38 फीसद रही थी, वहीं 1991-2001 में 28.43 फीसद रही।

महानगरों की बात करें तो मुम्बई, कोलकत्ता और दिल्ली में जनसंख्या का दबाव चेन्नई के वनिस्पत ज्यादा रहा है। दिल्ली में जनसंख्या सन् 1975 से सन् 2010 तक में दुगनी से भी अधिक हो गई है। दिल्ली की यह स्थिति तब है जब जनसंख्या का विस्तार मूल रुप से एनसीआर और निकटवर्ती के शहरों मसलन गाजियाबाद, मुरादाबाद, आगरा, मथुरा, अलीगढ़ में हो रहा है। हालत मुम्बई और कोलकत्ताा की भी ठीक नहीं है। अन्य शहरों में भी जनसंख्या का विस्तार तेज रफ्तार से ही हो रहा है।

इस विषय का सबसे दुखद पहलू यह है कि जनसंख्या से मुसलसल उत्पन्न हो रहे अनगिनत समस्याओं के बावजूद भी हमारे देश में इस पर लगाम लगाने के लिए वांछित कोषिश नहीं की जा रही है।

सन् 1970 में इंदिरा गाँधी की सरकार ने ‘परिवार नियोजन’ कार्यक्रम की शुरुआत की थी, जिसका नाम बाद में बदलकर ‘राष्ट्रीय जनसंख्या नियंत्रण’ रखा गया था। यह कार्यक्रम पूरी तरह से असफल रहा।

सन् 2006 में जनसंख्या स्थिरता कोष भी बनाया गया, जिसका भी हाल परिवार नियोजन कार्यक्रम की तरह हुआ। 2 सालों के बाद ही सन् 2008 में संतुष्टि परियोजना को आरंभ किया गया, जोकि आज भी जारी है।

सरकार द्वारा प्रायोजित इस परियोजना के तहत नसबंदी करवाने के लिए लोगों को प्रेरित किया जाता है। इसके लिए डॉक्टरों और नसबंदी करवाने वाले दोनों को आर्थिक प्रोत्साहन दिया जाता है। डॉक्टरों को 1 ऑपरेशन करने के लिए 1500 रुपये दिये जाते हैं। फिर भी यह योजना पूर्व की दूसरी योजनाओं की तरह ही सफलता पाने में विफल रही है।

जनसंख्या अभिषाप है या वरदान? छुटपन में अक्सर मास्टर जी इस विषय के पक्ष और विपक्ष पर निबंध लिखने के लिए कहते थे। उस वक्त जनसंख्या के फायदे और नुकसान की ज्यादा समझ नहीं थी। फिर भी विपक्ष में निबंध लिखना आसान लगता था। आज भी मुझे जनसंख्या के लाभ कम ही नजर आते हैं।

सामान्य तौर पर जरुर लगता है कि इंसानों की संख्या बढ़ने से कामगार बढ़ेंगे और परिणाम स्वरुप समस्याओं का निदान स्वत: स्फूर्त तरीके से हो जाएगा, पर वास्तव में स्थिति ठीक इसके विपरीत है।

जनसंख्या के दबाव के कारण आज पर्यावरण प्रदूषण अपने चरम सीमा पर है। प्रकृति द्वारा प्रदत्ता संसाधनों की अपनी सीमा है। उसका दोहन मनमानी पूर्वक नहीं किया जा सकता है, लेकिन इंसान इस तथ्य को जानबूझकर नहीं समझना चाहता है।

कभी महात्मा गाँधी ने भी कहा था, ‘प्रकृति हमारी जरुरतों को तो पूरा कर सकती है, किंतु हमारे लालच को नहीं’। आज हमारे लालच के आगे प्रकृति विवश हो गई है।

शहरीकरण, विकास और तीव्र औधोगिकीकरण के कारण आज प्राकृतिक संसाधन लगातार कम होते जा रहे हैं। जनसंख्या विस्फोट इतना जबर्दस्त है कि अब इंसानों को रहने के लिए धरती और अनाज दोनों कम पड़ने लगे हैं।

अधिक अनाज के उत्पादन के लिए रसायनिक पदार्थों का प्रयोग बेरोक-टोक चल रहा है। रासायनिक इंजेक्‍सन से 1 किलो की लौकी को 2 किलो का बनाने के बाद भी सभी का पेट नहीं भर पा रहा है। दिल्ली में हम यमुना के पानी का हाल देख ही रहे हैं। पूज्यनीय और पावन मानी जाने वाली यमुना का पानी आज आचमन तक के लिए भी उपयोग में नहीं लाया जाता है। गलती से भी इसके पानी को पीना मौत को बुलावा देने के समान हो गया है।

यह हमारी काली करतूतों का ही कमाल है कि यमुना जैसी जीवन दायिनी नदी भी अंतत: मौत की नींद के आगोश में चली गई है। देश की सबसे बड़ी नदी गंगा का हाल भी कमोबेश यमुना के समान हो गया है। आज की तारीख में गंगा का स्वास्थ सबसे अधिक खराब कानपुर और पटना में है।

छोटी-छोटी कितनी नदियाँ सूख चुकी हैं, इसका हिसाब-किताब किसी के पास नहीं है। पानी का इतना अधिक दोहन हो चुका है कि भूजल का स्तर पाताल में पहुँच गया है। हर छोटे-बड़े नगर में पानी के लिए रोज मार-काट मच रहा है। अधिक से अधिक जमीन पर खेती करने के लालच में या अपने अस्तित्व को बचाने की जद्दोजहद में हम तालाब, खई, पईन आदि की संस्कृति को खत्म करते जा रहे हैं।

भोपाल के यूनियन कार्बाइड कारखाने से जहरीले गैस के रिसाव के कारण तकरीबन 15000 हजार निर्दोष लोग मरे थे, पर इसके लिए आज भी किसी को कोई गम नहीं है। इस हादसे की आड़ में भी लोग राजनीति करने से बाज नहीं आ रहे हैं।

गरीबी निरतंर बढ़ती चली जा रही है। नकली सामान बनाने और कालाबाजारी करने के बाद भी सभी के जरुरतों को हम पूरा नहीं कर पा रहे हैं।

स्वास्थ की स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं है। इस क्षेत्र में आधारभूत आवश्‍यकताओं में लगातार कमी होने के कारण इंसान बेमौत मर रहे हैं। कुपोषण की मार से सभी बेहाल हैं। कालाहांडी में भूखमरी की समस्या आज भी बरकरार है।

बच्चे प्राथमिक पाठशाला में दाखिला नहीं ले पा रहे हैं। अषिक्षा के कारण इंसान जनसंख्या के नुकसान से वाकिफ ही नहीं हो पाता है। उसे लगता है कि अधिक कमाने वालों के घर में रहने से घर की हालत अच्छी हो सकती है। गरीबी के कारण आम आदमी सेक्स को ही मनोरंजन का पर्याय मानने लगा है। गर्भ निरोधक का इस्तेमाल करने में हिचकिचाता है। कुछ लोग बच्चे को ईश्‍वर का प्रसाद मानते हैं। इन्हीं चक्करों में जनसंख्या लगातार बढ़ती चली जाती है।

सच कहा जाए तो इस कलियुग में हम सभी विकास की जेट पर सवार हैं और एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ में हम अपने पतन पर भी जश्‍न मनाते हैं। इस प्रतिकूल स्थिति में भी जनसंख्या पर नियंत्रण इंसान बिना किसी दबाव के कर सकता है, लेकिन इसके लिए उसका जागरुक और शिक्षित होना जरुरी है। अगर इंसान जाहिल है और साथ में अपना भला-बुरा सोचने में भी असमर्थ है तो फिर जनसंख्या को बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता है।

लिहाजा सरकार का कर्तव्‍य है कि वह जनता की आधारभूत जरुरतों को पूरा करने में उसकी मदद करे। ऐसा करने से जनसंख्या में जरुर कमी आएगी।

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3 Comments on "हाशिए पर है जनसंख्या कम करने का फलसफा"

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sunil patel
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श्री सतीश जी ने बहुत अच्छा लेख लिखा है. वास्तविक आकडे भी दिए है. एक बहुत बड़ी समस्या को पुन चर्चा में लाने के लिए धन्यवाद कुछ साल पहले स्कूल से लेकर कालेज तक लेख का प्रमुख मुद्दा होता था. आज हमारे देश की सबसे बड़ी समस्या यही है. पिछले २०-३० सालो सालो में प्रति परिवार जनसँख्या में कुछ कमी आई है. १०० से २०० साल पहले भी एक एक परिवार में ८ से १० संताने होती थी, ४० से ५० साल पहले भी ६ से ८ संताने होती थी. किन्तु आज थोड़ी कमी आई है. जनसँख्या बढ़ने का का… Read more »
Dr.Parshuram Tiwari Bhopal
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Dr.Parshuram Tiwari Bhopal
जनसंख्या वृध्दि केवल अभिशाप नहीं है, इस नजरिये से हमें एक बार फिर देश और प्रदेश की जनसंख्या नीति पर विचार करने की जरूरत है। आज हम विश्व में जनसंख्या के मामले में चीन के ठीक पीछे हैं और गरीबी की रेखा के नीचे जीने को अभिशप्त जनसंख्या में चीन से मीलों आगे है। अर्थात इस पर चिंतन की आवश्यकता है कि कही संसाधनों के असमान वितरण, गलत नियोजन और क्रियान्वयन जैसे कारक तो हमारी जनसंख्या वृध्दि के लिये जिम्मेदार नही है? वैसे जनसंख्या कुछ अन्य एशियाई देशों की भी चिंता का विषय हैं। अंतर केवल इतना है कि बेहतर… Read more »
Agyaani
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आदरणीय लेखक महोदय, विज्ञापनवाद के इस युग में जब तक शहरी चश्मे से गावों में आबादी रोकने की योजनायें बनती रहेंगी उनका सफल न होना निश्चित है! जरुरत आज इस बात की है कि भोगोलिक परिस्थिति के अनुसार परिवार नियोजन के कार्यक्रमों को चलाया जाए! दूरदर्शन जैसे सरकारी चैनल जितना बेहतर काम आज से कुछ साल पहले करते थे आज उनका आकार सिकुड़ता जा रहा है! भोंडे विज्ञापनों के जरिये सनसनी फैलाकर ७२ घंटो वाली गर्भनिरोधक गोली तो बेचीं जा सकती है पर समस्या का स्थायी समाधान मिलना मुश्किल है! आवश्यकता तो लोगों को फायदे और नुक्सान उचित तरीके से… Read more »
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