लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

शिक्षा : एम.ए. राजनीति शास्त्र, मेरठ विश्वविद्यालय जीवन यात्रा : जन्म 1956, संघ प्रवेश 1965, आपातकाल में चार माह मेरठ कारावास में, 1980 से संघ का प्रचारक। 2000-09 तक सहायक सम्पादक, राष्ट्रधर्म (मासिक)। सम्प्रति : विश्व हिन्दू परिषद में प्रकाशन विभाग से सम्बद्ध एवं स्वतन्त्र लेखन पता : संकटमोचन आश्रम, रामकृष्णपुरम्, सेक्टर - 6, नई दिल्ली - 110022

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-विजय कुमार

परसों मैं किसी काम से बैंक गया था। वापसी पर कोषागार के पास से निकला, तो लगा मानो वहां कुछ लोग बैठे बात कर रहे हैं। वे बार-बार अर्थनीति, विकास, घाटा, घोटाला जैसे शब्द प्रयोग कर रहे थे। पहली नजर में ऐसा लगा मानो कई बड़े अर्थशास्त्री और राजनेता बजट भाषण पर चिन्तन कर रहे हैं।

कुछ देर बाद मैं अपनी मूर्खता पर हंसा। भला अर्थशास्त्रियों और राजनेताओं को यहां बैठने की क्या आवश्यकता है ? उनके लिए बड़े-बड़े पंचतारा होटल हैं, जहां ठंडे या गरम माहौल में, समयानुसार खाते और पीते हुए, व्यायाम करते और मालिश कराते हुए, दिन भर में मात्र लाख-दो लाख रुपये खर्च कर वे गरीब, गरीबी, पर्यावरण और आतंकवाद से लेकर देश की अर्थनीति पर स्थितप्रज्ञ भाव से सोच सकते हैं।

लेकिन फिर भी अंदर कुछ खुसर-पुसर तो हो ही रही थी। मैंने फिर एक बार ध्यान दिया, तो पता लगा कि वहां कुछ नोट आपस में बात कर रहे हैं। कोषागार होने के कारण वहां छोटे-बड़े सब तरह के नोट थे। वे ही आपस में सुख-दुख बांट रहे थे। छोटे नोट ज्ञानवर्धन की मुद्रा में बड़े और पुराने नोटों के पास बैठे थे।

– हाय ! आजादी से पहले के वह भी क्या दिन थे, जब लोग दस रु0 वेतन में पूरे परिवार के साथ सम्मान से जी लेते थे। आजादी के बाद भी सौ-दो सौ रु0 की बड़ी प्रतिष्ठा थी। दो रु0 जुर्माना या पांच रु0 इनाम तब कितना महत्वपूर्ण होता था ?

– हां, तुम बिल्कुल ठीक कह रहे हो। मैं बैंक से निकलकर पहली बार जिस छात्र के पास गया था, उसे दस रु0 महीना छात्रवृत्ति मिली थी। इससे पूरे मोहल्ले में उस छात्र का कद बढ़ गया था। विद्यालय में सबने ताली बजाकर उसका स्वागत किया था; पर अब दस रु0 को कौन पूछता है ?

– मैंने सुना है कि दिल्ली में एक न्यायालय ने जब किसी पर 30,000 रु0 जुर्माना किया, तो सब ओर तहलका मच गया और उसका नाम ही तीस हजारी कोर्ट हो गया; पर आज तो 30 लाख या 30 करोड़ रुपये की भी कोई खास कीमत नहीं है।

– कैसे… ? एक दस के नोट ने पूछा।

– कैसे क्या ! पिछला लोकसभा चुनाव के आंकड़े देख लो। जितने करोड़पति इस बार संसद में आये हैं, उतने पहले कभी नहीं पहुंचे। राज्यसभा के लिए तो खुलेआम बोली लगी है। आश्चर्य तो यह है कि ये नेता स्वयं को गरीबों का समर्थक और दूसरे को पूंजीपतियों का दलाल कहते हैं। वे दूसरों को शोषक और स्वयं को शोषित बताते हैं; पर राजनीति के हमाम में सब नंगे ही हैं।

– और क्या, खुद को साम्यवादी कहने वाले भले ही नयी चप्पल तोड़कर या नया कुर्ता फाड़कर पहनते हों; पर उनके बैंक खातों में करोड़ों रुपये नकद मिलते हैं। शर्म लिहाज के बिना अब तो सब ओर खुला खेल फर्रूखाबादी है। गहने, जमीन-जायदाद और ठेकों का तो इन लोगों के पास कोई हिसाब ही नहीं है। पहले लोग सूदखोर सेठ, जमींदार और उद्योगपतियों को गाली देते थे; पर अब राजनीतिक नेता और प्रशासनिक अधिकारी उनसे मीलों आगे निकल गये हैं। स्विस बैंक ऐसे लोगों के बल पर ही तो फल-फूल रहे हैं। अब तो बड़ा आदमी वही है, जिसका खाता विदेश में हो। बाकी तो सब टटपूंजिये हैं।

– अच्छा दादा … ? पांच के नोट का मुंह आश्चर्य से खुल गया।

– और क्या; एक गरीबों के मसीहा और पुराने हड़ताली समाजवादी की करोड़ों रु0 की सम्पत्ति के लिए उनकी दो प्रिय महिलाएं झगड़ रही हैं। बाहर बीड़ी और चाय, पर घर में महंगी सिगार और शैम्पेन पीने वाले अधिकांश नेताओं का यही हाल है।

– पर सुना है कुछ दल स्वयं को बहुजन गरीबों का सबसे बड़ा और एकमात्र हितैषी बताते हैं ?

– उनकी माया तो और भी निराली है। वहां तो टिकट ही करोड़ों में बिकते हैं। जरा सोचो, जिसने दो-चार करोड़ रु0 पूजा और माला में देकर टिकट खरीदा है, वह चुनाव में कितना खर्च करेगा और जीतने के बाद कितना कमाएगा ?

– ऐसे नेताओं के पास गाड़ियां भी कितनी होंगी ?

– नहीं भैया, ये अपनी गाड़ी नहीं रखते। गरीबों के इन हमदर्दों को घूमने के लिए शासन कई गाड़ियां देता है। दो-चार में सुरक्षाकर्मी चलते हैं और दस-बीस में समर्थक। इन्हें अपनी गाड़ी की जरूरत ही कहां है ?

– यानि जनता के पैसे से ये नेता जनता की ही छाती पर ये मूंग दलते हैं; पर दूरदर्शन पर आकर तो ये कहते हैं कि बजट गरीबों के लिए ही बनाया जा रहा है। सेंसेक्स चढ़ रहा है, मुद्रास्फीति उतर रही है। महंगाई भी बस घटने की वाली है।

– बेटा, सेंसेक्स चाहे चढ़े या उतरे, मुद्रास्फीति बढ़े या घटे; पर गरीबों की हालत सुधरने वाली नहीं है, क्योंकि गरीब और गरीबी इन नेताओं के लिए भाषण और वोट बटोरने का चीज है। इनके लिए विकास में हाथ बंटाने का अर्थ भ्रष्टाचार के गटर में नहाना है। अब रिश्वत सैकड़ों या हजारों में नहीं, लाखों-करोड़ों में मेज के ऊपर ही ली और दी जाती है।

– यानी मुझे कुछ दिन बाद कोई नहीं पूछेगा ? बहुत देर से चुप एक रु0 का नोट रोता हुआ बोला।

– तुम्हें आज ही कौन पूछता है बेटा। अब तो भिखारी भी एक रु0 देने वाले को आगे जाने को कह देता है।

– तो फिर भगवान हमें उठा ले; वह हम अछूतों को आत्महत्या पर मजबूर क्यों कर रहे हैं ?

– भैया, धरती पर भगवान का नहीं, सरकार का राज है। उसे गरीबों की तरह इन छोटे-छोटे गरीब नोटों की भी कोई चिन्ता नहीं है। जहां सारे काम लाखों-करोड़ों में होते हों, वहां एक-दो या दस-बीस के फटीचर नोटों को कौन पूछता है ?

– तो अब पांच सौ और हजार के नोटों की ही पूछ होगी ?

– नोटों की इस वर्ण व्यवस्था के बारे में तो अर्थशास्त्री ही जानें। वैसे भी वे रुपये के बदले ड१लर में अधिक सोचते हैं। उनका शरीर ‘मेड इन इंडिया’ और बुद्धि ‘मेड इन अमरीका’ होती है। संग्रहालय में रखने योग्य ऐसे लोगों के कारण ही लोग अर्थनीति को अनर्थनीति कहने लगे हैं।

मुझे कोषागार के पास खड़े काफी देर हो गयी थी। इससे बैंक का चौकीदार मुझे संदेह की नजर से देखने लगा। मुझे लगा कि अब यहां से चल देना चाहिए। यदि उसने मुझे डकैती की योजना बनाने के आरोप में बंद करा दिया, तो मेरी जेब में रखे दस-बीस के नोटों पर तो पुलिसकर्मी थूकेंगे भी नहीं।

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2 Comments on "छोटे नोटों की व्यथा-कथा"

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श्रीराम तिवारी
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made in in india -made in america रूपक अच्छे बने और व्यंग का सन्देश भी -ठीक -ठाक है .छोटे नोटों को अपनी व्यथा -कथा से नहीं बल्कि इस रूपक के मानवीयकरण से काव्य का सौन्दर्य भी विकसित किया जा सकता है .आम आदमी को रचना के केंद्र में रखना आम-फहम बात है किन्तु उनमें वर्ग चेतना का निरूपण आपको ही करना होगा .

Abdul Rashid (Journalist)
Guest
Abdul Rashid (Journalist)

बेहतरीन व्यंग

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