लेखक परिचय

मिलन सिन्हा

मिलन सिन्हा

स्वतंत्र लेखन अब तक धर्मयुग, दिनमान, कादम्बिनी, नवनीत, कहानीकार, समग्रता, जीवन साहित्य, अवकाश, हिंदी एक्सप्रेस, राष्ट्रधर्म, सरिता, मुक्त, स्वतंत्र भारत सुमन, अक्षर पर्व, योजना, नवभारत टाइम्स, हिन्दुस्तान, प्रभात खबर, जागरण, आज, प्रदीप, राष्ट्रदूत, नंदन सहित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में अनेक रचनाएँ प्रकाशित ।

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 मिलन सिन्हा

alone-man

कभी कभी खुद पर हंसना भी  अच्छा  लगता है

कभी कभी दूसरों पर रोना भी  अच्छा  लगता है।

 

हर चीज आसानी से मिल जाये सो भी ठीक नहीं

कभी कभी कुछ खोजना भी   अच्छा  लगता है।

 

भीड़  से  घिरा  रहता  हूँ  आजकल  हर  घड़ी

कभी कभी तन्हा रहना भी  अच्छा  लगता है।

 

हमेशा आगे देखने की नसीहत देता है  यहाँ हर कोई

कभी कभी पीछे मुड़कर देखना भी अच्छा  लगता है।

 

एक खुली किताब है मेरी यह  टेढ़ी-मेढ़ी  जिंदगी

कभी कभी  इसे दुबारा पढ़ना भी अच्छा लगता है।

 

जिंदगी  की   सच्चाइयां   तो  निहायत  कड़वी है

कभी कभी सपने में जीना भी अच्छा  लगता है।

 

‘मिलन’  तो  बराबर  ही  नियति  रही है मेरी

कभी कभी  बिछुड़न  भी   अच्छा  लगता है।

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2 Comments on "कविता : अच्छा लगता है"

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saurabh karn
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नमस्ते मिलन जी
आप की कविता :अच्छा लगता है,पढ़कर बड़ा ही अच्छा लगा आशा करता हु की आगे भी आपकी कविताओ को पढने का मौका मिलता रहेगा
आपका
सौरभ कुमार कर्ण

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार
Guest

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“हर चीज आसानी से मिल जाये सो भी ठीक नहीं
कभी कभी कुछ खोजना भी अच्छा लगता है”

ग़ज़ल की तरह लिखी गई कविता पसंद आई
मंगलकामनाओं सहित…
-राजेन्द्र स्वर्णकार

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