लेखक परिचय

सिद्धार्थ शंकर गौतम

सिद्धार्थ शंकर गौतम

ललितपुर(उत्तरप्रदेश) में जन्‍मे सिद्धार्थजी ने स्कूली शिक्षा जामनगर (गुजरात) से प्राप्त की, ज़िन्दगी क्या है इसे पुणे (महाराष्ट्र) में जाना और जीना इंदौर/उज्जैन (मध्यप्रदेश) में सीखा। पढ़ाई-लिखाई से उन्‍हें छुटकारा मिला तो घुमक्कड़ी जीवन व्यतीत कर भारत को करीब से देखा। वर्तमान में उनका केन्‍द्र भोपाल (मध्यप्रदेश) है। पेशे से पत्रकार हैं, सो अपने आसपास जो भी घटित महसूसते हैं उसे कागज़ की कतरनों पर लेखन के माध्यम से उड़ेल देते हैं। राजनीति पसंदीदा विषय है किन्तु जब समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का भान होता है तो सामाजिक विषयों पर भी जमकर लिखते हैं। वर्तमान में दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, हरिभूमि, पत्रिका, नवभारत, राज एक्सप्रेस, प्रदेश टुडे, राष्ट्रीय सहारा, जनसंदेश टाइम्स, डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट, सन्मार्ग, दैनिक दबंग दुनिया, स्वदेश, आचरण (सभी समाचार पत्र), हमसमवेत, एक्सप्रेस न्यूज़ (हिंदी भाषी न्यूज़ एजेंसी) सहित कई वेबसाइटों के लिए लेखन कार्य कर रहे हैं और आज भी उन्‍हें अपनी लेखनी में धार का इंतज़ार है।

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-सिद्धार्थ शंकर गौतम- election
उत्तर प्रदेश का पूर्वांचल क्षेत्र २०१४ के लोकसभा चुनाव में सबसे चर्चित और अलहदा तस्वीर पेश कर रहा है। एक ओर हिन्दू-मुस्लिम एकता की मिसाल काशी नगरी हिंदुत्व के पुरोधा और भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की सियासत की परीक्षा लेगी, वहीं कथित आतंक की नर्सरी के नामकरण से कुख्यात आजमगढ़ सपा मुखिया मुलायम के सियासी सपनों को उड़ान देगी। वोटों के ध्रुवीकरण के चलते इन दोनों लोकसभा सीटों पर पूरे देश की निगाहें लगी हुई हैं। हालांकि दोनों ही सीटों के भविष्य को लेकर अनिश्चय की स्थिति है। नरेंद्र मोदी जहां गुजरात के वडोदरा से भी चुनाव लड़ रहे हैं; वहीं मुलायम भी अपनी सुरक्षित सीट मैनपुरी से मैदान में हैं। दोनों ही नेता दोनों सीटों पर जीतने का माद्दा रखते हैं। पर वाराणसी और आजमगढ़ को लेकर इनके समर्पण पर ऊंगली उठाई जा सकती है। चूंकि मोदी का सारा आभामंडल गुजरात में उनकी सरकार के कामकाज से बना है लिहाजा वडोदरा की जीत उन्हें गुजरात छोड़ने से रोकेगी। ऐसे में वाराणसी से उनकी संभावित जीत मात्र वोटों के ध्रुवीकरण की सियासी मजबूरी ही कही जाएगी। दूसरी ऒर मुलायम से समक्ष परिवारमोह की ऐसी परिस्थिति है जिसे वे चाह कर भी नहीं नकार सकते। मुलायम के छोटे बेटे प्रतीक के राजनीतिक पदार्पण हेतु मुलायम आजमगढ़ आए हैं और यहां से उनकी संभावित जीत प्रतीक के राजनीतिक भविष्य को आगे बढ़ाएगी। कुल मिलाकर वाराणसी और आजमगढ़ या मैनपुरी और वडोदरा में से दो क्षेत्रों के लोग सियासी मजबूरी के नाम पर मात्र ठगे जाएंगे। खैर यह तो समय का फेर ही बताएगा कि किसकी झोली में क्या गया, फिलहाल तो पूर्वांचल में सियासी तूफ़ान उठा है जिसकी लहर में इस क्षेत्र से सटी लगभग ४० से अधिक सीटें प्रभावित हो रही हैं। मोदी के वाराणसी पहुंचने से भाजपा में उत्साह है और हिंदुत्व के आधार पर यहां वोटों के ध्रुवीकरण की आशंका है। वहीं आजमगढ़ में यादव-मुस्लिम गठजोड़ के सहारे सपा हिंदुत्व की राजनीति को तगड़ी चुनौती पेश कर रही है। चूंकि मुलायम भी तीसरे मोर्चे के संभावित गठन के चलते प्रधानमंत्री पद के स्व्यंभू दावेदार बन बैठे हैं लिहाजा कार्यकर्ता पूर्वांचल और उससे सटे क्षेत्रों में मुलायम और सपा की जीत के लिए दिन-रात एक किए हुए हैं। यूं भी मुलायम की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का अंतिम निचोड़ है प्रधानमंत्री पद। पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इंद्र कुमार गुजराल की प्रधानमंत्री पद पर ताजपोशी मुलायम सिंह को नकारते हुए हुई थी। इससे पहले भी मुलायम का नाम प्रधानमंत्री पद के दावेदारों में प्रमुखता से लिया जाता रहा है। राजनीति के धरतीपकड़ राजनेता की छवि में रम चुके मुलायम भी दिल में प्रधानमंत्री पद की आस रखते हैं जिसे उन्होंने कभी नकारा भी नहीं है। उनकी दावेदारी अन्य क्षेत्रीय क्षत्रप से कहीं अधिक मजबूत मानी जा रही है और वर्तमान राजनीतिक गठबंधन के दौर में यह असंभव भी नहीं है। इस लिहाज से देखा जाए तो पूर्वांचल प्रधानमंत्री पद के दो दावेदार की सियासी नूराकुश्ती का भी गवाह बनने जा रहा है।
मोदी और मुलायम में कई समानताएं हैं जो इन्हें राजनीति में काफी हद तक विवादित व्यक्तित्व बनाती हैं। मोदी के सर पर गोधरा दंगों का दाग है तो १९९०-९१ में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के तौर पर फैजाबाद में कारसेवकों और हिन्दुओं पर गोली चलवाने वाले मुलायम पर भी मुस्लिम वोट बैंक सेंकने का आरोप लगता रहा है।  मुलायम की राजनीति मुस्लिम-यादव गठजोड़ पर टिकी है वहीं मोदी हिंदुत्व के आधार पर वोटों की फसल काटते हैं। हालांकि मोदी ने गुजरात के विकास द्वारा अपनी छवि को बदलने का प्रयास किया है और वहां उन्हें मुस्लिम समुदाय का साथ भी मिला है किन्तु देश का मुस्लिम समुदाय मोदी के बारे में क्या राय रखता है यह इस बार के लोकसभा चुनाव तय कर देंगे। यदि पूर्वांचल की ही बात करें तो यहां मुस्लिम आबादी किसी भी हस्ती को धूल चटाने का साहस रखती है। ढाई लाख मुस्लिम आबादी और इतने ही हिंदुओं की नगरी में मोदी की जीत उनकी राजनीति की दिशा और दशा दोनों तय कर देगी। वहीं आजमगढ़ में मुलायम की जीत उन्हें मुज्जफ्फरनगर दंगों के बाद छिटके मुस्लिम समुदाय का पुनः सरपरस्त बना देगी। उत्तरप्रदेश की सपा सरकार के २ वर्षों के कार्यकाल में सूबे में १५० से अधिक छोटे-बड़े सांप्रदायिक दंगे हो चुके हैं जिनमें हिन्दुओं को निशाना बनाया गया है वहीं २००२ के बाद से अब तक गुजरात में एक भी बड़ा सांप्रदायिक दंगा नहीं हुआ। इस लोकसभा चुनाव में यह तथ्य भी पूर्वांचल की जनता के सामने अपने निर्णय को सुनाने से पहले होगा। हालांकि पूर्वांचल दंगों की आंच से सुरक्षित रहा है मगर मुज्जफ्फरनगर दंगों के दाग जितना मुलायम को परेशान कर रहे हैं उतना मोदी को नहीं। यानी मुलायम और मोदी में से मोदी का पूर्वांचल आना भाजपा के लिए अधिक मुफीद लग रहा है। फिर भी यह कहने में गुरेज नहीं होना चाहिए कि मोदी हों या मुलायम; दोनों में से किसी को पूर्वांचल की जनता की फ़िक्र नहीं है। उन्होंने तो पूर्वांचल को अपनी सियासी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति स्थली बना डाला है।

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