लेखक परिचय

आलोक कुमार

आलोक कुमार

बिहार की राजधानी पटना के मूल निवासी। पटना विश्वविद्यालय से स्नातक (राजनीति-शास्त्र), दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नाकोत्तर (लोक-प्रशासन)l लेखन व पत्रकारिता में बीस वर्षों से अधिक का अनुभव। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सायबर मीडिया का वृहत अनुभव। वर्तमान में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के परामर्शदात्री व संपादकीय मंडल से संलग्नl

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हाल के चंद दशकों में देश का पूर्वोत्तर व बिहार का पूर्वाञ्चल बांगलादेशी घुसपैठियों के कारण सांप्रदायिक सौहद्र की दृष्टि से हमेशा से ही संवेदनशील रहा है l ये पूरा इलाका  अवैध बांगलादेशी घुसपैठियों की शरण-स्थली है l बिहार तो क्या पूरे भारत में जहाँ भी बांगलादेशी घुसपैठियों हैं वहाँ हालिया कुछ वर्षों से दंगों व राष्ट्र विरोधी घटनाओं में निरंतर इजाफा ही हो रहा है l वर्तमान में बिहार के किशनगंज के इलाके में दंगों जैसे हालात भी इन्हीं घुसपैठियों की करतूतों का परिणाम है l बांगलादेशी घुसपैठिए आज देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बन चुके हैं l बिहार व उत्तर –पूर्व राज्यों में राजनीतिक संरक्षण में काफी बड़ी संख्या में बांगलादेशी घुसपैठियों को भारतीय मतदाता पहचान –पत्र व राशन-कार्ड प्राप्त है l ऐसा नहीं है कि ये किसी प्रशासनिक भूल का परिणाम है अपितु एक सोची – समझी रणनीति के तहत इसे अमलीजामा पहनाया गया जो आज भी बदस्तूर जारी है l भारतीय राजनीति में प्रचलित तुष्टीकरण की प्रथा के विभिन्न (विकृत) आयामों में से ये भी एक है l तुष्टीकरण का मूल ही है ‘वोट-बैंक’ की राजनीति है जिसमें राष्ट्र-हित की ही कुर्बानी दी जाती रही है l

भारत में ‘जिहादी’ उन्माद ‘ फैलाने में पाकिस्तान समर्थित आतंकियों के साथ – साथ बांगलादेशी घुसपैठियों की भी सक्रिय भूमिका रही है । अनेकों बम धमाकों में इनकी संलिपत्ता उजागर हुई है लेकिन फिर भी भारत का एक बहुत ही बड़ा राजनीतिक तबका मौन व आँखें मूँदे ही रहा है l

हाल के कुछ वर्षों में बांगलादेशी घुसपैठ का जो सबसे खरतनाक पहलू उभर कर आया है वो है भारतीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था की सबसे अहम प्रक्रिया चुनावों को प्रभावित करने में इनकी सक्रिय भूमिका l उदाहरण के तौर पर अगर पूर्वोत्तर राज्यों और बिहार के पूर्वाञ्चल की ही बात करें तो चुनावों में बांगलादेशी घुसपैठिए  ही निर्णायक भूमिका निभाते हैं l एक हालिया अध्ययन से स्पष्ट होता है कि पश्चिम बंगाल में १८ प्रतिशत और आसाम में ३२ प्रतिशत विधानसभा क्षेत्रों में बंगलादेशी घुसपैठिए चुनाव परिणामों को प्रभावित करने की स्थिति में हैं। आसाम विधानसभा की लगभग ८५सीटों पर (कुल सीट १२६) बांगलादेशी घुसपैठिए ही निर्णायक भूमिका निभाते हैं। हालिया सम्पन्न लोकसभा चुनावों में बिहार के किशनगंज में ९६ प्रतिशत बंगलादेशी घुसपैठियों ने मतदान में भाग लिया। इससे ये  स्पष्ट होता है कि अपने चहेते जनप्रतिनिधियों को देश की संसद या विधानसभाओं में भेजकर अपने लिए अनुकूल नियम व कानून बनवाना ही इन घुसपैठियों का मुख्य उद्देश्य है। वोटों के लालची गिद्घ प्रवृत्ति के भारतीय राजनीतिज्ञ अपने देशवासियों के भाग को या अधिकार को छीनकर इन घुसपैठिए शत्रुओं को देने में तनिक भी परहेज व संकोच नहीं करते l ये सीधे तौर पर राष्ट्र की अस्मिता पर प्रहार है ।

इतना ही नही त्रिपुरा में एन.एल.एफ.टी. व ए.टी.टी.एफ. , आसाम में उल्फा व एन.डी.एफ.बी. मेघालय में एच.एन.एल.सी.व ए.एन.वी.सी., नागालैंड में ए.एस.सी.एन. व आई.एम. , मणिपुर में पी.एल.ए. व यू.एन.एल.एफ. जैसे जो अलगाववादी संगठन सक्रिय हैं , इन सबों में बंगलादेशी घुसपैठिए सक्रिय रूप से शामिल हैं l आज की तारीख में भारत में बंगलादेशी घुसपैठियों की संख्या  १० करोड़ को पार चुकी है , जो लगभग सम्पूर्ण भारत में फैल चुके हैं । बांगलादेशी घुसपैठियों पर एक अर्से से पैनी नजर रखने वालों की अगर मानें तो इन घुसपैठियों के छोटे- छोटे बच्चे भी जघन्य अपराधों में लिप्त हैं और इन्हें इसकी बखूबी ट्रेनिंग दी जाती है , इससे सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि भारत में अस्थिरता कायम करना ही इनका एकमात्र ध्येय है । बांग्लादेश के बंदरबन, रंगामारी, चितरगोंग, खगराचरी, मौलवी बाजार, हबीबगंज,स्लीट मेमनसिंग, कुरीग्राम और ढाका से तैयार होकर सक्रिय आतंकी पहले पूर्वोत्तर भारत में आते हैं और भारत में विनाशकारी गतिविधियों में जी जान से जुट जाते हैं l नक्सलियों तक हथियारों की खेप पहुँचाने में भी बांगलादेशी घुसपैठियों की संलिप्तता सामने आई है l बिहार की सीमा से सटा पड़ोसी राज्य झारखंड के पाकुड़ का इलाका नक्सलियों तक हथियारों को पहुँचाने के लिए  घुसपैठियों का ‘सेफ-पैसेज’ है l

आसाम और उसके पड़ोसी भारतीय राज्यों (विशेषकर पूर्वाञ्चल बिहार ) के मूल निवासी (विशेषकर हिन्दू आबादी ) अपनी बदहाली से बेजार हुए जा रहे हैं और उन्हें अपने ही देश में ही अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है , जो कि किसी भी स्वाभिमानी देश के लिए लज्जाजनक है l बिहार के फारबिसगंज , अररिया , किशनगंज इत्यादि इलाकों में ऐसी अनेकों घटनाएँ सतह पर आई हैं जिससे ये जाहिर हुआ है कि बांगलादेशी घुसपैठिए अपने संख्या-बल में ज्यादा होने का लाभ उठाकर स्थानीय मूल निवासियों की ज़मीनों पर कब्जा कर रहे हैं l बावजूद इसके ‘छदयम-सेक्यूलरों’ की कुत्सित प्रवृति व नीति में कोई बदलाव नहीं होता दिख रहा है l ऐसे लोगों में बदलाव की उम्मीद भी बेमानी है क्यूँकि इन“राजनीतिक – हलवाइयों’ की दुकानों के चूल्हों में राष्ट्र-हित ही तो जलते हैं !!”

 

देशहित को मद्देनजर रखते हुए आज की सबसे बड़ी मांग यह है कि सभी राजनैतिक दल देश की स्थिरता, अखंडता वएकता से जुड़े इस अतिसंवेदनशील मुद्दे पर वोट बैंक की राजनीति का परित्याग कर गंभीरता से विचार करें कि जिन वोटों के लालच में वे इन विनाशकारी तत्वों को बढ़ावा दे रहे हो क्या वे कल उन्हीं के काल का कारण नहीं बनेगें ? भारत भूमि को आतंकियों व उपद्रवियों का आश्रय स्थल बनाने वालों को और संरक्षण देने वालों को ये समझना होगा कि दुनिया भर के हिन्दुओं की स्वाभाविक पुण्य व मूल भूमि को अशान्त बनाना आत्मघाती होगा। आज पाकिस्तान में हिन्दुओं की क्या स्थिति है। वे नारकीय जीवन जीने को विवश हैं लेकिन हम उन्हें शरण देने में पहल करने की बजाय अवैध रूप से घुसपैठ कर हमारी आंतरिक संरचना को बर्बाद करने पर आमादा लोगों को इसलिए बसा ले क्योंकि वे एक खास समुदाय से हैं ? देश की राजनीतिक जमात को धार्मिक आधार पर भेदभाव और तुष्टीकरण की नीति का त्याग कर राष्ट्रहित में सोचना होगा । बंगलादेशी घुसपैठियों को मानवीय आधार पर भारत में रहने देने की वकालत करने वालों की मंशा से आज देश की अधिसंख्य आबादी वाकिफ हो चुकी है और ऐसे में अगर समय रहते इन घुसपैठियों की गतिविधियों को नियंत्रित करने व देश से बाहर करने की दिशा में कोई ठोस पहल नहीं होती है तो वो दिन दूर नहीं जब देश विभाजन के वक्त से भी भयावह खून-खराबा देखने को विवश होगा l

आलोक कुमार

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