लेखक परिचय

मनमोहन आर्य

मनमोहन आर्य

स्वतंत्र लेखक व् वेब टिप्पणीकार

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arya-samaj-dayanand-saraswatiमनमोहन कुमार आर्य

अजमेर निवासी पं. नथमल तिवाड़ी ने लगभग दो बार 13 व 19 वर्ष की अवस्था में अजमेर में ऋषि दयानन्द के दर्शन किये और अजमेर और मसूदा में उनके साथ भी रहे। ऋषि के मसूदा से शाहपुरा जाते समय पंडित जी अजमेर लौट आये थे। इसके बाद ऋषि ने मुख्यतः शाहपुरा, चित्तौड़ व उदयपुर सहित जोधपुर आदि स्थानों की यात्रायें की और वहां वैदिक धर्म का प्रचार किया। जोधपुर के प्रवास काल में उनके जीवन को समाप्त करने का षडयन्त्र किया गया जिसके अन्तर्गत उन्हें विष दिया गया और उनकी चिकित्सा में अनियमिततायें की गईं वा हुईं। रोग अत्यधिक व अनियंत्रित हो जाने पर उन्हें वहां से आबू पर्वत और अन्त में अजमेर लाया गया। अजमेर में पं. नथमल तिवाड़ी पुनः ऋषि दयानन्द की सेवा व संगति में रहे और ऋषि के अन्तिम समय का विवरण भी उन्होंने अपने प्रत्यक्ष ज्ञान के आधार पर लिखा है। आज तीसरी किश्त में हम उनका लिखा हुआ वही विवरण प्रस्तुत कर रहे हैं।

 

पंडित नथमल तिवाड़ी, अजमेर लिखते हैं कि स्वामी जी शाहपुरा रहकर चित्तौड़ पधारे जहां लाट साहिब का जलसा था। पीछे हिन्दुओं के सूरज राणा सज्जनसिंह जी (स्वामी दयानन्द जी को) उदयपुर ले गये। उसके बाद जोधपुर गये जहां पर रोगग्रस्त हुए और वहां से आबू पधारे। वहां रोग बढ़ा जिसके समाचार पहिले मौलवी मुरादअली जी साहिब मालिक अखबार चिराग राजस्थान में छपा कि स्वामी जी आबू में बहुत बीमार हैं। यह खबर जब अजमेर के आर्य पुरुषों को मालूम हुई, तब हम सबों ने निश्चय किया कि स्वामी जी को कोई सभासद आबू जाकर अजमेर ले आवें। इस पर परम स्वामिभक्त भाई जेठमल जी सोढ़ा आबू गये और महाराज को अजमेर ले आये और राजा साहिब भिनाय की कोठी में ठहराया गया। स्वामी जी बहुत कमजोर हो गये थे, शरीर में कई एक फोड़े हो गये थे। आबू से डाक्टर लक्ष्मरणदास जी (जो महाराज के पूर्ण भक्त थे) पहुंचाने को साथ आये। यहां के मुख्य डाक्टर सिविल सर्जन न्यूमन साहिब और पूज्य वृद्ध हकीम निजामुद्दीन साहिब, नले वाले पीर जी, ने महाराज को देखकर विष प्रकोप का निदान निश्चित किया और यह कहा कि किसी ने हलाहल विष दिया है जो सारे शरीर में फैल गया है, जो आसाध्य है। यह समाचार लाहौर आदि-स्थानों में  पहुंचे। महाराज के परमभक्त पंजाबी सज्जन तुरन्त यहां पर पधार गये उनमें से सब लोगों के नाम याद नहीं रहे। लाला साईंदास जी, पं¬ गुरुदत्त जी, स्वामी आत्मानन्द जी, जीवनदास जी आदि लाहौर के, उदयपुर से पांडया मोहनलाल जी (स्वामी जी के) देहान्त के पीछे पं. सुन्दरलाल जी आदि बहुत से सज्जन आ गये। मैं पहले से ही स्वामी जी के अजमेर पहुंचते ही तुरन्त सेवा में पहुंच गया था। दस्त और पेशाब के लिये दो पिड़गियें कुम्हारों से ले आया उन्हें ले जाकर कमरे के पास दरवाजे की बगल में रख दिया। मैंने यह ही सेवा कबूल की कि महाराज को पेशाब-पखाना कराकर बर्तनों को तुरन्त साफ कर रखना। दूसरे ही दिन अकस्मात् सहजानन्द नामक स्वामी आ गये और मुझ से बलात् यह सेवा स्वयं करने को कहा। जब तक यह महात्मा यहां पर रहे बराबर स्वामी जी की सेवा में तत्पर रहे। मैं भी प्रातःकाल से रात्रि 10 बजे तक उपस्थित रहता। महाराज के शरीर में छालों के अतिरिक्त हाड़फूटणी की तकलीफ भी रहती थी। पावों के पंजों पर तीन-तीन चार-चार घण्टे तक अधर पलंग से बाहर दोनों पांव करके मुझे अधर बैठा रखते। मेरा वजन भी काफी था, 19 या 20 वर्ष की आयु थी। तकलीफ इतनी ज्यादा थी परन्तु इतने दिनों में कभी भी मुख से हाय रे ! शब्द भी नहीं निकाला। शहर के प्रतिष्ठित एवं सभासदों से स्वस्थ पुरुष की तरह बोलते रहे।

 

एक दिन मैं पलंग के पास बैठा हुआ था, आज्ञा दी कि स्वामी आत्मानन्द जी को बुलाओ जो दूसरे कमरे में थे। मैंने उनसे कहा–महाराज ! आपको स्वामी जी बुला रहे हैं। वे तुरन्त सेवा में उपथित हुए। उन्हें अपने पास बैठने को कहा। उनके बैठने के उपरान्त एक साथ वाले आदमी को एक दुशाला लाने के लिये इशारा किया। उसने दुशाला लाकर पलंग पर रख दिया। स्वामी जी (वह दुशाला) आत्मानन्द जी को देने लगे इस पर आत्मानन्द जी फूट-फूट कर रोने लगे और कहा कि महाराज मुझ को यह नहीं चाहिये। आप तो मेरे सिर पर हाथ रख देवें और आशीर्वाद देवें। अन्त में महाराज ने बहुत समझाया कि आप संन्यासी होकर इतना मोह करते हैं, शरीर तो नाशवान् है। इसके लिये चिन्ता क्या करनी, ईश्वर की वेदवाणी का प्रचार करते रहो इत्यादि इत्यादि। जब अन्त समय आया, दुर्भाग्यवश मैं उस समय घर पर आ गया था। पीछे मुझे 9 बजे रात्रि को मालूम हुआ कि स्वामी जी का स्वर्गवास हो गया। तुरन्त कोठी पर पहुंच गया।

 

प्रातःकाल महाराज के शरीर को स्नान कराकर कर्पूर-केसर मिश्रित चन्दन का सारे शरीर में लेप किया गया जिनकी बड़ी उत्तम गन्ध थी। शव के लिये बडे़-बड़े दो तख्तों को जोड़कर उन पर फरियां लगाई गईं थीं। मैं और बाबू मथुराप्रसाद जी तथा पं. मातादीन जी बाजार से मलमल का थान, कस्तूरी 1 तोला लाये, थान को बाजार से गेरु के रंग में रंगा लाये। शव को तख्तों पर लिटाया और चारों तरफ वस्त्र लपेटा गया। बीच में बांस के 4 डंडे आरपार फंसाये गये ताकि 16 आदमी आसानी से उठा सकें। प्रातःकाल के समय एक मोटा ताजा संन्यासी आया और धूमधाम करने लगा कि स्वामी जी की लाश हम ले जायेंगे और समाधि देंगे परन्तु गृहस्थियों को कभी दाह न करने देंगे, क्योंकि साधु पर साधु का अधिकार है। पीछे से उस महात्मा को समझा बुझा कर बाहर निकाल दिया। पीछे स्वामी जी के शव को आठ-आठ आदमी उठा कर उस स्थान से शान्ति के साथ धीरे-धीरे आगरे दरवाजे तक पहुंचे। पुलिस के जमादार ने अर्थी को रोका कि मुर्दा लाश बाहर से शहर में नहीं ले जा सकते, बाहर से ले जाओ। लालचन्द्र जी खत्री ने (जो पुलिस दफ्तर में हैड क्लर्क थे) फौरन जमादार को रोका। पीछे पं. भागराम जी भी आ गये थे।

 

हम सब लोग शव को नया बाजार, कडक्का चौक, धानमंडी, दरगाह बाजार, नला बाजार, घसेटी बाजार, डिग्गी बाजार, ऊसरी दरवाजे होकर ऊंडा वाला (मलूसर) के श्मशान में पहुंचे। शव को उठाने में वीर सिक्ख भाईयों की बड़ी सहायता थी जिसका श्रेय मिस्त्री बसावासिंह जी को है क्योंकि लाश इतनी भारी थी कि मैंने और पंडित मातादीन जी ने थोड़ी दूर तक कंधा लगाया था जिससे एक महीने तक कंधे में दर्द होता रहा। यदि सिक्ख भाई हमारे सहायक न होते तो साधारण बाबू लोगों को बड़ी मुसीबत उठानी पड़ती। 16 वीर जवान पंजाबी सिक्ख अरथी को श्मशान में ले गये। मार्ग में घंटा घडियाल तथा शंखध्वनि हो रही थी। श्मशान में पहुंचने पर वेदी खोदी गई व चिता चुनी गई। इसके बीच पण्डित भागराम जी जज ने ऐसा हृदयस्पर्शी भाषण दिया कि सब के सब 300 या 400 आदमियों के नेत्रों से अश्रुधारा बह चली जो कि रोकने पर भी नहीं रुकती थी। पश्चात् पं. सुन्दरलाल जी भी कुछ कहने उठे परन्तु गला रुक गया, घिग्गी बंध गई कुछ बोल न सके। वेदी तैयार होने पर शव को उस पर रखा गया और अग्नि संस्कार हुआ। केसर 30 या 40 तोला, कस्तूरी 1 तोला तो स्वामी जी के पास थी और 1 तोला हमने खरीदी, इस प्रकार दो तोले, घृत 4ऽऽ बड़ पीपल की लकड़ियां 12ऽऽ चन्दन 2ऽऽ कपूर 5 सेर एकत्रित कर रखी थी। ब्रह्मचारी रामानन्द जी द्वारा अग्नि संस्कार होने पर सुगन्धित सामग्री की आहुतियां लगनी प्रारम्भ हुईं, 5 घंटे तक कृत्य होता रहा। तत्पश्चात् भाई जेठमल जी सोढ़ा ने चिता के ऊपर की लकड़िया हटा कर शव को देखा तो लाश वैसी ही पड़ी रही। जो घृत-सामग्री की आहुतियां दी जाती थी वह ऊपर ही उड़ जाती थी उसका शव पर कुछ असर न होता था। भाई जेठमल जी द्वारा लाश के उलट पुलट किये जाने पर लाश का दाह हुआ। लाश को दग्ध कर 5 बजे सब आदमी अपने घर चले गये और 15 या 20 आदमी पीछे से आये। एक चैकीदार को रात्रि भर के लिये छोड़ दिया। 10 बजे हम घर पहुंचें।

 

दूसरे दिन स्वामी जी के सामान की फहरिश्त पं. मोहनलाल विष्णुलाल जी पांडया ने बनाई। मुझे मालूम नहीं कि वह समान कहां ले जाया गया।

 

स्वामी जी अममेर में 4 बार पधारे थे। पहिली बार सं. 1920 विक्रमी में। साथ में कोई विशेष आडम्बर नहीं था। केवल अकेले ही थे। उस समय पं. छगनलाल जी और उनके पिता पं. रामलाल जी, पं. शिवनारायण जी महामहोपाध्याय, पं. रामसुख जी व्यास आदि लोगों से परिचय हुआ। राय साहिब बंसीलाल जी के बाग में (जो अब शारदा भवन के नाम से दौलत बाग के बाहर प्रसिद्ध है) उसमें ठहरे थे। पं. शिवनारायण जी के कहने से मालूम हुआ था कि स्वामी जी उन दिनों रुद्राक्ष का कण्ठा रखते थे। भागवत को भडुवा भागवत कहते थे और उसका खण्डन करते थे, जिससे पौराणिकों में खलबली मच गई थी। कुछ दिनों के पश्चात् जयपुर पधार गये थे ऐसा मैंने सुना था क्योंकि उन दिनों मेरा जन्म ही नही हुआ था।

 

दूसरी बार स्वामी जी सं. 1935 विक्रमी में कार्तिक मास में पधारे। उस समय अनासागर पर सेठ रामप्रसाद जी करणीदान जी के बाग में ठहरे  थे। उस समय स्वामी जी के भक्तों ने बड़े आदर के साथ स्वागत किया। व्याख्यान गजमल जी की हवेली में हुआ करते थे, जिसका प्रबन्ध सरदार भगतसिंह जी व पं. भागराम जी करते थे। 15 या 20 व्याख्यान हुए, शंका-समाधान भी होते थे। पौराणिक लोगों में शास्त्रार्थ की चर्चा भी होती रहती थी परन्तु सिंह के सामने गीदड़ों की कहां हिम्मत। इसी तरह शान्तिपूर्वक गुजरती रही। मैं भी स्वामी जी के 4 या 5 व्याख्यान में गया परन्तु विषय गम्भीर होने से समझने की योग्यता न थी क्योंकि मेरी आयु 13 या 14 वर्ष की थी। मेरे पर व्याख्यानों का कोई असर न हुआ फिर स्वामी जी पधार गये। तीसरी बार सं. 1938 विक्रमी में पधारे जिसका वृतान्त पहिले वर्णन किया गया है।

 

चौथी बार महाराज का अन्तिम बार पधारना था जहां उन्होंने निर्वाण पद प्राप्त किया।

 

उपर्युक्त स्वामी जी के जीवन सम्बन्धी घटनायें याद करके लिखी गई है। तारीख वार क्रमशः नहीं लिखी गई हैं। संग्रहरूप सम्पर्ण करता हूं।

 

इसी के साथ पं. नथमल तिवाड़ी जी द्वारा प्रत्यक्ष अनुभवों पर आधारित विवरण समाप्त होता है। पाठकों को ऋषि दयानन्द की मृत्यु का यह विवरण पं. लेखराम, पं. देवेनद्रनाथ मुखोपाध्याय, स्वामी सत्यानन्द तथा डा. भवानीलाल भारतीय द्वारा लिखित ऋषि दयानन्द के जीवन चरितों में भी देखना चाहिये जहां कुछ अन्य तथ्य भी उनको दृष्टिगोचर होंगे। इसी के साथ यह लेख पूर्ण होता है। इति शम्।

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