लेखक परिचय

गंगानन्द झा

गंगानन्द झा

डी.ए.वी स्नातकोत्तर महाविद्यालय में वनस्पति शास्त्र के प्राध्यापक के पद से सेवानिवृत होने के पश्चात् चण्डीगढ़ में गत पन्‍द्रह सालों से रह रहे गंगानंद जी को लिखने पढ़ने का शौक है।

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मैंने नहीं सोचा था कि राष्ट्रीय संवयंसेवक संघ की शाखा के साथ अपने साथ, अनुभवों, उत्तेजनाओं और आनन्द को कभी शेयर करने का अवसर मिलेगा। या उसकी कोई प्रासंगिकता होगी। तब मैं सातवीं-आठवीं का छात्र था, समय 1945-46। शाखा वालों से परिचय कैसे हुआ, याद नहीं है। पहली यादें हैं कि रोज दोपहर बाद चार या पाँच बजे एक घंटे के लिए शाखा लगती थी, समय का पालन पूरी कड़ाई से होता था। शाखा की कोई लिखित नियमावली और सदस्यता नहीं थी। मैं अपनी बाल शाखा के सामान्य स्वयंसेवक से मुख्य गठनायक और अन्ततः मुख्य शिक्षक तक हो गया था। हम स्वयंसेवकों की उपस्थिति पर नजर रखते थे और जो भी स्वयंसेवक अनुपस्थित होता उससे मिलने का कार्यक्रम बनाते। मिलकर उसे शाखा में नियमित उपस्थिति बनाए रखने का महत्व बताते थे। मिलने का कार्यक्रम बहुत ही कारगर हुआ करता। कोई भी स्वयंसेवक इनकार नहीं कर पाता। अनेक अभिभावक उनपर दबाब बनाते कि शाखा में जाएँ।
शाखा में सम्मिलित होने वाले लोग स्वयंसेवक कहलाते थे। संघ का कोई लिखित आधिकारिक रजिस्टर नहीं था, न ही कोई सदस्यता शुल्क। हम शाखा में खेलने के लिए जाते थे, खेलों में ड्रिल, व्यायाम कब्बडी, खो खो जैसे देशी खेलों के साथ शामिल थे। लाठियों के करतब भी सिखाए जाते थे। इसी अवधि में बौद्धिक के नाम के आयोजन भी हुआ करते, जिनसे हमने सीखा कि ये शाखाएँ संघ की हैं। संघ का नाम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है और नागपुर में इसका मुख्यालय है। इसके संस्थापक डॉ केशव बलिराम हेडगेवार हैं और वर्तमान में सरसंघचालक श्री माधव सदाशिव गोलवलकर हैं। संघ का उद्देश्य हिन्दुओं का संगठन करना बताया जाता था। एक बात उलझन पैदा करनेवाली थी, वह थी संगठन का उद्देश्य भी संगठन ही कहा जाता था। स्पष्ट करने का दबाव डालने पर कहा जाता था कि संगठित हो जाने पर यह बात तय की जाएगी। हिन्दु अन्य धर्मावलम्बियों से भिन्न हैं क्योंकि भारत एकमात्र हिन्दुओं ही मातृभूमि, पितृभूमि होने के साथ धर्मभूमि है। एकमात्र वे ही इस भूमि के मूलवासी हैं। आर्य मध्यएशिया नहीं, उत्तरी ध्रुव के वासी थे। वे वहाँ से यहाँ नहीं आए, उत्तरी ध्रुव ही खिसकता हुआ वर्तमान स्थान पर साइबेरिया के उत्तर अवस्थित हो गया है, जब कि आर्य अपने मूल स्थान पर यानी भारत में बने रहे। बौद्धिक में तत्त्कालीन राष्ट्रीय आन्दोलन की कोई चर्चा नहीं हुआ करती, न गाँधी, नेहरु, पटेल की बात होती। बाल गंगाधर तिलक की बातें होतीं, आर्यों के मूल निवास उत्तरी ध्रुव के भारत की भोगौलिक सीमा से मौजूदा भूगोल पर खिसकने के सिद्धान्त के सन्दर्भ में उनके द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्त के सन्दर्भ में। सावरकर की बात होती। अहिन्दुओं के विरुद्ध प्रत्यक्षतः कोई चर्चा नहीं होती, लेकिन हिन्दु पहचान की बातें होतीं। यह कहा जाता कि भारतीयता का टेस्ट है, भारत के मातृभूमि के साथ साथ पितृभूमि और पुण्यभूमि होने में। एक बुझौवल का खेल हुआ करता। ब्रिटेन के बासिन्दे कौन हैं- ब्रिटिश. जर्मनी के बासिन्दे कौन हैं- जर्मन, जापान के बासिन्दे जापानी, हिन्दुस्तान के बासिन्दे हिन्दु।
शाखा का समापन ध्वज प्रणाम से होता था। हमें बताया गया था कि ध्वज ही गुरु हैं। व्यक्ति को गुरु का स्थान नहीं दिया जा सकता क्योंकि मनुष्य होने के कारण कुछ न कुछ दोष उसमें होने की सम्भावना रहती है।
• संघ के प्रचारक विश्वनाथ जी बहुत ही सौम्य एवम् लोकप्रिय व्यक्तित्व युवा थे। वे उत्तरी बिहार के छपरा के वासी थे। उन्होंने स्थानीय हाई स्कूल की दसवीं कक्षा में दाखिला लिया था। अपने सहपाठियों के ही साथ एक किराए के मकान में विश्वनाथजी रहते थे। यही आवास संघ का कार्यालय था, इसे निवास कहा जाता था। विश्वनाथजी के विनम्र, मिलनसार तथा आकर्षक व्यक्तित्व का असर था कि लड़कों का ही नहीं उनके अभिभावकों का भी शाखा के प्रति रूझान बहुत हो गया था। लड़कों में अनुशासन एवम् व्यायाम तथा सुसंस्कार कायम करने की सम्भावना दिखती थी। विश्वनाथ जी के प्रयास से प्रौढ़ लोग भी शाखाओ में शामिल होने लगे थे। उनकी शाखा प्रौढ़ शाखा कही जाती थी।
मुझसे बड़े भाई भी शाखा के स्वयंसेवक थे। करीब एक साल के बाद शाखा के साथ मेरा सम्बन्ध नहीं रह गया। अब यह तो याद नहीं कि ऐसा क्यों हुआ, पर मेरे भैया का तो सम्बन्ध आज तक स्थायी बना रहा है। ऐसी कोई घटना याद नहीं जिसके कारण शाखा अथवा संघ से मेरा मोहभंग हुआ हो। बस सरोकार टूटा सो टूटा।

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