लेखक परिचय

डॉ. मधुसूदन

डॉ. मधुसूदन

मधुसूदनजी तकनीकी (Engineering) में एम.एस. तथा पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त् की है, भारतीय अमेरिकी शोधकर्ता के रूप में मशहूर है, हिन्दी के प्रखर पुरस्कर्ता: संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती के अभ्यासी, अनेक संस्थाओं से जुडे हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अमरिका) आजीवन सदस्य हैं; वर्तमान में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्‍था UNIVERSITY OF MASSACHUSETTS (युनिवर्सीटी ऑफ मॅसाच्युसेटस, निर्माण अभियांत्रिकी), में प्रोफेसर हैं।

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तमिल भाषा में ४०% से ५० % तक शब्द तत्सम और तद्‍भव रूप में पाए जाते हैं।

(१)

संस्कृत के शब्द भारतीय भाषाओं में दो रूप में, फैले हैं; कुछ तत्सम रूप में और कुछ तद्भव रूप में। सही आकलन के लिए, पहले तत्सम और तद्भव संज्ञाएं समझ लेनी होंगी।

वे शब्द ’तत्सम’ (तत्‌+ सम) कहलाते हैं, जो अविकृत, शुद्ध संस्कृत रूप में प्रादेशिक भाषाओं में फैले हुये, हैं। और ’तद्भव’ (तत्‌ +भव) वे शब्द कहलाते हैं, जो प्रादेशिक भाषा का संस्कार पाकर रूपान्तरित हो कर रूढ हो चुके हैं।

तत्सम का शब्दार्थ है उसके समान। और तद्भव का शब्दार्थ है उससे उद्‌भूत (उससे उत्पन्न)

(२)

तमिल के तत्सम शब्दों के कुछ उदाहरण :

(१)अंकुश‍म्‌ , (२)अणु, (३)अंतरंग‍म्‌,(४) गर्वम्‌, (५)विषयम्‌,(६) आडंबरम्‌, (७)अलंकारम्‌,(८) रोहण‍म्‌,(९) विस्तारम्‌,(१०) सुगम, (११) विशालमान इत्यादि शब्द अविकृत और शुद्ध संस्कृत रूप में तमिल में पाये जाते हैं।।

टिप्पणी : कुछ तमिल बंधु ऐसे समान शब्दों को तमिल से संस्कृत में आये हुए मानते हैं।

पर हमें जब समानता ही ढूंढना है,और समन्वय की ही चाहना है, तो संस्कृत-तमिल की शब्द-समानता ही हमारे लिए पर्याप्त है। वे शब्द संस्कृत में तमिल से आये थे, या तमिल में संस्कृत से गये थे, यह चर्चा गौण हो जाती है। वैसे हमारी विचार प्रणाली समन्वयकारी है, विविधता में एकता देखनेवाली है। हमें हमारे तमिल भाषी पुरखों का उतना ही गौरव है, जितना हमारे संस्कृत भाषी पुरखों का।कुछ इसी प्रकार, विवेकानन्दजी ने भी कहा हुआ स्मरण है।

(३)

तद्भव शब्दों के कुछ उदाहरण: निम्न शब्द कुछ रूपान्तरित होकर तमिल में पाए जाते हैं। जैसे (१)सभा —> सबै, (२) अनाथ —-> अनादै; (३)मूल –> मुलै, (४)अवमर्यादा —->अवमरियादै; (५)अर्चना —–> अरुच्चनै, (६) पूजा—>पूजै इत्यादि।

निर्देशित शब्दों की ओर देखने पर आप के ध्यान में आयेगा, कि,

(एक) इन शब्दों का अंत ”ऐ” कार से हो रहा है; जैसे मूल का मुलै, सभा का सबै, पूजा का पूजै

(दो) दूसरी विशेषता भी है, जो तमिल की वर्णमाला की उच्चारण सीमा में ही उच्चारण करवाती है।

(तीन) संस्कृत की भांति अनुनासिक म्‌‍ में शब्द का अंत

(चार) ”द्ध” के स्थान पर ”द्द” का उच्चारण। बुद्धि –> बुद्दि

(पांच) भ के स्थान पर ब, ख के स्थान पर क, त थ द ध के स्थान पर द या त ।

ऐसी और भी विशेषताएं हैं। अभी केवल प्राथमिक जानकारी ही उद्देश्य है, पर ठीक समझ में

आने के लिए, कुछ बिन्दु प्रस्तुत किए हैं।

(४)

तमिल ’ळ’ का उच्चारण।

तमिल का ळ वेदों में भी पाया जाता है, जो हिन्दी में लुप्त हुआ है; पर संस्कृत में है; गुजराती, मराठी में भी है। शायद कन्नड, तेलुगु, मल्लयालम में भी होगा। तमिल ळ का उच्चारण कुछ अलग ही है।

(५) हिन्दी/संस्कृत—>तमिल शब्द

माना जाता है कि तमिल भाषा में ४०% से ५० % तक शब्द तत्सम और तद्‍भव रूपमें पाए जाते हैं।

केवल अ से प्रारंभ होते शब्दों का चयन किया है, इसके पीछे उद्देश्य, समझता हूँ, कि एक ”अ” से प्रारंभ होने वाले इतने शब्द मिल पाए, तो सारे तमिल शब्दों में प्रायः इसी अनुपात में शब्द मिलने चाहिए।

निम्न शब्द सूचि में, बाईं ओर संस्कृत का शब्द देकर उसीका तद्‌भव या तत्सम तमिल रूप दाहिनी ओर अंतमें दिया है। कुछ और पर्याय भी दिए हैं। कोष्ठक में अर्थ बताया है। तमिल शब्द अंत में —> की दाहिनी ओर दिए हैं।

(६)

संस्कृत शब्द –(संभवित अर्थ )—–> तमिल शब्द

अंकुर — मुलै।

अंकुश — (लोहे का कांटा जिससे हाथी को वश में किया जाता है; ) —> अंकुशम।

अंतरंग — (घनिष्ठ, आत्मीय;) —>आप्तमान; अंतरंगमान, अंतरंगं।

अंतर्राष्ट्रीय — (एक से अधिक राष्ट्रों से संबंध रखने वाला )—> सर्वदेसि।

अकड़ना — (कड़ा होना, ऐंठना; घमंड दिखाना या दुराग्रह करना )—> गर्वम्।

अक्ल — (बुद्धि, समझ )—> बुद्दि।

अगरबत्ती —> अगर्बत्ति ,ऊदुवत्ति।

अग्रज — (बड़ा भाई )—> अण्णन् (अण्णा )

विशेष: यही अण्णा हज़ारे का नाम भी है। ”अन्ना” अशुद्ध माना जाएगा।

अड्डा —-(निलयम )—-> निलैयम्

अणु — (किसी तत्वका बहुत छोटा अंश )—> अणु;

अदालत — (न्यायालय) —> नियायालयम् (न्यायालयम्‌)

अधिक — (बहुत; अतिरिक्त )—> अदिकं; अदिगं

अधिवेशन –( सभा )—> सबै

अध्यापक — (पढ़ाने वाला, शिक्षक) —> उबाद्दियायर् (उपाध्याय)

अध्याय —–> अद्दियायम्; विषयम्

अनशन — (आहार त्याग, उपवास;) —> उपवासम्

अनाथ —-> अनादै;

अनाथालय — —> अनादैलियम

अनुराग — (प्रेम,) —> पिरियम् (प्रियम )

अनुसार – (अनुरूप )—> अनुसरित्तु (अनुसरित)

अनेक — —> अनेग,

अन्न — (अनाज) —> दानियम् (धान्यम )

अन्याय —> अनियायम्; (अन्यायम्‌)

अपमान —–> अवमरियादै;(अवमर्यादा)

अफसर —> अदिकारि, — (अधिकारी)

अभयदान — (सुरक्षा का वचन) —> अबयम (अभयम)

अभिनय — (आंगिक चेष्ठा, हावभा —> अबिनयम्,

अभिप्राय — —> अंबिप्पिरायम्;

अभिभावक —-> पोषकर् (पोषक)

अभिमान — (अहंकार,)—> गर्वम्

अभिलाषा —–> अभिळाषै,

अभिशाप — —> शाबम्

अभ्यास —> अब्बियासम्

अमावस्या —> अमावासै

अमृत —–> अमुदम्

अम्ल —-> अमिलम्

अराजक —-अराजकम्

अरुण —>सूरियन् (सूर्यन)

अर्चना —–> पूजै, अरुच्चनै

अर्थ —– >अर्त्तम्; अर्त्तम्,

अर्धमासिक — –> पक्षम्, ( जैसे शुक्ल पक्ष, कृष्ण पक्ष)

अर्धांगिनी —-> धर्मपत्नी —> पत्तिनि, (पत्नी)

अर्पण —-> अर्पित्तल्,

अलंकरण —-> अलंकरित्तल्

अलंकार —->अलंकारम्

अलमारी —–> अलमारि ( यह एक पुर्तगाली शब्द मूलका शब्द है, जो हिन्दी में चलता है, पर संस्कृत में नहीं चलता)

अलापना —-> आलापनै

अलौकिक (दैवी )– —> देय्वीगमान

अलता —-> अल्ता

अवतार —->अवतारम्;

अवयव — —> अवयवम्;

अवरोह —-> अवरोहणम्

अवश्य — —> अवसियम्,

अवसान —-> मरणम्

अशुद्ध —->अशुद्दमान;

अशुद्धि —–> अशुद्दम्, (अशुद्धम)

अशुभ — —> अमंगलमान, अशुभम्;

अष्टमी — —> अष्टमि

असर — (प्रभाव) —> पिरबावम् (प्रभावम)

असल —-> मूलदनम् (मूल धन)

असली —-> असल् शुद्दमान (शुद्धमान)

असुविधा —–> असौकरियम्; (असौकर्यम)

अस्त्र —–> अस्तिरम्,

अल्प —-> अर्पमान (अल्पमान)

अहं — —> गर्वम्, अहंकारम्

अहिंसा —-> अहिंसै

आंशिक —->अपूर्णमान

आकाश — —> आगायम्

आकाशवाणी —-> अशरीरि वाक्कु ; आकाशवाणी,

आकृति —-> रूपम्, मुखम्

आकर्षण —-> शक्ति,

आचार्य —–> गुरु;

आज़ाद — (स्वाधीन, मुक्त, स्वतन्त्र )—> सुतंदिरमान (स्वतंत्रमान)

आजीविका — (रोज़ी, रोज़गार, धंधा) —>उद्दियोगम् (उद्योगम्‍)

आज्ञा — (आदेश,अनुमति) —> अनुमदि

आडंबर — (दिखावा,) —> आडंबरम्

आत्म-कथा — (स्व चरित्र) —> सुय-चरितै

आत्मा — —> आत्तुमा, जीवन्;

आदर —–> मरियादै; (मर्यादा)

आलंबन — (आधार, आश्रय) —> आदारम्

आदि — (मूल; पहला;) —> आदि, मूल

आदिवासी — (जनजाति का सदस्य )—> आदिवासी

आधार — –> आदारम्; कारणम्

आधिकारिक — (अधिकारपूर्वक) —> आदिकार पूर्वमान

आध्यात्मिक — (आत्मा से सम्बन्ध रखने वाला )—> आन्मीयम्

आनंद — (हर्ष, खुशी; मौज) —> आनंदम्

आमोद-प्रमोद —->उल्लास

आयत — (चार भुजाओं वाला विशाल क्षेत्र) —> विशालमान; नीळ् सदुरमान

आया — (धाय, दाई) —> आया;

आयाम — (लंबाई, विस्तार) —>विस्तारम्

आयुष्मान् — (दीर्घजीवी, चिरंजीवी )—> चिरंजीवियान,

आरंभ —–> आरंबम,

आरती —> आरत्ति, दीपारादनै;(दीपाराधना)

आराम —> सुगम्,

आरोह —>रोहणम्

आलोचना —–> विमरिसनम् (विमर्श)

आवरण — (परदा;)–> पडुदा;

आवश्यक — –> अवसियमान, (अवश्यमान)

आभूषण —–> अलंकारम्

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14 Comments on "तमिल की संस्कृत कड़ी – डॉ. मधुसूदन"

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मुकुल शुक्ल
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मुकुल शुक्ल
भारत की एकता को अक्षुण्ण रखने की बात नेता अपनी शपथ मे करते ज़रूर है पर प्रयास केवल मधुसूदन जी द्वारा ही होता दिख रहा है | सचमुच ऐसी जानकारी मन की सारी ग्रंथियों को खोल देती है और जैसे जैसे ये समझ आता है की भारत की समस्त भाषाओं और यहाँ तक की विश्व की समस्त भाषाओं की जननी हमारी संस्कृत भाषा है तो सारे अंधविश्वास दूर हो जाते हैं और अपने भारतीय होने पर गर्व होता है | हालांकि कुछ ऐसी भ्रांतियाँ भी तमिलभाषियों के बीच फैली हैं जिनका उत्तर कठिन प्रतीत होता है जैसे की तमिल भाषा… Read more »
डॉ. मधुसूदन
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सुरेन्द्र जी, विश्व मोहन जी, मोहन जी, शिवेंद्र जी, अवनीश, सत्त्यार्थी जी, श्री राम तिवारी जी, और डॉ. राजेश जी, सभी का बहुत ऋणी हूँ. मैं कुछ भाषा वैज्ञानिकों को जानता हूँ. जिन्हों ने सही संस्कृत पढ़ी है, वे सही अंग्रेजी नहीं जानते. और जो अंग्रेजी जानते हैं, वें संस्कृत नहीं जानते. और साथ में हीनता ग्रंथि भी उन पर प्रभाव डालती है.वास्तव में संस्कृत की जानकारी ही कम देखता हूँ. फिर पता नहीं. वे जो पुस्तक में लिखा होता है, वही सही मान कर–वही लिखते हैं. अपनी सोच नहीं सामने रखते. मुझे दो बहुत बहुत अच्छे संस्कृत शिक्षक शाला… Read more »
डॉ. राजेश कपूर
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प्रो. मधुसुदन जी के हिंदी भाषा के बारे में लिखे शोधपरक लेख राष्ट्रीय एकता की कड़ी को मजबूत बनाने वाला अमूल्य योगदान है. द्रविड़ीयन भाषा समूह के झूठे सिद्धांत के आधार पर राष्ट्रीय एकता को तोड़ने के वर्षों पुराने प्रयासों की धज्जियां एक अकेले प्रो. मधुसुदन जी ने उड़ा डाली हैं. हिंदी भाषा की वैज्ञानिकता व तार्किकता को प्रमाणिक रूप से स्थापित किया है. कमाल तो यह है कि ये भाषा विज्ञानी नहीं हैं. फिर भी इन्हों ने वह कर दिखाया है जो कोई भाषा विज्ञानी नहीं कर सका. इनकी लगन और प्रतिभा वंदनीय है, अभिनंदनीय है. लाखों रुपया मासिक… Read more »
डॉ. मधुसूदन
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मधुभाई — आपका तमिल वाला लेख मैंने बड़े मनोयोग से पढ़ा| बहुत सुन्दर और सटीक लेख है, साथ ही शिक्षा-प्रद भी | बधाई हो | आपके सारे लेख समयाभाव के कारण नहीं पढ़ पाता हूँ; पर मुझे मालूम है; आप जो भी लिखते हैं, विद्वत्तापूर्ण और तर्क-संगत होता है| विभिन्न भाषाओँ के ज्ञान के कारण, आपको, उनके शब्दों के मूल का विषद ज्ञान है; यह आपके लेखों में पूरी तरह दृष्टिगोचर होता है| विद्वानों और युवकों के लिए ये तर्क-संगत लेख, समान रूप से प्रेरणा-प्रद होंगें, यह मेरी आशा है और शुभ-कामना भी| आपने कहा था की मैं अपनी कविता,… Read more »
sATYARTHI
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आदरणीय प्रोफेसर मधुसूदन जी का यह लेख अपेक्षाकृत अधिक आनंद दायक लगा मेरे जैसे अधिकांश हिंदी भाषी यह समझते आये हैं की चारों दक्षिण भारतीय भाषाओँ में तमिल ही सबसे दुरूह है मलयालम,कन्नड़ तथा तेलुगु भाषाओँ में संस्कृत के तत्सम तथा तद्भव शब्द अधिक हैं आज यह लेख पढ़ कर ऐसा लगा की तमिल का भी हिंदी से ऐसा ही सम्बन्ध है जैसा की बंगला,या मराठी का इसी श्रंखला को आगे बढ़ाते हुए यदि तमिल नाडू निवासी विद्वान ऐसे ही लेख भेजें तो भाषाई तथा प्रादेशिक सद्भाव को पुनर्जीवित करने के प्रयत्नों को बल मिलेगा मधुसूदन जी अमरीका में रह… Read more »
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