लेखक परिचय

बी एन गोयल

बी एन गोयल

लगभग 40 वर्ष भारत सरकार के विभिन्न पदों पर रक्षा मंत्रालय, सूचना प्रसारण मंत्रालय तथा विदेश मंत्रालय में कार्य कर चुके हैं। सन् 2001 में आकाशवाणी महानिदेशालय के कार्यक्रम निदेशक पद से सेवा निवृत्त हुए। भारत में और विदेश में विस्तृत यात्राएं की हैं। भारतीय दूतावास में शिक्षा और सांस्कृतिक सचिव के पद पर कार्य कर चुके हैं। शैक्षणिक तौर पर विभिन्न विश्व विद्यालयों से पांच विभिन्न विषयों में स्नातकोत्तर किए। प्राइवेट प्रकाशनों के अतिरिक्त भारत सरकार के प्रकाशन संस्थान, नेशनल बुक ट्रस्ट के लिए पुस्तकें लिखीं। पढ़ने की बहुत अधिक रूचि है और हर विषय पर पढ़ते हैं। अपने निजी पुस्तकालय में विभिन्न विषयों की पुस्तकें मिलेंगी। कला और संस्कृति पर स्वतंत्र लेख लिखने के साथ राजनीतिक, सामाजिक और ऐतिहासिक विषयों पर नियमित रूप से भारत और कनाडा के समाचार पत्रों में विश्लेषणात्मक टिप्पणियां लिखते रहे हैं।

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sambandarबी एन गोयल

दक्षिण भारत के शैवमताचार्यों में इनका नाम प्रमुख है। आदि शंकराचार्य ने ३२ वर्ष की आयु में ही देश को अध्यात्म की एक नई दिशा दी, उसी कार्य को संभदार ने अपनी १६ वर्ष की अल्पायु में आगे बढ़ाया। इनका जन्म तमिलनाडु में चिदम्बरम के पास सिरकाज़ी नाम के स्थान पर हुआ था। इनके पिता का नाम श्री शिवपाद ईरुदयार और माता का नाम भगवती अम्माल था।घर में एकमात्र शिशु होने के कारण इनकी विशेष देखभाल होती थी।

कहते हैं एक दिन इनके पिता नन्हे बालक को उसकी जि़द्द के कारण मन्दिर के सरोवर पर ले गए। बालक को किनारे पर बैठाकर पिता स्नान करने के लिए सरोवर में चले गए। अचानक बालक ने रोना शुरू कर दिया। पिता चूंकि स्नान कर रहे थे वे इसका रुदन सुन नहीं पाये। बच्चे के रुदन को सुनकर वहां शिव-पार्वती आये, उन्होंने बालक को चुप किया और पार्वती ने बालक को अपने स्तन से दूध पिलाया। दूध पीकर बच्चे ने रोना बन्द कर दिया। तब शिव-पार्वती वहां से प्रस्थान कर गए। स्नान करने के बाद पिता जब लौटे कर आए तो उन्होंने बालक के मुंह पर दूध के छींटे दिखायी दिए। उन्हें आश्चर्य हुआ कि बालक को दूध किसने पिलाया। बच्चे ने पिता की जिज्ञासा शान्त करने के लिए एकपद सुनाया बालक की आयु उस समय मात्र तीन वर्ष की थी। इस पद में भगवान शिव और पार्वती की महिमा का वर्णन है। इसमें भगवान शिव के पांच मुख्य कार्यों का वर्णन किया गया है।

आचार्य शंकर ने सौन्दर्यलहरी में इनको ‘द्रविड़-शिशु’ के नाम से वर्णित किया है।

 

एक बार इनके पिता इन्हें पास के मन्दिर में लेकर गए। बालक संभदार उस समय ईश्वर भक्तिगान में लीन थे और वे हाथों से तालियां भी बजा रहे थे। अचानक उनके हाथों में एक स्वर्ण मंजीरा आकर गिरा। इस पर लिखा था ‘ओम् नमः शिवायः’। इस घटना के बाद बालक संभदार ने इसे प्रभु का प्रसाद मानकर अपने पदगान के लिए अपना लिया।

जब ये सात वर्ष के थे तो इनका उपनयन संस्कार हुआ। उस समय इन्होंने गायत्री मंत्र की अपेक्षा पंचाक्षरम् अर्थात ओम नमः शिवाय का वाचन किया। शैव मत के सभी प्रमुख सन्तों ने पंचाक्षरम् को आधार बनाकर अपनी रचनाऐं की हैं। इसे वेदों का मूलमंत्र मान लिया गया।

 

दक्षिण के शिव सन्तों और कवियों की वाणी को दर्षन का स्थान प्राप्त है। इन शिव भक्तों में नायनार भक्त हुए हैं। इनकी संख्या ६३ है और इनकी प्रतिमाएं दक्षिण के मन्दिरों में स्थापित हैं। शैवाचार्य नाम्बि-आन्दार-नम्बी ने शैव गानों और पदों का संकलन ग्यारह जिल्दों में किया। इस ग्रन्थ में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि ईश्वर प्राप्ति का साधन केवल प्रेम है। शास्त्रों का ज्ञान अथवा कर्मकाण्ड आदि का स्थान गौण है। संभदार ने तमिलनाडू के सभी मन्दिरों के दर्षन पांच-पांच बार किए और पहली तीन तिरुमरई की रचना की।

एक बार तिरु नीलकंठ नाम का एक वीणा वादक संभदार से मिला और इनसे अपनी भजन मण्डली में शामिल करने की प्रार्थना की। कुछ ही समय में नीलकंठ एक अच्छे संगीतकार के रूप में प्रसिद्ध हो गया। कुछ लोगों ने उसे संभदार के समान संगीतकार और भजन गायक तक कह दिया। इससे नीलकंठ को असुविधा हुई। उसने संभदार से एक ऐसा भजन गाने की प्रार्थना की जिसको वह अपने वाद्य यंत्र पर न बजा सके। संभदार ने राग नीलाम्बरी में एक भजन गाया। नीलकंठ उसे अपने वाद्ययंत्र पर बजाने में असमर्थ रहा। क्रोध में आकर उसने अपना यंत्र तोड़ने का प्रयास किया। संभदार ने उसे रोककर समझाया कि इसमें दोष उसका नहीं है वरन् उसके यंत्र की अपनी सीमाएं हैं।

संभदार ने अपने १६ वर्ष की अल्पायु में १६,००० पदों की रचना की। इनमें से अब केवल ३,८०० उपलब्ध हैं। इनका जीवनकाल सन् ६४३ से ६५९ तक का था।

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