लेखक परिचय

नीरज कुमार दुबे

नीरज कुमार दुबे

नीरज जी लोकप्रिय हिन्दी समाचार पोर्टल प्रभासाक्षी डॉट कॉम में बतौर सहयोगी संपादक कार्यरत हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा हासिल करने के बाद आपने एक निजी संस्थान से टीवी जर्नलिज्म में डिप्लोमा हासिल कीं और उसके बाद मुंबई चले गए। वहां कम्प्यूटर जगत की मशहूर पत्रिका 'चिप' के अलावा मुंबई स्थित टीवी चैनल ईटीसी में कार्य किया। आप नवभारत टाइम्स मुंबई के लिए भी पूर्व में लिखता रहे हैं। वर्तमान में सन 2000 से प्रभासाक्षी डॉट कॉम में कार्यरत हैं।

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 नीरज कुमार दुबे

आतंकवाद के ‘रंग’ को लेकर हुई सियासत के बाद अब आतंकवादियों को सुनाई गयी सजा को लेकर राजनीति शुरू हो गयी है। यह वाकई दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है जिसमें कि जनभावनाओं का हवाला देते हुए उन आतंकवादियों को बचाने का प्रयास किया जा रहा है जिनकी मौत की सजा पर न सिर्फ उच्चतम न्यायालय अपनी मुहर लगा चुका है बल्कि राष्ट्रपति भी उनकी दया याचिका खारिज कर चुकी हैं।

तमिलनाडु विधानसभा की ओर से पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के हत्यारों को फांसी नहीं देने का सर्वसम्मति से पास किया गया प्रस्ताव भानुमति का पिटारा खोल देने जैसा है। राज्य विधानसभा के इस कदम के बाद विभिन्न राज्यों में पार्टियां अपने चुनावी फायदे को देखते हुए ऐसे ही खतरनाक खेल खेल सकती हैं। इसकी शुरुआत हो भी गयी है। तमिलनाडु विधानसभा के प्रस्ताव के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने ट्वीट किया कि यदि जम्मू-कश्मीर विधानसभा अफजल गुरु को माफी के संबंध में प्रस्ताव पास करती तो क्या प्रतिक्रिया होती? इससे पहले देवेंद्र पाल सिंह भुल्लर को माफी दिलाने के लिए पंजाब के सभी पार्टियों के नेता एक हो ही चुके हैं।

गौरतलब है कि देश में कई ऐसे मुजरिम या आतंकवादी हैं जिन्हें मौत की सजा सुनाई गयी है। अब जो सिलसिला शुरू हुआ है उससे संभव है कि जिस जिस की सजा की तारीख नजदीक आती जायेगी उसके पक्ष में अपना चुनावी नफा नुकसान देख राजनीतिक पार्टियां उसके पक्ष में खड़ी होती रहेंगी। तमिलनाडु विधानसभा द्वारा शुरू किया गया यह सिलसिला चल निकला तो यकीनन आतंकवाद के खिलाफ कड़ा संदेश देने के हमारे प्रयासों को क्षति ही पहुंचेगी।

आखिर यह राजनीति नहीं तो और क्या है कि तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता ने राजीव गांधी के हत्यारों की सजा के मामले पर पहले तो कहा कि राष्ट्रपति के आदेश में संशोधन करने का उनके पास कोई अधिकार नहीं है लेकिन जब उनके कट्टर प्रतिद्वंद्वी करुणानिधि ने राजीव के हत्यारों की मौत की सजा को रद्द करने की वकालत करते हुए कहा कि यदि उन्हें छोड़ दिया जाता है तो तमिल लोग खुश होंगे तो जयललिता ने एकाएक पैंतरा बदल लिया और अगले ही दिन विधानसभा में सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित करा दिया जिसमें दोषियों की फांसी की सजा को माफ करने का आग्रह किया गया। यही नहीं राज्य के कई अन्य पार्टियों के नेता भी इस मामले से संभावित चुनावी लाभ का आकलन करते हुए मैदान में कूद पड़े। वाइको तो अदालत पहुंच गये और वरिष्ठ अधिवक्ता राम जेठमलानी के तर्कों की बदौलत दोषियों की सजा को आठ सप्ताह तक टलवाने में सफल भी रहे। श्रीलंका के भी कुछ सांसदों ने भारत के राष्ट्रपति और अन्य नेताओं को पत्र लिखकर राजीव के हत्यारों को फांसी नहीं देने की मांग कर डाली। अब तो कांग्रेस के कुछ नेता भी इसी धारा के साथ चलना लाभप्रद मान रहे हैं। मणिशंकर अय्य्ार का कहना है कि तीनों दोषियों को फांसी नहीं देनी चाहिए और उन्हें शेष जीवन जेल में बिताने देना चाहिए। यह दोहरा रवैया नहीं तो और क्या है कि एक ओर जहां राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस का मत है कि कानूनी प्रक्रिया को अपना काम करने देना चाहिए वहीं राज्य स्तर पर उसके नेताओं को कानूनी प्रक्रिया में हस्तक्षेप से कोई गुरेज नहीं है। यहां दोष सिर्फ एक दल का नहीं बल्कि सभी पार्टियों का है क्योंकि हर कोई राजीव के हत्यारों को फांसी में अपना चुनावी नुकसान देख रहा है।

दूसरी ओर बात जम्मू-कश्मीर की करें तो यकीनन यह एक संवेदनशील राज्य है। यह बात जब सभी को पता है तो निश्चित रूप से वहां के मुख्यमंत्री इससे अनजान नहीं होंगे। लेकिन उनके हालिया बयान पर गौर किया जाये तो कुछ सवाल उठ खड़े होते हैं। संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरु के संबंध में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने ट्वीट किया कि क्या हो जब राज्य विधानसभा अफजल को माफी के संबंध में प्रस्ताव पास करे? अपनी इस टिप्पणी पर उन्हें सिर्फ अपने पिता के अलावा किसी अन्य राष्ट्रीय स्तर के नेता का समर्थन नहीं मिला तो इस पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए। लेकिन उमर की टिप्पणी ने राजनीतिक गुल खिलाना तो शुरू कर ही दिया है और यह शायद उनकी टिप्पणी का ही कमाल है कि एक निर्दलीय विधायक शेख अब्दुल रशीद ने राज्य विधानसभा को एक प्रस्ताव सौंपा है जिसमें मानवीय आधार पर अफजल के लिए क्षमादान की मांग की गयी है। मान लीजिये यदि 26 सितंबर से शुरू होने वाले विधानसभा के सत्र में यह प्रस्ताव पास भले न हो लेकिन यदि इस पर सिर्फ चर्चा ही हो जाये तो क्या यह उच्चतम न्यायालय और राष्ट्रपति के आदेशों की अवमानना नहीं होगी और क्या इससे बहुत मुश्किल से शांत हुए राज्य में फिर से हालात बिगड़ सकने की संभावनाएं प्रबल नहीं होंगी? भारतीय लोकतंत्र के प्रतीक संसद पर हमले के दोषी के लिए यदि माफी की मांग की जा रही है तो कल को कोई अजमल कसाब के लिए भी माफी की अपील कर सकता है और चुनावी लाभ की संभावना देखते हुए कोई विधानसभा में इस मुद्दे पर भी प्रस्ताव ला सकता है। यह बात वाकई समझ से परे है कि कुछ समय पूर्व तक अलगाववादियों के खिलाफ कड़ा रुख रखने वाले उमर के सुर अब उन (हुर्रियत नेताओं) जैसे क्यों होते जा रहे हैं।

तीसरी स्थिति पंजाब की है जोकि बड़ी मुश्किल से आतंकवाद के साये से बाहर निकला था। वहां के नेताओं को चाहिए कि वह इस मुद्दे पर अपना रुख लगातार कड़ा बनाये रखें लेकिन हो इसका उलटा रहा है। फांसी की सजा सुनाये गये देवेंद्र पाल सिंह भुल्लर को माफी देने के पक्ष में जब पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष कैप्टन अमरिंदर सिंह खड़े हुए तो मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने अपने प्रतिद्वंद्वी पर हावी होने के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पत्र लिख कर भुल्लर को माफी देने की मांग कर डाली। हाल के घटनाक्रमों के बाद संभव है कि किसी कट्टरपंथी धड़े से जुड़ा कोई विधायक भुल्लर की माफी के लिए भी प्रस्ताव पेश कर दे। पंजाब में विधानसभा चुनाव निकट हैं इसलिए कोई भी दल नहीं चाहेगा कि वह कथित जनभावनाओं के विपरीत जाये या फिर उसे किसी वर्ग का विरोध झेलना पड़े।

इन सभी घटनाक्रमों पर गौर के बाद यहां सवाल यह खड़ा होता है कि आतंकवादियों को माफी के लिए जिन जनभावनाओं का हवाला दिया जा रहा है उसका कथित आंकड़ा राजनीतिक दलों के पास कहां से आया? क्या कोई सर्वेक्षण कराया गया है अथवा कोई जनमत संग्रह? जनता हमेशा से आतंकवादियों और अपराधियों के साथ कड़ाई से निबटने की प्रबल पक्षधर रही है, यह सिर्फ राजनीतिक दल ही हैं जो अपने लाभ के लिये जनभावनाओं का झूठा हवाला देते रहे हैं। जनता को चाहिए कि वह राजनीतिक दलों की ओर से कथित जनभावनाओं की आड़ लेकर राजनीतिक रोटियां सेंके जाने पर सवाल उठाये और अपना मत भी बेहिचक उजागर करे। देश के न्यायालयों की ओर से सुनाये गये फैसलों का पालन कराना भले प्रशासन की जिम्मेदारी हो लेकिन इन फैसलों के साथ खड़े होना जनता का भी कर्तव्य है।

बहरहाल, जहां तक बात मौत की सजा के नैतिक पक्ष की है तो यह सही है कि दुनिया भर में इसका प्रचलन कम हो रहा है और मीडिया रिपोर्टों के आंकड़ों के मुताबिक 139 देश फांसी की सजा को हटा चुके हैं। अपने देश में भी फांसी की सजा को खत्म करने की बहस वर्षों से चल रही है लेकिन किसी तार्किक अंजाम तक नहीं पहुंच पायी है। जब तक इस मामले में कोई एकराय नहीं बन जाती तब तक जघन्य अपराधों, कांडों में शामिल लोगों की सजा पर कोई राजनीति नहीं होनी चाहिए क्योंकि इससे सिर्फ आतंकवादियों और अपराधियों का हौसला ही बुलंद होगा क्योंकि उन्हें पता है कि पहले तो मुकदमा वर्षों तक चलेगा और जब सजा सुना भी दी जायेगी तो राजनीतिक कारणों से इसमें विलंब होता रहेगा।

जय हिंद, जय हिंदी

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1 Comment on "आतंकवादियों को नहीं देश को बचाइये"

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Anil Gupta,Meerut,India
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Anil Gupta,Meerut,India

ये सब वोट का खेल है. सभी पार्टियाँ, भाजपा को छोड़कर, वोट बैंक की राजनीती में लगी हैं. कुछ समुदायों के थोक वोट प्राप्त करने की झूटी मृगमरीचिका के पीछे भाग कर देश का विभाजन करने की गुनाहगार पार्टियों की मानसिकता में कोई बदलाव नहीं आया है. अफ़सोस ओ ये है की इसका विरोध उतने जोरदार तरीके से राष्ट्रवादी दल नहीं कर रहे हैं जितना करना चाहिए था. देश को एक सोफ्ट स्टेट के रूप में दिखाने वाले देश का भारी अहित कर रहे हैं.जागो देशवासियों जागो.

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