कहो कौन्तेय-३३ (महाभारत पर आधारित उपन्यास-अंश)

(वन में पाण्डवों की श्रीकृष्ण से भेंट)

विपिन किशोर सिन्हा

तीन दिन की पदयात्रा के पश्चात हमलोग काम्यकवन पहुंचे। वन की हरीतिमा, मृदु जल के सरोवर, पक्षियों के संगीत और दूर तक विस्तृत शान्त वातावरण ने हम सभी के व्यथित मन को कुछ शान्ति प्रदान की। लेकिन मन पूरी तरह शान्त कहां हो पा रहा था? द्यूत क्रीड़ा और द्रौपदी का अपमान एक दूसरे के पर्याय बन चुके थे। मन कोई यंत्र तो है नहीं – जब चाहा चला दिया, जब चाहा बन्द कर दिया। हम पांचो भ्राता और द्रौपदी अपमान की अग्नि में जल रहे थे। सबके मस्तिष्क में समान तरंगें उठ रही थीं। हमने मार्ग में एक-दूसरे से अत्यन्त अल्प वार्तालाप किया। हम व्यक्त तो नहीं कर पा रहे थे लेकिन हम सभी के आक्रोश के केन्द्र युधिष्ठिर ही थे।

धर्माराज कहलाने वाला व्यक्ति भी द्यूत में इतनी आसक्ति रख सकता है, यह बात मेरी समझ के बाहर थी। द्यूत क्रीड़ा के पूर्व अग्रज युधिष्ठिर मेरे लिए देवतुल्य थे, त्रुटिहीन व्यक्तित्व के स्वामी थे। लेकिन अब वे मेरे लिए मात्र अग्रज थे जिनकी प्रत्येक आज्ञा के अनुपालन हेतु मैं अपनी ही प्रतिज्ञा के कारण बाध्य था। वारणावत के लिए प्रस्थान पूर्व ही महात्मा विदु्र ने उन्हें धृतराष्ट्र के षड्‌यंत्र से अवगत करा दिया था। फिर भी हमलोगों को लेकर वे लाक्षागृह में रहे – वर्षों वन-वन भटकते रहे। जिस हस्तिनापुर पर हमारा पूर्ण वैध अधिकार था, हमलोगों से छीन लिया गया। हमें खाण्डवप्रस्थ के रूप में एक अविकसित क्षेत्र दे दिया गया। युधिष्ठिर ने कोई प्रतिरोध नहीं किया। हमने अपनी शक्ति, श्रम, विवेक और श्रीकृष्ण के अभूतपूर्व मार्ग-दर्शन से खांडवप्रस्थ को इन्द्रप्रस्थ में परिवर्तित कर दिया। उन्हें चक्रवर्ती सम्राट के रूप में प्रतिष्ठित कराया। कोई सोच भी नहीं सकता था कि अमरावती सदृश इन्द्रप्रस्थ के भाग्य का निर्णय द्यूत के पासे के करवट बदलने से हो जाएगा। महापराक्रमी पाण्डव क्रीत दास बन जाएंगे। महारानी द्रौपदी बीच सभा में अपने चीर और शील की रक्षा के लिए आसन-आसन जाकर याचना करेगी। यह हमलोगों का दुर्भाग्य था या युधिष्ठिर की हठधर्मिता। हमारा तो निर्माण क्षमा करने के लिए हुआ था – जब पांचाली ने उन्हें क्षमा कर दिया, तो हमारी क्या बिसात! लेकिन आर्यावर्त का इतिहास और आनेवाली पीढ़ियां क्या कभी युधिष्ठिर को क्षमा कर पाएंगी? क्या वे मातृशक्ति के सबसे बड़े अपराधी नहीं माने जाएंगे?

काम्यकवन में प्रवास के प्रथम दिन ही रक्तपात करना पड़ा। बकासुर का भ्राता और हिडिम्ब के मित्र किर्मीर ने अचानक हमपर आक्रमण किया। आत्मरक्षा में वीर भीम को प्रत्याक्रमण करना ही था – किर्मीर की जीवनलीला समाप्त हो गई।

वन में अब हमारी दिनचर्या सामान्य होती जा रही थी। द्रौपदी ने भगवान सूर्य के वरदान स्वरूप अक्षय पात्र प्राप्त किया। अब भैया भीम को अधपेटे नहीं सोना पड़ता था। हम भोजन की समस्या से मुक्त थे। कृष्णा प्रतिदिन अलग-अलग रुचिकर व्यंजन बनाती और जिमाती। उसके व्यंजनों की सुगन्ध, ऐसा प्रतीत हुआ, द्वारिका तक पहुंच गई। एक दिन श्रीकृष्ण, धृष्टद्युम्न और धृष्टकेतु के साथ अचानक प्रकट हुए। उनके दर्शन मात्र से समस्त संताप अचानक दूर हो गए। ऐसा प्रतीत हो रहा था – सहस्रों पद्मपुष्प आसपास एक साथ खिल गए हों – जेठ मास के प्रथम दिवस सावन की रिमझिम फुहार पड़ रही हो।

द्रौपदी ने अपने प्रिय सखा को आपबीती सुनाई। शोक संतप्त श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को संबोधित किया –

“राजन! स्त्रियों के प्रति आसक्ति, द्यूत खेलना, आखेट के लिए अनुराग और मद्यपान – ये चार प्रकार के भोग, कामनाजनित दुख माने गए हैं। इसके कारण मनुष्य अपने धन, ऐश्वर्य और कीर्ति से भ्रष्ट हो जाता है। सभी विद्वान सभी परिस्थितियों में, इन चारो को निन्दनीय मानते हैं। जूए से कुछ ही पलों में सारे धन का नाश हो जाता है – सारा यश समाप्त हो जाता है। मैं शाल्व से युद्ध में व्यस्त था अन्यथा हस्तिनापुर में उपस्थित होकर, इस घृणित कार्य को बलपूर्वक रोक देता – जो विरोध करते, सुदर्शन चक्र से उनका शिरच्छेद कर देता। लेकिन अब भी बहुत विलंब नहीं हुआ है। प्रत्याक्रमण का समय आ गया है। यह पृथ्वी अब दुरात्मा दुर्योधन, अधर्मी कर्ण, कुटिल शकुनि और दुष्ट दुशासन का रक्तपान करेगी। हम युद्ध में उनका वध करेंगे एवं धर्मराज युधिष्ठिर का हस्तिनापुर के राजसिंहासन पर अभिषेक करेंगे।”

“नहीं गोविन्द, नहीं। मुझे अपयश का भागी मत बनाइये। मुझे प्रायश्चित करने दीजिए। जो नीच कर्म मैंने किए हैं, उसका दण्ड तो भुगतना ही पड़ेगा। मैंने बारह वर्ष के वनवास और एक वर्ष के अज्ञातवास का संकल्प लिया है। मैं उसके पूर्व हस्तिनापुर नहीं लौट सकता। मेरे अन्य भ्राता और पांचाली अगर चाहें तो आपके साथ इन्द्रप्रस्थ, हस्तिनापुर या द्वारिका के लिए प्रस्थान कर सकते हैं। मुझे कोई आपत्ति नहीं होगी, अपितु प्रसन्नता होगी। लेकिन हे माधव! मुझे अपने पापों के प्रायश्चित हेतु प्राप्त सुअवसर से वंचित न करें। मैं आपको वचन देता हूं कि तेरह वर्षों के पश्चात अगर ज्येष्ठ पिताश्री ने हमारा अधिकार नहीं दिया तो आपके निर्देशन और नेतृत्व में हम महासमर में अन्याइयों का वध कर अपने पूर्वजों का राज्य पुनः प्राप्त करेंगे।” युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण को समझाया।

युधिष्ठिर का दृढ़ निश्चय सुन श्रीकृष्ण शान्त हो गए। भविष्य की योजनाओं पर विचार-विमर्श चल ही रहा था कि महर्षि व्यास के आगमन की सूचना मिली। हम सबको धीरज बंधाते हुए उन्होंने कृष्णा के मस्तक पर हाथ रखा, स्नेहसिक्त स्वरों में सांत्वना दी –

“पुत्री कृष्णा! एक आदर्श पतिव्रता के रूप में, पंचपतियों की जय-पराजय, मान-अपमान, जीवन-मरण के प्रसंग पर आक्रोश एवं पीड़ा की अनुभूति करना जितना स्वाभाविक है, युधिष्ठिर का सब देख-सुन अविचल रहना भी उतना ही स्वाभाविक है। फिर भी तुम्हारी दुश्चिन्ता दूर करने हेतु ही मैं यहां आया हूं।

आज के तेरह वर्षों के पश्चात कुरुक्षेत्र में हस्तिनापुर की सत्ता के लिए महासमर होगा। पाण्डवों को युद्ध में पितामह भीष्म, आचार्य द्रोण और पराक्रमी कर्ण जैसे योद्धाओं का सामना करना पड़ेगा। इन माहारथियों से युद्ध में विजय के लिए अर्जुन के पास दिव्यास्त्रों का भण्डार होना अत्यन्त आवश्यक है। अतः आज मैं युधिष्ठिर को प्रतिस्मृति विद्या का ज्ञान दे रहा हूं। इसे वे अर्जुन को सिखाएंगे। अर्जुन इस विद्या के बल पर देवाधिदेव भगवान शंकर, इन्द्र, यम, वरुण और कुबेर को प्रसन्न कर दिव्यास्त्र प्राप्त कर सकेंगे। फिर उन्हें शत्रुओं से किसी तरह का कोई भय नहीं रहेगा।”

दूसरे दिन शुभ मुहूर्त में पवित्र सरोवर में स्नानोपरान्त मैंने अग्नि में आहुति दी, अग्रज युधिष्ठिर से प्रतिस्मृति विद्या ग्रहण की और हिमालय के उस पार जा तपस्या करने का निर्णय लिया। द्रौपदी ने आरती उतारी और शुभकामना दी –

“धनंजय! विघ्न-बाधाओं से रहित हो, विजय प्राप्ति के लिए शीघ्र यात्रा कीजिए। धाता और विधाता को नमस्कार है। ह्री, श्री, कीर्ति, द्युति, पुष्टि, उमा, लक्ष्मी और सरस्वती- ये समस्त देवियां मार्ग में जाते समय आपकी रक्षा करें।”

क्रमशः 

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