कहो कौन्तेय-३८

(कर्ण द्वारा ब्रह्मास्त्र की प्राप्ति एवं परशुराम का शाप)

विपिन किशोर सिन्हा

वनवास की अवधि में ऋषि-मुनियों ने हमें अतीत, वर्तमान और भविष्य के विषय में असीमित ज्ञान उपलब्ध कराए। हमारे ज्ञान का कोष निरन्तर समृद्ध होता गया। वनवास की यह सबसे बड़ी उपलब्धि रही।

वन में निवास करते हुए कई वर्ष बीत गए। इन वर्षों में एक दिन भी ऐसा नहीं बीता, जब हम लोगों ने इन्द्रप्रस्थ या हस्तिनापुर की चर्चा न की हो। हमारे विश्वस्त गुप्तचर वहां की सारी गतिविधियों से हमें समय-समय पर अवगत कराते रहते थे। हमारी भी गतिविधियों पर दुर्योधन की दृष्टि सदैव रहती थी। मेरे द्वारा दिव्य अस्त्रों की प्राप्ति का समाचार जहां पितामह भीष्म, आचार्य द्रोण और महात्मा विदुर के लिए अत्यन्त उल्लास का कारण था, तो वही यह धृतराष्ट्र, कर्ण और दुर्योधन के लिए शोक का विषय था। दुर्योधन की आंखों से निद्रा देवी विदा ले चुकी थीं।

कर्ण द्वारा बार-बार सांत्वना दिए जाने के पश्चात भी उसके मन से कांटा नहीं निकल पा रहा था। दुर्योधन के मनोबल में वृद्धि हेतु, कर्ण ने ब्रह्मास्त्र पाने हेतु संकल्प लिया। आचार्य द्रोण ने उसे यह विद्या प्रदान करने में अपनी असमर्थता व्यक्त की। विवश कर्ण अपनी पहचान गुप्त रख, महेन्द्र पर्वत पर ब्रह्मर्षि परशुराम के सम्मुख उपस्थित हुआ।

“कौन हो तुम और यहां किस प्रयोजन से आए हो, वत्स! परसुराम ने कर्ण से उसका परिचय पूछा।

कर्ण ने अपना मूल परिचत छिपाते हुए उत्तर दिया –

“ब्राह्मण-कुमार हूं ऋषिवर! ज्ञान-पिपासा शान्त करने हेतु यत्र-तत्र भटक रहा हूं। इस समय आपका शरणागत हूं, आपके आशीर्वाद का आकांक्षी हूं।”

भगवान परशुराम ने कर्ण को अपने शिष्य के रूप में स्वीकार किया। कर्ण ने भी मनसा, वचसा और कर्मणा गुरु की सेवा की। उचित समय आने पर स्वयं परशुराम ने उसे ब्रह्मास्त्र के संचालन और उपसंहार की विधि सांगोपांग बताई। कर्ण अत्यन्त प्रसन्न हुआ। उसकी मनोकामना पूर्ण हुई। वह अब ब्रह्मास्त्र का ज्ञाता था।

लेकिन विधि को यह स्वीकार नहीं था। शिक्षा समाप्ति के पश्चात कर्ण प्रत्यागमन की योजना बना ही रहा था कि एक दिन गुरुवर के समक्ष उसके छद्म ब्राह्मण होने का भेद खुल गया। परशुराम को यह ज्ञात हो गया कि कर्ण ब्राह्मण कुमार नहीं बल्कि सूतपुत्र है। ब्रह्मर्षि का क्रोध नियंत्रण के बाहर हो गया। कुपित हो उन्होंने कर्ण को शाप दे डाला –

“कपटी कर्ण! तूने ब्रह्मास्त्र प्राप्त करने के लिए असत्य संभाषण का सहारा लिया। अनुचित साधन से उचित साध्य की प्राप्ति नहीं हो सकती। अतः यह ब्रह्मास्त्र भी तेरे प्रयोजन सिद्धि का हेतु नहीं बनेगा। संकट की घड़ी में, जब तू इसका प्रयोग करना चाहेगा, इसके संचालन और उपसंहार की विधि तेरे स्मृति पटल से लुप्त हो जाएगी, यह मेरा शाप है।”

कर्ण ने परशुराम के चरणों में निरन्तर क्षमा-याचना की लेकिन गुरुवर का हृदय तनिक भी नहीं पिघला। उन्होंने उसे आश्रम से निष्कासित कर दिया। कहते हैं, विपत्ति कभी अकेले नहीं आती। कर्ण का दुर्भाग्य भी उसका पीछा छोड़ने के लिए तैयार नहीं था। महेन्द्र पर्वत पर ही मृगया के लिए निकले कर्ण के शब्दभेदी बाणों से सुभदा नामक एक सुलक्षणा गौ का वध हो गया। गोपालक ब्राह्मण था। वह अपनी गाय को पुत्री की भांति स्नेह करता था। पूरे परिवार का जीवन निर्वाह उस गाय के सहारे ही होता था। अपनी गौ के वध से शोकसन्तप्त ब्राह्मण ने कर्ण को शाप दिया –

“जिस प्रकार मेरी गाय का वध कर, तूने मेरे परिवार की सुख-समृद्धि और जीवन को निगल लिया, उसी तरह, हे विवेकहीन धनुर्धारी! युद्ध के समय, निर्णायक अवसर उपस्थित होने पर, धरती माता तेरे रथचक्र को निगल लेंगी और तू प्रतिद्वंद्वी के बाणों से घायल हो मृत्यु को प्राप्त होगा।”

दो-दो ब्राह्मणों द्वारा शापदग्ध कर्ण, दन्त, नख विहीन वनराज सिंह के समान, वन में शान्तचित्त बैठा रहा और अपलक सूर्य को निहारता रहा। अस्ताचलगामी भगवान भास्कर ने भी अपनी रश्मियां समेट लीं। अधर्म के पथ पर गतिशील पथिक पर सूर्य ने भी अपनी किरणें बिखेरने से मना कर दिया। अब उसके पास दुर्योधन की शरण में पुनः जाने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं था। भारी मन से वह हस्तिनापुर वापस लौट आया।

हस्तिनापुर का राजमहल तो जैसे षड्यंत्रों का केन्द्र बन गया था। दुर्योधन के गुप्तचर उसकी चिन्ताओं में निरन्तर वृद्धि करते थे। कर्ण के महेन्द्र पर्वत पर जाने के पश्चात वह एकाकी और असहाय हो गया था। शकुनि उसे नित नए-नए षड्यंत्रों के ताने-बाने समझा सकता था, सांत्वना नहीं दे सकता था। वह कर्ण के लौटने की प्रतीक्षा अत्यन्त व्यग्रता से कर रहा था। कर्ण लौटा लेकिन तेजहीन होकर। अब वह भी पुरुषार्थ पर कम, षड्यंत्रों पर अधिक विश्वास करने लगा। जब मनुष्य का अपनी सामर्थ्य से विश्वास डिगता है, तो षड्यंत्रों का सहारा लेता है।

हमारे वनवास का अन्तिम वर्ष आरंभ हो चुका था। हम द्वैतवन में ऋषि-मुनियों और प्रकृति के सान्निध्य में आनन्द से समय व्यतीत कर रहे थे। हम जितने ही प्रसन्न होते, दुर्योधन उतना ही चिन्तित होता। उसने पाण्डवों के समूल उच्छेदन की योजना बनाई। कर्ण और शकुनि ने योजना की रूपरेखा को अन्तिम आकृति प्रदान की। ‘घोषयात्रा’ का कार्यक्रम निश्चित कर दिया गया। महाराज धृतराष्ट्र से अनुमोदन भी प्राप्त कर लिया गया।

गाय और बैलों का अद्यतन विवरण प्राप्त करने हेतु, की जाने वाली यात्रा को ‘घोषयात्रा’ कहा जाता है। हस्तिनापुर वासियों की आंखों में धूल झोंकने के लिए इसे ‘घोषयात्रा’ का नाम दिया गया, वस्तुतः यह युद्ध यात्रा थी। इसमें आठ हजार रथ, तीस हजार हाथी, नौ हजार अश्व, हजारों सैनिकों के साथ, सभी भ्राताओं और मंत्रियों समेत दुर्योधन, कर्ण तथा शकुनि सम्मिलित थे।

क्रमशः

 

Previous articleव्हाट अ रिलीफ यार!
Next articleचिलमन को जलाता सूचना का अधिकार
विपिन किशोर सिन्हा
जन्मस्थान - ग्राम-बाल बंगरा, पो.-महाराज गंज, जिला-सिवान,बिहार. वर्तमान पता - लेन नं. ८सी, प्लाट नं. ७८, महामनापुरी, वाराणसी. शिक्षा - बी.टेक इन मेकेनिकल इंजीनियरिंग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय. व्यवसाय - अधिशासी अभियन्ता, उ.प्र.पावर कारपोरेशन लि., वाराणसी. साहित्यिक कृतियां - कहो कौन्तेय, शेष कथित रामकथा, स्मृति, क्या खोया क्या पाया (सभी उपन्यास), फ़ैसला (कहानी संग्रह), राम ने सीता परित्याग कभी किया ही नहीं (शोध पत्र), संदर्भ, अमराई एवं अभिव्यक्ति (कविता संग्रह)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

* Copy This Password *

* Type Or Paste Password Here *

17,160 Spam Comments Blocked so far by Spam Free Wordpress