लेखक परिचय

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

यायावर प्रकृति के डॉ. अग्निहोत्री अनेक देशों की यात्रा कर चुके हैं। उनकी लगभग 15 पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पेशे से शिक्षक, कर्म से समाजसेवी और उपक्रम से पत्रकार अग्निहोत्रीजी हिमाचल प्रदेश विश्‍वविद्यालय में निदेशक भी रहे। आपातकाल में जेल में रहे। भारत-तिब्‍बत सहयोग मंच के राष्‍ट्रीय संयोजक के नाते तिब्‍बत समस्‍या का गंभीर अध्‍ययन। कुछ समय तक हिंदी दैनिक जनसत्‍ता से भी जुडे रहे। संप्रति देश की प्रसिद्ध संवाद समिति हिंदुस्‍थान समाचार से जुडे हुए हैं।

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– डा. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

जाति व्यवस्था भारतीय समाज अथवा हिन्दू समाज की आधारभूत संरचना में निहित है। इस व्यवस्था के गुण और दोषों पर लंबे अरसे से बहस होती रही है और अब भी हो रही है। कई दफा ऐसा भी होता है कि कोई व्यवस्था किसी समय लाभदायक और समाज के लिए उपयोगी होती है लेकिन काल प्रवाह में उसकी उपयोगिता समाप्त हो जाती है और वह फालतू बोझ बन जाती है। बाज मामलों में ऐसा भी होता है कि वह व्यवस्था केवल बोझ ही नहीं बल्कि समाज की आंतरिक संरचना को खोखला भी करने लगती है। जाति व्यवस्था को लेकर यह तीनों स्थितियां समय-समय पर देखी जा सकती है। इस्लामी आक्रमणों के समय जाति व्यवस्था ने इस देश के लोगों का मजहब परिवर्तन होने से बचाया। भारत हजार वर्ष की इस्लामी गुलामी के बाद भी भारत ही बना रहा। यह व्यवस्था दुनिया के अन्य देशों जिन्होंने इस्लाम अथवा ईसाई देशों के आक्रमणों को झेला है उनकी दिखाई नहीं देती। दुनिया के अधिकांश देश इस्लाम के पहले हल्ले में ही दम तोड गए और अपनी संस्कृति, इतिहास और विरासत को छोडकर उन्होंने नई संस्कृति, नई विरासत और नए इतिहास को ग्रहण कर लिया। उसके बाद इस्लामी आक्रमणों के काल में भी कमोवेश यही स्थिति रही। यही कारण था कि अग्निदेवता की पूजा करने वाला और नित्य प्रति या करने वाला संपूर्ण ईरानी समाज केवल मात्र तीस सालों में ही अपने इतिहास और विरासत पर लानत भेजने लगा और उसने अरबों का इस्लामी चोला धारण कर लिया। संपूर्ण मध्य एशिया, जिसमें कभी बुध्दाम् शरणम् गच्छामि का मंत्र गूंजता था, वह कुछ दशकों में ही इस्लामी आक्रमण की आंधी से दम घुटने के कारण दम तोड गया।

भारत ने लगभग आठ शताब्दियों तक इस्लाम के आक्रमणों का मुकाबला किया। यह काल पराजय का काल भी था और संघर्ष का काल भी था। इसके बाद लगभग दो सौ साल तक ईसाई देशों के आक्रमण का मुकाबला किया। लेकिन इसके बावजूद भारत अपनी परंपरा, इतिहास, संस्कृति और विरासत से जुडा रहा। सूत्र रूप में से कहना हो तो प्राचीनता में निरंतरता विद्यमान रही। भारत सचमुच भारत ही बना रहा। मोहम्मद इकबाल ने जब लिखा होगा-

यूनान मिश्र रोमा मिट गए जहां से।

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी।।

तो जिस बात के कारण हमारी हस्ती न तो मिटती है और न आजतक मिटी है, उस बात में जाति का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा क्योंकि जाति एक प्रकार की बिरादरी बन गई और जो उस बिरादरी को छोडकर बाहर जाकर इस्लामपंथी अथवा ईसाईपंथी बना उसको बिरादरी ने बाहर का दरवाजा दिखला दिया। उन दिनों बिरादरी से बाहर हो जाने का अर्थ जीवन का दुभर हो जाना ही था।

मौलाना हाली ने भी लिखा था-

वो दिने इलाही को बेबाग बेडा

किए पार जिसने थे सातों समंद्र

वो डूबा दहाने में गंगा के आकर

पूरब-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण और सातों समुद्रों को जीतने वाला इस्लाम का बेडा आखिर गंगा के दहाने में आकर क्यों डूब गया? मोहम्मद इकबाल और हाली इसका कारण समझा पाए हो या न हो लेकिन कुछ विद्वानों का ऐसा मानना है। इस दहाने में जाति व्यवस्था के ऐसे गङ्ढे थे जिसमें से इस बेडे का निकलना दुश्वार हो गया था।

लेकिन धीरे-धीरे यह जाति व्यवस्था अपनी उपयोगिता खोने लगी और इस देश का वास्ता पश्चिमी देशों के इस्लामी आक्रमणों से हुआ। इस्लाम के हाथ में तलवार थी और पश्चिमी देशों के ईसाई आक्रणकारियों के हराबुल दास्ता के रूप में चर्च चल रहा था जिसके हाथ में तलवार तो नहीं थी लेकिन सेवा का पाखंड और ढाल थी। जिसको आगे करके वह इस देश के लोगों का ईसाई पंथ में परिवर्तन करवाने लगा। अब की बार अंग्रेजों ने जाति व्यवस्था को अपने पक्ष में उपयोग करने की कुटिल नीति का सहारा लिया। उन्होंने एक लंबी योजना के अंतर्गत जातियों में विषमता उत्पन्न करने का अभियान चलाया। इसका अर्थ यह नहीं कि विभिन्न जातियों में वैमनस्य नहीं था। लेकिन अंग्रेजों ने उस वैमनस्य को आगे बढाया। जातियों को एक दूसरे के खिलाफ खडा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जात वैमनस्य को बढाने में अंग्रेजों की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण रही है। इसका उदाहरण ब्रिटिश इंडिया और रियासती भारत के सामाजिक विश्लेषण से स्पष्ट हो जाता है। हिमाचल प्रदेश का नीचे का हिस्सा ब्रिटिश इंडिया के अंतर्गत वहां जाति वैमनस्य स्पष्ट देखा जा सकता है। केवल तथाकथित कुछ और निम्न जातियों में ही नहीं बल्कि ब्राह्मण और राजपूत जैसी जातियों में भी। इसके विपरीत रियासिती हिमाचल में जहां सत्ताा रियासती राजाओं की थी। जातिगत वैमनस्य बहुत कम देखने को मिलता है। इसका एक प्रमुख कारण यह था कि राजाओं की सत्ता जातियों समीकरण पर निर्भर नहीं थी जबकि अंग्रेजों की सत्ता के बने रहने के लिए अनिवार्य था कि विभिन्न जातियों के लोगों को एक दूसरे के खिलाफ खडा कर दिया जाए। अंग्रेज सरकार ने भारत की अनेक जातियों में से कुछ जातियों को सूचीबद्ध करके उन्हें राजपत्र में अनुसूचित कर दिया। ये जातियां अनुसूचित जातियां कहलाई जाने लगी। अंग्रेजों का मानना था कि इन जातियों से जन्मगत कारणों के कारण भेदभाव किया जाता है और अनेक जातियों के साथ तो अस्पृश्यता का व्यवहार भी किया जाता है। उनका यह नया सिद्धांत कुछ तथ्य पर कुछ कल्पना पर आधारित था। परंतु इसको आधार बनाकर चर्च ने इस प्रकार अनुसूचित घोषित की गई जातियों के लोगों को जातिविहीन समाज का सपना दिखाया। वास्तव में यह लुभावना सपना था। एक ऐसे समाज की कल्पना जिसमें न कोई जाति हो और न ही किसी विशेष जाति में जन्म लेने के कारण भेदभाव का शिकार होना पडे। जिसमें जन्म से चिपका हुआ जाति का नकारात्मक बोझ हट जाए और मनुष्य को विकास का समान अवसर उपलब्ध हो जाए।

ईसाईपंथी और इस्लामपंथी दोनों ही इस अभियान में सक्रिय हुए। जातिभेद के कारण, जो कुछ सीमा तक यथार्थ में विद्यमान था और कुछ सीमा तक अंग्रेजों ने उसे योजनापूर्ण ढंग से आगे बढाया था, कुछ लोग इस्लाम, इस्लामी समाज और ईसाई समाज की ओर आकर्षित हुए और उन्होंने अपना मजहब परिवर्तित कर लिया। मजहब परिवर्तन का यह अभियान तेजी से अंग्रेजी शासन काल में चलने लगा। उनका सारा जोर अनुसूचित जात के लोगों या फिर अनुसूचित जनजाति के लोगों पर ही रहा। लेकिन चर्च के दुर्भाग्य से 1947 में अंग्रेजों को अपना बोरिया बिस्तरा गोल करके यहां से कूच करना पडा। उनके सामने बडा प्रश्न था कि सत्ता का हस्तांतरण किसको किया जाए? जाहिर था कि अंग्रेज उनको ही सत्ता सौपेंगे जो उनके जाने के बाद भी सांस्कृतिक, शैखिक और मजहबी क्षेत्रों में उनकी नीतियों को जारी रखेंगे। शायद इसीलिए लार्ड माउन्टबेटन ने पंडित जवाहर लाल नेहरू को सत्ता सौंपने की लाजवाब योजना बनाई।

सत्ता हस्तांतरण के बाद भारत के लिए नया संविधान बनाने की जरूरत बनी तो उसमें स्पष्ट ही दो विचारधाराओं का का स्पष्ट टकराव देखा जा सकता है। एक विचारधारा ऐसी थी जो पंथ निरपेक्षता के नाम पर भारत में चर्च को ईसाईकरण की खुली छुट देने की पक्षधर थी। इसलिए संविधान में यह प्रयास किया गया कि ऐसे प्रावधान रखें जाए जिनके अंतर्गत चर्च को पंथ परिवर्तन की खुली छुट मिली रहे। इस मरहले पर डा0 बाबासाहब अंबेडकर का ध्यान आता है। हिन्दू समाज के प्रताडित वर्ग के लिए कुछ सुविधाओं का प्रावधान किया जाए। यह सभी की इच्छा थी इसलिए जिन जातियों को अंग्रेजों ने अनुसूचित जातियों के वर्ग में रखा था उनके लिए सरकारी नौकरियों में और शिक्षा संस्थानों में आरक्षण का प्रावधान किया जाए ऐसी व्यवस्था संविधान में की गई। डा0 अंबेडकर स्वयं भी इस जाति व्यवस्था से दुखी थ। वे स्वयं महार जाति के थे इसलिए जाति भेद और उसका दर्द क्या होता इसे उनसे अच्छी तरह कौन जा सकता था? इन्हीं परिस्थितियों में उन्होंने हिन्दू व्यवस्था से निकलने का विचार किया। उनके इस विचार की भनक लगते ही इस्लाम और ईसाइयत के पैरोकार उनके पास दौडे। वे उन्हें मुसलमान या ईसाई बनने का निवेदन कर रहे थे और उनका सबसे बडा तर्क यही था कि आप जाति व्यवस्था से दुखी है। इस्लाम समाज या ईसाई समाज जातिविहीन समाज है। ऐसा प्रलोभन दक्षिणी अफ्रीका में चर्च ने एक बार महात्मा गांधी को भी दिया था। गांधी जी ने चर्च को लताडा ही नहीं था बल्कि यहां तक कहा कि ईसा मसीह यदि कहीं है तो वह चर्च के अतिरिक्त कहीं भी हो सकता है। अंबेडकर पंथ परिवर्तन के पीछे के छिपे हुए दुष्परिणामों से अच्छी तरह वाकिफ थे वे जानते थे कि पंथ परिवर्तन अंतत: राष्टनंतरण की ओर ले जाता है। इसलिए उन्होंने इस्लाम के पेरोकारों और चर्च को स्पष्ट इंकार कर दिया। वे बुध्दा की शरण में चले गए। उनका मानना था कि बुध्दा वचनों का उद्गम भारत भूमि ही है इसलिए बुध्दा की शरण में जाने से भारतीय एकता और भी सशक्त होती है। उस समय चर्च ने अंबेडकर को अपना सबसे बडा विरोधी विरोधी घोषित किया था। लेकिन नेहरू के साथ ज्यादा देर न अंबेडकर टिक पाए, न डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी। गोबिंद वल्लभ पंथ और पुरूषोत्ताम दास टंडन की क्या गत बनी इसे सभी जानते है। चर्च नेहरू के समयम से ही ईसाईकरण की प्रक्रिया में लगा हुआ है। आश्चर्य की बात तो यह है कि चर्च के पक्ष में इतना पंथ परिवर्तन अंग्रेजों के समय में नहीं हुआ जितना पंडित नेहरू द्वारा सत्ताा संभालने से लेकर अब तक के काल में हो गया है।

लेकिन अभी भी चर्च के मार्ग में सबसे बडी बाधा बाबा साहब अंबेडकर द्वारा बनाए गए संविधान वे प्रावधान है, जो अनुसूचित जातियों की बिरादरी को छोडकर इस्लामी अथवा ईसाई बिरादरी में गए लोगों को आरक्षण का निषेध करते हैं। विदेशों से अरबों रूपया आने के बावजूद अभी तक पूरा भारत या फिर कम से कम अनुसूचित जाति के सभी लोग ईसाई क्यों नहीं बने, यह चर्च के लिए आश्चर्य का विषय है। इसलिए चर्च ने अब एक नई रणनीति इजाद की है। यदि अनुसूचित जाति के लोगों को इस्लामी समाज या ईसाई समाज में शामिल हो जाने के बाद भी सरकारी नौकरियों और शिक्षा संस्थानों में दलित लोगों के लिए आरक्षित स्थानों में हिस्सेदारी दे दी जाए तो चर्च को विश्वास है ईसाईकरण की प्रक्रिया तेज हो सकती है। लेकिन चर्च यह लडाई अकेले नहीं लड सकता। इसलिए उसने मस्जिद को भी साथ लिया है। आश्चर्य है कि शेष दुनिया में इस्लाम और ईसाइयत आमने-सामने है लेकिन भारत को ‘कनवर्ट’ करने के मामले में दोनों साथ हो जाते हैं। 2004 में सोनिया गांधी के नियंत्रण वाली सरकार बन जाने के बाद चर्च को लगा कि इससे बढिया मौका भारत में पंख फैलाने के लिए और नहीं मिल सकता। यदि अनुसूचित जातियों में से ईसाई और मुसलमान बने लोगों को पंथ परिवर्तन के बाद भी आरक्षण की सुविधा बरकरार रहें तो स्वभाविक ही विदेशी धन बल के आधार पर पंथ परिवर्तन कर प्रक्रिया को तेज किया जा सकता है। इस मोड पर भारत सरकार चर्च की सहायता के लिए आगे आई। मार्च 2005 में भारत सरकार ने ‘मजहबी और भाषाई अल्पसंख्यकों में सामाजिक और आर्थिक ह्ष्टि से पिछडे वर्ग हेतु राष्ट्रीय आयोग’ की स्थापना की। इस आयोग का अध्यक्ष उडीसा के रंगनाथ मिश्र को बनाया गया। ये वही रंगनाथ मिश्र है जो कभी उच्चतम न्यायालय के मुख्यन्यायधीश रहे और वहां से रिटायर हो जाने के बाद केन्द्र की कांग्रेस सरकार ने उन्हें राज्यसभा का सदस्य बनाया। आयोग के एक अन्य सदस्य डा0 ताहिर महमूद, जो कभी दिल्ली विश्वविद्यालय में छात्रों को कानून की पढाई करवाते थे। एक तीसरे सदस्य दिल्ली में चर्च द्वारा चलाए जा रहे एक कॉलेज के प्रिंसीपल थे और इसे दुर्योग ही कहना की आयोग की रपट लिखने के तुरंत बाद उन्हें हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय का कुलपति बना दिया गया। पर्दा भी बना रहे और काम भी होता रहे इसलिए सरकार ने इस आयोग से सीधे-सीधे पंथ परिवर्तित लोगों को आरक्षण देने का सुझाव तो नहीं मांगा बल्कि यह कहा कि मजहबी और भाषाई अल्पसंख्यक लोगों में से सामाजिक और आर्थिक ह्ष्टि से पिछडे वर्गों की पहचान कैसे की जाए? पहचान के बाद उनके कल्याण के लिए कौन से कदम उठाए जाए और यदि ये कदम उठाने के लिए संविधान में संशोधन भी करना पडे तो कहां-कहां संशोधन किया जाना चाहिए।

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5 Comments on "अनुसूचित जाति समाज को छोड कर चले गए लोगों को आरक्षण देने का प्रश्न"

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ajay kumar
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आपने जाती के परिवर्तन स्वरूप को सही साबित किया हे .

डॉ. मधुसूदन
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निम्न वेब साईट देखने पर आप जानेंगे की जिस इसाइयत का गुण गान किया जाता है, उसमें दलित ईसाईयों का क्या हाल है?

http://en.wikipedia.org/wiki/Caste_system_among_Indian_Christians

-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
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आपका यह लेख शुरूआत में ठीकठाक तरीके से आगे बढता है, लेकिन “धर्म-परिवर्तन” जिसे आप संघ की नीति को आगे बढाते हुए बार-बार “पंथ परिवर्तन” लिख रहे हैं, का असली कारण हिन्दु धर्म पर काबिज मनुवादियों के अत्याचारों, विभेदों और शोषणों को झुठलाने के लिये आप जबरन चर्च और इस्लाम पर सारा दोष मढ रहे हैं| हॉं इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि चर्च और इस्लाम के अनुयाई भारत में धर्म परिवर्तन कराने के लिये भारत की निचली जातियों को “सबसे आसान टार्गेट” मानते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि- -उच्च जातियों के शोषण, अत्याचार और क्रूर… Read more »
atul
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डॉ कुलदीप जी, मुझे आप का लेख बहुत अच्छा लगा | बहुत से लोग आरक्षण के नाम से चिड़ते है और इसे हटाने की मांग करते है | पर जात-पात हटाने की बात ज्यादा नही करते | जब कभी छुवा-छुत की खबर आती है तो ये लोग उन लोगो को शायद ही समझाने जाते होंगे | ये लोग बताये की जो लोग दलितों को मंदिर में पूजा नही करने देते तो क्या मंदिर में इन्ही का आरक्षण है | धन रखने , पानी पिने, मंदिर में पूजा करने , शासन करने आदि ये सब (जो अपने आप को उच्चय वर्ग… Read more »
sunil patel
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लेखो से वास्तविक जानकारी मिल रही है. सच्चा इतिहास भी पढने को मिल रहा है. और रहस्य उदघाटन करते रहिये.

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