लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

शिक्षा : एम.ए. राजनीति शास्त्र, मेरठ विश्वविद्यालय जीवन यात्रा : जन्म 1956, संघ प्रवेश 1965, आपातकाल में चार माह मेरठ कारावास में, 1980 से संघ का प्रचारक। 2000-09 तक सहायक सम्पादक, राष्ट्रधर्म (मासिक)। सम्प्रति : विश्व हिन्दू परिषद में प्रकाशन विभाग से सम्बद्ध एवं स्वतन्त्र लेखन पता : संकटमोचन आश्रम, रामकृष्णपुरम्, सेक्टर - 6, नई दिल्ली - 110022

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विजय कुमार

लगता है कि अखबार वालों के पास छापने के लिए विषयों की कमी हो गयी है, इसलिए वे न जाने कहां-कहां से लाकर ऊल जलूल बातें त्यौहार के मौसम में पाठकों को परोस देते हैं।

शर्मा जी कल बहुत दिन बाद मिले, तो मैंने उत्साहपूर्वक हाथ आगे बढ़ाते हुए उन्हें दीपावली की बधाई देनी चाही; पर उन्होंने हाथ मिलाने की बजाय मुझे अखबार की एक कतरन थमा दी।

– शर्मा जी, मेरे पास इस समय चश्मा नहीं है। इसलिए आप ही बताइये इसमें क्या लिखा है ?

– क्या बताऊं वर्मा, बात ऐसी है कि बताते हुए संकोच होता है।

– फिर भी कुछ बात तो होगी ही।

– इसमें छपा है कि साफ सफाई के मामले में ब्रिटिश लोगों की आदतें ठीक नहीं है।

– अच्छा.. ?

– जी हां, क्वीन मैरी विश्वविद्यालय तथा लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मैडिसन द्वारा किये गये एक शोध में यह बात सामने आयी है कि 26 प्रतिशत अंग्रेजों के हाथ में वही बैक्टीरिया पाये गये हैं, जो मानव मल में पाये जाते हैं।

– छी..छी..।

– इतना ही नहीं, इन्हीं हाथों से जब वे क्रैडिट कार्ड या कार्यालय में फोन, फाइलें आदि छूते हैं, तो यह बैक्टीरिया वहां भी पहुंच जाता है। इस तरह एक से दूसरे तक इनका भ्रमण होता रहता है।

– यह तो बहुत चिन्ता की बात है शर्मा जी ?

– हां, शोध के दौरान जब शौच के बाद सफाई के बारे में पूछा गया, तो 99 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वे हाथ ठीक से धोते हैं।

– हम भारत वाले तो कई बार साबुन या राख से हाथ धोते हैं। बिना इसके तो हम किसी चीज को छूते तक नहीं।

– पर ब्रिटेन में ऐसा नहीं है। वहां तो काम पूरा होने के बाद पानी की बजाय एक विशेष प्रकार का कागज प्रयोग करते हैं और फिर उसे वहीं कूड़ेदान में फेंक देते हैं। इसीलिए लोग हाथ धोने की जरूरत ही नहीं समझते।

– तो फिर सर्वेक्षण कैसे हुआ ?

– इसके लिए शोधकर्ताओं ने शौचालयों के वॉशबेसिन के पास छिपे हुए कैमरे लगा दिये।

– इस तरह छिप-छिपकर देखना तो बहुत ही खराब बात है, और वह भी शौचालय में…। हे राम।

– हां, पर सर्वेक्षण के लिए यह जरूरी था।

– तो शर्मा जी, इस सर्वेक्षण से क्या पता लगा ?

– पता यह लगा कि 32 प्रतिशत पुरुष और 64 प्रतिशत महिलाओं ने ठीक से हाथ धोये। बाकी ऐसे ही पतली गली से निकल लिये।

– यानि लगभग आधे लोगों ने झूठ बोला ?

– और क्या ?

– लगता है ये बात केन्द्रीय मंत्री जयराम रमेश को नहीं पता ?

– क्यों ?

– आजकल उन्होंने ‘निर्मल भारत अभियान’ के अन्तर्गत हर घर में फ्लश वाला शौचालय बनवाने का बीड़ा उठाया है। यदि उन्हें पता होता, तो वे ब्रिटेन में भी हाथ धुलवाने का अभियान प्रारम्भ कर देते।

– तुम चाहे जो कहो; पर हाथ तो ठीक से धोने ही चाहिए।

– जी हां, इस मामले में हम भारत वाले प्राचीन काल से ही बहुत समझदार और जागरूक हैं।

– वह कैसे वर्मा ..?

– हमारे यहां हाथ मिलाने की बजाय हाथ जोड़कर अभिवादन करने की परम्परा है। इससे यदि किसी के हाथ गंदे भी हों, तो संक्रमण दूसरे के हाथों में नहीं पहुंचता।

– तो क्या भारत में हाथ मिलाने की परम्परा नहीं रही ?

– ऐसा तो नहीं है। हनुमान जी ने श्रीराम और सुग्रीव की मित्रता अग्नि की साक्षी में हाथ मिलवाकर कराई थी। उसी से दुष्ट बाली का वध हुआ और सीता जी की खोज का अभियान आगे बढ़ सका। इसी प्रकार विवाह के समय यज्ञकुंड में प्रज्वलित अग्नि की परिक्रमा करते हुए पुरोहित वर और वधू का हाथ मिलवाते हैं, और फिर नवयुगल इस गठबंधन को जीवन भर निभाते भी हैं।

– यानि हमारे यहां हाथ मिलाने का अर्थ है जीवन भर के लिए अभिन्न और अटूट मित्रता।

– जी हां शर्मा जी, आप बिल्कुल ठीक समझे; पर इन धूर्त अंग्रेजों के हाथ बहुत शीघ्र ही कोहनी, कन्धे और फिर गर्दन तक पहुंच जाते हैं। भारत में भी ये हाथ हिलाते और मिलाते हुए व्यापार के नाम पर आये और फिर देश पर अधिकार ही कर बैठे। फिर भारतवासियों को कितने संघर्ष और बलिदान के बाद 1947 में आजादी मिली, यह कौन नहीं जानता ?

– इसका अर्थ हुआ कि अब अंग्रेजों से हाथ मिलाते हुए बहुत सावधान रहना होगा।

– जी हां; पर मेरे हाथ बिल्कुल साफ हैं और हम दोनों की मित्रता भी अटूट है, इसलिए आप मुझसे हाथ मिलाने में संकोच न करें।

शर्मा जी ने अपना हाथ आगे बढ़ाया और फिर गले से लिपट गये।

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