लेखक परिचय

प्रकाश चण्डालिया

प्रकाश चण्डालिया

लेखक कोलकाता से प्रकाशित दैनिक राष्ट्रीय महानगर के प्रधान संपादक हैं

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-प्रकाश चण्डालिया

कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव शकील अंसारी ने जिस जलेबिया अंदाज में गुरुवार शाम संवाददाताओं के समक्ष अपनी बात रखी, उससे साफ है कि ममता बनर्जी पूरे प्रदेश से कांग्रेस को भले बुहार दें, आलाकमान उनकी गुलामी नहीं छोडऩे वाला। उम्मीद तो थी कि शकील अंसारी तृणमूल सुप्रीमो की मनमानियों पर प्रहार करते हुए अपने सहोदर दल को हुड़की भी देंगे, पर हुआ ठीक विपरीत। अंसारी लगे आलाकमान का शास्त्रीय संगीत सुनाने। सच कहें तो प्रहार और प्रतिघात के आदी स्थानीय कांग्रेसकर्मियों को यह संगीत रास नहीं आया। अब कांग्रेसी विचारधारा छोड़कर न जा पाने की मजबूरी अलग बात है, वरना जिला स्तर के कांग्रेसियों की बात मानें तो उन्हें अंसारी की घिघियाहट से कुछ नहीं लेना। मुमकिन है, आलाकमान के बचाऊ तेवर और अंसारी के सेल्समैनी बयान पर हाल-फिल्हाल स्थानीय कांग्रेस कार्यकर्ता चुप हो जाएं, पर प्रचार के दौरान तृणमूल प्रत्याशी के पक्ष में बात रखने का वक्त आने पर वे अपने मन की करने से नहीं चूकेंगे। 30 मई को मतदान के दिन कांग्रेसी भाई अलग राग सुनाने लगें तो हैरत वाली बात नहीं होनी चाहिए।

सभी जानते हैं, बंगाल में सबकी निगाहें अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों पर टिकी हुयी हैं। ममता बनर्जी जिस तल्खी के साथ लोकसभा चुनाव के बाद से वाममोर्चा पर हावी होती जा रही हैं, उसे देखकर पहली बार वामपंथी खेमा भी खासा परेशान दिखाई पड़ रहा है। ऐसे में ममता और कांग्रेस के साथ जिएंगे-साथ मरेंगे वाली तर्ज पर साल भर से चल रहा गठबंधन बरकरार रहा, तभी वास्तविक सत्ता परिवर्तन संभव है, वरना घायल वामपंथियों के पास आज भी सांगठनिक ताकत कम नहीं है। सोनिया गांधी इस बात को अपने कार्यकर्ताओं से बेहतर समझती हैं, लेकिन कार्यकर्ताओं की अपनी मजबूरी है। ममता बनर्जी परिवर्तन की इस बयार में वामपंथियों से लोहा लेते-लेते दो-एक वार ऐसे भी कर बैठती हैं, जिससे कांग्रेस को खोखला होने का खौफ सताने लगता है। लालगढ़ में नक्सलियों के मसले पर वे अपनी ही केंद्र सरकार के गृहमंत्री से पंगा ले बैठती हैं, तो कांग्रेस नेता सुब्रत मुखर्जी को जब चाहे अपनी पार्टी के प्लेटफार्म पर बुलाकर कांग्रेसियों को चिढ़ाती रहती हैं। ममता और तृणमूल की ऐसी और भी हरकतें हैं, जिससे कांग्रेसियों को खाज होना लाजिमी है। पर आलाकमान जानता है, बंगाल के कटोरे से दिल्ली का कटोरा कहीं ज्यादा बड़ा है। वैसे, दिग्गज कांग्रेसियों का मानना है कि सोनिया गांधी ने ममता बनर्जी को अगले साल बंगाल का मुख्यमंत्री बनवाने तक सबकुछ सहने का मन बना रखा है। केंद्र में मिले प्रकाश करात के धोखे का प्रतिघात बंगाल से वामपंथियों को हटाकर ही लिया जा सकता है।

ममता के लिए सोनिया से मिली छूट संजीवन बूंटी की तरह है। शायद इसीलिए वे समझती हैं, कांग्रेस पर दबाव बनाए रखने में ही उनकी बाजीगरी है। सोनिया के चलते ममता स्वयं तो आश्वस्त हैं, पर रह-रहकर खुद ऐसा नर्तन करती हैं कि कांग्रेस को पीड़ा होने लगती है। गठबंधन का अपना धर्म होता है, पर जिस गठबंधन में ममता, मायावती और जयललिताएं हों, वहां कैसा धर्म और कैसी मर्यादा? कांग्रेस कार्यकर्ताओं को ममता के इसी खेल से चोट लग रही है।

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1 Comment on "ममता मगरूर है, सोनिया मजबूर है"

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RAJ SINH
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कहीं कोई धर्म बचा है राजनीती में ? और गठबंधन की मर्यादा ? इन में से किसी के पास कोई मर्यादा है ? सत्ता ही और अहम् -मौकापरस्ती ही आज का सच है.

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