लेखक परिचय

प्रभुदयाल श्रीवास्तव

प्रभुदयाल श्रीवास्तव

लेखन विगत दो दशकों से अधिक समय से कहानी,कवितायें व्यंग्य ,लघु कथाएं लेख, बुंदेली लोकगीत,बुंदेली लघु कथाए,बुंदेली गज़लों का लेखन प्रकाशन लोकमत समाचार नागपुर में तीन वर्षों तक व्यंग्य स्तंभ तीर तुक्का, रंग बेरंग में प्रकाशन,दैनिक भास्कर ,नवभारत,अमृत संदेश, जबलपुर एक्सप्रेस,पंजाब केसरी,एवं देश के लगभग सभी हिंदी समाचार पत्रों में व्यंग्योँ का प्रकाशन, कविताएं बालगीतों क्षणिकांओं का भी प्रकाशन हुआ|पत्रिकाओं हम सब साथ साथ दिल्ली,शुभ तारिका अंबाला,न्यामती फरीदाबाद ,कादंबिनी दिल्ली बाईसा उज्जैन मसी कागद इत्यादि में कई रचनाएं प्रकाशित|

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प्रभुदयाल श्रीवास्तव

“दादाजी मैं छक्का मारूंगा”अमित ने क्रिकेट बेट लहराते हुये मुझसे कहा|वह एक हाथ में बाल लिये था”,बोला प्लीज़ बाँलिंग करो न दादाजी|”

“अरे! अरे! इस कमरे में छक्का, नहीं नहीं यहां थोड़े ही छक्का मारा जाता है कमरे में कहीं क्रिकेट खेलते हैं क्या?|यहाँ टी. वी. रखा है, फ्रिज है, कूलर रखा है, छक्के से ये समान टूट जायेगा|”मैंने उसे समझाते हुये कहा|

“तो फिर पोर्च में खेलें?”वहां भी तो छक्का मार सकते हैं न?”

” वहां भी नहीं ”

” क्यों दादाजी वहां तो टीवी नहीं रखा|” उसने बड़ी उत्सुकता से मेरी ओर देखा|

” वहां पर कार रखी है, तुम्हारे पापा की बाईक रखी है और मेरी टी.वी.एस. रखी है गाड़ियां खराब हो जायेंगी और‌ उनके दर्पण टूट जायेंगे|”मैंने उसे समझाने की कोशिश की|

“ये दर्पण…… क्या है दादाजी?”उसने ऐसे पूछा जैसे मैंने किसी जंगली खूंखार जानवर का नाम ले दिया हो|

“अरे भाई मिरर हैं न, कार में भी लगे हैं और बाईक में भी|”मैंने कहा |

” तो ऐसा बोलो न ,आप तो क्या, दर्पण, वर्पण ,जाने किस भाषा में बात करते हैं| क्या आपको हिंदी नहीं आती?”

मैं उसकी बातों का रस ले रहा था| “बेटा मेरी हिंदी जरा ठीक नहीं है न”

” ठीक है तो मैं ग्राउंड‌ में जाकर खेलता हूं ,वहीं चौके और छक्के मारूंगा|” वह बाहर भागने लगा|

बेटे ग्राउंड तो बड़े बच्चे खेलते हैं ,तुम अभी बहुत छोटे हो|

 

मैंने उसे पकड़ा और घर के भीतर ले आया| वह उदास होकर वहीं बैठ गया|

उसके बाद मैं नहाने के लियॆ बाथ रूम में चला गया|थोड़ी ही देर में जैसे ही बाहर आया तो मैंने देखा कि अमित टीवी के सामने टूटा हुआ फ्लावर पाट लेकर सहमा सा बैठा है और एक हाथ से टूटे हुये टुकड़े बटोरने का प्रयास कर रहा है|

मुझे देखते ही बोला”दादाजी ये …देखो…. ”

” ये क्या?” मैं समझा शायद उसने कमरे ही धोनी बनने का प्रयास कर लिया है और टी वी का राम नाम सत्य कर दिया है|किंतु टी .वी. सलामत थी तो मैंने चैन की सांस ली| क्या हुआ ?क्या तोड़ा? मैंने थोड़ा जोर से पूछा तो वह सिसकने लगा| और हाथ में पकड़े टूटे फ्लावर पाट की ओर इशारा करने लगा|मेरी नज़र सामने टीवी के ऊपर की खाली जगह पड़ी तो समझ गया की भाई साहब ने फ्लावर पाट को श्मशान भेजने की तैयारी कर दी है| क्या आपने यहां छक्का मार दिया?मैने जरा जोर से पू‍छा तो वह सिसकने लगा| “पर दादाजी बाल‌ टी. वी‍. में नहीं लगी है,फ्लावर पाट ही टूटा है|”कहकर उस पाट को टेप लगाकर जोड़ने का प्रयास करने लगा| उसके हाथ में कैंची और टेप का रोल था|मैंने उसे धीरे से डाँटा” मैंने कहा था न कि यहां क्रिकेट मत खेलो पर आप नहीं माने|पाट टूट गया न|”

” दादादी मम्मी कॊ मत बताना और दादीजी को भी नहीं बोलना|” वह धीरे से बोला|

क्यों नहीं बोलना जब आपने मेरा कहना नहीं माना तो मैं क्यों… “प्लीज़ दादाजी मुझे डींट पड़ेगी न मेरी बात पूर्ण हॊने से पहले ही वह बोल पड़ा||

“ठीक है नहीं बोलूंगा पर प्रामिस करो की आगे से कमरों के भीतर क्रिकेट नहीं खेलोगे”मैंने समझाइश भरे स्वर में कहा|

” प्रामिस दादाजी, मदर प्रामिस अब क्भी कमरे में छक्का नहीं मारूंगा|”बड़े आत्म विश्वास सॆ वह बोला|

शाम को जब लोगों ने फ्लावर पाट टूटा देखा तो प्र्श्नों की झड़ी लग गई किसने तोड़ा कैसे टूटा?मैने सबको फ्लावर पाट टूटने की सच कहानी सबको बतला दी और यह भी हिदायत दॆ दी कि अमित को कोई न डाँटे और न ही उसे यह बतायें कि सबको मालूम पड़ गया है कि बाल लगने से पाट टूटा|

दादी ने हँसकर पूछा अमित पाट कैसे टूटा तो वह हँसकर बोला दादी टी .वी .| थोड़ा सा हिल गया था इससे उस पर रखा पाट गिर गया और टूट गया| उसने सबको यही जबाब दिया मतलब सबसे वह झूठ बोले जा रहा था| जब उसको किसी ने नहीं डांटा तो उसका डर जाता रहा और वह सामान्य होकर खेलने लगा|

दूसरे दिन जब वापिस आकर मैंने उसे बताया कि छक्का लगने से पाट टूटा है वाली बात मैंने सबको बता दी है तो वह आश्चर्य से देखने लगा”मुझे तो किसी ने नहीं डांटा|पर आपने सबको क्यों बताया?”

” इसलिये बताया कि हमें झूठ नहीं बोलना चाहिये| कहते हैं कि झूठ बोलना पाप होता है|”

“पर आपने तो प्रामिस किया था कि किसी को नहीं बतायेंगे|” वह हँसकर‌ बोला|

“”उस समय आप डरे हुये थे, इससे प्रामिस कर लिया ठा| हमेशा सच बोलना चाहिये यदि गलती हो जाये तो उसे स्वीकार कर लेना चाहिये और आगे से गलती न हो ऐसा प्रण करना चाहिये|”

” ठीक दादाजी आगे से कभी झूठ नहीं बोलूंगा बड़ों का कहना मानूंगा और कमरे में छक्का भी नहीं मारूंगा बस|”इतना कहकर वह छक्का मारने बाहर‌ मैदान में चला गया|

 

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