लेखक परिचय

बी एन गोयल

बी एन गोयल

लगभग 40 वर्ष भारत सरकार के विभिन्न पदों पर रक्षा मंत्रालय, सूचना प्रसारण मंत्रालय तथा विदेश मंत्रालय में कार्य कर चुके हैं। सन् 2001 में आकाशवाणी महानिदेशालय के कार्यक्रम निदेशक पद से सेवा निवृत्त हुए। भारत में और विदेश में विस्तृत यात्राएं की हैं। भारतीय दूतावास में शिक्षा और सांस्कृतिक सचिव के पद पर कार्य कर चुके हैं। शैक्षणिक तौर पर विभिन्न विश्व विद्यालयों से पांच विभिन्न विषयों में स्नातकोत्तर किए। प्राइवेट प्रकाशनों के अतिरिक्त भारत सरकार के प्रकाशन संस्थान, नेशनल बुक ट्रस्ट के लिए पुस्तकें लिखीं। पढ़ने की बहुत अधिक रूचि है और हर विषय पर पढ़ते हैं। अपने निजी पुस्तकालय में विभिन्न विषयों की पुस्तकें मिलेंगी। कला और संस्कृति पर स्वतंत्र लेख लिखने के साथ राजनीतिक, सामाजिक और ऐतिहासिक विषयों पर नियमित रूप से भारत और कनाडा के समाचार पत्रों में विश्लेषणात्मक टिप्पणियां लिखते रहे हैं।

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kanak dasबी  एन  गोयल

 

आरिगारील्ल आपत्काल दौलगे  – 

वारिजाशन नाम नेने कंडया मन वे।  … … 

 

विपत्ति के समय कोई किसी का नहीं होता,

हे मूर्ख मना,

तू भगवान के नाम का स्मरण कर  –

जब तू भूख से तड़प रहा हो,

जब बैरी तुझे चारों ओर से घेर लें

जब बीमार होने पर शरीर जर्जर हो जाये,

जब तू अधरी हो उठे, और

जब तुझ पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़े,

तब तू भगवान के नाम का स्मरण कर। । …. …

 

कनक दास के मुख से यह भजन निकला था जब मल्ल नायक के साथियों ने कनक दास पर अचानक प्राण घातक वार कर दिया था  और वह बच गया। उस समय कनक दास के मुख से यह भजन निकला।  वार बहुत जबरदस्त था और कनक दास का शरीर लहू लुहान हो गया था, वह अचेतन था लेकिन जैसे ही उसे चेतना आई – उस ने इस भजन से प्रभु स्मरण किया।

 

कनक दास तेरहवीं शताब्दी के महान भक्त संत थे।  वे वैष्णव मत के प्रचारक थे और उन की गणना आचार्य माधव के अनुयायियों में होती है।  इन मैं मुख्य नाम नरहरि तीर्थ, श्रीपाद तीर्थ , व्यास तीर्थ, वादि राज, पुरन्दर दास, राघवेन्द्र तीर्थ, विजय दास, गोपाल दास आदि हैं।  ये सभी परम ज्ञानी सन्त थे।

 

कनक दास का जन्म कर्णाटक में धारवाड़ ज़िले के बंका पुर गांव में  बीर गौडा और बचम्मा के गड़रिया परिवार में हुआ था।  यह दम्पति सभी तरह से सुख सुविधा संपन्न था लेकिन काफी समय तक निःसंतान था। संतान प्राप्ति के लिए इन्होंने अनेक देवी देवताओं की पूजा अर्चना की, व्रत – उपवास किये, मन्नत मनौतियां मांगी, दान दक्षिणा में भी कोई कमी नहीं रखी लेकिन संतान सुख नहीं मिल सका।  एक दिन जब वे अपना नित्य क्रम के बाद सो गए तो अचानक इन्हें स्वप्न में आभास हुआ जैसे कि तिरुपति के भगवान वेंकट रमण स्वामी  अपने हाथ के संकेत से इन्हें  अपने पास बुला रहे हैं । इन्हें लगा इन्हें भगवत दर्शन के लिए तिरुपति जाना चाहिए । अतः सुबह सोकर उठने के बाद दम्पति ने अपनी यात्रा की तैयारी शुरू कर दी।

 

एक महीने की पैदल यात्रा के बाद ये दोनों तिरुपति पहुंचे । रास्ते में कई नदियां, नाले, ताल तलैया पार किये।  टीलों, पहाड़ों, पर्वत मालाओं से गुज़रे और अंततः तिरुपति पहुँच गए।  वहां पहुँच कर इन दोनों ने पूरे 48 दिन तक व्रत, पूजा, ध्यान आदि किये और जब ऐसा लगा कि  उन्हें भगवान का प्रसाद मिल गया है तो ये वापिस अपने घर के लिए चल दिए।  परिणाम स्वरूप 1508 संवत्सर  के कार्तिक महीने में कृष्ण पक्ष की तृतीया को गुरुवार के दिन इन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। श्री तिरुपति तिमप्पा की कृपा से बालक हुआ था अतः उस का नाम भी तिमप्पा रखा गया।

 

तिमप्पा ने अपनी दीक्षा प्रतिभा के बल पर पांच छह वर्षों में ही दस पन्द्रह वर्षों का ज्ञान अर्जित कर लिया।  आठ वर्ष की आयु में ही तिमप्पा संस्कृत और कन्नड़ भाषा की व्याकरण में पारंगत हो गए।  इन की अद्भुत ग्रहण क्षमता,  तर्क वितर्क कुशलता , और धर्म विवेचना की प्रतिभा से गुरु श्री निवासाचार्य जी अभिभूत थे।  इस के बाद भी तिमप्पा अपने व्यवहार में अत्यंत विनम्र और विनीत थे।

 

वेद शास्त्र पुराण पुण्पद हदियनु नानरिये तर्क़द। ……. 

 

मैं वेदों शास्त्रों, पुराणों आदि द्वारा बताये गए पुण्य मार्ग को नहीं समझ पाता हूँ। मैं विभिन्न तर्कों और वाद विवादों को भी नहीं समझ पाता हूँ।  मैं मंद बुद्धि हूँ।  तुम आदि मूर्ति  हो, तुम मेरे ह्रदय रूपी आँगन में ज्ञान का प्रकाश करो और हमेशा मेरी रक्षा करो।

 

हासिवरितु ताय तन्न शिशुविगे। …… 

 

“जिस प्रकार कोई माँ अपने बच्चे को भूखा जान कर अपने स्तनों से दूध पिलाती है उसी प्रकार तेरे सिवाय कौन है जो हमारा पालन पोषण करेगा। वेद कहते हैं की तुझ में सारा ब्रह्मांड समाया हुआ है।  हे प्रभु हमारी रक्षा करो।”

 

कनक दास ने इस प्रकार के 160 पद लिखे जो उन की पुस्तक हरी भक्ति सागर में संकलित हैं।  इन के गुरु इन्हें तिमप्पा की बजाय तिम्मरस कहते थे। इस का अर्थ है तिम्मराजा।  इन के ह्रदय में गुरु जनों और देवताओं के प्रति असीम श्रद्धा थी।  वे प्रतिदिन केशव के मंदिर में जाकर उन की मूर्ति को टकटकी लगा कर देखते रहते थे।  उन के मन में विचार उठते, ” मैं कहाँ से आया हूँ ? आगे मुझे कहाँ जाना है ? यहाँ कब तक   रहना है ? इन्हें सभी व्यक्तियों में भगवद् दर्शन होते थे।

 

एक दिन की बात है। तिम्मरस भगवन ध्यान में लीन थे।  उन्हें लगा की पवन पुत्र हनुमान जी की मूर्ति उन के सामने विराज मान है।  उन के मन में हनुमान जी और उन से जुडी भगवान राम सम्बन्धी सभी घटनाएं एक चित्र श्रृंखला की तरह दिखाई देने लगी।  देखते देखते उन्हें ऐसा लगने लगा जैसे सभी घटनाएं उन के सामने घटित हो रही हों। थोड़ी देर बाद सामान्य स्थिति आने पर उन्हें लगा  शायद हनुमान जी कुछ कह रहे हैं। उन्होंने हनुमान जी की एक कांस्य प्रतिमा बनवा कर आदि केशव के मंदिर में प्रतिष्ठित करा दी। अब वे प्रतिदिन केशव की पूजा अर्चना के बाद हनुमान जी को पूजा अर्चना भी करने लगे।  उन की एक ही इच्छा थी की उन में भी हनुमान जी जैसा दास्य भाव, ब्रह्मचर्य पालन और भगवत भक्ति का भाव आ जाये।

 

बारह वर्ष की अवस्था तक तिमप्पा ने विद्या, भक्ति, ज्ञान, वैराग्य, और योग का अध्ययन कर लिया था।  इन के माता पिता को भी यह विश्वास हो गया था की यह बालक अवश्य ही  कोई देव पुरुष है. तिमप्पा को इस  से दुःख हुआ लेकिन अपनी माता के दुःख को देख कर वे स्वयं संयत हो गए।  एक दिन इन्होंने देखा की इन की माता असह्य दुःख और वेदना से तड़प कर रो रही है। वह अपने और  अपने बालक के भविष्य के प्रति अत्यधिक चिंतित थी।  तब तिम्मरस ने उन्हें समझाया, ” माँ, इस संसार में सुख या दुःख कुछ भी स्थाई नहीं है।  ये सब आते और जाते रहते हैं।  इस लिए यह उचित नहीं की हम सुख आने पर पुलकित हो जाएं और दुःख आने पर विचलित  हो जाएं। याद करो की हम में से पहले कितने लोगों ने क्या क्या कष्ट सहे हैं।  इस संसार में कोई किसी का नहीं होता।  अंत में भगवान ही हमारा उद्धार करने वाला है।  हमें उस की दया पा कर ही सुखी होना है। ” माता को लगा की यह उस का बीटा नहीं कोई सिद्ध पुरुष बोल रहा है।

 

धीरे धीरे तिम्मरस की भक्ति भावना की प्रसिद्धि आस पास के गांव में फैलने लगी।  सभी लोग इन के प्रवचन सुनने के लिए लालायित रहते।  सब को ऐसा लगता की तिम्मरस मानव के रूप में कोई अवतार है।  वे एक महान भक्त, विद्वान, गायक, और संत कवि के रूप में विख्यात हो गए।  इस के साथ वे अपना खेती बाड़ी और भेड़ बकरी चराने का काम भी करते रहे।

 

एक दिन की बात है की तिम्मरस कुदाली से जमीन खोद रहे थे।  खोदते खोदते इन्हें जमीन में कुछ घड़े मिले  सोने के सिक्के भरे हुए थे।  इन्होंने कुछ धन तो गरीबों में बाँट दिया और शेष धन मंदिरों के पुनर्निर्माण, धार्मिक आयोजन, और भोज आदि पर खर्च कर दिया।  लेकिन सोने के सिक्कों से भरे घड़े मिलने का सिलसिला बढ़ता गया। ये जहाँ भी कुदाली मारते वहीँ पर सिक्कों का घड़ा निकल आता।  इन के खर्च करने की प्रक्रिया भी बढ़ने लगी।  गांव में इस बात की चर्चा होने लगी की तिम्मरस को जमीन से  सोने के सिक्कों  के घड़े मिलते ही जा रहें है और वह उसी तरह खुले हाथों से उन सिक्कों को खर्च/ भी करते जा रहे हैं।   जनता में उन के प्रति विशेष आदर और प्रशंसा के भाव उठने लगे।  लोगों ने इन्हें तिमप्पा की बजाय कनकप्पा कहना शुरू  दिया और धीरे धीरे ये कनक दास के नाम से प्रसिद्ध हो गए।  अब तिमप्पा और तिम्मरस दोनों ही नाम  गए।

 

कनक दास के त्याग, ईश्वर भक्ति, काव्य रचना, दैन्य बंधुत्व, और सम दृष्टि आदि गुणों की चर्चा दूर तक फैलने लगी। यह कीर्ति विजय नगर के प्रसिद्ध भक्त राजा राय कृष्ण देव तक पहुंची। राजा राय कृष्ण देव सदा ही ऐसे व्यक्तियों को सम्मानित करने का अवसर ढूंढते रहते थे।  एक दिन कनक दास को राय कृष्ण देव का राज पत्र मिला।  इस में लिखा था की राजा राय कृष्ण देव आगामी विजय दशमी के दिन  उन्हें राज दरबार में सम्मानित करना चाहते हैं।  विजय दशमी विजय नगर राज्य का एक महत्वपूर्ण पर्व होता था।  यह दस दिन तक चलता था और इस में देश भर के विद्वान, पंडित, संत, सम्राट, भक्त भाग लेते थे।  महाराजा ने यथासमय कनक दास को लाने के लिए अपना हाथी भेजा।  कनक दास अत्यधिक अभिभूत हुए और हाथी पर बैठ कर राजा से मिलने चल दिए।  रास्ते  देश के बहुत से कलाकार, नर्तक, नर्तकियां, खिलाडी, धनुर्धारी, स्त्री पुरुष, धर्म, कला, कथा, साहित्य के साधक राजधानी जाते हुए मिले। इन के लिए यह यात्रा ही एक अनूठा अनुभव था।

 

विजय नगर में  विजय दशमी का पर्व भाद्रपद कृष्ण पक्ष अमावस्या के दिन से प्रारम्भ होकर आश्विन शुक्ल पक्ष (विजय दशमी के दिन तक ) बड़े ही हर्षोल्लास से मनाया जाता था।  यह राज्य के शौर्य और वैभव का प्रतीक था। इस में राज्य के विकास, शौर्य,  धर्म , संस्कृति , तथा ऐश्वर्य सम्बन्धी झांकियां निकलती थी। हाथियों और घोड़ों को विशेष रूप से सुसज्जित कर पंक्तिबद्ध किया जाता था।  यह एक गौरव  की बात थी की ऐसे अवसर पर महाराजा ने कनक दास को निमंत्रित किया था।  ऐसे में कनक दास ने अपनी विशेष कृति ‘मोहन तरंगिणी’ की रचना की और उसे दरबार में प्रस्तुत किया।

 

कनक दास उडीपी के भगवान श्री कृष्ण के अनन्य भक्त थे।  सामाजिक भेद  भाव के कारण इन्हें मंदिर में जाने की अनुमति नहीं थी।  मंदिर के पुजारी इन्हें मंदिर के आस पास भी फटकने  देते थे। जब कि ये भगवान के दर्शनों के लिए मंदिर के आस पास ही भटकते रहते थे।  एक दिन इन्होंने  देखा की मंदिर की पिछली तरफ एक छोटी से खिड़की है जहाँ से प्रभु की मूर्ति के दर्शन सामने की अपेक्षा पीछे की ओर से हो सकते हैं।  कनक दास ने उधर ही अपना आसन जमा लिया और भगवत भजन शुरू कर दिया।  सुमधुर स्वर में भजन सुन कर काफी लोग मंदिर के पीछे ही इकट्ठे हो गए।  कहते हैं इन की भक्ति, श्रद्धा, संगीत और प्रस्तुति के कारण भगवन की मूर्ति  स्वयं ही इन की तरफ घूम गयी और कनक दास ने भगवद् दर्शन किये।  सभी लोग इस दृश्य से आश्चर्य चकित थे।  पुजारी ने यह देख कर स्वयं ही मंदिर के दरवाज़े खोल दिये । इस के बाद सभी भक्तों और यात्रिकों के लिए मंदिर के इस भाग के दर्शन करना अनिवार्य हो गया।

 

कनक दास ने केशव, नारायण, माधव, गोविन्द, विष्णु, मधुसूदन, त्रिविक्रम, वामन, श्रीधर, हर्षिकेश, पद्मनाभ, दामोदर,  संकर्षण, वासुदेव, आदि अभिधानों के आधार पर पच्चीस पदों की रचना की।

 

हरि   निम्न  पदकमल, करुणादिंदलि एनगे।  

 

हे हरि तुम्हारे चरण कमल के समान हैं।  इन की दया से  ही मुझे तेरी सेवा करने का अवसर मिला है।  समस्त गुरु मन्त्रों का तू ही मूल है।  तू ही सद्गुरु की साक्षात मूर्ति है।  तू ने मुझे अपने पास बुला लिया है।  हे भगवान तुम्हारी जय हो।

 

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