दक्षिण के दो राजा-त्रावणकोर और ए. राजा

साकेंद्र प्रताप वर्मा 

अभी कुछ दिनों पूर्व दक्षिण भारत के दो राजाओं से जुड़े प्रकरणों ने देश को झंकझोर कर रख दिया। एक थे त्रावणकोर के राजा जिन्होंने किसी जमाने में श्री पद्मनाथ स्वामी के मंदिर में अपने परिवार की बहुत सारी संपति दान कर दी, उसी का परिणाम था कि खुलासा होने पर आज श्री पद्मनाथ स्वामी का मंदिर दुनिया का सबसे धनाड्य मंदिर बन गया। मंदिर से प्राप्त सोना, चांदी, हीरे, जवाहरात, स्वर्णमूर्तियां तथा स्वर्ण मुद्राओं का एक मूल्य एक लाख करोड़ से 5 लाख करोड़ के मध्य आंका जा रहा है। चूंकि ये सारी वस्तुएं दान में प्राप्त की गई हैइसलिए वर्तमान में इनके ठीक-ठीक मूल्यांकलन कर पाना कठिन है। वैसे तो जिन्होंने भी मंदिर को यह संपत्ति दान दी उनकी कल्पना हिंदू धर्म के उत्थान की रही होगी। स्वाभाविक रूप से हिंदू धर्म और संस्कृति की कल्पना व्यापक संदर्भों में की जाती है। इसलिए इस अपार संपदा से उसी के अनुरूप विकास की अपेक्षा करना ठीक ही कहा जा सकता हैकिंतु केरल सहित सारे देश के कुछ तथाकथित बुध्दिजीवी अपने-अपने तरीके से इस पैसे को खर्च करने की वकालत कर रहे हैं। किसी को इस संपदा से कई किलोमीटर सड़क बनती दिखाई दे रही है, किसी को कितने ही स्कूल, कॉलेज या अस्पताल स्थापित होते दिखाई दे रहे हैं, किसी को लगता है कि यह पैसा एक साल के मनरेगा का खर्च उठा सकता है। किंतु हदें तो तब पार होती दिखाई दे रही है जब जे. एन. यू. की एक इतिहास प्राध्यापिका टी.वी. चैनलों पर यह बताने में भी नहीं संकोच करती कि चढ़ावे की यह संपदा राज्यों से लूटकर लाया गया धन है जो मंदिर में छिपा दिया गया होगा।

ऐसे ही लोग मंदिराें के राष्ट्रीयकरण की वकालत भी करने लगते हैं। केरल के उच्च न्यायालय ने भी मंदिर की देखरेख का अधिकार केरल सरकार को संपत्ति की सुरक्षा के नाते दे दिया। अन्यथा संपत्ति के दुरूपयोग की संभावना व्यक्त कर दी गई। किंतु ऐसा करने वाले लोगों ने शायद यह ध्यान नहीं दिया कि जिस राजपरिवार के द्वारा निर्मित ट्रस्ट ने कई शताब्दियों में इस संपदा का दुरूपयोग नहीं किया बल्कि रक्षक की भूमिका निभाते रहे, उसी ट्रस्ट के लोग क्यों इस संपत्ति का दुरूपयोग करने पर उतारू हो जाएंगे। वैसे तो धन संपदा का यह चौंकाने वाला दृश्य उस हर हिंदू मंदिर में मिलेगा जहां तक मुगल और फिरंगी आक्रमणकारियों की नापाक निगाहें नहीं पहुंच पायी।

अपने देश के दक्षिणी भाग में एक दूसरे राजा भी हैं जो आजकल तिहाड़ जेल की शोभा बढ़ा रहें हैं। ये वे राजा हैं जिन्होंने जनता की गाढ़ी कमाई का एक लाख छिहत्तर हजार करोड़ रूपये टूजी स्पेक्ट्रम आवंटन में हड़प लिया। लेकिन ए. राजा की इस लूट पर हमारे देश के बुध्दिजीवियों ने इस लूट की संपदा से कितने स्कूल, कॉलेज, अस्पताल या सड़कें बनेगी इसका कोई हिसाब प्रस्तुत नहीं किया। जे. एन. यू. के किसी प्रोफेसर ने लूट के तरीके पर भी अपना ज्ञान प्रकट नहीं किया। यहां तक कि लूट की इस संपदा को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित करने की मांग भी किसी केरल राजनैतिक वंशी सरकार ने नहीं की। उल्टे जब कालेधन को राष्ट्रीय संपदा घोषित करने की मांग बाबा रामदेव ने उठायी तो मध्यरात्रि में दिल्ली सरकार ने लाठियों से रामलीला मैदान में सो रही जनता की पिटाई कर दी। ये कौन सा दोहरा मापदंड है मंदिर की संपदा का राष्ट्रीयकरण करने की मांग करने में जिन्हें कोई संकोच नहीं होता तथा जिन सरकारों ने तमाम मंदिरों पर अपने रिसीवर बैठाकर मंदिरों का पैसा दूसरे कार्यों में लगा रखा है और हिंदू मंदिरों के पैसों से हिंदुओं के धार्मिक आयोजनों को छोड़कर अन्य मतावलंबियों की सहायता कर रखी है। उन्हें अमरनाथ यात्रा या मान सरोवर यात्रा के नाम पर सहायता देने में आर्थिक संकट दिखाई देता है। जबकि हज यात्रियों की सुविधा के नाम पर सरकारें अपने कपड़े बेचकर सहायता देने के लिए उतावली रहती हैं। इतना ही नहीं मस्जिद, मदरसे और चर्च में अरबों रूपये बाहर से आने की खुली छूट दी जाती है। यहां तक कि सरकारें उनका हिसाब तक पूछने की हिम्मत नहीं जूटा पा रही है। अगर कोई सरकारी अफसर हिम्मत वाला है भी जिसने किसी से कागजात मांग लिए तो फिर सरकारें नाक रगड़कर माफी मांगने के लिए तैयार हो जाती है।

वास्तव में भारत के दक्षिणी हिस्से के ये दोनो राजा अलग-अलग संस्कृतियों के परिचायक हैं। जहां एक ओर त्रावणकोर के राजा भारत के उस निरंजन और पुरातन हिंदू जीवनशैली पर आधारित हिंदू जीवन रचना के उदाहरण हैं। जिसमें व्यक्ति अपने लिए उतना ही अर्जन करता हैजिसको उसका जीवन सकुशल चल जाए। ‘साई इतना दीजिए, जामें कुटुंब समाय। मैं भी भूखा न रहूं, साधू न भूखा जाए।’ प्राचीन हिंदू जीवन शैली का मूल विचार है। जबकि दूसरी ओर ए. राजा पश्चिम की भोगवादी संस्कृति का प्रतीक हैं जिसमें येन केन प्रकारेण धन संपदा का अर्चन करके भौतिक सुखों का आनंद लूटना ही जीवन का लक्ष्य है इसलिए पश्चिमी अवधारणा में मनुष्य को अर्थिक प्राणी माना गया है। यही वह संस्कृति है जिसने मंदिरों को लूटा है और देशों को लूटा है इसी कारण ए. राजा को लूटने में कोई संकोच नहीं हुआ। आज मंदिरों की संपदा को अपनी सरकारों के अधीन करने वाले उसी पश्चिमी अवधारणा के शिकार हैं जिसका शिकार होकर ए. राजा देश को लूट ले गए। हिंदू जीवन-दर्शन की दृष्टि केवल आर्थिक नहीं है। ‘आत्मनो मोक्षार्थ – जग हिताय च’ हिन्दुत्व की अवधारण है जिसमें अपने हित और जगती के कल्याण की कल्पना की जाती है। मंदिरों पर अधिकार जमाने की कोशिश करना समाज सत्ता पर राजसत्ता का अतिक्रमण है। रोम में जब राजसत्ता एक ही सिक्के के दो पहलू हो गए तब सेकुलर स्टेट की अवधारणा पश्चिमी जगत के दिमाग में आयी। जबकि हिंदुत्व का मौलिक चिंतन ही पंथनिरपेक्षता की पहली पहचान है।

भारत में ॠषि और मंदिर संस्कृति समाज सत्ता का प्रतिनिधित्व करती हैं। देश में अनेक मंदिर ट्रस्ट या सामाजिक ट्रस्ट जनता की सेवा के लिए अनाथालय, वृध्दाश्रम, चिकित्सालय, स्कूल, योग केंद्र, प्राकृतिक चिकित्सा केंद्र, आदि बिना सरकार की एक कौड़ी सहायता प्राप्त किए संचालित करते हैं। राजसत्ता को कोई नैतिक अधिकार नहीं है कि समाजसेवा के इन प्रकल्पों पर व्यय करने के लिए आरक्षित धनराशि को मनमाने तरीके से हड़प लें। जिस प्रकार किसी सरकार का अपना बजट होता है, उसी प्रकार समाज का भी अपना वजट होता है। वजट की मदों का परिवर्तन वित्तीय अनियमितता का हिस्सा है। सरकारें तय करती हैं कि रक्षा, शिक्षा, चिकित्सा, सड़क निर्माण, प्रशासन आदि पर अलग-अलग कितना व्यय करेंगे। किंतु यदि कोई समझदार आदमी कहे कि रक्षा पर करोड़ों रूपये खर्च करने से क्या लाभ है? इस पैसे से तो हजारों किलोमीटर सड़क और सैक ड़ों स्कूल बन जाएंगे, तो उसके ऊपर लोग हसेंगे। फिर समाज द्वारा हिंदू धर्म के विकास के लिए श्रध्दा के साथ मंदिरों में दान की गई संपदा पर सरकारों की गिध्द दृष्टि का क्या मतलब है? क्या यह सामाजिक बजट में हेराफेरी नहीं है? संपदा चाहे श्री पद्मनाथ स्वामी मंदिर ट्रस्ट की हो, तिरूमाला ट्रस्ट की हो, सत्यसाईं बाबा ट्रस्ट की हो या फिर किसी अन्य हिंदू धर्म स्थान की हो, उसे सरकारों द्वारा अपने कब्जे में करने का प्रयास घोर निंदनीय ही नहीं असंवैधानिक भी है। वस्तुतः दान की संपत्ति में दानदाता की मंशा भी निहित रहती है अतः उसकी अनदेखी करके संपत्ति का उपयोग करना आर्थिक दुराचार है। जिसने भी अपनी गाढ़ी कमाई पद्मनाभ स्वामी को दी होगी उनकी दृष्टि में मंदिर का विकास तथा अपंग, अपाहिज, गरीब बेसहारा और वृध्दजनों की सेवा का सपना भी रहा होगा इसलिए मंदिर ट्रस्ट को ही न्यायालय इस कार्य के लिए पूर्णतया अधिकृत करे न कि सरकार को मनमाने तौर पर अपना अधिकार जमाने के लिए। मुकदमें की सुनवाई माननीय सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति आर. वी. रविन्द्रन तथा न्यायमूर्ति एके पटनायक की खंड पीठ कर रही है। न्यायालय ने जहां एक ओर राज्य सरकार और मंदिर ट्रस्ट के ट्रस्टी त्रावणकोर के राजा मार्तंड वर्मा से मंदिर की सुरक्षा और खजाने के संरक्षण पर सुझाव मांगा है वहीं दूसरी ओर मंदिर ट्रस्ट के वकील के. के. वेणुगोपालन ने कहा है कि मंदिर सार्वजनिक संपत्ति है। राजपरिवार ने यहां से मिली संपत्ति पर किसी तरह का निजी स्वामित्व पेश नहीं किया है। यह संपत्ति पद्मनाभ स्वामी की है। केरल सरकार का इस पर कोई भी अधिकार नहीं होना चाहिए।

जहां तक इस मंदिर की प्राचीनता का सवाल है तो यह मंदिर ग्यारहवीं शताब्दि का बताया जाता है। त्रावणकोर में पद्मनाभ स्वामी के रूप में भगवान विष्णु की सृष्टि में सबसे बड़ी शेषमयी मूर्ति है। केवल इतना ही नहीं केरल की सामाजिक विषमता के कारण 1892 में स्वामी विवेकानंद ने केरल को भ्रांतालय (पागलखाना) कहा था। जहां पर नारायण गुरू तथा उनके अनुयायियों ने उंच-नींच का भेदभाव समाप्त करने की दृष्टि से व्यापक प्रयत्न किए। उसी केरल में तिरुअनन्तपुरम् का श्रीपद्मनाभ स्वामी का मंदिर पहला मंदिर था जहां सन् 1936 में अनुसूचित जाति के बंधुओं को समस्त हिंदू समाज का अंग मानते हुए प्रवेश का अधिकार दिया गया और 1937 में महात्मा गांधी भी सभी जातियों के लोगों के साथ इसी मंदिर में गए। जहां उन्होंने यह भी कहा था कि पद्मनाथ स्वामी मंदिर के इस कदम ने केरल को भ्रांतालय से तीर्थालय बना दिया।

मंदिर की इस महत्ता को देखते हुए न्यायालय का भी यह धर्म है कि समाज संरक्षण के इस पुनीत कार्य में बाधा न खड़ी हो। अन्यथा सरकारों का रवैया तो जगजाहिर है। दिल्ली की शीला सरकार की नीयत का खोट भी समाने आ गया जब दिल्ली के मंदिरों की संपत्ति पर ललचायी निगाहें पड़ने लगी या ऐसा लगता है कामनवेल्थ की लूट के बाद भी नयी लूट परियोजना की तलाश जारी है। दिल्ली हो या केरल, दोनों ही राज्य सरकारें उसी राजनैतिक वंशावली से जुड़ी हैं जिसने टूजी स्पेक्ट्रम के नामपर लूटा, आदर्श सोसायटी के नाम पर लूटा और कामनवेल्थ गेम में खेल किया। ए. राजा और कलमाड़ी तिहाड़ में शोभा बढ़ा रहे है। अशोक चव्हाण और दयानिधि मारन राजनैतिक वनवास में हैं, पता नही कब इनको तिहाड़माता बुलावा भेज दे। कपिल सिब्बल, पी. चिदंबरम् और खेलमंत्री गिल प्रतीक्षा सूची में है। इसलिए देश के मंदिरों को भी टूजी, आदर्श और कॉमनवेल्थ गेम न बना दे।

* लेखक समाजसेवी, स्वतंत्र पत्रकार एवं अध्यापन से जुड़े हैं।

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