लेखक परिचय

केशव आचार्य

केशव आचार्य

मंडला(म.प्र.) में जन्‍म। माखनलाल चतुर्वेदी राष्‍ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय से प्रसारण पत्रकारिता में एमए तथा मीडिया बिजनेस मैनेजमेंट में मास्टर डिग्री हासिल कीं। वर्तमान में भोपाल से एयर हो रहे म.प्र.-छ.ग. के प्रादेशिक चैनल में कार्यरत।

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आज के वैज्ञानिक युग में भी लोग टोना-टोटके, तंत्र-मंत्र और अंधविश्वास से जकड़े हुए हैं। ऐसा कोई भी नहीं है जो किसी बुरी नज़र की बात से ना ड़रे क्या छोटा और क्या बड़ा? अंधविश्वास की इस दौड़ में एक और नाम शामिल हो गया है। पाकिस्तान के राष्ट्रपति जरदारी का। भ्रष्ट्राचार के कई मामलों से घिरे जरदारी एक बार फिर अंधविश्वास के चलते मुसीबत में घिरते नज़र आ रहे हैं। राष्ट्रपति बनने के बाद से जरदारी ने खुद को बुरी नज़र से बचाने के लिए 500 से भी ज्यादा काले बकरों की बलि दे दी है। जरदारी रोज़ सुबह एक काले बकरे की बलि देते है ताकि वे किसी भी तरह की बुरी नज़र और जादू से बच सके। इतना ही नहीं इस अंधविश्वास के चलते जरदारी सिर्फ ऊंट और बकरी का ही दूध पीते हैं। ऐसा नहीं है कि इस अंधविश्वास की चपेट में सिर्फ जरदारी ही शामिल हों पूरी दुनिया में ऐसे कई राजनेता और विश्व प्रसिद्ध हस्तियां हैं जिन्होंने खुद को इस तरह के तमाम अंधविश्वासों में खुद को लपेट रखा है। इन हस्तियों के बारे में जानने से पहले एक नज़र ड़ालते हैं कौन से ऐसे टोटके हैं जिन्होंने पूरी दुनिया को दहशत की चपेट में ड़ाल रखा है।

बिल्ली के रोने की आवाज- परेशानी आने की सूचना मिलना।

-काम पर जाते समय छींकना- काम न बनना।

– पूजा करते समय दीपक बुझना- अपशगुन होना।

– खाने में बाल आना- किसी परेशानी में आना।

– रोटी का बार-बार मुड़ना- किसी अपने का याद करना।

– छत पर कौवे का बोलना- मेहमान के आने की सूचना।

और भी ना कितने तरह के टोटके हैं जिनसे लोग डरते हैं। पूरी दुनिया में एक नज़र डाले तो तमाम बड़े नाम किसी ना किसी शकुन और अपशकुन के चलते अंध विश्वास की चपेट में रहे हैं।

बात चाहे जरदारी की हो या फिर ओबामा की कहीं ना कहीं हर कोई इन अंध विश्वासों की चपेट में है,एक नज़र इनके अंध विश्वास पर।

• जॉन मेक-इन भी इसी अंधविश्वासों की दौड़ में शामिल हैं। वे हमेशा अपने साथ एक लकी सिक्का, निकल (धातु), quarter, कम्पस और एक पंख साथ में रखते हैं।

• वही अमेरिका के बरैक ओबामा वोटिंग के पहले बास्केटबाल खेलने की परंपरा निभाते हैं।

• Franklin Roosevelt को १३ नम्बरों में अंधविश्वास से इतने गहरे प्रभावित रहे हैं कि महीने की १३ तारीख को कही सफ़र नहीं करते थे। वे अपनी यात्रा १२ या १४ के आंकडे में करते थे, इसके साथ उन्हें यह भी भ्रम था की एक ही माचिस से तीन सिगरट नहीं जलना चाहिये।

• Harry S .Truman जो united states के ३३ वे राष्ट्रपति रह चुके हैं.वे अपने घर के बाहर घोड़े की नाल टांगते हैं.ऐसा माना जाता है कि घोड़े की नाल घर के मुख्य दरवाजे पर टांगने से घर में समर्धि और सुख-शांति बनी रहती हैं। जब वे राष्ट्रपति बने तो अपने राष्ट्रपति भवन के मुख्य द्वार पर भी घोड़े की नाल टांग रखी थी।

• Michelle Obama की पत्नी पारम्परिक choclate cookies बनाने की प्रतिस्पर्धा में हार गयी थी, तो सबने उनकी हार निश्चित कर ली थी, पर वे इलेक्शन जीत गए थे।

• Bill Clinton ने अंतिम इलेक्शन के दौरान अपनी रेसिपी जमा कर दी थी, वही उनकी पत्नी पीछे रह गयी थी। ऐसा माना गया कि इसकी वजह से बिल क्लिंटन इलेक्शन जीत गए थे।

सिर्फ विदशों में ही नहीं भारत में तो राज नेताओं और बड़ी हस्तियों पर अंध विश्वास की किताब लिखी जा सकती है। कुछ बड़े नाम हैं।

वाइ एस राजशेखर रेड्डी जब दूसरी बार मुख्यमंत्री बने तो अंकज्योतिष के अनुसार ३ जून तक अपने चम्बर में नहीं गए थे, क्योंकि हिन्दू कैलेंडर के हिसाब से उस दिन निर्जला एकादशी थी, जो अशुभ मानी जाती हैं.उन्होंने पूजा पाठ के बाद ही ७;१५ a .m पर ही अपनी कुर्सी पर बैठे थे। उन्होंने भगवान वेंकटेश्वर, गिरजाघर और मुसलिम धर्म के अनुसार पूजा अर्चना भी की थी। इसके बाद अपने अच्छे राजनीति कार्यकाल के लिए हनुमान मंदिर में पूजा के बाद ही कार्य शुरु किये थे। उसी दिन ८ मंत्रियों ने अंकज्योतिष के अनुसार ठीक ९ बजे से पहले अपने चम्बर में गए थे। ज्योतिष्य शास्त्री भैयु महाराज के शिष्य विलासराव देशमुख, शिवराज पाटिल, जयंत राव पाटिल औऱ अशोक चव्‍हाण इन्हीं के कहे अनुसार कार्य रूपरेखा बनाते हैं। तो वहीं बाल ठाकरे को धार्मिक अनुष्ठान खासकर यज्ञ एवं आहुतियों में विश्वास है। उनका मानना है कि इससे ही राजनीति में एक मुकाम तय किया जा सकता है। देवगौड़ा भी अंकज्योतिषी में विश्वास करते हैं। मुसीबतों से बचने के लिए देवगौड़ा एक जुदाई चैन भी पहनते थे। उमा रेड्डी तो अपने आफिस में जाने से पहले नारियल तोड़ना नहीं भूलती थी।

इतना ही नहीं इस अंधविश्वास की दौड में हमारे फिल्मी सितारे भी पीछे नहीं है। अगर हम फिल्मी हस्तियों की बात करें तो बिग बी ने अभिषेक की शादी के पहले ऐश्वर्या की कुंडली में मांगलिक दोष को दूर करने के लिए वाराणसी मे 4 घंटे की पूजा की थी। एकता कपूर अपने हर सीरियल का नाम क से शुरू करती है, काला टीका लगा कर रखती हैं साथ ही अपने आफिस के बाहर एक मरा हुआ चूहा लटकाकर रखा है। भारतीय क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले सचिन तेंदुलकर उल्टा पैड पहले पहनते हैं। स्टीव वॉ अपनी जेब में हमेशा लाल रूमाल रखते थे।अअपनी हर फिल्म के मुहुर्त से पहले हेमा मालिनी इडली-चटनी खाती थी। टोटकों का चलन पुराना और अंधविश्वास से जुडा है। मगर हैरत की बात तो यह भी है कि अनेक विश्वविख्यात लेखक भी इन पर यकीन करते थे और लेखन के समय इनका नियमित रूप से पालन करते थे, जो बाद में उनकी आदत में शुमार भी हो गया। महान फ्रांसीसी लेखक एलेक्जेंडर डयूमा का विचार था कि सभी प्रकार की रचनाएं एक ही रंग के कागज पर नहीं लिखनी चाहिए। उनके मुताबिक उपन्यास आसमानी रंग के कागज़ पर और अन्य रचनाएं गुलाबी रंग के कागज़ पर लिखनी चाहिए। मगर प्रख्यात हिन्दी लेखक रांगेय राघव को फुलस्केप आकार का कागज भी बेहद छोटा लगता था। इसी तरह चार्ल्स आउडिलायर (1821-1867) नामक फ्रेंच कवि को हरा रंग लिखने की प्रेरणा देता था। इसलिए उन्होंने अपने बाल ही हरे रंग में रंग डाले थे। प्रख्यात समीक्षक डॉ.सैम्युअल जॉन्सन अपनी पालतू बिल्ली लिली को मेज पर बिठाकर ही लिख पाते थे। गार्डन सेल्फिज शनिवार को दोपहर में और शेष दिनों में रात के समय लिखते थे। शनिवार को दोपहर में वह खुद को विशेष उत्साहित महसूस करते थे। विख्यात अंग्रेजी उपन्यासकार और समीक्षक मैक्स पैंबर सिर्फ सुबह दस बजे तक ही लिखते थे। इसलिए एक उपन्यास को पूरा करने में उन्हें बहुत ज्यादा समय लगता था। इटली के लेखक जियो ऑक्चिनी रौसिनी (1791-1868) लिखने का मूड बनाने के लिए हमेशा नकली बालों की तीन विग पहना करते थे। प्रसिद्ध जर्मन कवि फेडरिक वान शिल्लर (1759-1805) की आदत भी कम अजीब नहीं थी। वे अपने पैरों को बर्फ के पानी में डुबोकर ही कविताएं लिख सकते थे। अगर वे ऐसा नहीं करते थे तो उन्हें कविता का एक भी शब्द नहीं सूझता था। फ्रांसीसी भाषा के सुप्रसिद्ध साहित्यकार तथा रमणी रसिक चिरकुमार मोंपासा मूड फ्रैश होने पर ही लिखते थे। अपने को तरोताजा करने के लिए वे नाव चलाते, मछलियां पकड़ते या फिर मित्रों के साथ हंसी-ठिठौली करते थे। राइज एंड फास्स ऑफ रोमन एंपायर के लेखक नाटककार गिब्सन को लिखने के लिए पहले एकाएक संजीदा होना पडता था। महान फ्रांसीसी लेखक बाल्लाजाक की आदत भी विचित्र थी। वह दिन में फैशन के कपड़े पहनते और रात को लिखते समय पादरियों जैसा लिबास पहनते थे। सुप्रसिद्ध लेखक बरटेड रसेल का अपनी लेखन प्रक्रिया के बारे में कहना था कि उनका लेखन मौसम पर ही आधारित होता है। खुशगवार मौसम में वे रात-दिन लिखते थे और गर्मी वाले उमस भरे दिन में वे लिखने से कतराते थे। एईडब्ल्यू मेसन भी मूडी स्वभाव के थे। जब उनका मन करता तभी लिखने बैठते। वे रात या दिन मूड होने पर कभी भी लिख सकते थे। गोल्जस्मिथ को लिखने से पहले सैर करने का भी शौक था। अपने उपन्यास, कविताएं और नाटक रचने के दौरान उन्होंने दूर-दराज के इलाकों की यात्रा की। गिलबर्टफे्रंको सुबह नौ बजे से दोपहर दो बजे तक लिखा करते थे। दोपहर के भोजन के बाद एक घंटे लिखते थे और फिर वह शाम को भी दो घंटे तक लिखते थे। रात को लिखना उन्हें जरा भी पसंद नहीं था। सर ऑर्थर पिनेरी को केवल रात में ही लिखना पसंद था। दिन में अगर वे लिखने बैठते तो उन्हें कुछ सूझता ही नहीं था। इसी तरह की आदत लुई पार्कर को भी थी। वे दिनभर सोते और रात को जागकर लिखते थे। अमेरिकी लेखक मार्क ट्वेन को औंधे मुंह लेटकर लिखने की अजीब आदत थी। अर्नेस्ट हेमिंगवे फ्रांस के क्रांतिकारी लेखक विक्टर ह्यूमो और पंजाबी के उपन्यासकार नानक सिंह को खडे होकर लिखने की आदत थी। विस्मयली लैक्स सुबह चार बजे से दिन के 11 बजे तक और शाम को साढे सात बजे तक तथा रात को फिर 11 बजे तक लिखते थे। उनका बाकी का समय सोने और चाय पीने में बीतता था। प्रख्यात रूसी लेखक फीडिन ने जब उपन्यास असाधारण ग्रीष्म ऋतु लिखा तब वह समुद्र किनारे रह रहे थे। उनका मानना था कि समुद्र की लहरों की गूंज की आवाज उन्हें निरंतर लिखने के लिए प्रेरित करती थी। हैरसवासिल सुबह नौ बजे से दोपहर 12 बजे तक और शाम को पांच बजे से सात बजे तक लिखते थे। डेलिस ब्रेडकी केवल तीन घंटे ही लिखते थे और वह भी सुबह 11 बजे से दोपहर दो बजे तक। सर ऑर्थर कान डायल केवल सुकून महसूस करने पर ही लिखते थे। अगर किसी बात से उनका मन जरा भी विचलित होता तो वे एक पंक्ति भी नहीं लिख पाते थे। जर्मनी के कार्लबेन को लिखने की प्रेरणा संगीत से मिलती थी। उन्होंने अपनी पसंद के गाने रिकॉर्ड कर रखे थे। पहले वे टेप चलाते और फिर लिखने बैठते।

-केशव आचार्य

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4 Comments on "अंधविश्वास और हम"

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Anand G.Sharma
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अंधविश्वास ? सबसे बड़ा अंधविश्वास तो भारत की भोली भली (मूर्ख) जनता का नेताओं के धूर्ततापूर्ण आश्वासनों को सुन कर उन्हें वोट देना और अपना भविष्य उनके हाथों में दे देना है. पिछले ६२ वर्षों से अशिक्षा, गरीबी , भूख, बेरोजगारी दूर करने का नितांत झूठा आश्वासन दे कर अपनी दुकानदारी चला रहे नेताओं ने जितना लूटा है उसका १० प्रतिशत भी इन समस्त तथाकथित धार्मिक अंधविश्वासों ने इस देश का नुकसान नहीं किया है. मैं सभी प्रकार के अंधविश्वासों का विरोध करता हूँ. काली बिल्ली का रास्ता काटना अशुभ कहा जाता है. मोटरसाइकल चलाते समय जब जब एक १००%… Read more »
abhinav
Guest

जो लोग मानसिकता से ग्रस्त होते है वही, बकरेकी , किसी पशु की बलि देते है ! जिसका कोई मतलब नहीं है ! जरदारी चाहे लाखो
बकरेकी बलि देंगे फिरभी आतंकवादी तालिबानी हमले बंद नहीं होंगे !

VIKAS
Guest
सभी लोग अंधश्रधा से ग्रस्त है इसका मतलब हम अभी भी हमारी मानसिकता ठीक nahi है , लेकिन नेता लोग चुनाव जितने के लिए यग्न-आहुति में लाखो करोडो खर्च करते है लेकिन होता क्या है ? चुनाव हार जाते है ! हमें हमेशा से परलोक -नरक जैसी बातोंसे धर्मके ठेकेदारोने डराया हुवा है ,जिसका कोई अस्तित्व नहीं है न कोई साबित कर सका है ! सीधी बात है यह है की हम अभी तक ये नहीं समझ सके की भ्रमांड का निर्माण कुदरती [नेचरल -पावर ]से हुवा है ना किसी भगवान से !!!! इसलिए हम हजारो साल से धर्मका ढोल… Read more »
संगीता पुरी
Guest

बडे बडों का ये हाल .. तो छोटे या अशिक्षित लोगों के बारे में क्‍या कहा जाए ??

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