लेखक परिचय

आर. सिंह

आर. सिंह

बिहार के एक छोटे गांव में करीब सत्तर साल पहले एक साधारण परिवार में जन्मे आर. सिंह जी पढने में बहुत तेज थे अतः इतनी छात्रवृत्ति मिल गयी कि अभियन्ता बनने तक कोई कठिनाई नहीं हुई. नौकरी से अवकाश प्राप्ति के बाद आप दिल्ली के निवासी हैं.

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आर. सिंह

अन्ना हज़ारे ने इस पुस्तक के मुख्य आवरण पृष्ठ पर लिखा है, “यह किताब व्यवस्था-परिवर्तन और भ्रष्टाचार के खिलाफ हमारे आंदोलन का घोषणा -पत्र है और देश में असली स्वराज लाने का प्रभावशाली मॉडल भी”

इसके पीछे वाले आवरण पृष्ठ पर महात्मा गाँधी का विचार उद्धृत है.जो यों है, “सच्ची लोकशाही केंद्र में बैठे हुए दस बीस लोग नही चला सकते.सत्ता के केन्द्र बिंदु दिल्ली, बंबई और कलकत्ता जैसी राजधानियों में हैं.मैं उसे भारत के सात लाख गाँवों में बाँटना चाहूँगा.”

इसी आवरण पृष्ठ पर आगे लिखा है, “वर्ष २०११ अन्ना हज़ारे के भ्रष्टाचार -विरोधी आंदोलन से परिभाषित हुआ. सालेगन सिद्धि के फकीर ने सत्ता के गलियारों में खलबली मचा दी. और इस बार तो मध्यवर्गीय भारत और यहाँ तक क़ि ‘इलीट’भी–जो क़ि सदा ही अपनी बैठक में राजनीति पर बहस करते नज़र आते थे–सड़कों पर निकल पड़े. अरविंद केजरीवाल की इस आंदोलन में महत्व पूर्ण भूमिका रही है. टीम अन्ना की मुख्य माँग थी, लोकपाल क़ानून का क्रियान्वयन. केंद्रिय शक्तियों ने वादे तो बहुत किए,लेकिन बिल अब तक संसद में पास नहीं हुआ.

यह किताब हमें इस मुकाम से आगे का रास्ता बताती है. लोकपाल पर चर्चा के अलावा, ये उपयोगी सुझाव देती है कि सच्चे स्वराज्य के लिए भारत की जनता और राजनीतिक पार्टियों को क्या करना चाहिए और क्या नहीं. सरकारी नीतियों की खामियों से लेकर ग्राम पंचायत के स्तर पर व्याप्त कमियाँ, बि.पि.एल. राजनीति,नरेगा का भ्रम,कृषि,शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी ज़रूरी सेवा में सुधार पर लेखक की विशेष टिप्पणियाँ हैं. एक जनतंत्र होने के नाते किस प्रकार इस देश की बागडोर उसके लोगों के हाथ दी जाए न कि नेताओं के कदमों तले, उस लक्ष्य की ओर अरविंद केजरीवाल की के किताब हमे अग्रसर करती है.”

महात्मा गाँधी ने कहा था, “सबसे गरीब और सबसे कमजोर आदमी के चेहरे को याद करो. और अपने आप से पूछो कि जो कदम तुम उठाने जा रहे हो,वह क्या उसके किसी काम आयेगा?क्या उसको इससे कोई लाभ होगा?क्या यह उसके जिन्दगी और उसकी तकदीर पर उसका अधिकार वापस दिलाएगा? दूसरे शब्दों में ,क्या इससे लाखों भूखे और मानसिक रूप से पीड़ित व्यक्तियों को स्वराज मिल पायेगा/”

इन्ही कुछ प्रश्नों का उत्तर यह पुस्तक तलाशता है.यह पुस्तक स्वराज की राह देख रही आम जनता को समर्पित है.

अन्ना हजारे ने इस पुस्तक की भूमिका में दो शब्द कहते हुए लिखा है, ” आज देश भर में बदलाव की एक लहर दिख रही है.हर धर्म, हरेक जाति,हरेक उम्र के लोग,अमीर हों या गरीब,शहरी हों या ग्रामीण ,सबकी आँखे बदलाव का सपना देख रही है.अगर यह जोश कायम रहा तो आजाद भारत के इतिहास में जो काम ६४ साल के इतिहास में नहीं हुआ,वह १० साल में हो सकता है.महंगाई और भ्रष्टाचार के चलते आम आदमी का जीना मुश्किल हो रहा है..आजादी के ६४ साल बाद भी न हर हाथ को काम है और न हर पेट को रोटी.

अगर देश की अर्थ नीति को बदलना है तो गाँव की अर्थ नीति को बदलना होगा.और यह अर्थ नीति दिल्ली में बैठ कर बन रही योजनाओं या इनके तहत बाँटें जा रहे पैसे से नहीं बदलेगी.यह काम होगा, लोगों को मजबूत बनाने से.आज हमारे तंत्र लोग पर हावी हैं.कभी तो लगता है कि तंत्र ही लोक का मालिक बन कर बैठ गया है. हमें सच्ची लोकशाही का मतलब समझना होगा.हमें यह समझना होगा कि लोक तंत्र में लोगों की भूमिका पांच साल में एक बार वोट देकर सरकार चुनने की ही नहीं होती..इसके लिए आम लोगों की सत्ता में भागीदारी जरूरी है.सता के केंद्र बिंदु को दिल्ली और राजधानियों से निकाल कर गाँव और कस्बों तक लाना होगा ”

अन्ना हजारे यह भी कहते हैं कि इस तरह के छिट पुट प्रयोग जहाँ भी हुए हैं हैं वहां खुश हाली भी बढी है और भ्रष्टाचार भी कम हुआ है.फिर क्यों न इस तरह के प्रयोगों की एक आम रूप रेखा बनाई जाए और पूरे देश में इसको व्यवहार में लाया जाए?

अरविन्द केजरीवाल की इस पुस्तक में व्यवस्था के बदलाव और सम्पूर्ण क्रांति की विस्तार से चर्चा की गयी है.इस पुस्तक से यह भी उम्मीद जगती है कि बेरोजगारी ,महंगाई, भ्रष्टाचार, आर्थिक विषमता, ऊँच-नीच, हिंसा, नक्‍सलवाद जैसी जटिल समस्याओं के समाधान खोज रही दुनिया इस पुस्तकं के माधाम से इन समस्याओं के सरल समाधान खोज सकेगी.

करीब दो सौ पृष्ठों की यह पुस्तक जन लोक पाल से बहुत आगे बढ़ कर सोचने की दिशा तैयार करने का प्रयत्न करती है. लगता है इस पुस्तक को मूर्तरूप देने के पहले अरविन्द केजरीवाल ने देश के विभिन्न भागों का दौरा किया है और वहां जो नए प्रयोग हुए हैं ,उससे प्रभावित भी हुआ है, न केवल रालेगण सिद्धि ,बल्कि केरल के भी गांवों में इस तरह के प्रयोग चल रहे हैं.इससे न केवल ग्रामीणों का जीवन सुधरा है,बल्कि उन्हें अपनी जिम्मेवारियों का भी ज्ञान हुआ है.पहले तो विद्वान लेखक ने तर्क द्वारा और विभिन्न उदाहरणों से यह सिद्ध करने का प्रयत्न कियI है कि वर्तमान व्यवस्था में विकास के नाम पर दिल्ली से भेजा हुआ धन किस तरह गांवों की कोई भलाई नहीं कर पाता,बल्कि कुछ ख़ास लोगोंकी जेब भरने का काम करता है, फिर वह बताता है कि इसका विकल्प क्या है? उसने यह भी प्रश्न उठाया है की आखिर क़ानून बनाने का हक़ किसे है?जनता का या जनता के विचारों की अवहेलना करके संसद का? जनता की भलाई के लिए बनने वाले कानूनों में जनता की भागीदारी आवश्यक है,पर यह हो कैसे इसका भी विस्तृत विवरण इस पुस्तक में है.

ग्राम पंचायतों के वर्तमान में सीमित अधिकारों और उनके अधिकारों में वृद्धि से आगे बढ़ कर ग्राम सभाओं द्वारा लिए गए निर्णयों को इसमे सर्वोपरी माना गया है

वास्तविक लोक तंत्र के उस इतिहास पर भी प्रकाश डाला गया है,जो वास्तव में भारत की देन थी.

लेखक शहरों की वर्तमान हालत से भी खुश नहीं है. यद्यपि पुस्तक का अधिकांश भाग में गांवों के विकास पर जोर दिया गया है,पर शहरों के विकास के लिए भी उपाय सुझाए गए हैं.

गाँधी के उस कथन पर ख़ास जोर दिया गया है कि सच्चा स्वराज तभी आएगा जब हर हाथ को काम और हर पेट को रोटी मिलेगा.

वर्तमान व्यवस्था में सरकारी कर्मचारियों का स्थान सर्वोच्च हो जाता है.लेखक ने इस व्यवस्था में आमूल परिवर्तन के लिए दिशा निर्देश दिया है.उसका यह मानना है कि वर्तमान व्यवस्था पग पग पर भ्रष्टाचार को जन्म देती है और उसे प्रश्रय भी देती है.इसमे आमूल परिवर्तन की आवश्यकता है.बहुत से बदलाव संविधान की वर्तमान रूप रेखा के अंतर्गत ही सम्भव हैं हैं पर कही कही संविधान में संशोधन की भी आवश्यकता पड़ सकती है.विद्वान लेखक ने यह माना है कि सम्पूर्ण व्यवस्था परिवर्तन या सम्पूर्ण क्रांति के लिए हमें जन लोकपाल से आगे सोचने की आवश्कता है,तभी देश को वास्तविक आजादी और जनता को स्वराज मिलेगा.

ऐसे इस पुस्तक में कुछ कमियां भी हैं.सबसे बड़ी कमी दिखती है कि लेखक बिजली के उत्पादन और वितरण के मामले में एक दम चुप है,जब कि मेरे विचारानुसार भारत के सर्वांगीण विकास के लिए वहन करने यौग्य मूल्य पर हर घर और हर छोटे बड़े उद्योग के लिए बिना बाधा के अनवरत बिजली की उपलब्धता अति आवश्यक है.

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25 Comments on "अरविंद केजरीवाल का ‘स्वराज’"

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Javed Usmani
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अच्युतानंद मिश्र की पक्तिया है –
“सभ्यता की शिलाओं पर
बहती नदी की लकीरों की तरह
हम तलाश रहे थे रास्ते
एक बेहद सँकरे समय में “!

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
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श्री सिंह साहेब पूछते हैं कि “मैंने कहा है कि वे सब जो स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद आरक्षण का लाभ उठाते रहें हैं,वे अन्य दलितों के उन्नति को अवरुद्ध करने के सबसे बड़े कारण हैं,क्योंकिं यह तो एक बच्चा भी समझ सकता है कि अगर भोजन सामग्री सिमित है(२२,५%,)….तो अगर उस भोजन पर कुछ लोग अपनी शास्वत अधिकार जमाये रखेंगे तो दूसरों को भूखा रहना ही पडेगा.वही हाल पिछड़े वर्गों के आरक्षण का है.मेरे विचार से दलितों और पिछड़े वर्गों के सर्वांगीं विकास में सबसे बड़ी बाधा वे लोग उपस्थित कर रहें हैं.” श्री सिंह साहेब आप और आपके सवाल… Read more »
आर. सिंह
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डाक्टर मीणा.आपका उत्तर पढ़ कर मुझे आश्चर्य नहीं हुआ ,क्योंकि मैं इस उत्तर के लिए तैयार था.संविधान का हवाला मत दीजिये,संविधान में आवश्यकता पड़ने पर या कभी कभी कुछ ख़ास मुखर वर्गों को संतुष्ट करने के लिए अनेकों संशोधन किये जा चुके हैं.बात प्राकृतिक न्याय की है.जो किसी संविधान और शासन द्वारा बनाए गए क़ानून से ऊपर होता है.मैंने पहले भी लिखा है और आज भी इसको दुहरा रहा हूँ कि अनिसुचित जातियों पर बहुत अत्याचार हुए हैं.शायद उतने अत्याचार अनुसूचित जन जातियों पर नहीं हुए हैं.अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जन जातियों के लिए अलग से निर्वाचन व्यवस्था से क्या… Read more »
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
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“………………अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जन जातियों के लिए अलग से निर्वाचन व्यवस्था से क्या लाभ होता,,यह मेरी तरह साधारण बुद्धि वाले की समझ से बाहर है……….”

कोई बात समझ में नहीं आती इसलिए उसको आप विचार योग्य नहीं समझें क्या ये प्राकृतिक न्याय है?

आर. सिंह
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डाक्टर मीणा,तो आप ही समझाइए,शायद समझ में आ जाए.अन्य मुद्दे जो मैंने उठाये थे,उनका क्या हुआ?

dr dhanakar thakur
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प्रिय श्री मीना, स्पस्त्ता से लिखी बात को समझने में अधिक समय नहीं लगत. स्तर का आधार भी अपनी अपनी समझ होती है ! हर व्यक्ति का विचार उसके शैक्षिक एवं वैचारिक स्तर और आपके समाजीकरण के परिवेश को दर्शाता है! आप अपना विचार जरूर बनाबे और लिखें पर आपको 95 फीसदी लोगों का प्रतिनिधी मैं कैसे मानु? स्वयम आंबेडकर और गांधी ने भी यह दवा नाहे एकिया था? मैं केजरीवाल का प्रतिनिधी हूँ ही नहीं और चूँकि आप सार्वजनिक और देश हित के विषयों पर हर एक को अपने विचार रखने का संवैधानिक हक़ मानते हैं मैंने भी लिखा… Read more »
आर. सिंह
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डाक्टर मीणा,मैं दूसरों की बाबत तो नहीं जानता,पर मैं जल्दी किसी का अनुयाई नहीं बनता.पुस्तकं में लिखी बातों से मैं अवश्य प्रभावित हुआ हूं.मैंने उस लिंक को फिर से देखा.उसमे महत्त्व पूर्ण बातों का उल्लेख अवश्य है,पर आपको तो आम जनता केलिए महत्त्व पूर्ण बातों से कोई मतलब है नहीं .तो मैं आपको पुस्तक के हिंदी संस्करण के ११९ वें पृष्ठ पर ले जाना चाहूंगा,दलितों पर अत्याचार शीर्षक के अंतर्गत एक अलग अनुच्छेद है.वहाँ लेखक ने लिखा है,”कुछ लोगों को शंका है कि अगर ग्राम सभाओंको ताकत दी गयी तो दलीतों पर अत्याचार बढेगा.इसका जवाब ढूँढने के लिए हम बिहार… Read more »
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
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“मेरे विचार से ग़रीबों की समस्याएं एक हैं,चाहे वह दलित हो या अदलित” आपकी उक्त निष्कर्ष पंक्ति से ऐसा लगता है कि आप ऐसा इस कारण से आसानी से लिख सकते हैं, क्योंकि आप न तो दलित है और न ही दलितों की जातिगत पीड़ा के बारे में आपको अहसास है! सामान्य गरीबों और दलित गरीबों में बहुत बड़ा अंतर है, लेकिन ये आपको दिख नहीं सकता, क्योंकि shayad आप देखना नहीं चाहते! केवल यही नहीं आप ये भी चाहते हैं कि आपका ऐसा manna है कि “ग़रीबों की समस्याएं एक हैं,चाहे वह दलित हो या अदलित” इसलिए आपकी इस… Read more »
आर. सिंह
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डाक्टर मीणा,मुझे यह कहते हुए अफ़सोस हो रहा है कि आप वही देखते हैं,जो आप देखना चाहते हैं.अन्य किसी बात पर आपकी नजर नहीं पड़ती यह तो इतिफाक है कि किसने कहाँ जन्म लिया.?उसी बात को लेकर अगर आप हर उस आदमी को गाली देते रहेंगे,जिसने दलित होकर जन्म नहीं लिया तो इस मानसिकता का कोई इलाज संभव नहीं है.अरविन्द केजरीवाल ने अपनी पुस्तकं में दलितों की समस्याओं को अलग से उठाया है,पर मेरी टिप्पणी के इस हिस्से पर आपकी नजर नही पडी,पर आपने मेरी विचार धारा में उसको भी लपेट दिया.मैंने बार बार लिखा है कि भ्रष्टाचार कम होगा… Read more »
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
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“यह बात आपजैसे दलितों के दिमाग में जगह बनाए तो भी आप इसे जाहिर नहीं करेंगे…”
श्री सिंह साहेब आपके पास मेरे सवालों के उत्तर नहीं हैं! कोई बात नहीं, लेकिन बोखलाने की जरूरत नहीं है! दुसरे ये बात हमेशा याद रखें कि मैं दलित नहीं हूँ! आप जैसे कुछ तथाकथित विद्वान आदिवासियों को भी दलित मानकर आदिवासियों के विकास को अवरुद्ध कर रहे हैं!

आर. सिंह
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डाक्टर मीणा,मुझे यह जानकर प्रसन्नता हुई कि आप अपने को दलित नहीं मानते,पर अभी भी मेरे प्रश्न अनुतरित हैं.अगर आप उन प्रश्नों क उत्तर दे सकें तो आपके सभी प्रश्नों का उत्तर अपने आप मिल जाएगा.मैंने कहा है कि वे सब जो स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद आरक्षण का लाभ उठाते रहें हैं,वे अन्य दलितों के उन्नति को अवरुद्ध करने के सबसे बड़े कारण हैं,क्योंकिं यह तो एक बच्चा भी समझ सकता है कि अगर भोजन सामग्री सिमित है(२२,५%,)पहले मैं शायद २७.५% लिख गया था तो अगर उस भोजन पर कुछ लोग अपनी शास्वत अधिकार जमाये रखेंगे तो दूसरों को भूखा… Read more »
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
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आप चाहे कितने ही बढे विद्वान हों, लेकिन आपको बिना वजह दूसरों को हकालने, ललकारने और अपमानित करने वाली भाषा का उपयोग करने का कतई भी हक़ नहीं है? आप लिखते हैं की-“आपको तो आम जनता केलिए महत्त्व पूर्ण बातों से कोई मतलब है नहीं ” इसका क्या मतलब है? आप ऐसा इकतरफा निर्णय किस आधार पर सुना सकते? आम जनता आपकी राय में कौन हैं, आप जाने, लेकिन मेरे को आम जनता से कोई मतलब नहीं है ये बात लिखने से पहले आपको मेरे बारे में अपनी इस राय को सार्वजानिक करने का कारण और आधार भी बताना/लिखना चाहिए… Read more »
आर. सिंह
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मुझे अफ़सोस है किइस टिप्पणी को पढने और समझने में मैंने देर कर दी.आपकी इस टिप्पणी का मैं बुरा नहीं मानता और न व्यक्तिगत टिप्पणियों पर मुझे कोई एतराज है,क्योंकि मेरी बेवाक विचारधारा के चलते कहीं न कहीं कभी न कभी किसी की कोई कमजोर नस दब ही जाती है आप को भी मेरे किस सत्यता ने ठेस पहुंचाया यह मुझे अच्छी तरह ज्ञात है,,पर सच्छाई यही है कि वे दलित जो आज भी स्वतंत्रता के बाद मिले लाभों से वंचित हैं,उसके लिए उनके लाभान्वित भाई बन्धु अन्य जाति वालों से कम जिम्मेवार नहीं हैं.

अभिषेक पुरोहित
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अभिषेक पुरोहित

95 % का हिसाब तो बता देते जनाब ???

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
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यदि अभी तक नहीं पता तो आपको बताने से कोई लाभ नहीं!

अभिषेक पुरोहित
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अभिषेक पुरोहित

जनाब मैं गणित का विध्यार्थी रहा हूँ ओर विश्वास कीजिएगा बहुत प्रतिभावन भी अत: हिसाब में गलती नहीं करता हूँ 4 % आपके बामन 3 % बनिए 3 % राजपूत 3 % दुसरे 13तो यो ही हो जाते है जनाब??फिर ये 95 % कहा से लाये ??फिर चाहे 35 मानो या 50 ओबीसी पुछलीजिएगा की वो 95 मे है या 13 मे ……………वैसे ये सब भी एक वाइल्ड गेस ही है ………………….

dr dhanakar thakur
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“सबसे गरीब और सबसे कमजोर आदमी के चेहरे को याद करो.” के बाद मीना जी को यदि वर्ग संघर्ष की खोज हर चीज में करने की जरूरत पड़ती है तो उन्हें अपने को पहले बदलना चाहिए और प्राम्भ अपने नाम के परिवर्त्तन से करना चाहिए जो की उनके परिजनों ने भगवान् के नाम पर रख डाला उसमे “निरंकुश’ जोड़ आपने अपन एपरिजनों की अपेलाषाओं का ही दमन कर डाला आपकी निर्कुश्ता किनके खिलाफ है यह तो स्पस्ट नहीं है भगवान् पुरुषोत्तम इतने निरंकुश नहीं रहे देश की 95 फीसदी शोषित तथा वंचित आबादी की सत्ता में के सभी केन्द्रों में… Read more »
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
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निम्न कुकृत्य को अंजाम देने वालों को और ऐसी अम्न्वीय विचारधारा को जन्म देने तथा बढ़ावा देने वालों को आतंकी कहने में क्यों परहेज किया जाये? ऐसे लोगों को फांसी पर चढाने की कानूनी व्यवस्था क्यों न हो? “मंदिर में दलित को प्रवेश से रोका, तनाव From Dainik Jagran (Updated on: Tue, 24 Jul 2012 11:47 PM (IST) जागरण संवाददाता, भुवनेश्वर : सावन के तीसरे सोमवार को केन्द्रापाड़ा जिले के गोपेई गांव स्थित शिव मंदिर में जलाभिषेक करने जा रहे दलित कांवरियों को प्रवेश करने से रोकने को लेकर विवाद हो गया। इससे स्थिति तनावपूर्ण बन गई। हालांकि किसी अप्रिय… Read more »
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
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आदरणीय ठाकुर साहेब, खेद के साथ लिख रहा हूँ कि मुझे ऐसा लग रहा है कि आपने मेरी टिप्पणी को जल्बाजी में पढ़कर, बिना उसका भाव समझे ही अपनी उक्त टिप्पणी लिख डाली है! अन्यथा मुझे विश्वास है कि आप इस प्रकार की स्तरहीन टिप्पणी नहीं लिखते! आपसे विनम्र अनुरोध है कि कृपा करके फिर से मेरी टिप्पणी पढ़ें! दूसरा आप लिखते है कि “………केजरीवाल की किताब कुछ कहती हो या नहीं मैं आपको तो उन सबों का प्रतिनिधि मान नहीं सकता नाहे एतो आप ही होते गाँधी या नन्ना की जगह…….” आपका इस प्रकार के विचार व्यक्त करना, आपके… Read more »
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
Guest
मोडरेटर महोदय मेरी उक्त टिप्पणी की नीचे से दूसरी टिप्पणी के स्थान पर निम्न टिप्पणी को स्थापित करने का कष्ट करे! क्योंकि इसमें कुछ टायपिंग भूल रह गयी हैं! “मैं तो ये ही जानता और समझता हूँ कि जो अपने आतंक से आम लोगों को भयभीत करे, मारे, जीने नहीं दे और मर-मर कर जीने को विवश करे वही असली आतंकी है! इस कार्य को करने वाले असली आतंकी क्यों नहीं, ये तो आप ही बेहतर जान सकते हैं? हाँ यहाँ फिर से दुहरा हूँ कि मैंने उन आतंकियों के बारे में भी लिखा है, जिन्हें ही शायद आप असली… Read more »
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