लेखक परिचय

सतीश सिंह

सतीश सिंह

श्री सतीश सिंह वर्तमान में स्टेट बैंक समूह में एक अधिकारी के रुप में दिल्ली में कार्यरत हैं और विगत दो वर्षों से स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। 1995 से जून 2000 तक मुख्यधारा की पत्रकारिता में भी इनकी सक्रिय भागीदारी रही है। श्री सिंह दैनिक हिन्दुस्तान, हिन्दुस्तान टाइम्स, दैनिक जागरण इत्यादि अख़बारों के लिए काम कर चुके हैं।

Posted On by &filed under आर्थिकी.


बेब पोर्टल कोबरा पोस्ट द्वारा किया गया यह दावा कि सरकारी बैंक भी धनशोधन का काम कर रहे हैं, बेहद ही सनसनीखेज एवं चौंकाने वाला खुलासा है। कोबरा पोस्ट ने अपने दूसरे स्टिंग आपरेशन रेड स्पाइडर पार्ट-2 में दावा किया है कि सार्वजनिक क्षेत्र के 12 बैंक (भारतीय स्टेट बैंक, बैंक औफ़ बड़ौदा, पंजाब नेशनल बैंक, केनरा बैंक, इंडियन बैंक, इंडियन ओवरसीज बैंक, सेंट्रल बैंक औफ़ इंडिया, आईडीबीआई बैंक, ओरियंटल बैंक औफ़ कौमर्स, इलाहाबाद बैंक, कौर्पोरेशन बैंक एवं देना बैंक) निजी  क्षेत्र के 4 बैंक (यस बैंक, धनलक्ष्मी बैंक, फेडरल बैंक एवं डीसीबी बैंक) और 4 बीमा कंपनियां (भारतीय जीवन बीमा निगम, रिलायंस लाइफ, बिड़ला सनलाइफ एवं टाटा एआईजी) भारतीय रिजर्व बैंक, इरडा और दूसरी वित्तीय नियामक एजेंसियों के नियमों की अनदेखी करते हुए अपने बिजनेस को नाजायज तरीके से आगे बढ़ा रहे हैं।

अपने इस अभियान को आगे बढ़ाते हुए कोबरा पोस्ट ने पुनः 09.05.2013 को अपने रेड स्पाइडर-3 संस्करण में खुलासा किया कि धनशोधन करने में 10 बैंक और शामिल हैं, जिनमें बैंक औफ़ महाराष्ट्र, बैंक औफ़ इंडिया, इंग-वैश्य बैंक, इंडसइंड बैंक आदि का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है।

कोबरा पोस्ट के मुताबिक धनशोधन के लिए बेनामी खाते खोले जाते हैं। खाता खोलने में पैन कार्ड एवं केवाईसी नियमों की अनदेखी की जाती है। खाते में जमा पैसों को बीमा में निवेश किया जाता है। इस काले धन को रियल स्टेट में भी लगाया जाता है। बेनामी धन को रखने के लिए लौकर की सुविधा दी जाती है। बिना वित्तीय नियामकों को खबर किए काले धन का हस्तांतरण भी किया जाता है।

ज्ञातव्य है कि कुछ दिन पहले ही इस बेब पोर्टल ने तीन निजी बैंकों यथा-आईसीआईसीआई बैंक, एचडीएफसी बैंक और ऐक्सिस बैंक में धनशोधन एवं चल रहे दूसरी तरह की गड़बड़ियों का आरोप लगाया था।

कोबरा पोस्ट के सहायक संपादक श्री सैयद मसूर हसन के नेतृत्व में पिछले 6 महीनों से देश के विभिन्न राज्यों मसलन-उत्तर प्रदेश, आंध्रप्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, कर्नाटक आदि में विविध बैंकों की शाखाओं में इस स्टिंग औपरेशन का फिल्मांकन किया जा रहा था। श्री अनिरुद्ध बहल के अनुसार दिल्ली के संसद मार्ग के विविध बैंकों की 5 शाखाओं में भी इसतरह की अनियमितता पाई गई है।

बेब पोर्टल कोबरा पोस्ट के संपादक श्री अनिरुद्ध बहल ने यह आरोप भी लगाया है कि सरकार और विविध नियामक एजेंसियां मामले में लापरवाही बरत रहे हैं। भारतीय रिजर्व बैंक, जोकि एक नियामक एजेंसी है, लेकिन इस मामले में वह आरोपियों का बचाव कर रही है। श्री बहल के मुताबिक आज के दौर में बैंकों द्वारा खुलेआम धनशोधन किया जा रहा है, जोकि धनशोधन निषेध कानून (पीएमएलए) का सीधा-सीधा उल्लंघन है। उनके अनुसार बैंको द्वारा की जा रही दूसरी गड़बड़ियाँ भी भारतीय दंड सहिंता के अंतर्गत अपराध की श्रेणी में आती हैं।

श्री बहल के अनुसार इस तरह की गतिविधियों की जानकारी बैंकों के शीर्ष प्रबंधन को भी है, जबकि भारतीय स्टेट बैंक के मुखिया श्री प्रतीप चौधरी ने कोबरा पोस्ट के आरोपों को सिरे से खारिज किया है। श्री चौधरी का कहना है कि बैंक संदिग्ध लेन-देन की जानकारी हमेशा वित्तीय खुफिया विभाग (एफआईयू) को देता है और बैंक के द्वारा नियमों का कड़ाई से पालन किया जाता है।

बावजूद इसके अगर जांच में किसी बैंक कर्मचारी की इस तरह के मामलों में संलिप्तता पाई जाती है तो उसके खिलाफ कड़ी-से-कड़ी कार्रवाई की जाएगी। बैंक औफ़ बड़ौदा के प्रमुख का भी इसी तरह का मिलता-जूलता बयान आया है। भारतीय जीवन बीमा निगम के प्रमुख का मानना है कि इस तरह की गड़बड़ी हमारे संस्थान में नहीं हो सकती है, क्योंकि पैन नहीं होने पर 50000 रूपये से अधिक का लेन-देन हमारे यहाँ संभव नहीं है। इसके अलावा पाँच लाख से अधिक राशि वाले लेन-देन की नियमित रिपोर्ट हम एफआईयू को करते हैं।

निजी क्षेत्र की बीमा कंपनी रिलायंस लाइफ के प्रमुख का कहना है कि हमारी कंपनी के ऊपर लगाये गये सभी आरोप गलत और  बेबुनियाद हैं। फिर भी हम जांच करवाने के लिए तैयार हैं। जाँच में अगर कोई गड़बड़ी पाई जाती है तो दोषी कर्मचारियों के खिलाफ हम सख्त कार्रवाई करेंगे। टाटा एआईजी के प्रतिनिधि ने कहा कि हमने अपनी तरफ से आंतरिक जाँच शुरू कर दी है। हालांकि हमारी कंपनी धनशोधन का काम नहीं करती है।

मामले की गंभीरता को देखते हुए भारतीय रिजर्व बैंक ने आरोपी बैंकों के संबंध में जाँच की प्रक्रिया पूरी कर ली है। रिजर्व बैंक के मुखिया श्री सुब्बाराव ने कहा है कि एक आंतरिक रिपोर्ट तैयार की गई है, जिसे कुछ प्रक्रियाओं को पूरा करने के बाद अमलीजामा पहनाया जाएगा। वित्त मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार सरकारी क्षेत्र के बैंकों और जीवन बीमा निगम ने 31 कर्मचारियों के विरुद्ध कार्रवाई की है। 15 कर्मचारियों को बर्खास्त किया गया है। 6 को लंबी छुट्टी पर भेज दिया गया है। 10 कर्मचारियों का स्थानांतरण किया गया है। निजी क्षेत्र के उपक्रमों ने भी आरोपी कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू की है। इसके बरक्स  वित्त मंत्रालय हर हलचल पर अपनी निगाह रखे हुए है। मंत्रालय चाहता है कि जल्द से जल्द मामले की जाँच पूरी करके सच को सामने लाया जाय और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जाये।

गौरतलब है कि मौजूदा समय में कोबरा पोस्ट के आरोपों को पूरी तरह से खारिज नहीं किया जा सकता है। बैंकिंग और बीमा क्षेत्र में आज गलाकाट प्रतिस्पर्धा है। इन संस्थानों में ऐसे बजट कर्मचारियों को दिये जाते हैं, जिसे पूरा करना अमूमन संभव नहीं होता है। बजट पूरा नहीं करने पर मीटिंगों में कर्मचारियों को जलील किया जाता है। इस तरह की दवाब वाली स्थिति में अगर कोई कर्मचारी बजट पूरा करने के लिए नियमों की अनदेखी करता है तो इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता। इस सच का खुलासा पटना में फ़र्जी चेक के जरिये सरकारी खातों से करोड़ों रूपये निकासी के मामले में आर्थिक अपराध इकाई (ईओयू) की जाँच में भी हुआ है। जाँच के दौरान कुछ बैंक कर्मियों ने स्वीकार किया कि डिपॉज़िट के लालच में उनके द्वारा केवाईसी के नियमों की अनदेखी की गई। इस फ़र्जीवाड़ा का मास्टरमाइंड सन्नी प्रियदर्शी ने भी कुबूल किया कि वह बैंकों में फर्जी खाते खुलवाने के लिये शाखा प्रबंधकों के सामने अच्छा बिजनेस देने का प्रस्ताव रखता था और इस जाल में आमतौर पर बैंक वाले फँस जाते थे।

कुछ मामलों में ऐसा भी देखा गया है कि कुछ बड़े अधिकारी अपनी प्रोन्नति के लिए डरा-धमका कर अपने अधीनस्तो को बजट पूरा करने के लिए मजबूर करते  हैं। हाल के दिनों में कुछ बैंक अधिकारी बजट पूरा करने के द्वाब की वजह से आत्महत्या करने पर भी विवश हुए हैं। वर्ष, 2008 में पूर्व स्टेट बैंक औफ़ इंदौर के एक मुख्य प्रबन्धक ने मध्यप्रदेश के गुना जिले मेँ आत्महत्या कर लिया था। उक्त मुख्य प्रबंधक ने सुसाइड नोट में अपने वरीय अधिकारियों पर आत्महत्या करने के लिए मजबूर करने का आरोप लगाया था। वरीय अधिकारी द्वारा बनाये गये प्रेशर का द्वाब नहीं सहने के कारण पूर्व स्टेट बैंक औफ़ इंदौर के ही दो और अधिकारियों की मौत वर्ष, 2009 मेँ भोपाल मेँ हुई थी।

बीते सालों मेँ बैंकिंग क्षेत्र मेँ तेजी से प्रतिस्पर्धा बढ़ा है। पड़ताल से स्पष्ट है कि सामान्य तौर पर काम की अधिकता, करियर, लालच एवं डर की वजह से बैंक या बीमा कर्मचारी नियामकों द्वारा बनाये गये नियमों की अनदेखी कर रहे हैं, जोकि देश के हित में नहीं है। काला धन और हवाला हमारे देश को अंदर से खोखला बना रहा है। इतना ही नहीं यह आतंकवाद को भी खाद-पानी दे रहा है।

बता दें कि किसी भी संस्थान की सबसे बड़ी पूंजी मानव संसाधन को माना गया है। लिहाजा बैंक प्रबंधन को मामले की तह तक जाना चाहिए। उन्हें  समस्या का स्थायी ईलाज ढूँढना होगा। मानव संसाधन स्तर पर नीतिगत बदलाव लाना होगा साथ ही साथ मुनाफे एवं प्रोन्नति के लिए किसी हद तक जाने की प्रवृति पर लगाम लगाना होगा। केवल दोषी कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई करने से इसतरह की घटनाओं की पुनरावृति नहीं रुकेगी।

 

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz