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डॉ.अमित प्रताप सिंहmedia

पत्रकारों से मार-पीट या जान से मार देने जैसी घटनाओं की के समाचार आजकल आम होते जा रहे हैं, ऐसी घटनाओं के बाद सामान्यतः लोकतंत्र के झंडाबरदार अंततः जुबानी जमाखर्च करके अपने – अपने काम में लग जाते हैं और बेचारा मीडिया अपने फूटे सर और शरीर पर बंधी पट्टियों के साथ समाज व शासन व्यवस्था की ओर कातर निगाहों से देखता हुआ लोकतंत्र में फिर से विश्वास ज़माने की कोशिश में लग जाता है.
मीडिया पर हमलों की फेहरिस्त दिन – प्रतिदिन बहुत लंबी होती जाने के साथ ही आये दिन इसमें जघन्य से जघन्यतम घटनाएँ जुडती चली जा रही हैं. क्या मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, हरियाणा आदि में पत्रकारों पर हुए जानलेवा हमलों आदि की घटनाओं को पेरिस में पत्रिका ‘शार्ली एब्दो’ के कार्यालय में हुए आतंकी हमले से कम आँका जा सकता है? निश्चित ही सभी घटनाएं निंदनीय हैं, पर क्या मीडिया पर हुए हमलों को केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला या मीडिया की आवाज को दबाने की कोशिश इत्यादि कहकर खारिज किया जा सकता है? और केवल चंद हमलावरों को पकड़कर सजा दे देने भर से बात ख़त्म हो जाती है.
मीडिया अपने ऊपर होते हमलों के लिए राजनीतिक परिस्थियों, निष्पक्षता और अभिव्यक्ति की आजादी आदि का रोना रोते नहीं रह सकता. मीडिया चाहता है कि चाहे अपराधी हो अथवा पुलिस, आतंकवादी हों या शांति समर्थक, आमजन हों या राजनीतिज्ञ सभी मीडिया के बारे में एक जैसी राय रखें और मीडिया को समाज में ‘विशिष्ट सम्मान’ प्राप्त हो, पर क्या मीडिया की दिन-प्रतिदिन खोती साख के लिए मीडिया स्वयं जिम्मेदार नहीं है? मीडिया की स्वतंत्रता के नाम पर विश्व भर में क्या-क्या हो रहा है, कौन नहीं जानता? जब अमेरिका ने ईराक युद्ध के समय ‘एम्बेडेड पत्रकारिता’ की शुरुआत की तब विश्व भर के मीडिया हाउस और पत्रकार क्यों अमेरिका के खिलाफ एकजुट नहीं हो गए? जब मीडिया में ‘पेड न्यूज’ आती हैं तब निष्पक्षता और अभिव्यक्ति की आजादी जैसी बातें कहाँ खो जातीं हैं? जब शनैः – शनैः विश्व भर में मीडिया का व्यापारीकरण हो रहा था तब सारे बुद्धिजीवी किस बिल में घुसे थे? और आज भी मीडिया स्वयं सुधार की कितनी बात करता है? विश्व भर में लगभग सभी लोकतान्त्रिक देशों में चुनावों में राजनीतिक दलों के द्वारा, चुनाव के बाद सरकार के द्वारा और विभिन्न कंपनियों इत्यादि के द्वारा जब प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से मीडिया को खरीदा जाता है, बोली लगायी जाती है तब मीडिया की आजादी और निष्पक्षता की बातें क्यों सामने नहीं आतीं? क्या इस सबके लिए मीडिया स्वयं जिम्मेदार नहीं है? मीडिया विश्वसनीयता खो रहा है, इसमे संदेह नहीं. यदि आप स्वयं पर नियंत्रण नहीं रख सकते तो आप सामने वाले से नैतिकता की अपेक्षा कैसे रख सकते हैं? विश्व भर के विभिन्न मीडिया मुगलों ने अपने मीडिया हाउसेस के दम पर और क्या – क्या व्यापार फैला रखे हैं, कौन नहीं जानता? क्या मीडिया की ताकत का स्व-हित के लिए उपयोग उसकी छवि ख़राब नहीं करता? कितने मीडिया हॉउस हैं जो मीडिया को ‘सूचना का अधिकार अधिनियम’ के अंतर्गत लाने की पहल करेंगे? कितने मीडिया मुग़ल हैं जो स्वयं के जीवन में पारदर्शिता व इमानदारी लाकर समाज के सामने उदाहरण पेश करने के लिए तैयार हैं? क्या वे अपनी व अपने परिवार की परिसंपत्तियों आदि की जानकारी सार्वजनिक करने के लिए तैयार हैं? मीडिया अपनी निष्पक्षता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, इमानदारी, सच्चाई जैसे गुणों को लेकर चयनात्मक (Selective) नहीं हो सकता. अमेरिका और विकसित देशों ने वैश्विक स्तर पर अपनी प्रभुत्ववादी सोच और संस्कृति के द्वारा पत्रकारिता को को कितना और किस तरह से नुकसान पहुँचाया है, किसी से छिपा नहीं है. मीडिया अपनी खोती विश्वसनीयता और गिरती साख के लिए स्वयं जिम्मेदार है.
जब मीडिया अपनी विश्वसनीयता, निष्पक्षता, स्वतंत्रता इत्यादि खोता ही जा रहा है तब उसे इस सबकी कीमत तो चुकानी ही होगी. मीडिया को देशों की सीमाओं से परे जाकर वैश्विक स्तर पर गोलबंदी करनी होगी और सत्ताधारियों, बाहुबलियों, पूंजीपतियों आदि के हाथों का खिलौना बनने से बचना होगा. जब मीडिया के भीतर सत्य की शक्ति नहीं बचेगी तो फिर तो उसकी आत्मा को कभी गोलियों और कभी गालियों से छलनी हो ही जाना पड़ेगा. मीडिया को अपनी सोच, कथनी व करनी में एकरूपता और इमानदारी लाना ही होगी. मीडिया को इस बात पर आत्म मंथन करना ही होगा कि अब कैसे लोहे के कुछ गर्म टुकड़े उसकी आत्मा को बेधने में सफल होने लगे? क्यों उन आतंकियों के हाथ नहीं कांपते जो मीडिया की आवाज को बन्दूक की गोली से दबा देना चाहते हैं?

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