लेखक परिचय

अंकुर विजयवर्गीय

अंकुर विजयवर्गीय

टाइम्स ऑफ इंडिया से रिपोर्टर के तौर पर पत्रकारिता की विधिवत शुरुआत। वहां से दूरदर्शन पहुंचे ओर उसके बाद जी न्यूज और जी नेटवर्क के क्षेत्रीय चैनल जी 24 घंटे छत्तीसगढ़ के भोपाल संवाददाता के तौर पर कार्य। इसी बीच होशंगाबाद के पास बांद्राभान में नर्मदा बचाओ आंदोलन में मेधा पाटकर के साथ कुछ समय तक काम किया। दिल्ली और अखबार का प्रेम एक बार फिर से दिल्ली ले आया। फिर पांच साल हिन्दुस्तान टाइम्स के लिए काम किया। अपने जुदा अंदाज की रिपोर्टिंग के चलते भोपाल और दिल्ली के राजनीतिक हलकों में खास पहचान। लिखने का शौक पत्रकारिता में ले आया और अब पत्रकारिता में इस लिखने के शौक को जिंदा रखे हुए है। साहित्य से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं, लेकिन फिर भी साहित्य और खास तौर पर हिन्दी सहित्य को युवाओं के बीच लोकप्रिय बनाने की उत्कट इच्छा। पत्रकार एवं संस्कृतिकर्मी संजय द्विवेदी पर एकाग्र पुस्तक “कुछ तो लोग कहेंगे” का संपादन। विभिन्न सामाजिक संगठनों से संबंद्वता। संप्रति – सहायक संपादक (डिजिटल), दिल्ली प्रेस समूह, ई-3, रानी झांसी मार्ग, झंडेवालान एस्टेट, नई दिल्ली-110055

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-अंकुर विजयवर्गीय-
petrol

इराक में ढाई दशक से जारी अशांति और उथल पुथल के बावजूद भारत ने कच्चे तेल की अपनी मांग को पूरा करने के लिये न तो कोई वैकल्पिक स्त्रोत तलाश किया और न ही इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर होने के उपाय किये, जिसके कारण वहां जारी गृहयुद्ध आज हमारे लिए बडा संकट बन गया है। इराक भारत का पुराना मित्र है और भारत के कच्चे तेल की मांग को बहुत हद तक वही पूरा करता है। भारत को इराक से तेल आयात करने में इसलिये भी फायदा होता है कि वहां उसे तेल की कीमत डॉलर में नहीं, बल्कि रुपये में चुकानी पड़ती है, जिसका सीधा लाभ उसके विदेशी मुद्रा भंडार को मिलता है। अमेरिका ने कुवैत के बहाने पूर्व राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन के शासनकाल में इराक पर जब हमला किया, उस समय भारत और इराक के विदेश मंत्री जिस गर्मजोशी से गले मिले, उससे पहली बार दुनिया को भारत-इराक की गहरी मित्रता का पता चला था। यदि इराक का संकट लंबा खिंचता है, तो भारत को अपनी तेल जरूरत के लिए दूसरे देशों का रुख करना पड़ेगा, लेकिन उसके लिए उसे डॉलर में कीमत चुकानी पड़ेगी। इसका सीधा असर भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ेगा, साथ ही रुपया भी कमजोर होगा। नई सरकार आने के बाद रुपये की स्थिति मजबूत होनी शुरू हो गई थी, लेकिन जब से इराक में हिंसा का नया दौर शुरू हुआ, तब से रुपया फिर से अपनी मजबूती खोता जा रहा है।

हमारे हुक्मरानों को मालूम है कि इराक के सहारे हमारी धड़कने ज्यादा देर तक स्वस्थ होकर नहीं चल सकती, तो हमने इराक से मिलने वाले ईंधन पर निर्भरता कम करके अपने लिए ईंधन क्षमता बढ़ाने की कोशिश क्यों नहीं की है। यह सही है कि हमारे यहां पिछले ढाई दशक में तेल उत्पादन क्षमता बढ़ी है, लेकिन खपत भी तो उसी गति से बढ़ी है। इसका मतलब यही हुआ कि हम आज भी ढाई दशक पहले वाली स्थिति में हैं। हमें उर्जा का उत्पादन बढ़ाना है और इस स्तर पर लाना है कि आयात पर हमारी निर्भरता कम हो। उर्जा और गैस उत्पादन के विकल्प पर काम करने की जरूरत है और जो संसाधन हमारे पास हैं, उन्हें मजबूत किया जाना जरूरी है। इराक पर निर्भरता सिर्फ तेल क्षेत्र में ही कम नहीं करनी है, बल्कि आर्थिक क्षेत्र में भी हमें तरक्की करनी है, ताकि हमारे लोग चंद पैसे के लिए जानबूझकर जान जोखिम में डालने को मजबूर नहीं हो।

यह सही है कि भारत और इराक के बीच की मित्रता का लाभ वहां पैसा कमाने की लालसा में गए भारतीयों को हर समय मिलता है, इसलिए हमारे लोग खाड़ी देशों का रुख करते हैं। कुवैत पर 1990 में इराक ने जब हल्ला बोला था, तो लाखों भारतीयों को आपात स्थिति में वहां से निकाला गया। इसके करीब एक दशक बाद यानी 2003 में जूनियर बुश ने इराक को निशाना बनाया, तो उस समय भी भारतीयों को वहां से निकाल लिया गया। इसका फायदा वर्ष 2006 में लेबनान युद्ध के समय भी मिला, जब वहां फंसे भारतीयों को विशेष ऑपरेशन के जरिए आसानी से वापस लाया गया। इस बार की स्थिति एकदम भिन्न है। अमेरिकी नेतृत्व वाली विदेशी सेना वहां से वापस जा चुकी है। अमेरिका पहले की गलती दोहराएगा नहीं, इसलिए 2003 वाली स्थिति पैदा नहीं होने देगा। अमेरिका के बचाव के रुख का फायदा विद्रोहियों को मिल रहा है और उन पर नकेल कसना मुश्किल हो गया है। विद्रोही इतना उग्र पहले कभी नहीं थे और इस तरह से शहर दर शहर पर कब्जा पहले उन्होंने कभी नहीं किया था। सेना उनके सामने बहुत कमजोर पड़ रही है। इराकी सेना पर वहां के विद्रोहियों और आम आदमी को विश्वास भी नहीं रह गया है। अमेरिका हालात देखकर जान बचाने की फिराक में था और उसने इराक को सुरक्षित कहते हुए अपनी सेना वापस बुला ली थी, लेकिन वास्तविकता यह है कि तब भी इराक में कमोबेश आज की ही जैसी स्थिति थी।

इराक पूरी तरह से तीन टुकडों में विभाजित होने की कगार पर है। एक कुर्द क्षेत्र है, जहां लंबे समय से कुर्द अलग देश की मांग कर रहे हैं और कुर्द गुरिल्ला लगातार हिंसा फैलाते रहे हैं। तानाशाह सद्दाम हुसैन के सामने उनकी हिम्मत नहीं होती थी और अमेरिकी सेना को वे धमाके करके अपनी मौजूदगी का परिचय दे रहे थे। दूसरा शिया क्षेत्र और तीसरा सुन्नी क्षेत्र है। कुर्द गुरिल्ला तेल के बड़े भंडार वाले किरकुक क्षेत्र पर कब्जा कर चुके हैं। इराक में प्रधानमंत्री नूर अल मलिकी के नेतृत्व में शिया प्रभुत्ववाली सरकार है, जो पूरी तरह से भेदभाव के आधार पर काम कर रही है और वहां सुन्नी अल्पसंख्यकों के लिए कोई जगह नजर नहीं आती है। मलिकी की सरकार सबको साथ लेकर चलने की बजाए सिर्फ शिया समुदाय को लेकर ही चल रही है जिससे सुन्नी समुदाय में असंतोष बढ़ रहा है।

सुन्नी विद्रोहियों के संगठन इस्लामिक स्टेट इन इराक एंड द लेवांत (आईएसआईएल) के हजारों लड़ाके देश के उत्तर और पश्चिम के सुन्नी बहुल प्रांतों मे अपना जबरदस्त प्रभाव बनाए हुए हैं और उनके कब्जे वाले क्षेत्रों में प्रधानमंत्री मलिकी की सेना की कुछ नहीं चल रही है। इन विद्रोहियों के सामने सेना बहुत कमजोर पड़ गई है और उसके पास जेहादियों की तरह का आत्मविश्वास और जुझरूपन भी नहीं है। आए दिन होने वाले बम धमाकों से सेना पहले से पस्त हो चुकी है। इराक में जो अस्थिर हालात हैं, उनका जल्द से जल्द शांत होना जरूरी है। यह सिर्फ 3,000 भारतीय नागरिकों की जिंदगी का सवाल नहीं, बल्कि उन सभी देशों के निवासियों के हित से जुड़ा है, जिनकी अर्थव्यवस्था अंतरराष्ट्रीय मापदंडों से हर क्षण प्रभावित होती है। हमारे देश का शेयर बाजार भी प्रभावित हो रहा है। हालात बदलने के लिए स्थाई समाधान की कोशिश न सिर्फ वहां की सरकार को, बल्कि तमाम लोकतांत्रिक देशों के नुमाइंदों को करनी चाहिए।

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