लेखक परिचय

अरुण जेटली

अरुण जेटली

दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय छात्र संघ के लोकप्रिय अध्‍यक्ष रहे जेटली जी ने छात्र-युवा संघर्ष वाहिनी के अध्‍यक्ष के नाते आपातकाल के विरोध में सशक्‍त संघर्ष किया। आप देश के जाने-माने वकील एवं राजनेता हैं। एनडीए शासन के दौरान केन्‍द्रीय कानून मंत्री का दायित्‍व संभाल चुके जेटली जी अपनी वाक्पटुता और कुशल चुनावी प्रबंधन के लिए मशहूर हैं। विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं में समसामयिक मुद्दों पर आप लेख लिखकर जन-जागरण का काम सहजता से करते रहते हैं। संप्रति : राज्‍यसभा में विपक्ष के नेता

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अरूण जेटली

भारत के उच्चतम न्यायालय ने छत्तीसगढ़ राज्य द्वारा विशेष पुलिस अधिकारियों की नियुक्ति को गैर-संवैधानिक और संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के विरूध्द बताकर रद्द कर दिया है। उच्चतम न्यायालय के निर्णय का असर यह हुआ कि छत्तीसगढ़ राज्य और इन्हीं हालात में देश के अन्य भागों में कार्य कर रही विशेष पुलिस अधिकारी संस्था बंद हो जाएगी। विशेष पुलिस अधिकारी उन क्षेत्रों में नियुक्त किए गए हैं, जहां पर उपद्रवों से वातावरण को खतरा पैदा हो गया है, ताकि वे अपनी स्वयं की तथा अपने साथी नागरिकों की रक्षा करके नियमित पुलिस के कृत्यों का निवर्हन कर सकें। जम्मू और कश्मीर में यही विशेष पुलिस अधिकारी ही ग्राम रक्षा समितियों का गठन करते हैं जो ग्रामवासियों की विद्रोहियों से रक्षा करती हैं। बगावत के दिनों में पंजाब में भी इसी तंत्र का कारगर ढंग से उपयोग किया गया था। विशेष पुलिस अधिकारी एक ऐसी प्रणाली है, जिसमें समुदाय के सदस्यों को समुदाय की रक्षा करने हेतु शक्तियां प्रदान की जाती हैं। पुलिसमैन हर घर या हर गांव में उपस्थित नहीं रह सकते। जिन क्षेत्रों में विद्रोह के कारण शांति और सुरक्षा भंग होने की आशंका होती है, वहीं पर विशेष पुलिस अधिकारियों की नियुक्ति करना जरूरी होता है।

पुलिस अधिनियम 1861 में विशेष पुलिस अधिकारियों की नियुक्ति करने के प्रावधान हैं। विभिन्न राज्य के पुलिस कानूनों में इस प्रकार के विशेष पुलिस अधिकारियों की नियुक्ति करने के ऐसे प्रावधान हैं। कानूनों की भाषा अलग-अलग हो सकती है। जो लोग भारत की वास्तविक स्थिति से परिचित हैं, वे ऐसे विशेष पुलिस अधिकारियों की उपयोगिता को बखूबी समझते हैं। वे समुदाय की रक्षा के लिए समुदाय के प्रतिनिधि होते हैं। वे आम पुलिस प्रशासन के पूरक हैं।

उच्चतम न्यायालय के निर्णय से संकट की स्थिति पैदा हो गई है। राज्य को अब विशेष पुलिस अधिकारियों से हथियार वापस वसूलने पड़ेंगे। यह स्वयं में एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। प्रत्येक विशेष पुलिस अधिकारी यह महसूस करता है कि वह माओवादियों की हिट लिस्ट में होगा। उसके पास केवल दो ही विकल्प बचे हैं – या तो वह माओवादियों में शामिल हो जाए या माओवादियों से अपने आप को बचाने के लिए अपने हथियारों को अपने पास ही रखें। बिना राज्य के समर्थन से अथवा अपने-आप की रक्षा के लिए बिना हथियारों के ये विशेष पुलिस अधिकारी अब सिटिंग डक्स बनकर रहेंगे। माओवादियों के विरूध्द लड़ाई भारत देश के विरूध्द लड़ाई हो जाएगी। अब माओवादी विशेष पुलिस अधिकारियों को आम माफी देने के लिए शर्तें निर्धारित कर रहे हैं। उनकी बर्खास्ती से हुए खाली स्थान स्थानीय पुलिस के द्वारा आसानी से नहीं भरे जा सकते।

उच्चतम न्यायालय के निर्णय को पढ़ने से प्रथम दृष्टतया यह पता चलता है कि निर्णय देने वाले की विचारधारा संविधानवाद पर भारी पड़ी हैं। इससे उत्पन्न होने वाला जायज़ प्रश्न यह है कि क्या न्यायालय संविधान को लागू करते है या वे अपनी विचारधारा के अनुपालन को बाध्य बनाते हैं। माओवादी सुधारक नहीं हैं। उनका प्रमुख उद्देश्य भारतीय संसदीय लोकतंत्र को बर्बाद करना है और भारत में एक साम्यवादी तानाशाही स्थापित करना है। माओवादी प्रत्येक सुस्थापित लोकतांत्रिक संस्था को बर्बाद करता है। यदि माओवादियों का भारत पर कब्जा हो जाता है, तो निर्णय देने वाला तथा उनकी तरह अन्य विद्वान जज उच्चतम न्यायालय में नहीं रह पायेंगे। न्यायालय पर विचारधारा और माओवादियों की विचारधारा वाले लोगों का नियंत्रण होगा। निर्णय पढ़ने में स्वत: ही बहुत दिलचस्प है। यह विचारधारा सम्बन्धी औचित्य है कि माओवादी क्यों अस्तित्व में हैं और वे अपने हितों के लिए क्यों लड़ रहे हैं। ऐसा करना उन लोगों की भर्त्सना करना है जो माओवादियों से लड़ते हैं। निर्णय में बताया गया है –

”छत्तीसगढ़ राज्य का दावा है कि उसे अनिश्चित काल के लिए अत्याचार करने, मानव अधिकारों का घोर उल्लंघन करने का उसी तरीके से, उसी ढंग से अधिकार प्राप्त है, जो माओवादी अपनाते हैं।”

इसमें आगे बताया गया है – ”संसाधनों से भरपूर अफ्रीकी उष्ण कटिबंधीय वनों की पृष्ठभूमि को ध्यान में रखते हुए यूरापीय शक्तियों की साम्राज्यवादी-पूंजीवादी-विस्तारवादी नीति के द्वारा ब्रुटल आइवरी ट्रेड को बढ़ाने की दृष्टि से जोसेफ कोनार्ड इसे भयावह एवं वीभत्स मनोदशा बताता है और उन व्यक्तियों द्वारा न्यायोचित बताता है, जो बिना औचित्य के शक्ति हासिल करते हैं और उसका इस्तेमाल करते हैं। उसमें मानवता और किसी प्रकार के संतुलन का ध्यान नहीं रखा जाता।”

निर्णय में माओवादी विचारधारा को यह बताते हुए उचित बताया गया है –

”लोग किसी राज्य या अन्य लोगों के खिलाफ बिना किसी ठोस कारण या औचित्य के संगठित रूप में हथियार नहीं उठाते। जीवित रहने की इच्छा को ध्यान में रखते हुए और थॉमस होब्स के अनुसार हमारी आत्मा में अव्यवस्था के डर के रहते हम एक व्यवस्था चाहते हैं। तथापि, जब वह व्यवस्था अमानवीयकरण, कमजोर, गरीब और वंचित लोगों पर सभी प्रकार के अत्याचार ढहाने से आती है, तो लोग विद्रोह करते हैं।”

निर्णय में स्वीकृति के तौर पर ”दि डार्क साइड ऑफ ग्लोबलाइजेशन” नामक पुस्तक का उल्लेख किया गया है, जिसमें यह बताया गया है – ‘इस प्रकार, उसी प्रकार के मुद्दे, विशेषरूप की राजनीति, हिंसात्मक आन्दोलन की राजनीति तथा सशस्त्र विद्रोह को बढ़ावा मिलता है। क्या भारत में सरकारें और राजनीतिक पार्टियां सामाजिक-आर्थिक डायनीमिक, जो इस प्रकार की राजनीति को प्रोत्साहित करती हैं, को समझने में सक्षम हैं अथवा क्या वे सुरक्षा-उन्मुख रवैया ही अपनाएगी, जो उन्हें और अधिक भड़काता है ?”

निर्णय में बाध्यकारी रवैये की निंदा की गई है, जहां यह बताया गया है –

”इस प्रकार की सलाह, जो हमारे संविधान के अनुरूप है, को मानने के बजाय हमने वर्तमान मामले में जो देखा है, वह बाहुबल और हिंसात्मक स्टेटक्राफ्ट की अपरिहार्यता को बार-बार बताना है। समस्या का असली कारण और उसका समाधान कहीं और है। आधुनिक नव-उदारवादी विचारधारा द्वारा सृजित अनियंत्रित स्वार्थ और लालच की संस्कृति और खपत के निरंतर बढ़ते स्पाइरल्स संबंधी इन झूठे आश्वासनों से कि इनसे आर्थिक विकास होगा और प्रत्येक व्यक्ति का उत्थान होगा, सामान्य रूप से भारत के अधिकांश क्षेत्रों में और विशेष रूप से छत्तीसगढ़ में सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक रूप से ये अस्थिर परिस्थितियां मजबूत होंगी।”

निर्णय में भारत की कमजोर राष्ट्रीय सुरक्षा को चुनौती दी गई है। नि:संदेह जजों ने राजनीतिक क्षेत्र में प्रवेश किया है। न्यायालय ने एक विचारधारा बनाई है। इसने आर्थिक नीति का एक पसंदीदा तरीका चुना है। इसने कार्यपालिका के ज्ञान को अपना ज्ञान माना, जिसके तहत माओवाद से कैसे निपटा जा सकता है। निर्णय में शक्तियों को अलग करने के मूल संवैधानिक विशिष्टता को नकारा गया है।

उच्चतम न्यायालय द्वारा घोषित कानून, जो सभी अधीनस्थ प्राधिकरणों के लिए अब बाध्यकारी है, इस प्रकार है – ‘राज्य द्वारा संवैधानिक मानदंडों और मूल्यों का प्रत्यक्ष रूप से उल्लंघन करके समर्थित और संबंधित पूंजीवाद का विनष्टकारी रूप प्राय: अतिरिक्त सक्रिय उद्योगों के इर्द-गिर्द गहरी जड़ें लेता है।”

एक विस्तृत वैचारिक चर्चा के बाद न्यायालय ने विशेष पुलिस अधिकारियों की तैनाती में खामियां पाई हैं। हालांकि, केन्द्र और राज्य के कानून इस संबंध में विशिष्ट शक्तियां प्रदान करते हैं। इसे अनुच्छेद 14 का उल्लंघन बताया गया है क्योंकि आदिवासियों में कम शिक्षित युवाओं को ये नियुक्तियां दी जा रही हैं। इसे अनुच्छेद 21 के तहत जीने और स्वतंत्रता के अधिकार का हनन माना गया है क्योंकि विशेष पुलिस अधिकारियों की शैक्षिक योग्यता कम है और उनसे माओवाद से लड़ने के खतरे को समझने की अपेक्षा नहीं की जा सकती। ऐसे विशेष पुलिस अधिकारियों को नौकरी देने से उनका जीवन और अन्य लोगों का जीवन खतरे में पड़ सकता है और इस प्रकार से उन्हें प्रोत्साहित करना अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है। इस कठिन कार्य को करने के लिए मानदेय का भुगतान किया जाना उनकी नियुक्तियों को रद्द करने का एक अन्य कारण है।

यदि न्यायालय ने मानदेय को अपर्याप्त माना है तो वह और अधिक मानवीय मानदेय दिए जाने के लिए निर्देश दे सकता था। यदि न्यायालय ने यह पाया कि विशेष पुलिस अधिकारी बनने के लिए शैक्षिक योग्यताएं अपर्याप्त हैं, तो वह राज्य को एक ऐसी नीति बनाने का निर्देश दे सकता था ताकि उचित योग्यता वाले व्यक्तियों को ही विशेष पुलिस अधिकारी नियुक्त किया जाए।

न्यायालय ने यह महसूस नहीं किया कि विशेष पुलिस अधिकारियों सहित आम नागरिकों के जीवन को माओवादियों से खतरा है। उनका जीवन और स्वतंत्रता पहले से ही खतरे में है। विशेष पुलिस अधिकारियों को उपलब्ध सुविधा से वे अपने आपको और अन्य लोगों को माओवादी हमले से बचा सकते थे। परन्तु उच्चतम न्यायालय के निर्णय के कारण इसका फायदा माओवादियों को मिला है।

निर्णय को पढ़ने से नि:संदेह यह पता चलता है कि असंवैधानिकता के आधार पर विशेष पुलिस अधिकारियों की संस्था को समाप्त करने के कारण कमजोर हैं। निर्णय का औचित्य विचारधारा है न कि संविधान। जब कोई न्यायालय एक विचारधारा बना लेता है तो वह एक नीति बनाना तय कर लेता है। वह शक्तियों को अलग करने के संवैधानिक आदेश को नहीं मानता। वह विधानमंडल और कार्यपालिका के क्षेत्र में दाखिल हो जाता है। इस निर्णय में बताए गए औचित्य से संवैधानिक संतुलन बिगड़ गया है। यदि किसी जज की विचारधारा संवैधानिकता तय करती है, तो जज का सामाजिक एवं राजनीतिक दर्शनशास्त्र प्रासंगिक हो जाता है। जब किसी जज का सामाजिक दर्शनशास्त्र प्रासंगिक हो जाता है तो यह आपको आपातकाल लगाए जाने के पूर्व के दिनों की याद दिलाता है। यदि न्यायपालिका संविधान की जगह सामाजिक-राजनीतिक विचारधारा के प्रति वचनबध्द हो जाए तो न्यायिक स्वतंत्रता को इससे बड़ा खतरा और कोई नहीं है। भारत की राजनीतिक प्रक्रिया और संसद को इस निर्णय के परिणामों पर गम्भीरतापूर्वक विचार करना चाहिए।

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6 Comments on "क्या न्यायालय विचारधारा के अनुपालन को बाध्य कर सकता है"

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Javed Usmani
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जेटली जी ने फैसले को लेकर जो सवाल उठाये हैं , उसने फैसले को दोबारा पढ़ने पर मजबूर कर दिया हैं . राजनीती और कानून दो अलग चीजे हैं और जेटली जी को दोनों में महारत हासिल हैं , इन दोनों का किसी विषय को देखने का नजरिया भी अलग हैं .पर दोनों की अदा एक हैं . दोनों की इच्छा अपने लिए अनुकूलता की हैं जिसका व्यवाहरिक सच्चाई से कुछ लेना देना नहीं हैं .

vimlesh
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vimlesh
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नकली नोट रिजर्व बैंक और सरकार April 10th, २०११ देश के रिज़र्व बैंक के वाल्ट पर सीबीआई ने छापा डाला. उसे वहां पांच सौ और हज़ार रुपये के नक़ली नोट मिले. वरिष्ठ अधिकारियों से सीबीआई ने पूछताछ भी की. दरअसल सीबीआई ने नेपाल-भारत सीमा के साठ से सत्तर विभिन्न बैंकों की शाखाओं पर छापा डाला था, जहां से नक़ली नोटों का कारोबार चल रहा था. इन बैंकों के अधिकारियों ने सीबीआई से कहा कि उन्हें ये नक़ली नोट भारत के रिजर्व बैंक से मिल रहे हैं. इस पूरी घटना को भारत सरकार ने देश से और देश की संसद से… Read more »
आर. सिंह
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यह सही है की अरुण जेटली एक ऐसे वकील का नाम है ,जिनके तर्क को काटने की जुर्रत करना किसी भी आम आदमी के बूते के बाहर की बात है.अरुण जेटली एक ऐसे राजनेता का नाम है जिनकी छवि अब तक साफ़ सुथरी मानी जाती है ,फिर भी विमलेश जी ने अपनी टूटी फूटी भाषा में जो समझाने की कोशिश की है वह प्रसंशा के योग्य है.अरुण जेटली साहब के लिए इन संशयों का समुचित समाधान कठिन नहीं होना चाहिए.एक अन्य प्रश्न भी मैं उठाना चाहूंगा.वह यह की श्री अरुण जेटली भी मानते हैं की ये तथाकथित बिशेष पुलिस अधिकारी… Read more »
vimlesh
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जेटली जी सादर अभिवादन आप जैसे लोगो से सवाल जवाब करने की हम जैसो में जुर्रत नही ,और निश्चय ही आपकी छवि एक बेदाग राजनेता की है . मै अरुण जेटली से नही उस बेदाग छवि वाले राज नेता से चंद समाधान पाने की अपेक्षा करते हुए आपके लेख की ही चंद लाइने ले रहा हू -+-+-+-+-+-+-++-+-++–++–+ माओवादी सुधारक नहीं हैं। उनका प्रमुख उद्देश्य भारतीय संसदीय लोकतंत्र को बर्बाद करना है और भारत में एक साम्यवादी तानाशाही स्थापित करना है। लोक + तंत्र सर जी यह देश के कौन से हिस्से में पाया जाता है इसका स्वरूप ,स्वभाव कैसा है… Read more »
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