लेखक परिचय

डॉ. मनोज कुमार तिवारी

डॉ. मनोज कुमार तिवारी

सिविल लाइन, गुडग़ांव

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चिंतनशीलता, वैचारिक गतिशिलता हमेशा से एक ‘नई दुनिया’ की खोज के रूप में व्यैक्तिक व सामुहिक प्रयास का फल रहा है। लेकिन, इस संदर्भ में हमेशा से इस बात की चिंता रही है कि चिंतन व विचार-प्रवाह की मुखरता-स्वतंत्रता कहीं भी और किसी भी स्तर पर न बाधित हो, न एेसा दिखे और न दबाव में रहे। हर युग में नई विचारधाराओं का उद्भव व उसका प्रसार मौजूद संचार प्रणाली या व्यवस्था पर निर्भर करता है। चुकि, वैचारिक प्रवाह का सामाजिक परिवर्तन के दिशा निर्धारण में भूमिका और उस कालखंड विशेष के इतिहास से उसका पारस्परिक संबंध होते हैं। सामाजिक परिवर्तन और वैचारिक गतिशिलता की प्रक्रिया, उनके पीछे अंतर्निहित सामाजिक शक्तियां, उनका राजव्यवस्था, अर्थतंत्र, संस्कृति, साहित्य से अंतर्संबंध और इनकी विवेकपूर्ण समझ समग्र रूप से इतिहास बोध है, जो अपने समय के बाद के काल खंड में भी प्रसांगिक बना रहता है।

विचारों की स्वतंत्रता और परस्पर संवाद प्रक्रिया किसी भी समस्या  के निदान के लिए ऊर्जा प्रदान करते हैं। याद करें, जब राम, सीता और लक्ष्मण के साथ अपने पिता-माता की आज्ञा के बाद वन को चले गए।  इस सूचना की प्राप्ति के बाद भाई भरत भारी विषाद में पड़ गए।  ऐसी स्थिति में भरत ज्ञान और जीवन-दर्शन की सभी बातें, सभी रहस्य भूल गए।  चित्रकूट जाकर राम से संपर्क और संवाद  कर उन्हें मनाने तथा स्वयं के मन पर निर्बाध रूप से पड़ रहे ग्लानि भाव के असह्य बोझ को हल्का कर लेने की उनकी मंशा को गुरुजनों, माताओं व वरिष्ठों तक ने सहर्ष स्वीकार कर लिया।  गुरु और विद्वतजन यह जानते थे कि समय से पहले राम का वापस अयोध्या लौटना मुमकिन नहीं है, फिर भी  किसी ने इसका विरोध नहीं किया।  और चित्रकूट की सभा में भरत के मार्मिक प्रस्ताव के बाद राम की उक्ति- ‘‘ तात तुम्हहि मैं जानउं नीके ।  करौं काह असमंजस जी के। ’’ के बाद भरत के पास  निर्मल मन से अयोध्या लौटने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं रहा।  परस्पर संवाद  हर समस्या के निदान में सहायक रहा है और उसकी महता भी हर युग में रही है। वर्तमान में जहां समाज व मनुष्य आर्थिक रूप से संपन्न हुआ है वहीं, परिस्थितिवश रहन-सहन, बात-व्यवहार में वह अधिक से अधिक एकाकी भी हुआ है।  इस परिवेश में और व्यवहार में वह कितना ज्ञानी, कितना समझदार हुआ यह निश्चय ही विवेचन का विषय है, पर उसकी वैचारिक-मानसिक समस्याएं पहाड़-सी हुईं हैं, इसमें कोई संदेह नहीं रहा है।  उदाहरण के रूप में यह तथ्य आंखें खोलने वाला है कि मात्र भारतवर्ष जैसे अविनाशी, अलौकिक और  जिज्ञासू देश में प्रतिवर्ष करीब डेढ़ लाख लोग आत्महत्या कर लेते हैं। इस युग में कोई राम, कोई कृष्ण, कोई  गुरु वशिष्ठ तो सर्वसुलभ रहे नहीं, जो मनुष्य के अनंत विचारों व उसके दिमाग में उठ रहे तमाम प्रश्नों  के झंझावात से मन की बोझ को हल्का कर सके। पर, भला हो साइवर दुनिया का, जिसने काफी हद तक मुनष्यक के एकाकीपन को, उनके अविचल-चंचल मन की दुनिया को, उनके जिज्ञासाओं को एक ठौर प्रदान किया।  वेब मीडिया ने सुलभ रूप से, सर्वत्र और 24 घंटे सूचना-संचार का एेसा मौका प्रदान किया है जो सभी के पहुंच में है।

बड़ी आबादी को मिला सुविधाओं का लाभ

उदारीकरण के दौर में जब कंप्यूटर और इंटरनेट का पूरी दुनिया में विस्तार हो रहा था तो भारत मेंभी लोगों से इसका स्वागत किया।  हालांकि कुछ लोगों को यह डर भी सता रहा था कि कंप्यूटर के विस्तार के चलते भारत जैसे आबादी वाले देश में रोजगार के अवसर कम होंगे और लोगों की परेशानी बढ़ेगी।  हालांकि, समय के साथ यह चिंताएं नकारा रहीं।  उल्टे, भारत के संरचनात्मक, परिवहन, सूचना-संचार और सेवा क्षेत्र में कंप्यूटर व साइवर एप्लीकेशन सिस्टम ने जो सहुलियतें प्रदान की वह यहां की भारी आबादी के लिए एक प्रकार से वरदान साबित हुईं।  देश में एक ही स्थान से केंद्रीकृत ट्रेन-वायुयान  आरक्षण सिस्टम, डिजीटल जन संचार सेवा, सूचना तंत्र, अंतरिक्ष विज्ञान, औद्योगिक विस्तार, मनोरंजन, बैंकिंग, पत्रकारिता आदि एसे तमाम क्षेत्र हैं, जहां वेब तकनीक के  प्रयोग ने करोड़ों लोगों के जीवन को आसान बनाया।  लोगों ने भी अनिवार्य व व्यवहारिक  पक्ष के रूप से वेब मीडिया को स्वीकार्य किया। 1998 में राष्ट्रीय दूरसंचार नीति की घोषणा के बाद  जब देश में इंटरनेट की सुविधा के विस्तार का कार्यक्रम बना तो  इसका अंदाजा नहीं था कि आज करोड़ों लोग वेब माध्यम को ‘कर्ण के शरीर में व्याप्त कवच-कुंडल’ की तरह स्वीकार कर लेंगे।

वैचारिक एकाकीपन को दूर किया 

शुरुआती दिनों में इंटरनेट पर चंद भाषाओं में ही संवाद की सुविधा थी।  हालांकि, यह तय था कि जिस तरह डिजीटल सूचना तकनीक का विस्तार हो रहा है, उसमें देर-सवेर भारतीय भाषाओं खासकर हिन्दी में लेखन की सुविधा उपलब्ध हो जाएगी।  एेसा संभव नहीं था कि वैश्वीकरण के युग में एक अरब से ज्यादा लोग डिजीटल सूचना तकनीक का हिस्सा न बन सकें।  इंटरनेट पर हिन्दी का सफर इंदौर से शुरू हुआ और इस भाषा में प्रयोग की सुविधा उपलब्ध होते ही लोग और तेजी से वेब माध्यमों से जुडऩे लगे। फेसबुक और ट्वीटर जैसी सोशल साइटों ने तो आपसी संवाद की दुनिया को ही खोल दिया।  लोग तेजी से एक-दूसरे से जुडऩे लगे।  लाखों ऐसे जाने-पहचाने लोग जो वर्षों से एक-दूसरे से अलग थे, इस माध्यम से साथ आए।  जहां तेजी से सामूहिक आपसी संवाद कायम हुआ वहीं, विचारों-सूचनाओं का आदान-प्रदान भी हुआ। आपसी संवाद  के इस मंच ने जैसे जीवन के एकाकीपन को ही खत्म कर दिया।  ऑनलाइन किसी मुद्दे पर विचार रखना और दूसरे के विचार को जानना संभव हुआ।  समस्याएं हैं तो उनका ऑनलाइन समाधान भी हाजिर है और समाधान की कोशिश में लगे लाखों लोग भी सामने हैं। विपक्ष भी है और पक्ष भी।  माना कि अब समाज, गांव और संयुक्त परिवार की तरह रोज शाम को कहीं एक साथ बैठकर किसी मुद्दे या समस्या पर चर्चा नहीं होती।  लेकिन दिन हो या रात, सुबह हो या शाम, आठों पहर-चौबिसो घड़ी, एकल या सामुहिक आप ऑनलाइन हैं।  इन मंचों ने वेब माध्यम की स्वीकारिता को आसमान-सी ऊंचाई प्रदान की है।

सूचनाएं छुप नहीं सकती…

पारंपरिक जन संचार माध्यम (इलेक्ट्रानिक व प्रिंट मीडिया) जैसे सांगठनिक क्षेत्र जो नियंत्रित सूचनाएं प्रदान तो करते थे लेकिन वे संवाद का माध्यम नहीं बन सके थे। ऐसे माध्यमों पर लोगों की निर्भरता कम हुई है। लेकिन वेब माध्यमों के चलते  मानो अब आजाद पंछी की तरह नीले आकाश में स्वछंद विचरण का रास्ता खुल गया।  इरादतन या गैरइरादतन सूचनाएं छुपाने, घटनाओं को तोड़-मरोडक़र पेश करने की अब कोई भी कोशिश कामयाब नहीं हो सकती।  उदाहरणस्वरूप, बीते दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की न्यूयार्क यात्रा के दौरान मैडिसन एस्क्वायर गार्डन के बाहर भारतीय पत्रकार राजदीप सरदेसाई और एनआरआई महेंद्र नामक एक व्यक्ति के बीच कहासुनी की खबर को तत्काल कुछ न्यूज चैनलों ने दिखाया।  इस खबर में बताया गया कि भारतीय पत्रकार पर हमला करने वाले मोदी समर्थक थे।  न्यूज चैनलों ने इस पर कुछ राजनीतिक पार्टियों के नेताओं की प्रतिक्रिया भी ली गई, जिसमें स्पष्ट तौर पर मोदी को फासिस्ट ताकतों का समर्थक तक बता दिया गया।  पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने भी इसे अपने ऊपर हमला बताया।  बाद  में जब सोशल मीडिया पर पूरी फुटेज जारी की गई तो पाया गया कि राजदीप सरदेसाई ने सबसे पहले आपा खोया और महेंद्र का  कॉलर पकडऩे की कोशिश की।  यह तो एक घटना है। एेसी न जाने कितनी घटनाएं  होंगी, जिन्हें सही तौर पर पेश नहीं किया जाता होगा।  इन तरह घटनाओं-सूचनाओं के उजागर होने से सोशल मीडिया की स्वीकार्यता बढ़ी है।

लोकसभा चुनाव-2014 में महत्वपूर्ण भूमिका

बीते लोकसभा चुनाव में सोशल मीडिया की भूमिका ने अपनी स्वीकार्यता को सिद्ध किया है।  इस माध्यम से करोड़ों लोग एक-दूसरे से जुड़े।  अपनी बातें भी सबके साथ रखी और सबकी बातें भी सुनी गईं। छात्रों-युवाओं, नौकरी-पेशा वाले लोगों जिन्हें  अब तक लोकतंत्रीय चुनाव प्रणाली में भाग लेने या फिर वोटिंग में रूचिहीन माना जाता था, इस वर्ग ने खुलकर भाग लिया।  सभी राजनीतिक पार्टियां, उम्मीदवारों ने भी वेब मीडिया पर अपने अकाउंट खोले और इसे चुनाव प्रचार का महत्वपूर्ण तंत्र माना।  चुनाव आयोग ने भी ऑनलाइन मतदाता सूची, सूचनाएं, निर्देश जनता के साथ साझा किए। यहां तक वोटिंग की प्रक्रिया को भी ऑनलाइन रखा गया और पल-पल की जानकारी दी गई।  इस कारण पहली बार पूरे देश में वोटिंग का प्रतिशत 65 के पार चला गया।  हालांकि, अन्ना आंदोलन के दौरान भी सोशल मीडिया ने लोगों को एकजुट करने में अपनी अहम भूमिका निभाई थी।

मत प्रकटीकरण का सुलभ साधन

1991 में पहली बार वेब सॉफ्टवेयर लॉच करने वाले टिम बर्नर्स-ली को भी शायद ही यह पता था कि वेब माध्यम दुनिया में विचारों के प्रकटीकरण का एेसा तंत्र बन जाएगा जो, जहां एक आेर लोगों की आसान पहुंच में होगा और दूसरी आेर किसी भी प्रकार के अवरोध से भी मुक्त होगा।  वेब माध्यमों ने जहां दुनिया के बड़े राजनीतिज्ञों, विचारकों, वैज्ञानिकों, कारीगरों, किसानों  आदि को अपने कृत्यों-उपलब्धियों को तत्काल प्रकट करने का सुलभ साधन प्रदान किया है वहीं, आंतकवादियों तक को  अपने विचारों-कृत्यों  को विश्व पटल पर रखने का मंच दिया है। यह आइना है, जिसके सामने जैसा रखा जाएगा वैसा ही प्रस्तुत होगा।  वेब मीडिया की स्वीकारिता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि आज दुनिया में 25 करोड़ से ज्यादा बेवसाइट सेवा में हैं।

तेजी से बदली सूचना-तंत्र की दुनिया

इंटरनेट के चलते दुनिया खासकर भारत में पत्रकारिता का पूरा स्वरूप ही बदल गया है।  एक समय था जब घटनाओं की जानकारी एक-एक सप्ताह बाद पाठकों-दशर््कों तक पहुंचती थी।  भारत जैसे वृहत-जटील देश में जानकारियों को एकत्रित करना और उसे संपादकीय विभाग तक पहुंचाना चुनौति भरा काम रहा है।  लेकिन मोबाइल और नेट की सर्वत्र पहुंच ने अत्यंत कम समय सूचनाओं का आदान-प्रदान संभव बनाया है।  यही कारण है कि कम लागत में आज  एक साथ अखबारों के कई-कई संस्करणों का प्रकाशन और  कई राज्यों व शहरों में न्यूज चैनलों का प्रसारण संभव हुआ है।  वेब मीडिया और ई-न्यूज वेबसाइटों ने पारंपरिक मीडिया घरानों के वर्चस्व को कमजोर किया है।  स्थिति यहां तक बन गई है कि अब हर मोबाइल और नेट का उपयोग करने वाला रिपोर्टर और फोटो पत्रकार बन गया है।  वेब मीडिया की बढ़ती लोकप्रियता और स्वीकार्यता का यह प्रमाण है।

सूचना-प्रौद्योगिकी अधिनियम -2000 का प्रभाव

सूचना-प्रौद्योगिकी की बढ़ती महत्ता को देखते हुए 17 अक्टूबर 2000 को देश में संवैधानिक प्रक्रिया के अंतगर्त इसे अधिनियमित किया गया।  इस अधिनियम के बाद इलेक्ट्रानिक रूप में किए गए संचार और कारोबार को कानूनी स्वीकार्यता मिली।  इससे पहले देश की न्याय व्यवस्था में केवल लिखे, टाइप किए या छपे हुए अभिलेख ही सबूत के रूप में स्वीकार था।  लेकिन इस अधिनियम के बाद डिजिटल हस्ताक्षर को भी न्यायालय ने मान्यता दे दी।  अधिनियम के तहत डिजिटल रूप में किसी भी सूचना, जानकारी एवं दस्तावेजों के आदान-प्रदान को कानूनी करार दिया गया।  इससे देश में ई-बिजनेस व ई-गवर्नेंस को गति मिली।  अधिनियम के तहत कंप्यूटर संबंधी सभी अपराधों को कानून के दायरे में ला दिया गया और सजा का प्रावधान भी किया गया।  किसी कंप्यूटर के मालिक की अनुमति के बिना किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ , डाटा चुराना, डाटा संपादित करना, सिस्टम फाइलों के साथ छेड़छाड़ करना, कंप्यूटर में वायरस डालना आदि को अपराध घोषित किया गया।  यही नहीं, बल्कि किसी भी प्रकार की अश्लील सूचना या तस्वीर आडियो-वीडियो या प्रिंट टेक्स्ट के रूप में कंप्यूटर और नेट पर छोडऩा या देखना तक अपराध घोषित किया गया है।  हालांकि, देश में कंप्यूटर क्रांति का समय 1990 से माना जाता है लेकिन इसे कानूनी जामा पहनाने में करीब दस साल लग गए।  इस कानून के प्रकाश में आने के बाद वेब मीडिया की उपयोगिता और स्वीकार्यता और बढ़ गई।

पुनश्च, वर्तमान युग विज्ञान और तकनीक का है।  चल रहे शोध व अध्ययन ने तकनीक को और परिमार्जित किया है।  लेकिन इतना तो तय है कि वही विद्धा या तकनीक लोकप्रिय या स्वीकार्य होंगी जो लोगों  की आसान पहुंच में हो।  चाहे वह वेब माध्यम हो या उसके स्थान पर कोई  अन्य साधन।  हालांकि वेब माध्यम की स्वतंत्रता की कुछ नाकारात्मक छवियां भी मौजूद हैं। लेकिन विवेकशील व्यक्ति इससे इनकार नहीं कर सकता कि वह धर्म (धारण करने योग्य) और नैतिकता के दायरे में ही अपनी आवश्यकताओं को रेखांकित करता है या करेगा।  अंतत: जब तक समाज और संस्कृति के क्षेत्र में परिवर्तन, नए चिंतन के प्रस्फुरण, विज्ञान, प्रविधि के क्षेत्र में नए अविष्कार, राजनीति, अर्थतंत्र के क्षेत्र में गतिशिलता की प्रक्रिया जारी है, तब तक बदलाव भी जारी रहने वाला है।

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