लेखक परिचय

डॉ. दीपक आचार्य

डॉ. दीपक आचार्य

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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डॉ. दीपक आचार्य

सब उल्लू बना रहे हैं एक-दूसरे को

मानवीय सभ्यता में जब तक पूर्ण अनुशासन के भाव विद्यमान थे तब तक हर व्यक्ति अपने-अपने काम में लगा रहता था। किसी को भी फालतू चर्चाएं करने और बेकार बैठे रहने की फुरसत नहीं थी और न ही उस जमाने में लोगों को निरर्थक चर्चाओं और बकवास में विश्वास था।

वे अपने जीवन के एक-एक क्षण का पूरा-पूरा सदुपयोग करने की कला को जानते थे और इसीलिए इतिहास में उनका नाम अमिट है वहीं उनके व्यक्तित्व और कर्मयोग की गंध आज भी महसूस की जा सकती है। आज भी लोग पूरी शिद्दत के साथ उनका स्मरण करते हैं और पूरा आदर-सम्मान देते हुए नहीं अघाते।

उस जमाने में हर व्यक्ति का जीवन मर्यादाओं और अनुशासन की सुरक्षा परिधि में पल्लवित, पुष्पित और फलित होता था और पूरे समाज को इसका लाभ प्राप्त होता था। आने वाली पीढ़ियाँ भी उनका अनुसरण करते हुए अपना उनका गौरव और अपनी गरिमा बनाए रखती थीं जिन पर आज भी हम गर्व करने को विवश हैं।

भले ही हम अपने आपको सभ्य, लोकतांत्रिक और स्वतंत्र कहते हुए फूले नहीं समा रहे हैं लेकिन अन्तर्मन से हर व्यक्ति इस बात को स्वीकारता है कि कुछ नगण्य कमियों को छोड़ दिया जाए तो पुराना जमाना कितना बेहतर था जहाँ वैज्ञानिक विकास और यांत्रिक जनजीवन की कमी के बावजूद हर चेहरा प्रफुल्लित, निर्मल, निश्चिंत और मस्ती भरा था।

जहाँ पारस्परिक संवेदनशीलता, सामूहिक विकास की सोच और सकारात्मक माहौल बनाए रखने के लिए हर व्यक्ति पूरे मन से प्रयत्नशील रहता था। ये प्रयत्न भी आज की तरह छपास रोग से ग्रस्त या कीर्ति पाने के मोहताज नहीं हुआ करते थे बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और सांगठनिक जड़ों को मजबूत बनाए रखने के लिए आत्मीय भावना से सिंचन और समर्पण को साफ पढ़ा जा सकता था।

मूल्यहीनता और स्वार्थकेन्द्रित जड़ता के मौजूदा दौर में सब कुछ स्वाहा होता चला जा रहा है। आदमी आदमी को काटने दौड़ रहा है, लोग चाहते हैं अपना दबदबा बना रहे, इसलिए हर नाजायज धौंस और धमकियों का चलन बढ़ता जा रहा है, हराम की कमाई और मिथ्या प्रतिष्ठा ने अहंकार के रावण को दस की बजाय शतशीष कर दिया है। एक दूसरे को गुमराह कर, मूर्ख बना कर अथवा धौंस जमा कर अपने उल्लूओें को सीधा किया जा रहा है, शोषण तथा सामंती परंपराएं विकृत और वीभत्स स्वरूप में फिर मुँह दिखा रही हैं।

लगता है जैसे हर तरफ एक दूसरे को कुचलकर भी जमाने की नज़रों में खुद को ऊँचा दिखाने की मनोवृत्ति ने आदमी को आदमी ही नहीं रहने दिया है। आज आदमी कहीं से आदमी नहीं दिखता। उसका मन-मस्तिष्क, मनोवृत्तियाँ और व्यवहार सब कुछ बदल गया है।

आदमी होने का एकमात्र अर्थ यही रह गया है कि जैसे भी हो सके, अर्थसंग्रह और संपदा संग्रह करते हुए तरक्की की तस्वीर दिखाएं, अपने-अपने कबीलों को शहद चटाते हुए उनकी दीर्घायु और यश प्राप्ति के सारे जतन किए जाएं तथा उन सारे शिखरों पर कब्जा जमा लिया जाए जो औरों के भाग्य से भाग्यवानों के लिए बने हैं।

छीनने और झपटने की यह मानसिकता हमें कहाँ ले जाएगी, यह किसी को पता नहीं है, जिम्मेदार लोगों से समझदारों की सारी आशाएं व्यर्थ साबित होती जा रही हैं और लग रहा है जैसे विवेक और कर्त्तव्यनिष्ठा की सारी गाड़ियांें के ब्रेक फेल हो चले हैं।

हर तरफ उच्छृंखलता और स्वेच्छाचारिता के मौजूदा दौर का सबसे घृणित और दुर्भाग्यजनक पक्ष यह है कि आज आदमी अनुशासन और मर्यादाओं की सारी सीमाएँ लांघ चुका है। अधिकांश को यह पता भी नहीं है कि वे किसलिए आये हैं और क्या करना है, कहाँ जा रहे हैं और कहाँ आने वाली पीढ़ियों को ले जाना चाहते हैं?

जो जहाँ है उसकी सोच का दायरा उसी के स्वार्थ के इर्द-गिर्द मण्डरा रहा है। उसकी सोच कभी टुण्ड्रा प्रदेश की भांति एकान्तिक हो जाती है, कभी दक्षिण वह अपने आपको दक्षिण अफ्रीका के जंगलों में बेफिक्र घूमता हुआ पाता है जहाँ अपने भक्ष्य को पाने के लिए किसी भी प्रकार की कोई वर्जना नहीं होती क्योंकि जंगलों में खूंखार जानवरों के बीच सनातन खाद्य श्रृंखला को बनाए रखने और अपनी उदरपूर्त्ति के लिए सब कुछ जायज है।

कभी आदमी अपने आपको समुदाय के बीच पाता है तब उसे किसी अभिनय का पात्र होने का अहसास होता है और वह उसे अच्छी तरह जी लेना चाहता है। यानि की आदमी रोजाना अपने कई-कई किरदारों में जीने लगा है। वह जीता भी है और कामनाएं पूरी नहीं होने पर कभी मरा और कभी अधमरा भी दिखता है।

सच तो यह है कि आदमी स्वार्थ की अंधी दौड़ में भागते हुए उन सारी गलियों और चौबारों को भूल चुका है जहां से उसे जन्म के बाद से ही मौलिकता का उपदेश मिला है और उसे आदमी के रूप में ढालने के औजारों का उपयोग हुआ है।

आदमी के लक्षणों को देखें और उसकी वर्तमान जिन्दगी की तुलना करें तो कई चौंकाने वाले अन्तर हमें दिखने लगते हैं और ऐसे में हमें भान हो ही जाता है कि हम कौन थे, क्या हो गए, और क्या होंगे अभी।

इतना सब कुछ होने के बावजूद यह तो कहा ही जा सकता है कि हम जैसे भी हैं या आने वाले समय में जैसे भी होंगे, कम से कम उतनी तो आदमीयत हममें नहीं ही होगी जितनी हमारे पुरखों में रही है। इंसानियत का ग्राफ लगातार नीचे जा रहा है और आदमी अब आदमी की शक्ल में आदमी दिखता है, आदमीयत तो धीरे-धीरे जाने कहीं गायब होती जा रही है।

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1 Comment on "आदमी जीने लगा है कई-कई किरदारों में"

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आर. सिंह
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इस परिवर्तन को कविता के माध्यम से मैंने बहुत पहले समझाने का प्रयत्न किया था.कविता का शीर्षक है,”मुखौटेवाला” और उसका लिंक है, http://www.pravakta.com/poetry-the-mask

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