लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

शिक्षा : एम.ए. राजनीति शास्त्र, मेरठ विश्वविद्यालय जीवन यात्रा : जन्म 1956, संघ प्रवेश 1965, आपातकाल में चार माह मेरठ कारावास में, 1980 से संघ का प्रचारक। 2000-09 तक सहायक सम्पादक, राष्ट्रधर्म (मासिक)। सम्प्रति : विश्व हिन्दू परिषद में प्रकाशन विभाग से सम्बद्ध एवं स्वतन्त्र लेखन पता : संकटमोचन आश्रम, रामकृष्णपुरम्, सेक्टर - 6, नई दिल्ली - 110022

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विजय कुमार

यों तो शर्मा जी से हर दिन सुबह-शाम भेंट हो ही जाती है; पर दो दिन से मेरा स्वास्थ्य खराब था। अतः वे घर पर ही मिलने आ गये। कुछ देर तो बीमारी, डॉक्टर, दवा और परहेज की बात चली, फिर इधर-उधर की चर्चा होने लगी।

– वर्मा जी, कहते हैं कि हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। इसका क्या अर्थ है ?

– यह तो बहुत सीधी सी बात है। कोई भी सिक्का देखो, तो उसमें दो भाग होते ही हैं। कोई उसे शेर-बकरी कहता है, कोई चित-पट, हेड-टेल, आगे-पीछे, ऊपर-नीचे या ऐसा ही कोई नाम। इसीलिए खेल के प्रारम्भ होने से पहले भी सिक्का उछाला जाता है।

– ये तो बच्चों वाली बात हो गयी। थोड़ा विस्तार से बताओ।

– सांसारिक रूप से देखें, तो इसका एक अर्थ यह है कि हर दुख के पीछे कोई सुख, और सुख के पीछे दुख छिपा है। इसे ऐसे भी समझ सकते हो कि ईश्वर जब एक द्वार बंद करता है, तो दूसरा खोलता भी है। अब यह व्यक्ति के मनोबल और आत्मविश्वास पर निर्भर है कि वह उसे पहचान कर अपने मार्ग पर बढ़ चले।

– इसका कोई उदाहरण दो वर्मा जी।

– जैसे बालक धु्रव को उसके पिता ने अपने सिंहासन पर नहीं बैठने दिया, तो प्रभु की भक्ति कर उसने आकाश में तारों के बीच वह अटल स्थान पा लिया, जो अन्य किसी को नहीं मिला।

– क्या इसका राजनीति में भी कोई उदाहरण हो सकता है ?

– यह मेरा क्षेत्र नहीं है शर्मा जी, इस बारे में तो आप ही ज्ञानवृद्धि कर सकते हैं।

– तो सुनो, राजनीति में भी हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। वो अपने नेता जी हैं न, जो हमारे साथ पहले खूब कबड्डी खेलते थे।

– हां-हां, उन्हें कैसे भूल जाएंगे। बचपन में तो हम लोग साथ-साथ साइकिल पर घूमते थे। बड़े हुए, तो स्कूटर पर चलने लगे; पर अब तो वे कार से नीचे पैर ही नहीं रखते।

– कैसे रखेंगे, वे नेता जी जो हो गये ?

– हां, पिछली बार उन्होंने विधानसभा का चुनाव लड़ा था। उनके सब पुराने साथियों ने परिश्रम किया। अच्छे वातावरण और भगवान की कृपा से वे विधायक बन गये।

– विधायक ही नहीं, बाद में मंत्री भी बने।

– हां, मुझे सब मालूम है।

– पर तुम्हें यह मालूम नहीं है कि उसके बाद नेता जी ईद के चांद हो गये। जिसे दिन में एक बार मिले बिना चैन नहीं पड़ता था, उससे मिलने के लिए पहले से समय लेना जरूरी हो गया।

– शर्मा जी, मंत्री पद की कुछ मजबूरियां होती हैं। उन पर काम का बहुत बोझ होता है। आपको इसे भी समझना चाहिए।

– मैं तो बहुत कुछ समझता हूं; पर जब नेता जी फोन उठाना बंद कर दें; जब वे दिन में आठ-दस बार बाथरूम जाने लगें; जब उनके सचिव यह पूछने लगें कि मंत्री जी से आपको क्या और कितनी देर का काम है, तो समझ लेना चाहिए कि मामला कुछ गड़बड़ है।

– लेकिन आप इस उदाहरण से क्या बताना चाहते हैं ?

– मैं यह बताना चाहता हूं कि इस बार नेता जी चुनाव हार गये हैं। विधायकी तो गयी ही, उनके दल की सरकार न बनने से रुतबा भी जाता रहा।

– अरे ! यह तो बहुत बुरा हुआ।

– हां, बुरा तो हुआ; पर इस सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि चुनाव के बाद जब मैंने फोन किया, तो पहली घंटी बजते ही नेता जी ने खुद फोन उठा लिया।

– अच्छा.. ?

– जी हां, और जब मैंने अपनी एक घरेलू समस्या बताई, तो वे शाम को मेरे घर ही आ गये। जिसने सुख-दुख में झांकना तक बंद कर दिया था, वह बिना बुलाये घर आ जाए, तो आश्चर्य नहीं होगा ?

– तो आपके कहने का अर्थ यह है कि अब नेताजी फिर से अपने मित्रों और आम जनता के लिए उपलब्ध होने लगे हैं।

– जी हां, यह सिक्के का दूसरा पहलू है; जो उनके लिए दुखद, पर हमारे लिए सुखद है।

– पर शर्मा जी, यदि वे मंत्री बनने के बाद भी आम जनता से ऐसे ही मिलते रहते, तो यह हाल न होता ?

– यह तुम मुझसे नहीं, उत्तराखंड जाकर नेता जी से ही कहो।

उत्तराखंड का नाम सुनते ही मुझे जोर का झटका धीरे से लगा। शर्मा जी तो घर चले गये; पर मैं तब से अपना सीना दबाये, इस झटके से उत्पन्न दर्द को झेल रहा हूं। इससे उबरने का कोई उपाय आपके पास हो, तो मुझे जरूर बताएं।

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