भारत के खिलाफ चीन और पाकिस्तान की साजिश

chin and pakistanडा. राधेश्याम द्विवेदी
चीन और पाकिस्तान एक बार फिर से हिन्दुस्तान के खिलाफ साजिश रच रहे हैं, दोनों देशों की सेनाओं ने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर यानि पीओके के बॉर्डर से सटे इलाकों में गश्त की है, इतिहास में ये पहली बार हुआ है कि पाकिस्तान और चीनी सेना कहीं एक साथ गश्त करें। इससे भारतीय फौज भी सतर्क हो गई है। चीन के सरकारी अखबार पीपुल्स डेली की वेबसाइट पर प्रकाशित तस्वीरों के अनुसार शिनजियांग में पीएलए के फ्रंटियर रेजिमेंट और पाकिस्तानी बॉर्डर पुलिस के जवान चीन- पीओके बॉर्डर पर एक साथ गश्त लगाते दिखे, इस वेबसाइट के अनुसार इस इलाके को चीन-पाकिस्तान बॉर्डर कह रहा है, जबकि शिनजियांग का बॉर्डर केवल पीओके से लगती है। मालूम हो कि भारत सरकार पीओके को भारतीय क्षेत्र का अभिन्न हिस्सा मानती है। इससे पहले ना तो चीन की सरकार और ना ही चीनी मीडिया ने संवेदनशील पीओके के इलाके में ज्वाइंट गश्त की बात कबूली है, मामले के जानकारों का कहना है कि इससे चीन के इरादे सामने आ रहे हैं कि वो पीओके में अपनी मौजूदगी बढ़ाना चाहता है।
भारत की अमेरिका से बढ़ती नजदीकियों से सबसे ज्यादा परेशान चीन ही है, इसी वजह से वो पाकिस्तान के साथ मिलकर भारत के खिलाफ साजिश करने में जुटा हुआ है। एक तरफ तो चीन कहता है कि वो भारत के साथ टकराव खत्म करना चाहता है, दूसरी ओर पाकिस्तानी सेना के साथ मिलकर ऐसी करतूत करता है, चीन के इस कदम से उसका दोहरा चेहरा सामने आ गया है। बीते सप्ताह ही चीनी राजदूत ने एक भारतीय अखबार को दिये साक्षात्कार में कहा था कि वो भारत के साथ टकराव खत्म करना चाहता है, वो पड़ोसी देशों के साथ बेहतर संबंध चाहता है, साथ ही उसने एनएसजी में शर्तों के साथ भारत को समर्थन की भी बात कही थी। देश के खिलाफ पाकिस्तान की नापाक हरकतें जारी हैं। हिजबुल मुजाहिद्दीन के कमांडर बुरहान वानी के एनकाउंटर के विरोध में पाकिस्तान में ना सिर्फ काला दिवस मनाया गया। बल्कि यहां बुरहान के समर्थन में आतंकियों का जमघट भी लगा। पाकिस्तान सरकार की शह पर आतंकी कारवां भी निकाला गया। जिसे आजादी कारवां का नाम दिया गया था। जमात-उद-दावा की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम में पाकिस्तान के कई आतंकी संगठनों ने हिस्सा लिया।
जहां एक ओर पाकिस्तान में जमात-उद-दावा आतंकियों की भीड़ के साथ आजादी कारवां निकाल रहा था। वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ एक बार फिर अपनी हद पार करते नजर आए। नवाज शरीफ का कहना था कि ये कश्मीर भारत का आंतरिक मामला नहीं है। नवाज शरीफ ने मांग की है कि भारत सरकार को कश्मीर में जनमत संग्रह कराना चाहिए। नवाज शरीफ का कहना था कि हम केवल कश्मीरियों की एकजुटता के लिए काला दिवस मना रहे हैं। इस काला दिवस के जरिए हम दुनियाभर को एक संदेश भी देना चाहते हैं।
लोगों को भड़काने वाले अंदाज में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने कहा कि हम कश्मीर के लोगों की लड़ाई में उनके साथ हैं। कश्मीरियों की आवाज को दबाया नहीं जा सकता है। बेशक पाकिस्तान में बैठकर ये लोग कुछ भी कहें लेकिन, हकीकत सिर्फ ये है कि घाटी में माहौल असल में पाकिस्तान ने ही बिगाड़ रखा है। अलगाववादी नेता पाकिस्तान के इशारे पर घाटी के युवाओं को भड़काने का काम कर रहे हैं। जबकि मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक ज्यादातर कश्मीरियों का ये मानना है कि जब वो खुद को आजाद महसूस कर रहे हैं तो फिर आजादीकी मांग का क्या मतलब है ? पाकिस्तान ने देश के खिलाफ एक प्रोप्रेगंडा कर रखा है। दूसरी ओर बुरहान वानी के एनकाउंटर से दुखी जमात-उद-दावा ने भी पाकिस्तान में आजादी कारवां निकाला। बेशक इसका नाम आजादी कारवां हो। लेकिन, इस कारवां में ज्यादातर आतंकी संगठन के लोग ही शामिल हुए। इस्लामाबाद के डी चौक से इस कारवां को निकाला गया था। जिसके बाद हाफिज सईद और अब्दुल रहमान मक्की जैसे आतंकियों ने भारत के खिलाफ जमकर आग उगली। इन आतंकियों ने ये भी धमकी दी है कि वो बुरहान की मौत को जाया नहीं जाने देंगे।
NSG की सदस्यता देने का विरोध:- भारत के खिलाफ बार-बार परमाणु अप्रसार संधि (NPT) का हवाला देने वाला चीन इस संधि पर दस्तखत करने के बावजूद इसे नहीं मानता और सरासर उल्लंघन करता है। एक रिपोर्ट के मुताबिक चीन ने 2010 में NPT रिव्यू कॉन्फ्रेंस के दौरान रखे गए प्रस्ताव का उल्लंघन करते हुए चीन ने पाकिस्तान को न्यक्लियर रिएक्टर्स मुहैया कराए। परमाणु अप्रसार की ग्लोबल संस्था आर्म्स कंट्रोल एसोसिएशन (ACA) ने अपनी रिपोर्ट में चीन के इस कदम को NPT का उल्लंघन बताया है। ACA की रिपोर्ट में कहा गया है कि एक ऐसे देश जो कि अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के तय मानकों के तहत नहीं आता उसे ये रिएक्टर्स देना NPT के प्रावधानों का साफ उल्लंघन है। चीन ने 2004 मे NSG की सदस्यता मिलने के बाद से अब तक पाकिस्तान के न्यूक्लियर पावर कॉम्प्लेक्स को 6 परमाणु रिएक्टर मुहैया कराए हैं। चीन ने इसके लिए 2003 में पाकिस्तान के साथ अपनी डील का हवाला दिया है। चीन ने NPT का हवाला देकर ही भारत को परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (NSG) में जगह दिए जाने का विरोध किया था। चीन ने उस वक्त कहा था कि जिन देशों ने एनपीटी पर दस्तखत नहीं किए हैं उन्हें NSG में शामिल किया गया तो इससे परमाणु अप्रसार की कोशिशों को झटका लगेगा।
NPT का ऐलान 1970 में किया गया था और अब तक इस पर 187 देशों ने दस्तखत कर दिए हैं। इस पर दस्तखत करने वाले देश भविष्य में परमाणु हथियार विकसित नहीं कर सकते, सिर्फ शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए ही परमाणु ऊर्जा का इस्तेमाल कर सकते हैं। भारत ने NPT पर दस्तखत नहीं किए, इसी का हवाला देकर चीन ने NSG में भारत की सदस्यता का विरोध किया और भारत को सदस्यता नहीं मिल पाई। 26/11 हमलों के गुनहगार आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के चीफ हाफिज सईद ने पाक सरकार से कहा है कि भारत के होम मिनिस्टर राजनाथ सिमह को पाकिस्तान नहीं आने दे, मालूम हो कि राजनाथ सिंह सार्क सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिये 3 अगस्त को पाकिस्तान जाने वाले हैं। जमात-ए-इस्लामी ने हाल ही में कश्मीर के मसले पर ऑल पार्टीज कॉन्फ्रेंस बुलाई थी, जिसमें कहा गया है कि भारत सरकार कश्मीर में आजादी के संघर्ष को आतंकवाद का नाम देकर संयुक्त राष्ट्र संघ और अंतरराष्ट्रीय समुदाय का इस मसले पर ध्यान हटाने की कोशिश कर रही है। विदित हो कि इस कॉन्फ्रेस में जमात-ए-इस्लामी के मुखिया और पॉर्लियामेंट कश्मीर कमेटी के चेयरमैन मौलाना फजलुर रहमान, पीएमएलएन नेता रजा जफरुल हक और हाफिज सईद जैसे लोग शामिल हुए थे।
आतंकी हाफिज की सलाह:- हाफिज सईद ने अपनी सरकार और व्यापारियों को सलाह दी कि वो भारत के साथ सभी कारोबारी गतिविधियों को कश्मीर के आजाद होने तक बंद कर दे। हाफिज ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री से अपील की है कि वो भारत के गृहमंत्री राजनाथ सिंह को पाकिस्तान ना आने दें, हाफिज का कहना है कि अगर राजनाथ सिंह पाकिस्तान सरकार और वहां के लोगों को कश्मीर में जाकर कश्मीरियों की मदद करने की इजाजत देते हैं, तभी उन्हें भी पाकिस्तान का दौरा करने दिया जाये, अन्यथा उन्हें भी पाकिस्तान आने से रोक दिया जाए। आतंकी हाफिज का कहना है कि पाकिस्तान को भारत को आलू, प्याज का निर्यात भी बंद कर देना चाहिये, हाफिज ने आगे बोलते हुए कहा कि पाकिस्तान सरकार को आलू, प्याज की जगह कश्मीर में कश्मीरियों के लिये राहत सामाग्री भेजनी चाहिए, क्योंकि कश्मीर में जो लोग भी आजादी के लिये लड़ रहे हैं, वो भारत सरकार की मदद लेने से इंकार कर चुके हैं। विदित हो कि ये पहला मौका नहीं है, जब हाफिज ने भारत और यहां के लोगों के खिलाफ जहर उगला है। इससे पहले भी वो कई बार सार्वजनिक रुप से ऐसे जहरीले बयान दे चुका है, बावजूद पाकिस्तान सरकार खामोश है।
चीन, पाकिस्तान में रक्षा संबंध मजबूत :-पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की चीन यात्रा से पहले दोनों देशों के शीर्ष सैन्य अधिकारियों ने आज अपने रक्षा संबंधों को मजबूत करने पर चर्चा की। चीन के सेंट्रल मिल्रिटी कमीशन (सीएमसी) के उपाध्यक्ष शू छिलियांग ने पाकिस्तान के ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी के अध्यक्ष रशद महमूद से बीजिंग में मुलाकात की। चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग की अध्यक्षता वाला सीएमसी चीन का सर्वोच्च सैन्य संस्थान है जो देश के सशस्त्र बलों का नियंत्रण संभालता है। दोनों देशों की सेनाओं के बीच सहयोग को मजबूत करने के लिए बैठक ऐसे समय में हुई है जब शरीफ आठ नवंबर को यहां एशिया-प्रशांत आर्थिक सहयोग (एपीईसी) नेताओं के चीन द्वारा आयोजित सम्मेलन में भाग लेने के लिए पहुंचने वाले हैं। बांग्लादेश, पाकिस्तान, लाओस, म्यामां, मंगोलिया, तजाकिस्तान और कंबोडिया के नेता इस सम्मेलन में शिरकत करेंगे। सितंबर में अपने दक्षिण एशिया दौरे में पाकिस्तान की यात्रा निरस्त करने वाले शी चीन में आयोजित सम्मेलन की अध्यक्षता करेंगे।इससे पहले खबरें थीं कि पाकिस्तान चीन से उम्मीद कर रहा है कि शी की यात्रा के दौरान 34 अरब डॉलर के निवेश की घोषणा की जाएगी। आज की बैठक में शू ने महत्वपूर्ण हितों से जुड़े मुद्दों पर चीन और पाकिस्तान के आपसी सहयोग की प्रशंसा करते हुए कहा कि सैन्य संबंधों को मजबूत करना दोनों देशों के लिए सामरिक महत्व वाला है। सरकारी शिन्हुआ समाचार एजेंसी के अनुसार शू ने उम्मीद जताई कि दोनों सशस्त्र बल मिलकर आगे बढ़ेंगे और द्विपक्षीय संबंधों में और अधिक योगदान देंगे। रशद ने कहा कि पाकिस्तान और चीन के बीच विशेष दोस्ती है। उन्होंने पाकिस्तान की संप्रभुता, स्वतंत्रता और सुरक्षा के लिए चीन के समर्थन पर उसका शुक्रिया अदा किया। उन्होंने कहा कि महत्वपूर्ण हितों के मुद्दों पर पाकिस्तान की ओर से चीन के समर्थन का रख बदलेगा नहीं और दोनों देशों के लिए आतंकवाद से लड़ना प्रमुख मुद्दा है।
भारत की रणनीति:- एक कथन है कि शत्रु का शत्रु सबसे अच्छा मित्र होता है. चीन यह बात बहुत अच्छे से जानता है. इसी नाते वह भारत को दुश्मन मानने वाले पाकिस्तान को साधने तथा उसका भारत के खिलाफ इस्तेमाल करने की लगातार कोशिश करता रहता है, जिसमे कि उसे अपेक्षित कामयाबी भी मिली है. इसका सबसे ताजा उदाहरण हाल में देखने को मिला जब भारत ने पठानकोट हमले तथा देश में हुए अन्य कई और आतंकी हमलों के गुनाहगार जैश-ए-मोहम्मद प्रमुख मसूद अजहर पर अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबन्ध लगाने के लिए संयुक्त राष्ट्र में प्रस्ताव पेश किया.भारत के इस प्रस्ताव पर विचार करने को 15 में से 14 देश सहमत थे. लेकिन, अकेले चीन इसके विरुद्ध खड़ा था. उसने भारत के इस प्रस्ताव के खिलाफ अपने वीटो का प्रयोग कर इसे निष्प्रभावी कर दिया. चीन ने तर्क यह दिया कि मसूद अज़हर आतंकी होने के संयुक्त राष्ट्र द्वारा निर्धारित मानदंडों को पूरा नहीं करता है, इसलिए उस पर प्रतिबन्ध नहीं लगाया जा सकता. भारत ने इसपर अपनी कड़ी प्रतिक्रिया जरूर जाहिर की है, मगर उससे चीन पर कोई प्रभाव पड़ता नहीं दिख रहा. यह तो एक मौका है जब चीन का पाक प्रेम और भारत विरोध अंतर्राष्ट्रीय पटल पर सामने आया है. अन्यथा तो वो लम्बे समय से और विभिन्न स्तरों पर भारत के खिलाफ पाक का साथ देता रहा है. विगत दिनों चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के पाकिस्तान दौरे के दौरान भी चीन का ऐसा ही कुछ रुख देखने को मिला था, जब उसने इस दौरे के दौरान भारत की तमाम आपत्तियों के बावजूद गुलाम कश्मीर से होकर गुजरने वाले 46 अरब डॉलर के चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरीडोर की शुरुआत कर दी थी. इसके अलावा चीन की तरफ से पाकिस्तान को घोषित-अघोषित रूप से तमाम आर्थिक व तकनिकी सहयोग आदि मिलता रहता है. साथ ही, जम्मू-कश्मीर विवाद को लेकर भी चीन अकसर पाकिस्तान के पक्ष में खड़ा होता रहा है और पाक अधिकृत कश्मीर में तो उसके सैनिकों की मौजूदगी की बात भी सामने आ चुकी है. अब वैसे तो चीन का पाक-प्रेम नया नहीं है मगर हाल के एकाध वर्षों में ये प्रेम काफी ज्यादा बढ़ता दिख रहा है. इसका कारण यही प्रतीत होता है कि विगत वर्ष भारत में नई सरकार के गठन के बाद से ही भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा भारतीय विदेश नीति को जिस तरह से साधा गया है, उसने कहीं न कहीं भीतर ही भीतर चीन को परेशानी में डाल दिया है. फिर चाहें वो एशिया हो या योरोप मोदी भारतीय विदेश नीति को सब जगह साधने में पूर्णतः सफल रहे हैं.
एशिया के नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश, मालदीव, जापान आदि देश हों, विश्व की द्वितीय महाशक्ति रूस हो या फिर यूरोप के फ़्रांस, जर्मनी हों अथवा स्वयं वैश्विक महाशक्ति संयुक्त राज्य अमेरिका, इन सबके दौरों के जरिये प्रधानमंत्री मोदी ने पिछले 10-11 महीनों के दौरान भारतीय विदेश नीति को एक नई ऊंचाई दी है. साथ ही इनमें से अधिकांश देशों के राष्ट्राध्यक्षों का भारत में आगमन भी हुआ है. भारत की बढ़ती वैश्विक साख ने चीन को परेशान किया हुआ था कि तभी भारत के दबाव में आकर श्रीलंका ने चीन को अपने यहां बंदरगाह बनाने की इजाजत देने से इंकार कर दिया. वहीं दूसरी तरफ भारतीय प्राधानमंत्री नरेंद्र मोदी मॉरीशस और सेशेल्स में एक-एक द्वीप निर्माण की अनुमति प्राप्त कर लिए. इन बातों ने चीन को और परेशान कर के रख दिया. कहीं न कहीं भारत की इन्हीं सब कूटनीतिक सफलताओं से भीतर ही भीतर बौखलाए चीन की बौखलाहट इन दिनों पाकिस्तान पर हो रही भारी मेहरबानी के रूप में सामने रही है. कहने की जरूरत नहीं कि इन सब गतिविधियों के मूल में चीन का एक ही उद्देश्य है कि पाकिस्तान के जरिये भारत को दबाया जाए और परेशान किया जाए. चूंकि, पाकिस्तान भारत का ऐसा निकटतम पडोसी है, जिससे भारत के सम्बन्ध अत्यंत खटास भरे रहते आए हैं. चीन भारत-पाक संबंधों की इसी अस्थिरता का लाभ लेने की कोशिश में रहता है और कूटनीतिक दृष्टिकोण से उसका ये करना गलत भी नहीं कहा जा सकता.
भारत के लिए चिंताजनक:- निस्संदेह चीन की असीमित शक्ति और पाकिस्तान की कुटिल प्रवृत्ति का ये एका भारत के लिए चिंताजनक है और इस सम्बन्ध में भारत को पूरी तरह से सचेत रहने की आवश्यकता है. अब सवाल उठता है कि भारत चीन-पाक के इस गठजोड़ के खिलाफ किस रणनीति के तहत चले कि चीन को जवाब भी मिल जाए और भारत को कोई हानि भी न हो. मतलब कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे. इस संदर्भ में किसी विद्वान का यह कथन उल्लेखनीय होगा कि अटैक इज द बेस्ट डिफेंस. भारत के प्रति चीन की विदेश व कूटनीति हमेशा से इसी कथन पर आधारित रही है. वो शुरू से ही भारत के प्रति यही नीति अपनाता रहा है, पर भारत ने हमेशा से चीन के प्रति रक्षात्मक रवैया अख्तियार करने में ही विश्वास किया है. अब समय बदल गया है तो भारत को अपने इस रक्षात्मक रुख में परिवर्तन लाना चाहिए. चीन के प्रति आक्रामक रुख अपनाते हुए भारत चाहे तो उसे उसीकी नीतियों के जरिये दबा सकता है. चीन के इस वार का प्रतिकार भारत जापान के रूप में कर सकता है. चूंकि, विगत कुछ वर्षों से चीन-जापान संबंधों में समुद्री द्वीपों को लेकर काफी खटास आई है. भारत इस स्थिति का लाभ लेते हुए जापान को अपनी ओर कर चीन को काफी हद तक परेशान कर सकता है. इसके अलावा अन्य छोटे और कमजोर एशियाई देशों से अपने संबंधों को बेहतर कर तथा उनका समर्थन हासिल करके भी भारत चीन-पाक गठजोड़ की चीनी कूटनीति को जवाब दे सकता है. सुखद बात यह है कि मोदी सरकार के आने के बाद इस दिशा में कदम उठाए गए हैं, लेकिन जरूरत है कि इन संबंधों को और मजबूती दी जाय तथा कूटनीतिक दृष्टिकोण से इनका लाभ लेने के लिए कदम भी उठाए जाएं. ऐसे ही, जम्मू-कश्मीर मामले में चीन के हस्तक्षेप को जवाब देने के लिए भारत का सबसे उपयुक्त अस्त्र तिब्बत है. वैसे भी, तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा भारत से अत्यंत प्रभावित रहते आए हैं. ऐसे में, भारत को चाहिए कि वो दलाई लामा को अपने साथ जोड़कर चीनी नाराजगी की परवाह किए बगैर तिब्बत मामले को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उठाते हुए चीन पर दबाव बनाए कि वो तिब्बत को स्वतंत्र करे. इनके अतिरिक्त और भी तमाम उपाय हो सकते हैं, जिनके जरिये भारत चीन की कूटनीतिक चालों का समुचित उत्तर दे सकता है. बशर्ते कि भारत अब अपनी अतिरक्षात्मक और किसी भी कीमत पर शांति की नीति को तिलांजलि देकर आक्रामक रूख अपनाए और यह स्मरण रखे कि विदेश नीति में सबसे ऊपर केवल और केवल राष्ट्रहित होता है.

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