लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

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अवध किशोर  

व्यक्तिवाद, क्षेत्रवाद, जातिवाद, स्वार्थवाद तथा भाई-भतिजावाद इन सभी वादों से बड़ा राष्ट्रवाद है। राष्ट्रहित ही सर्वोपरि है। इस देश के प्रत्येक नागरिकों के मन और मस्तिष्क में यह बात बैठनी चाहिए, तभी और केवल तभी राष्ट्रवाद बढ़ेगा और अपना राष्ट्र परमवैभव के उच्च शिखर पर प्रतिष्ठापित होगा, कर्तव्य पथ पर निरन्तर चलते हुए कटिले-पथरीले मार्ग पर बढ़ते हुए, अनेक थपेड़ों को सहते हुए, अनथक और अडिग रहते हुए, सत्य मार्ग पर सतत चलते हुए, जो पथिक कालचक्र के माथे पर पौरुष की भाषा अंकित कर लक्ष्य से पल भर भी ओझल न हो, ऐसे श्रेष्ठ कर्तव्य पथ का निर्माण करता है। आने वाली पीढ़ी को प्रेरणा दें। राष्ट्रवाद की वैचारिक अधिष्ठान है, राष्ट्रहित में स्वहित को तिलांजलि और ”मैं नहीं तू” की भावना से प्रेरित हो जातिविहीन और वर्गविहीन समाज की स्थापना के द्वारा सम्पूर्ण समाज की प्रगति का मार्ग प्रशस्त करना। जो देश-हित समाज-हित के लिए नहीं जीते-मरते हैं उनका लक्ष्य सबका सुख ही होता है, वे चुनौतियों से घबड़ाते नहीं, अनेक प्रकार के प्रतिकूल परिस्थितियों में भी वे बढ़ते रहते हैं, यही कारण है कि विजयश्री उनका ही वरण करती है, ऐसे राष्ट्रभक्तों की धड़कने और श्वास भी इस मातृभूमि के लिए ही होती है, अवसर आने पर वे अपना सबकुछ न्योछावर कर जाते हैं। आज राष्ट्र संक्रमण काल से गुजर रहा है, आतंकवाद, अशिक्षा, मंहगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार ने इसे चारों तरफ से जकड़ लिया है। माँ भारती चित्कार कर रही है। राजनीतिक वैमनस्व का भाव राष्ट्र की उन्नति की दिशा में सभी तरफ दिख रहा है, जबकि होना यह चाहिए कि परस्पर के सभी भेदभाव, मन-मुटाव तथा खींच-तान को भुलाकर राष्ट्रहित के विषयों में सभी का सोच एक हो। इन विषम परिस्थितियों में भी जो राष्ट्रवादी शक्तियाँ राष्ट्रसाधना में लगी है, उन्हें जड़मूल से उखाड़ने के लगातार प्रयास चल रहे हैं, इतिहास साक्षी है जब भी इन राष्ट्रवादी शक्तियों को उखाड़ फेंकने और नष्ट करने हेतु दमन चक्र का सहारा लिया गया, इस बोझ का राष्ट्रीय समाज ‘हिन्दू’ आग में तप कर कुन्दन बना व अग्नि परीक्षा में सफल हुआ, साथ ही छद्म सेकुलरवाद, परिवारवाद और वितंडावाद की पराजय हुई, उन्हें राष्ट्रवादी ताकतों के सामने घुटने टेकने पड़े। इस देश का राष्ट्रीय समाज जड़ों से जुड़ा है, वह प्रतिदिन माँ भारती की भक्ति-अर्चना कर अलख जगाए हुए है। जब भी राष्ट्र पर संकट आया राष्ट्रवादी शक्तियों ने एकजुटता दिखाई चाहे वह देश का विभाजन हो या फिर आपातकाल हो या फिर देशी-विदेशी मूल का प्रश्न हो।

आजादी के बाद सेकुलरवाद का प्रचलन एक फैशन के रूप में जोड़ पकड़ा, इस लक्ष्य का राष्ट्रवादी शक्तियों को हतोत्साहित करना। वास्तव में सेकुलरवाद का हेतु विशुध्द स्वार्थ से जुड़ा है, यह देश सेक्युलर नहीं आध्यात्मिक राष्ट्र है, मुख्य कारण सर्वपंथ समादर की भावना सनातन काल से परम्परा में चला आ रहा है। सबका समान रूप से हित साधन हो ऐसी व्यवस्था हमारे मनिषियों ने की। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और ‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम्’ का उद्धोष हमारे मनिषियों ने किया। ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ के साथ ही प्राणी मात्र के सुख की कामना की। सेक्युलर शब्द का प्रयोग विशुध्द रूप से राजनीति से प्रेरित है, यह वोट बैंक की राजनीति के अलावा कुछ भी नहीं है, नेता अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर राष्ट्रहित का विचार करते ही नहीं, जनता से वादे करते हैं चुनाव जीतने के लिए सभी प्रकार के हथकण्डे अपनाते हैं। सत्ता प्राप्ति के लिए ये जाति के आधार पर प्रत्याशी खड़े करते हैं और साथ ही निर्दलीय प्रत्याशी खड़ा कर खर्चा उनके नाम दिखाते हैं ताकि चुनाव आयोग का डण्डा न पड़े। वोटरों में पैसा बाँटते हैं, इस प्रजातन्त्र में भ्रष्टतंत्र हावी है, वोटर खरीदें जा रहे हैं, जो वोट खरीद कर सत्ता पर कब्जा करेगा वह भला पहले अपना जेब क्यों नहीं भरेगा। भ्रष्टाचार की अमरवेल दिनोंदिन फैलती जा रही है। इस देश का आम आदमी सबकुछ सुनकर फिर चुप मारकर बैठने का आदि बन चुका है। राष्ट्रमंडल खेल घोटाला, आदर्श सोसायटी घोटाला और टूजी स्पेक्ट्रम घोटाला के साथ ही सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश क े परिवार के सदस्यों के सम्मिलित होने के मामले प्रचार में आए हैं। जीप घोटाले से लेकर टूजी स्पेक्ट्रम घोटाले तक कांग्रेस के हाथ रंगे हैं, उसके दामन में दाग ही दाग है। जो शीशे के महल में रहते हैं, वे दूसरों पर पत्थर नहीं फेंकते। घोटाले, भ्रष्टाचार तथा मंहगाई से घिरी यह केन्द्र सरकार जनता का ध्यान बटाने हेतु दुष्प्रचार की राजनीति के तहत राष्ट्रभक्तों पर कीचड़ उछाल रही है, संघ को बदनाम करने की नाकाम कोशिश कर रही है।

प्रख्यात गांधीवादी चिंतक दादा धर्माधिकारी ने राष्ट्र के तीन शत्रुओं का जिक्र किया है । वे हैं ः माओ, माफिया तथा मिशनरी है। जेहादी शक्तियों की जड़ों का पोषण सरकार के गलत नीतियों के चलते हो रहा है, विदेशी शक्तियों के षड्यन्त्र का जाल इस देश को जकड़ लिया है, इन सभी समस्याओं से हटकर सरकार बदले की राजनीति के अन्तर्गत आतंकवाद के सामने राष्ट्रवादी शक्तियों को खड़ा करने की कोशिश कर रही है, इस देश को तोड़ने हेतु विश्व के अनेक देशों की एजेन्सियां काम कर रही हैं, इनके साथ ही केन्द्र सरकार राष्ट्रवादी शक्तियों के बढ़ते प्रभाव से घबड़ाकर जाँच ऐजेन्सियों का दुरुपयोग कर देश में एक ऐसा वातावरण बना रही है जिससे हर आदमी का मन-मस्तिष्क आन्दोलित हो रहा है। कहते ही हैं राजनीति में सबकुछ जायज होता है, जनतंत्र मेें जनता के हितों का ध्यान रखना ही चाहिए आज जनता त्रस्त है, और सरकार मस्त है, प्याज और पेट्रोल के दाम आसमान छू रहे हैं। जमाखोरी और कालाबाजारी चरमोत्कर्ष पर है, कहां चला गया प्याज और लहसून। बात प्याज और लहसून की नहीं आम जरुरत की वस्तुओं की कीमतें आसमान छू रही हैं, जनता के जेब पर डाका और बहुतों के घरों में फांका चल रहा है, समय का ऐसा बहुत बड़ा वर्ग है जो 20 से 25 रुपये रोज में गुजारा कर रहा है। साथ ही सरकार के अफसर और नेता घोटाले में डूबे हुए हैं। कितनी बड़ी असमानता है इस देश में यह खाई कैसे पटेगी? यह एक विचारणीय प्रश्न है इस देश में घोटाला कब रूकेगा? इस प्रश्न का उत्तर किसके पास है, शायद किसी के पास नहीं? बिना घोटाले, भ्रष्टाचार और मंहगाई को रोके बिना देश की उन्नति नहीं हो सकती। राजनेता सत्ता की दौड़ में एक-दूसरे के टांग खींचने में लगे हैं इस काम से उन्हें फुर्सत नहीं कि एकजुट हो इन राष्ट्रीय समस्याओं पर विचार करें, लम्बे-चौड़े लुभावने भाषण से जनता को छलने के अलावा राष्ट्रहित में राष्ट्रीय समस्याओं से निपटने हेतु कारगर कदम उठाने की आवश्यकता पर बल देना चाहिए। यह समय की मांग है, जनता सबकुछ समझती है, बहुत समय तक बहुत लोगों को बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता। इसलिए प्रपंचवाद और पाखंडवाद का आडम्बर छोड़कर राष्ट्रहित के मुख्य विषय महंगाई और भ्रष्टाचार से निपटने हेतु एकजुटता दिखाने की आवश्यकता है।

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1 Comment on "वैमनस्य की राजनीति"

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लक्ष्मी नारायण लहरे कोसीर पत्रकार
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अवध जी साहित्य जोग
आप का लेख प्रसंसनीय है ;;;;;;; धन्यवाद ””””

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