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प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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दिनेश पंत

उत्तराखंड में कुल देवताओं के नाम से स्वयं सहायता समूह खोलकर महिलाएं आजीविका विकास की खामोश क्रांति के मार्ग पर अग्रसर हैं। ईश्ट देव, हर सैम देवता, गोलू देवता, कालसिंग देवता, जय होकरा देवी, मां भगवती, संतोषी मां, जयकाली, छुरमुल देवता, नागीमल देवता, महाकाली सहित सैकड़ों देवी देवताओं के नाम पर उत्तराखंड में स्वयं सहायता समूह खोले गए हैं। अधिकतर ये स्वयं सहायता समूह महिलाओं द्वारा संचालित किए जा रहे हैं। 10 रूपए से लेकर 20 रूपए प्रतिमाह की सदस्यता शुल्क के साथ खुले इन समूहों की सदस्य संख्या भी 10,15,20 के आस-पास है। हर महीने आपस में पैसे जमा करने के बाद कई समूह बैंक में भी अपनी धनराशि को जमा कर रहे हैं। कई-कई गांवों में तो तीन से भी अधिक समूह काम कर रहे हैं। समूहों के जरिए छोटी-छोटी बचत कर ये अपनी आजीविका को मजबूती प्रदान कर रहे हैं। कई समूहों ने मिलकर फैडरेशन भी गठित कर रखा है। इन समूहों से जुड़कर कई महिलाओं ने अपने जीवन को नई दिशा दी है। खुद व गांव को एक नए बदलाव के साथ जोड़ा है। राज्य में चल रही ग्राम्या, आजीविका सहित विभिन्न परियोजनाओं के तहत भी गांवों में स्वयं सहायता समूह खोले गए हैं। इन समूहों के माध्यम से आर्थिक स्वालंबन की दिशा में कदम रखने के साथ ही ये महिलाएं सामाजिक कार्यों में भी संलग्न हैं। गांव में सफाई, स्वच्छता जैसे कार्यक्रमों में भी यह निरंतर भागीदारी बनी हैं।

समूहों के माध्यम से ये न सिर्फ दुनियादारी की बातें सीख रही हैं बल्कि अपनी व अपने आसपास की दुनिया में बदलाव के संकल्प के साथ आगे बढ़ रही हैं। अब मशरूम उत्पादन हो, बुरांश का जूस तैयार करना हो, सब्जियों का उत्पादन हो या फिर ग्राम स्तर पर प्राकृतिक संसाधनों का नियोजित प्रबंधन हो या ईधन, चारा, जड़ीबूटी, वन संरक्षण जैसे कार्यों में हाथ बटाई। हर जगह महिलाएं समूहों के माध्यम से खामोषी के साथ जुटी हुई है। कृशि, फलोत्पादन, पषुधन व चारा, भूमि जल संरक्षण जैसे कई कार्यों से जुड़कर ये महिलाएं खामोशी के साथ जुड़कर नए बदलाव लाने में जुटी हुई हैं। यह खामोश क्रांति उत्तराखंड के कुमाऊॅं व गढ़वाल के इस छोर से लेकर उस छोर तक चल रही है। सहकारिता समूह हों या फिर इच्छुक कृशक समूह यह तमाम कामों से जुड़ आजीविका प्रदान कर रहे हैं। सरकारी परियोजनाओं के तहत इन स्वयं सहायता समूहों को समय-समय पर प्रषिक्षण भी प्रदान किया जा रहा है। प्रषिक्षित महिलाएं सीखे हुए ज्ञान व हुनर की हिस्सेदारी को अपने गांव व समाज के विकास पर लगा रही हैं। समूहों से जुड़ी अधिकतर महिलाएं वे हैं जो पहले खुली बैठकों में आने से भी कतराती थी, संकोच करती थी। ये मानती थीं कि बैठकों में जाना सिर्फ पुरूषों का काम है। लेकिन अब न सिर्फ इनकी धारणा बदली है बल्कि इनके इरादे भी बदल गए हैं। पुरानी सोच व पुराने चिंतन को तोड़कर अब यह खुली बैठकों में न सिर्फ भाग लेती हैं बल्कि दहाड़ती भी हैं। गांव व समाज के हित में निर्णय भी लेती हैं। स्थानीय उत्पादों से लेकर ग्राम हक में लिए जाने वाले निर्णयों में भी हिस्सेदारी कर रही हैं। इन्होंने अब अपने हकों के लिए लड़ना ही नहीं सीखा है बल्कि ग्राम विकास में अपनी हिस्सेदारी भी खुद तय कर दी है।

जनपद उधमसिंहनगर के सितारगंज के लौका गांव की रहने वाली रामेन्द्री देवी ने समूह के माध्यम से कनाडा तक की यात्रा कर डाली। उत्तरांचल विकेन्द्रीकृत जलागम विकास परियोजना से जुड़ी इस महिला ने गांव में स्वयं सहायता समूह स्थापित किया और फिर अपने कामों को कनाडा में हुए एक अंतराष्ट्रीूय सम्मेलन में प्रस्तुत किया। इसी तरह लोहाघाट के खैसकाण्डे गांव में 18 सदस्यों से बने इच्छुक कृषक समूह सब्जियों का उत्पादन कर आजीविका प्रदान कर रहा है। हर सप्ताह संडे हाट आयोजित कर सब्जियों की बिक्री कर आमदनी पैदा की जा रही है। इसी तरह पिथौरागढ़ में स्वायत्त सहकारिता के तहत बने स्वयं सहायता समूहों का फैडरेशन श्री श्री पिथौरागढ़ स्वायत्त सहकारिता महासंघ शहर में दूध, दही व मट्ठे का वितरण कर रहा है। इस तरह की एक नहीं सैंकड़ों सफल कहानियां जगह-जगह बिखरी पड़ी हैं। शून्य से आरंभ कर कैसे शिखर तक पहुंचा जा सकता है, यह समूहों से जुड़ी महिलाएं अपने काम के माध्यम से बखूबी बता रही हैं। अधिकांश महिलाएं निम्न आय वर्ग से आती हैं जिनके सामने अत्याधिक कठिनाईयां थीं। इसके बावजूद इन महिलाओं ने न सिर्फ अपनी आय में इजाफा किया, बल्कि सामाजिक मूल्यों को भी मजबूती प्रदान करने में लगी हैं। (चरखा फीचर्स)

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