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सूर्यकांत देवागंन

छत्तीसगढ़ का नाम आते ही एक ऐसे क्षेत्र की छवि उभरकर सामने आती है जो पिछले तीन दशकों से हिंसा, संघर्ष और रक्तपात से जूझता आ रहा है। विकास की गति यहां अन्य राज्यों की अपेक्षा अब भी काफी कम है। प्रति व्यक्ति आय का मामला हो या फिर रोजगार सृजन का प्रश्ना, प्रत्येक क्षेत्र में इसे उम्मीद से कम ही कामयाबी मिली है। अपने अस्तित्व में आने के एक दशक बाद भी छत्तीसगढ़ में समस्याएं बरकारार हैं। हालांकि नक्सल प्रभावित क्षेत्र होने का सबसे अधिक दंश इसी राज्य को झेलना पड़ रहा है। लेकिन इन सबके बीच भी राज्य सरकार द्वारा नागरिकों के हित में उठाए जा रहे कई कदम सराहनीय हैं। शिक्षा के क्षेत्र में जहां प्रगति हुई है वहीं स्वास्थ्य में भी संतोषजनक सुधार हो रहा है। स्वास्थ्य के प्रति उठाए जा रहे विशेष कदम राज्य सरकार की कर्तव्यह के प्रति गंभीरता को दर्शाता है। पिछले वर्ष छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा शु रू की गई आपातकालीन स्वास्थ्य सेवा ‘‘संजीवनी एक्सप्रेस‘‘ एम्बुलेंस वास्तव में राज्य के लोगों के लिए संजीवनी का कार्य कर रही है।

प्रत्येक जीवन की सुरक्षा के लिये प्रदेश में कुल 172 एम्बुलेंस की सेवा पूर्णतः निःशुल्क सभी ब्लाक मुख्यालय में प्रारम्भ की गई है। जिसका सीधा लाभ आम जनता को हो रहा है। प्रदेशवासी चिकित्सकीय आपातकाल में किसी भी फोन से ‘108’ डायल कर निःशुल्क एम्बुलेंस की सुविधा का लाभ प्राप्त कर रहे हैं। संजीवनी एक्सप्रेस की विधिवत् शुरूआत पिछले वर्ष 25 जनवरी 2011 को राजधानी रायपुर व जगदलपुर जिले से की गई थी। जिसे अब राज्य के सभी ब्लाक मुख्यालय के स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंचा दिया गया है।

संजीवनी एक्सप्रेस में वो तमाम सुविधाएं उपलब्ध हैं जो घटना स्थल से अस्पताल पहॅुचाने तक पीडि़तों के उपचार के लिए उपलब्ध कराई जा सकती है। आपातकालीन स्थिति में राहत पहुंचाने वाली यह एम्बुलेंस ऑक्सीजन, सेक्शन मशीन, मेडिसिन, बीपी आपरेटर तथा डिलिवरी कीट सहित अत्याधुनिक उपकरणों से लैस है। इसके साथ चार प्रकार के स्ट्रेचर हैं जो आवश्यकतानुसार उबड-खाबड रास्ते, आगजनी के मरीज, पहाडी स्थान से उतरने व जल मार्ग आदि से मरीजों को सही सलामत लाने ले-जाने में सहायक होते है। प्रायः सडक दुर्घटनाओं या अन्य आपात स्थिति के बाद घायलों को चिकित्सा सुविधा मिलने में विलंब होता है। जो उनकी मौत का कारण बनती है। राज्य में संजीवनी 108 सेवा शुरू होने के बाद शहरी क्षेत्रों में सूचना मिलने के 15 मिनट तथा ग्रामीण क्षेत्रों में 30 से 35 मिनट में वाहन पहुंच कर तत्काल चिकित्सा उपलब्ध कराती है। 108 डायल करने पर सीधे रायपुर स्थित कंट्रोल रूम में संपर्क होता है। वहां से निकटतम दूरी पर तैनात संजीवनी 108 से कान्फ्रेंस पर जरूरतमंद की बात कराई जाती है तथा तत्काल वाहन मौके के लिए रवाना हो जाती है। यह सुविधा साल के 365 दिन चैबीसों घंटे उपलब्ध रहती है। विशेष बात यह है कि इस एबुलेंस में प्रशिक्षित इएमटी (इमरजेन्सी मेडिकल ट्रीटमेंट) स्टाफ 24 घण्टे वाहन में तैनात रहते हैं। जो मौके पर ही जरूरतमंद का प्राथमिक ईलाज शुरू कर देते हैं। इतना ही नहीं आवश्यरकता पड़ने पर इसमें रायपुर कंट्रोल रूम में आनलाईन डॉक्टरों से मरीज की हालात बताकर परामर्श लेने की सुविधा भी उपलब्ध है। वास्तव में दुर्घटना के बाद के एक घण्टे को चिकित्सीय भाशा में गोल्डन आवर माना जाता है। क्योंकि यही वह समय होता है जब मरीज को प्राथमिक चिकित्सा की सख्त जरूरत होती है। इस गोल्डन आवर में यदि चिकित्सा मिल जाए तो केजुअल्टी की संभवनाएं बेहद क्षीण हो जाती है।

संजीवनी का उपयोग विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में किया जाना सराहनीय है। छत्तीसगढ़ के वे सभी दूर अंचल गांव जो स्वास्थ्य महकमे की पहुंच से दूर है तथा जहां यातायात का अभाव हैं वहां आपात स्थिति में पहुंच संजीवनी अपनी सुविधा प्रदान कर रही है। वहीं दूसरी ओर ग्रामीण भी धीरे-धीरे इसके प्रति जागरूक हो रहे हैं तथा आपातस्थिति में 108 को डायल कर रहे हैं। पिछले एक वर्ष में संजीवनी सबसे ज्यादा प्रसव के समय कारगर साबित हो रही है। इनमें अधिकतर प्रसव संजीवनी वाहन में ही हुआ है। आंकड़ों के अनुसार अकेले बस्तर डिवीजन में पिछले वर्श 26 जनवरी से इस वर्ष 30 जनवरी के मध्य ‘‘संजीवनी 108‘‘ में आपातकाल प्रसव के 7 हजार 303 मामले आए। इनमें से 620 माताओं ने गाडी में ही बच्चे को जन्म दिया है।

कांकेर जिले के दुर्गकोंदल ब्लाक मुख्यालय से 12 किमी दूर अति पिछड़े टेम्बल गांव के रहने वाले मुकेश की गर्भवती पत्नी कामता बाई को इसी वर्श 9 जनवरी की रात अचानक प्रसव पीड़ा उठी। नक्सल प्रभावित इस गांव में देर रात किसी डॉक्टर का उपलब्ध होना नामुमकिन था। ऐसे में मुकेश ने 108 पर फोन कर सहायता की सूचना दी। दुर्गूकांदल ब्लाक मुख्यालय में मौजूद ‘‘संजीवनी 108‘‘ के ईएमटी तथा पायलट सूचना मिलते ही टेम्बल के लिए निकल पड़े। 10 किमी दूर जाने के बाद आगे पगडंडी होने के कारण संजीवनी आमागढ़ में जा रूकी। आमागढ से टेम्बल की दूरी 2 किमी थी, जहां पहुंचने के लिए पैदल चलना ही एकमात्र विकल्प है। विपरीत परिस्थिति के बावजूद 108 में सवार ईएमटी तथा पायलट ने मरीज को उपचार पंहुचाने का निश्चय किया। सुनसान स्थान पर मंहगें उपकरणों से लैस वाहन को अकेला छोड़ना भी एक समस्या थी। लेकिन इसके बावजूद ईएमटी सदस्य डिलेवरी किट तथा रूकूफ बोर्ड लेकर गांव की ओर रवाना हो गए। 2 किमी लंबे घने और अंधेरे जंगल से गुजरकर ईएमटी कामता बाई के घर पहुंचे। लेकिन उसकी हालत ऐसी नहीं थी कि उसे एंबुलेंस तक भी लाया जा सके। दूसरी ओर उसके घर में बिजली भी नहीं थी। किट में मौजूद सामान तथा टार्च की रोशनी के सहारे ही ईएमटी ने महिला को मौके पर ही सफलतापूर्वक प्रसव कराया।

वास्तव में संजीवनी एक्सपे्रस का सीधा लाभ राज्य की आम जनता को होता दिख रहा है। यहां तक कि किसी भी प्रकार के सरकारी प्रयासों का विरोध करने वाले नक्सली भी इसकी सराहना कर रहे हैं। संभवतः पहली बार होगा जब नक्सलियों ने शासन की किसी योजना की दिल खोलकर प्रशंसा की है। विगत दिनों नारायणपुर जिले मे अबूझमाड गई संजीवनी 108 वाहन की सेवा को देखकर नक्सलियों ने इसकी जमकर सराहना की। यहां तक कि उन्होंने इस वाहन को रूकवाकर आपातकालीन सेवा के दौरान इसके कार्यकलाप को देखने और समझने और समझने का प्रयास भी किया। उत्तम सेवा व्यवस्था प्रदान करने के बावजूद ‘‘संजीवनी‘‘ को अपने कुछ नियमों के कारण आलोचनाओं का भी सामना करना पड़ रहा है। पिछले महिने ‘‘संजीवनी एक्सप्रेस‘‘ के संचालनकर्ताओं की संवेदनहीनता के चलते एक व्यक्ति की जान चली गई। कांकेर जिला के पखांजूर से 2 किमी दूर सोहगांव निवासी मेहताब सिंह राणा की रात 12 बजे तबीयत बिगड़ गई। लेकिन क्षेत्र में दूर संचार सेवा ठप्प होने के कारण उसके परिजन 108 में फोन नही कर पाए। किसी तरह पंखान्जूर अस्पताल पहुंचकर उन्होंने संजीवनी के उपस्थित स्टाफ से मदद की गुहार लगाईं। परंतु डयूटी पर मौजूद स्टाफ ने यह कह कर जाने से मना कर दिया कि उन्हें कंट्रोल रूम रायपुर से फोन आने पर ही जाने का निर्देश है। दूर संचार सेवा बंद होने के कारण परिजन फोन नहीं कर पा रहे थे। उनकी विवशता को देखकर भी मौजूद स्टाप का मन नहीं पिघला। एक घण्टे तक परेशान होने के बाद परिजन निराश लौट गए तब तक मरीज ने दम तोड दिया। इस घटना ने साबित कर दिया कि संजीवनी एक्सप्रेस के लिए मानवता से बढ़कर नियम कायदे हैं। संजीवनी के नियमानुसार उसे रायपुर कंट्रोल रूम के आदेश के बाद ही किसी भी अंचल क्षेत्र में भेजा जा सकता है। वहीं दूसरी ओर कभी-कभी पायलट को दूर-दराज के क्षेत्रों की विशेष जानकारी नहीं होने के कारण भी यह समय पर मरीज को सुविधा प्रदान नहीं कर पाता है।

बहरहाल इस योजना को लेकर एक पुरानी बात दोहराई जा सकती है कि हजार अच्छाईयों के सामने कुछ गलतियां नजरअंदाज के काबिल होती हैं। यह योजना हकीकत में छत्तीसगढ के लिए वरदान सिद्ध हो रही है। यही कारण है कि अपने शुरूआत से अब तक केवल एक वर्ष के दौरान संजीवनी एक्सप्रेस ने पूरे राज्य में 4,94,129 से ज्यादा स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सफलतापूर्वक निपटान कर चुकी है और यह आंकड़ा प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। (चरखा फीचर्स)

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1 Comment on "छत्तीसगढ़ के लिए वरदान बन गया ‘‘संजीवनी‘‘"

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डॉ. मधुसूदन
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धन्यवाद
अनेक नकारात्मक समाचारों में ऐसे अच्छे समाचार मन आनंदित करते हैं|

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