लेखक परिचय

राघवेन्द्र सिंह

राघवेन्द्र सिंह

117/के/145, अम्बेदकर नगर गीता नगर, कानपुर उत्तर प्रदेश-208025

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Cosmic_Omवैसे तो सनातन व्यवस्था अति प्राचीन मानी जाती है। इतिहासवेत्ताओं के अनुसार भी विश्व में सबसे पुरानी सनातन सभ्यता ही रही है। जिसका आधार बीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक में हुयी खुदायी मे प्राप्त सिंधु घाटी की सभ्यता जो लगभग 2500-1500 ईसा पूर्व जो पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान, गुजरात, राजस्थान, जम्मू तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक थी जहाँ पशुपति नाथ, महादेव वृक्षों तथा पशुओं की पूजा की जाती थी। वहाँ के निवासी वस्तु विनमय द्वारा व्यापार करते थे जिन्हें शिल्प तथा उघोग धन्धों का पूरा ज्ञान था। यहाँ के लोग धातु निर्माण, आभूषण निर्माण बर्तन निर्माण हथियार औजार निर्माण एवं परिवहन में भरपूर रूचि लेते थे। जो सभ्यता लगभग 1000 वर्षों तक चली। इसके बाद वैदिक काल खण्ड का समय भी उक्त सभ्यता से जुड़ा था जो 1500 से 600 ईसा पूर्व था। जो वैदिक साहित्य का समय था, इस समय ऋग्वेद जिसमें चिकित्सा विज्ञान (आयुर्वेद), यजुर्वेद में युद्व कला, सामवेद मे कला तथा संगीत, अथर्ववेद में भवन निर्माण का विस्तार से वर्णन है। इसके अतिरिक्त वेदांग जिसमें शिक्षा, कल्प, व्याकरण निरूक्त, छन्द तथा ज्योतिष की चर्चा की गयी। पुराण, आरण्यक, उपनिषद, रामायण तथा महाभारत की रचना भी इसी समय की गयी।

काल चक्र की गति के चलते सम्पूर्ण विश्व में धीरे-धीरे जनसंख्या बढ़ती गयी अनेक सभ्यताओं का उदय हुआ बढती आबादी की सोंच मान्यताओं एवं आस्थाओं से सरक कर आधुनिक होती गयी कालान्तर मे व्यक्ति का स्थान कम्प्यूटर तथा आस्थाओं का आधुनिक विज्ञान ने ले लिया। समाज का शिक्षित वर्ग तो समस्त चर-अचर के उचित एवं अनुचित का ज्ञान रखता है परन्तु एक बहुत बड़ा वर्ग जिसे उक्त की जानकारी नहीं थी वह अपनी आस्थाओं से हट गया। जो किसी समय स्वर्ग-नरक, पाप-पुण्य, धर्म-अधर्म के चलते न जानते हुए भी उन हितो की रक्षा मे लगा रहता था जिसमे सभी का हित समाहित होता था। हमारे ऋषियों (रिसर्चर) ने अथक परिश्रम कर प्रकृति एवं समस्त बृम्हाण्ड के विज्ञान को सभी प्राणियों ही नही अ-प्राणियों के हितों की रक्षा के लिए भी प्रयास किया। मनुष्य के शुभ को देखते हुए उनके लाभ हेतु पाप-पुण्य के आधार पर उनकी दैनिक दिनचर्या को ऐसा बनाया कि वे आरोग्य एवं सुखी रह सकें। वे भली भाँति जानते थे उनको तर्क या विज्ञान की दलील के माध्यम से समझाया गया तो बहुत बड़ा वर्ग इससे अछूता रह जायगा।

भारतीय दर्शन के अनुसार व्यक्ति को स्वस्थ्य रखने का पूरा प्रयास किया गया। गीता में अर्जुन के माध्यम से भगवान श्री कृष्ण सम्पूर्ण मानव समाज को संदेश देते हैं ”युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु युक्तस्वप्रावबोधस्य योगो भवति दु:खहा” अर्थात जिसके आहार, विहार, विचार एवं व्यवहार संतुलित व संयमित हैं जिनके कार्यों मे दिव्यता मन में सदा पवित्रता व शुभ के प्रति अभीप्सा है जिसका शयन एवं जागरण अर्थपूर्ण है वही सच्चा योगी है। यहाँ योगी का अर्थ कर्मक्षेत्री से है। इसी प्रकार स्वस्थ्य मनुष्य के बारे मे आयुर्वेद के प्रसिद्व गृन्थ सुश्रुत में लिखा है ”समदोषा: समाग्निश्र समधातुगलक्रिया: प्रसन्नात्मेन्द्रियमन: स्वस्थ इत्यमिधीयते ” अर्थात जिनके तीनो दोष वात, पित्त, कफ सम हो, जठराग्नि सम हो, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा तथा वीर्य उचित अनुपात मे हो मल मूत्र की क्रिया सही ढंग से होती हो और दसों इन्द्रियाँ नाक, कान, ऑंख, त्वचा, रसना, गुदा, उपस्थ, हांथ, पैर तथा जीव्हा, मन तथा उसका स्वामी आत्मा भी प्रसन्न हो ऐसे व्यक्ति को स्वस्थ माना जाता है जो बिल्कुल सत्य एवं वैज्ञानिकता केंन्द्रित है जिसे आधुनिक विज्ञान असत्य नही कह सकता।

सनातन व्यवस्था मे अष्टांग योग के माध्यम से वैयक्तिक व सामाजिक समरसता, शारीरिक स्वास्थ्य, बौद्विक जागरण, मानसिक शान्ति एवं आत्मिक अनुभव प्राप्त होता है। महर्षि पतंजलि के अनुसार यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहर, धारणा, ध्यान तथा समाधि ये योग के आठ अंग है। यम-जिनके अनुष्ठान से इन्द्रियों एवं मन को हिंसादि अशुभ भावों से हटाकर आत्मकेन्द्रित किया जाय वे यम हैं। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, बृम्हचर्य तथा अपरिग्रह ये पाँच यम है। नियम- शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय तथा ईश्वर यह पाँच नियम है। आसन-पद्मासन भद्रासन, सिद्वासन या सुखासन पर बैठना आसन कहलाता है हठयोग में 84 प्रकार के आसन बताये गये हैं। ध्यानात्मक आसनों के अतिरिक्त हठ योग में दूसरे ऐसे आसन वर्णित है जिनका संबंन्ध शारीरिक व मानसिक आरोग्य से है। प्राणायाम-बाह्यवृत्ति, अभ्यन्तरवृत्ति, स्तम्भवृत्ति तथा बाहयम्यन्तर विषयाक्षेपी ये चार प्रकार के प्राणायाम हैं। प्रत्याहार-जिसके द्वारा साधक का इन्द्रियों पर पूर्ण अधिकार हो प्रत्याहार कहलाता है। धारणा-नाभिचक्र, ह्नदयपुण्डरीक, मूर्धाज्योति, भूमध्य, ब्रम्हरन्ध, नासिकाग्र, जिव्हाग्र इत्यादि शारीरिक प्रदेशों मे से किसी एक स्थान पर मन का निग्रह या एकाग्र होना धारणा कहलाता है। ध्यान- ध्यान हमारे जीवन के साथ प्रतिपल जुड़ा हुआ है भारतीय संस्कृति मे तो ध्यान प्रत्येक क्रिया का पूरक होता है। ध्यान के बिना हम अपने किसी भी भौतिक या अध्यात्मिक लक्ष्य में सफल नही हो सकते। ध्यान से ही हम सदा आनन्दमयी व शान्तिमय जीवन जी सकते है। समाधि- ध्यान ही जब केवल अर्थ ध्येय के स्वरूप को प्रकाशित करने वाला अपने स्वरूप से शून्य जैसा होता है, तब उसे समाधि कहते है निश्चित रूप से उक्त अष्टांग योग विज्ञान का अतिविकसित स्वरूप है जिसको धारण कर मनुष्य सम्पूर्ण जीवन आरोग्य एवं सुखमय व्यतीत कर सकता है।

इसी प्रकार आयुर्वेद के अनुसार व्यक्ति की दिनचर्या मे आहार, निद्रा, ब्रम्हचर्य, व्यायाम, स्नान तथा ध्यान को आवश्यक बताया गया है। भारत में हजारों वर्ष पूर्व एक्यूप्रेशर विधा का उपयोग होता था जिससे मनुष्य के स्वस्थ रहने मे सहायक था। भारतीय समाज मे पाजेब, नूपुर, बिंदी, कड़े, लाकेट, टीका, माला, झूमर, बालियाँ, लौंग, तगड़ी, ऍंगूठी तथा रूद्राक्ष आदि का उपयोग होता था। जो उक्त सिद्वान्त पर ही आधारित था। कान में 43 रोग बिंदु हैं जो टॉन्सिल्स, एपेंडिक्स, ऐड़ी, घुटने का जोड़, उच्च रक्त चाप, दमा, सायटिका, कूल्हा, मूत्राश्य, गुर्दा, बड़ी ऑंत, मलाशय, छोटी ऑंत, आमाशय, श्वांस प्रणाली, फेफड़ा, कान का भीतरी भाग, ऑंख, डिम्बग्रन्थि, जबड़े, अण्डकोश, मस्तिष्क, दाँत, जिगर, प्लीहा, पित्ताश्य, गर्दन, कंधों का जोड़, पेट, कोहनी, नितम्ब के जोडों पर दबाव पड़ने से लाभ मिलता है। अत: एक निश्चित समय पर कान पर जनेउ चढ़ाने की व्यवस्था की गयी कि मनुष्य धर्म के आधार पर उसे अपने दैनिक जीवन का भाग बना लें।

आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के अनुसार यदि स्वस्थ मनुष्य सप्ताह में एक दिन भोजन नही करता हो तो इससे उसके आमाशय, यकृत एवं पाचन तंत्र को विश्राम मिलता है, जिससे उनकी कार्य क्षमता बढ़ती है। कितने व्यक्ति उसका अनुपालन करते है इसके अतिरिक्त सनातनीय व्यवस्था मे सप्ताह मे एक दिन वृत का प्रावधान है जिसे हजारों वर्षों से समाज का बहुत बड़ा वर्ग करता आ रहा है। उक्त व्यवस्था मे प्रात: काल किसी भी अमंगलकारी वस्तु या व्यक्ति को देखना वर्जित बताया गया वर्तमान आधुनिक मनोविज्ञान के अनुसार भी मनुष्य निश्चल मन या शान्ति अवस्था मे जिसके सम्पर्क मे आयेगा उसके मन पर उसका स्थायी प्रभाव होगा शास्त्रों के अनुसार शौच एवं लघुशंका आदि पर मौन रहने को कहा गया तथा ऐसा न करने पर पाप का भागीदार बताया गया है। उक्त दैनिक कार्य करते समय मनुष्य यदि मुंह खोलता है तो मल में स्थित दूषित कीटाणु उसके शरीर मे मुख द्वार प्रविष्ट हो सकते है। जिससे उसके शरीर में व्याधि उत्पन्न हो सकती है उक्त धार्मिक पुस्तकों मे तिलक लगाने को भी दैनिक दिनचर्या मे शामिल किया गया चाँहे स्त्री हो या पुरूष चँकि भ्रकुटि तथा ललाट के मध्य का भाग विचारक केन्द्र है। अत्यधिक मानसिक कार्य करने पर उक्त स्थान पर वेदना का अनुभव होता है, अत: एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्वति के अनुसार चन्दन, कुमकुम आदि का तिलक उक्त ज्ञान तंन्तुओं को संयमित तथा सक्रिय रखता है अत: उक्त व्यक्ति की मेधा शक्ति तेज होती है। इसी प्रकार आधुनिक विज्ञान ने भी स्वीकार किया है मनुष्य के शरीर मे एक उष्मा होती है जिसके ह्रास से मनुष्य निष्तेज एवं अस्वस्थ होता है प्राचीन काल मे हमारे शोधकर्ताओं को उक्त का ज्ञान था अत: उन्होने खड़ाऊ, कुश के आसन, मृगछाला एवं अन्य ऊष्मा के कुचालक वस्तुओं की दैनिक उपयोग मे ऐसी व्यवस्था की थी कि व्यक्ति भूमि पर कम समय नंगे पैर रहे जिससे शरीर की ऊष्मा पाँवों से होती हुयी जमीन मे न समाहित हो।

भारतीय दर्शन मे सोते समय दक्षिण दिशा मे पैर करके सोना भी वर्जित कहा गया है। जो बिना वैज्ञानिक आधार के नही है। सौर जगत मे ध्रुव तारा आकर्षण का केन्द्र है, यदि कोई व्यक्ति दक्षिाण दिशा मे पैर तथा ध्रुव की तरफ सर करके शयन करता है तो उसके पेट मे स्थित भोजन या अन्य तत्व आकर्षण के कारण ऊपर की तरफ आने लगते हैं जिसका असर शरीर पर घातक होता है। उक्त ध्रुवतारे के आकर्षण के आधार पर ही कुतुबनुमा डिबिया का अविष्कार हुआ है। इसी प्रकार सूर्य तथा चन्द्रग्रहण को देखना भी वर्जित किया गया है। उक्त ग्रहणों के उपरान्त स्नान तथा उक्त कालखण्ड मे रखे भोजन को भी वर्जित कहा गया है जिसको भी आधुनिक विज्ञान ने स्वीकार किया है। उक्त समय पराबैगनी किरणों की अत्यधिक मात्रा के कारण यदि मनुष्य ग्रहण को देखता है तो उसकी ऑंखों को क्षति पहुँच सकती है तथा वातावरण की अशुद्वता भोजन मे भी पहुँच भोजन को दूषित कर देती है। भारतीय ग्रन्थों के अनुसार सूर्य सात घोड़ों के रथ पर सवार है ”सत्ययुज्जति रथमेकचक्रमेको अश्वोवहति संप्तनामा”(ॠ.1/164/2) जिसके अनुसार एक चक्रवाले सूर्य के रथ मे सात घोड़े जुते हुये है। वैज्ञानिकता के अनुसार सूर्य के प्रकाश मे विधमान सात रंग क्रमश: बैगनी, नीला, आसमानी, हरा, पीला, नारंगी तथा लाल को बताता है। जो इन्द्रधनुष मे भी दिखायी पड़ते है। ज्योतिष शास्त्र मे ग्रहों की चर्चा सटीक तरह से की गयी है जिसमे नौ ग्रहों को महत्व दिया गया है जिनमे दो छाया ग्रह राहु तथा केतु है। इसके अतिरिक्त क्रमश: सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र तथा शनि है जिनके रंगों तथा गति के बारे मे हमारे शोधकर्ताओं ने हजारों वर्ष पुर्व जो घोषण की थी अकाट्य हैं। जिन सौरमंडलीय रहस्यों को बिना आधुनिक यंत्रों एवं सुविधाओं के हजारों वर्ष पूर्व जान लिया गया था। कुछ वर्षो पूर्व तक उनपर आधुनिक विज्ञान सहमत नहीं था! परन्तु आज उन्हें झुठला नहीं सकता।

भारतीय दर्शन के अनुसार काफी पहले पेड पौधो में जीव होना बताया गया आधुनिक विज्ञान इस विषय मे पूर्व मे भ्रम की स्थित लिये हुए था जिसे आज वह स्वीकार कर चुका है! प्रथ्वी के आकार को लेकर भी विवाद की स्थित थी जिसे हमारे पौराणिक ग्रंथों में स्पष्ट रूप से पहले से गोल बताया गया था ! सनातनी व्यवस्था के अनुसार माँस की अपेक्षा दुग्ध के सेवन को प्रोत्साहन दिया गया जिसे आज आधुनिक चिकित्सा ने स्वीकार किया है। क्योंकि दूध मे प्रचुर मात्रा मे फैट, कार्बोहाइड्रेट, ग्लूकोज, एन्जाइम आदि तत्व पाये जाते है जिसे वर्तमान आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने भी सम्पूर्ण आहार का स्थान दिया है वास्तविकता के अनुसार मनुष्य का शरीर शाकाहार हेतु प्रकृति ने तैयार किया है न कि माँसाहार के लिए, जीभ से पानी पीने वाले जीव माँसाहार भक्ष्य होते है जैसे शेर, बिल्ली, कुत्ता आदि।

सभी चेतन प्राणियों मे सबसे विश्वसनीय स्थान माँ का होता है वह कभी भी अपने बच्चे के अहित के बारे मे विचार तक नही कर सकती। अत: सनातनीय व्यवस्था मे उक्त स्थान पर गाय तथा गंगा को रखा गया है। गाय का दुग्ध जहाँ अन्य जानवरों के दूध से अधिक पौष्टिक तथा गुणवत्ता लिए हुए है, वहीं उसके मूत्र मे गंधक तथा पारद (पारद) की मात्रा पायी जाती है जो औषधीय गुणों से भरपूर है। गाय के गोबर मे भी रेडिएशन रोकने की अभूत पूर्व क्षमता होती है एवं गंगा के जल को भी यदि वर्षों रखा जाय वह खराब नही होता है वह भी अनेक औषधीय गुणों से भरपूर है। तुलसी के पौधे को भी प्रत्येक घर मे उसके लाभकारी गुणों के कारण अनिवार्य बताया गया, वहीं पीपल के वृक्ष को पूज्जनीय स्थान मात्र इस लिए दिया गया कि वह अन्य वृक्षों से अधिक आक्सीजन प्रदान करता है।

संसार के प्रत्येक चल-अचल, एवं सृष्टि उपयोगी तत्वों को श्रद्वा के साथ जोड़ उनके दुरूपयोग को रोका गया। हमारे पुराने शोधकर्ता यह बात भली भाँति जानते थे मनुष्य से भावनात्मक माध्यम से कुछ भी कराया जा सकता है परन्तु केवल सत्य या विज्ञान का पाठ पढ़ाने से उनके मन मष्तिष्क मे कुछ पलों के लिए तो विषय डाला जा सकता है परन्तु उसे स्थायी रूप नही दिया जा सकता। वह तभी सम्भव है जब उसे पाप-पुण्य या धर्म-अधर्म के आधार पर विषय बताया जाय। सनातन व्यवस्था मे सभी मानव ही नही चर-अचर प्राणियो एवं वस्तुओ के हित संरक्षण की व्यवस्था की गयी जो धार्मिक व्यवस्था से जोड़ी गयी। जिसके कारण एक लम्बे समय से समस्त जीवों एवं सृष्टि को स्थायी लाभ मिलता रहा। पुरातन काल के सनातनी वाड़्.मय की शायद ही कोई एैसी व्यवस्था रही हो जिसका खंडन वर्तमान आधुनिक विज्ञान ने किया हो। हजारों वर्षों पूर्व हमारे अनुसंधानकर्ताओं ने जो सूत्र स्थापित किये वे आज भी अकाटय है। परन्तु दुर्भाग्य से हमारे पुरातन विज्ञान को देश मे ही कोई योजनाबद्व संरक्षण नही प्राप्त हो रहा है और न ही उन पर व्यवस्थित खोज की योजना कार्य कर रही है। इसके विपरीत हमारे उक्त ज्ञान पर विदेशों मे तेज गति से कार्य हो रहा है। हमारी केन्द्रीय सरकार को चाहिए इस तरफ विशेष ध्यान दे एवं उनके अनुसंधान, संरक्षण एवं उपयोगिता को सुनिश्चित करें।

-राघवेन्‍द्र सिंह

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3 Comments on "सनातन वांग्मय के वैज्ञानिक आधार"

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sunita sharma
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It’s a very nice post for new generation u r view for society is valuable for all of as thanks for a such good information………

पं. डी.के.शर्मा "वत्स"
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बहुत ही बढिया आलेख्!! वास्तव में यही हो रहा है कि आज हम लोग पश्चिम अंधानुकरण् के चलते अपने वैदिक विग्यान से दूर होते चले जा रहे हैं।। आज जरूरत है तो सिर्फ एक सम्पन दृ्ष्टिकोण की……ताकि अपने शास्त्रों की वैग्यानिकता को समझकर उससे शेष दुनिया को परिचित कराया जा सके!!

jay prakash singh
Guest

bahut hi achha , kramvar vaigyanik chintan , apne agale lekh ka vishay pashchimi andhanukar ko banayenge to achha rahega

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