लेखक परिचय

राजेश कश्यप

राजेश कश्यप

स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक।

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1 फरवरी/ पुण्यतिथि पर विशेष —ग्रामीण भारत की बुलन्द आवाज थे

राजेश कश्यप

आजकल देश में जनप्रतिनिधियों के प्रति जनता में बढ़ता अविश्वास,जातिपाति-धर्म-मजहब की संकीर्ण राजनीति, राज्यों के विभाजन, जमीन अधिग्रहण पर बवाल, आरक्षण की संकीर्ण सियासत, ऑनर किलिंग, किसानों की आत्महत्या, फसलों का उचित मुआवजा न मिलना आदि असंख्य समस्याएं विकट चुनौती बनी खड़ी हैं और उनका समाधान दूर-दूर तक नजर नहीं आ रहा है। देश के बहुत बड़े चिन्तक, विशेषज्ञ, अर्थशास्त्री एवं नीति-निर्माता इन समस्याओं के समाधान के लिए माथापच्ची कर रहे हैं, लेकिन परिणाम शून्य है। लेकिन, देश में एक ऐसे दूरदृष्टा इंसान भी थे, जिन्होंने देश को स्वतंत्रता प्राप्ति की भोर में ही इन सभी चिन्ताओं एवं चुनौतियों से अवगत करवा दिया था। वह अनूठी एवं अद्भूत शख्सियत थे संविधान निर्मात्री सभा के सदस्य, गांधीवादी नेता, प्रखर वक्ता और आर्यसमाजी विचारों से युक्त स्वर्गीय चौधरी रणबीर सिंह।

चौधरी रणबीर सिंह का जन्म 26 नवम्बर, 1914 को रोहतक (हरियाणा) के सांघी गाँव में महान् आर्यसमाजी एवं देश भक्त चौधरी मातूराम के घर, सुघड़ एवं सुशील गृहणी श्रीमती मामकौर की कोख से तीसरी संतान के रूप में हुआ था।वर्ष 1937 में दिल्ली के रामजस कॉलेज से बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उन्होंने गांधी जी से प्रभावित होकर स्वतंत्रता आन्दोलन से जुड़ने का फैसला किया। एक सच्चे स्वतंत्रता सेनानी के रूप में उन्हांने स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान कुल साढ़े तीन वर्ष की कठोर कैद और दो वर्ष की नजरबन्दी की सजा झेली। राष्ट्र के प्रति अटूट, अनुपम, अनूठी, अनुकरणीय सेवाओं, त्याग एवं बलिदानों को देखते हुए चौधरी रणबीर सिंह को 10 जुलाई, 1947 को संयुक्त पंजाब (हरियाणा सहित) भारत की संविधान सभा के सदस्य के तौरपर चुना गया और 14 जुलाई को उन्होंने शपथ ग्रहण की। संविधान सभा में उन्होंने देहात (गाँवों) में रहने वाले लोगों के पैरवीकार की पहचान बनाई और समग्र ग्रामीण भारत की आवाज बने। उन्होंने 6 नवम्बर, 1948 को अपने पहले ही भाषण में  स्पष्ट कर दिया था, कि ‘‘मैं एक देहाती हूँ, किसान के घर पला हूँ और परवरिश पाया हूँ। कुदरती तौरपर उसका संस्कार मेरे ऊपर है। उसका मोह और उसकी सारी समस्याएं आज मेरे दिमाग में हैं।’’

चौधरी रणबीर सिंह ने संविधान निर्माण के दौरान अनेक ऐतिहासिक मसौदे पेश किए। उन्होंने बड़े-बड़े धुरन्धर नेताओं के बीच बड़ी निडरता के साथ बेबाक व दो टूक विचार रखे। चौधरी साहब की ग्रामीण समाज से जुड़े मुद्दों पर अनूठी दूरदर्शिता बड़ी लाजवाब रही। वे एकमात्र ऐसे नेता थे, जो लोकतंत्र के इतिहास में सर्वाधिक सात अलग-अलग सदनों वे संविधान सभा, विधायी (1947-50), अस्थाई लोकसभा (1950-52 ) पहली लोकसभा (1952-57), दूसरी लोकसभा (1957-62), संयुक्त पंजाब विधानसभा (1962-66), हरियाणा विधानसभा (1966-67 व 1968-72) और राज्य सभा (1972-78) सदस्य रहे।  वे जिस भी पद पर रहे, उन्होंने हमेशा गरीबों, किसानों, मजदूरों, दलितों, पिछड़ों, असहायों, पीड़ितों आदि के कल्याण पर जोर दिया। उन्होने ‘गाँवों में खुशहाली और किसानों के चेहरे पर लाली’ लाने के लिए अनेक प्रयत्न किए। चौधरी रणबीर सिंह ने स्वतंत्रता की भोर में सुनहरे भारत के निर्माण के लिए गठित संविधान सभा के सदस्य के तौर पर ठोस तर्कों के साथ देहात से जुड़े मुद्दों पर बहस की और दूरगामी नीतियों के निर्माण पर जोर दिया। उन्होंने सदन में जो चिन्ताएं जाहिर कीं, वे आज आजादी के साढ़े छह दशक बाद देश के समक्ष विकट चुनौतियों के रूप में सत्तारूढ़ सरकार का सिरदर्द बनकर खड़ी हैं। यदि उस समय चौधरी रणबीर सिंह द्वारा दिए गए सुझावों पर गंभीरता से गौर कर लिया जाता तो संभवतः हर समस्या का हल हो चुका होता। भ्रष्टाचार व काले धन के विरूद्ध गतवर्ष अन्ना व बाबा रामदेव द्वारा चलाए गए राष्ट्रव्यापी आन्दोलनों के दौरान देश के लोगों ने जनप्रतिनिधियों के प्रति अत्यन्त रोष प्रकट किया। चुनावों के दौरान ‘अस्वीकृत’ व ‘वापस बुलाने’ जैसे अधिकार के लिए कानून बनवाने की मांग करके उनकीं योग्यता व निष्ठा पर भी सवालिया निशान लगाए। एक आदर्श जनप्रतिनिधि में कौन-कौन से गुण होने चाहिएं, यह सवाल अंतरिम संसद में 4 अप्रैल व 23 नवम्बर, 1950 को भी उठ चुका है। इस सन्दर्भ में चौधरी रणबीर सिंह ने जो विचार व्यक्त किए, वो आज की जनता के विचारों पर एकदम खरे उतरते हैं। तब चौधरी साहब ने सुझाव दिए थे कि ‘‘सांसद अथवा विधायक बनने के लिए आवश्यक योग्यता देश की सेवा होनी चाहिए। सदन का सदस्य होने से पहले देश और उन लोगों की सेवा करनी चाहिए, जिसका प्रतिनिधित्व वह करना चाहता है। संसद को ऐसे आदमी की आवश्यकता है, जो प्रशासनिक क्षमता रखता हो, बुद्धि रखता हो, मामले को जल्द समझ सकता हो और अभिव्यक्ति की काबलियत रखता हो। यदि सांसद अथवा विधायक की योग्यता यह रख दी जाए कि जो कोई कम से कम पाँच, सात या दस एकड़ नई जमीन को आबाद न करे और काश्त में न लाए तो वह सदन का सदस्य नहीं बन सकता तो इससे देश का भी बहुत भला होगा।’’ यदि उनके इस सुझाव पर गौर कर लिया जाता तो निःसन्देह आज भ्रष्ट, दागी और परिवारवादी नेताओं की बजाय, श्रेष्ठ, योग्य एवं सही जनप्रतिनिधि संसद व विधानसभाओं की शोभा बने हुए होते।

चौधरी रणबीर सिंह ने संसद में विभिन्न अवसरों पर वर्गविहिन समाज के निर्माण पर बल दिया। 6 नवम्बर, 1948 को उन्होंने भारतीय विधान-परिषद की बैठक में वाद-विवाद के दौरान स्पष्ट तौरपर कहा कि, ‘‘हम देश के अन्दर वर्गविहिन समाज बनाना चाहते हैं। यदि किसी को संरक्षण (आरक्षण) देना है तो उन्हीं आदमियों को देना है, जोकि किसान हैं, मजदूर हैं और पिछड़े हुए हैं।’’ देशभर में किसान कर्ज के नीचे दबकर निरन्तर आत्महत्याएं कर रहे हैं। बाजार में उन्हें फसलों का उचित मुआवजा तक नहीं मिल रहा है। उन्हें अपनी फसल कोड़ियों के भाव बेचनी पड़ रही है। कई जगह किसान अपनी फसल को लोगों पर डालने के लिए विवश हुए हैं। दूरदृष्टा चौधरी रणबीर सिंह ने 23 नवम्बर, 1948 को भारतीय विधान परिषद में इसी मुद्दे पर चेताया था कि, ‘‘जब तक हम उपज की कोई इकोनोमिक प्राइस मुकर्रर नहीं करेंगे, तब तक किसान के साथ बड़ा भारी अन्याय होता रहेगा। एग्रीकल्चर की चीजों की इकानामिक प्राइस मुकर्रर किये बिना किसान के आर्थिक जीवन में स्थायित्व नहीं आ सकता और उसको स्थायित्व देना बेहद जरूरी है।’’ इससे पूर्व 6 नवम्बर को इसी परिषद में किसानों पर टैक्स मसले पर बहुत बड़ा सवाल खड़ा किया था कि, ‘‘किसानों के साथ यह बहुत बड़ा अन्याय है और ऐसे देश में जिसके अन्दर किसानों का प्रभुत्व है और जो देश किसानों का ही है, उसके अन्दर उनके साथ यह अन्याय जारी रहेगा तो यह कैसा मालूम देगा?’’ चौधरी रणबीर सिंह ने बाजार में किसानों की फसल को उचित दाम न मिलने के मुद्दे को 2 अगस्त, 1950 में संविधान सभा में बड़ी प्रखरता के साथ इन शब्दों में उठाया था, ‘‘किसान गेहूं मण्डी में ले जाते हैं, लेकिन, उसे खरीदने वाला कोई नहीं है और वे इसे अपने घरों में वापस ले जाते हैं या कम कीमत पर व्यपारियों को बेचने को विवश होते हैं। केन्द्र सरकार हो या प्रान्तीय सरकार, मार्केट को कन्ट्रोल करने में सफल नहीं हुई हैं व व्यापारियों पर अपना दबाव नहीं बना पाई हैं।  मैं इतना ही कहना चाहता हूँ कि एकमुश्त नीति अपनाई जाए।’’ उन्होंने 24 फरवरी, 1948 की बहस में साफ तौरपर कहा कि, ‘‘व्यापारी कुछ भी मेहनत नहीं करता, वह सारा मुनाफा ले जाता है और इसी वजह से ब्लैक मार्केट बढ़ता है।’’ चौधरी साहब कालाबाजारी को देश के लिए कलंक मानते थे। उन्होंने 15 फरवरी, 1951 को अंतरिम संसद सबको चेताया था कि, ‘‘जितना हमारे देश को कालाबाजारी करने वालों से खतरा है, उतना शायद दूसरे किसी आदमी से नहीं है। जहां तक कालाबाजारी करने वालों के खिलाफ आम कानून इस्तेमाल करने का सवाले है, अदालत में वकील लोग अधिकतर अपराधियों को बेकसूर साबित करन में कामयाब हो जाते हैं और वे रिहा हो जाते हैं। ऐसे में उन्हें कोई दण्ड नहीं मिल पाता। मैं समझता हूँ कि मौजूदा कानून कालाबाजारी को रोकने में नाकाफी है।’’ 16 मार्च, 1948 की संसदीय बहस में चौधरी साहब ने स्पष्ट चेताया कि, ‘‘हमारा देश देहाती और किसानों का देश है। अगर, देहातियों और किसानों की आर्थिक हालत खराब होती है तो तमाम हिन्दुस्तान की आर्थिक स्थिति खराब समझनी चाहिए।’’ उन्होंने 24 नवम्बर, 1949 को भारतीय संविधान सभा में बहस करते हुए कहा कि, ‘‘किसानों को आर्थिक आजादी तभी मिल सकती थी, जब ऐसा कायदा बनाया जाता कि जिस चीज को वह पैदा करते हैं, उसे उसकी लागत से कम कीमत पर बेचने के लिए विवश न किया जा सकता होता।’’ चौधरी रणबीर सिंह ने हमेशा देहात के विकास को प्राथमिकता देने की पैरवी की। 6 नवम्बर, 1948 को उन्होंने भारतीय विधान-परिषद की बैठक में वाद-विवाद के दौरान स्पष्ट तौरपर कहा, ‘‘इस देश के निर्माण में जितना बड़ा योगदान देहातियों का है, उतना हक उन्हें मिलना चाहिए और हर चीज में देहात का प्रभुत्त्व होना चाहिए।’’ इससे एक कदम आगे बढ़ते हुए उन्होंने 22 अगस्त, 1949 की बहस में देहात के विद्यार्थियों के लिए लोक सेवा आयोग की परीक्षा में आरक्षण की जोरदार वकालत की। उन्होंने कहा कि, ‘‘जब लोक सेवा आयोग द्वारा कोई प्रतियोगिता आयोजित की जाती है, तब एक ही प्रकार के प्रश्न पूछे जाते हैं और निर्णय करने की कसौटी वही होती है। हमारा देश गांवों का देश है और ग्रामीण जनता अधिक है। लेकिन, तथ्यों के आधार पर इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि शहर के लोगों का विकास अपेक्षाकृत तीव्र गति से हुआ है और वे ग्रामीण जनता की अपेक्षा बहुत अधिक उन्नत हैं और इन परिस्थितियों में यदि ग्रामीण क्षेत्र के किसी व्यक्ति का शहरी क्षेत्र के व्यक्ति के साथ मुकाबला करवाया जाता है और उनसे एक ही प्रकार के प्रश्न पूछे जाते हैं तो इस बात में संदेह नहीं कि ग्रामीण व्यक्ति, शहरी व्यक्ति के साथ सफलतापूर्वक अथवा समानता के आधार पर मुकाबला नहीं कर सकेगा।’’ इस समस्या के सरल समाधान भी चौधरी साहब ने सुझाए। उन्होंने कहा कि, ‘‘इस स्थिति के समाधान के दो तरीके हैं। एक यह है कि ग्रामवासी उम्मीदवारों के लिए सरकारी सेवाओं में कुछ अनुपात आरक्षित कर दिया जाए और सेवाओं में उन्हें आरक्षित संख्या के पद आबंटित किये जाएं। उन पदो के लिए केवल ग्रामीण जनता के उम्मीदवारों को ही मुकाबला करने के लिए केवल ग्रामीण जनता के उम्मीदवारों को ही मुकाबला करने की अनुमति दी जाए। दूसरा तरीका यह है कि लोक सेवा आयोग के सदस्यों को नियुक्त करते समय इस बात का विशेष रूप से ध्यान रखा जाए कि उनमें 60-70 प्रतिशत सदस्य ऐसे होने चाहिएं, जो ग्रामवासियों की कठिनाईयों को समझते हों और उनके साथ सहानुभूति रखें।’’ आजकल उत्तरांचल, बुन्देलखण्ड, तेलंगाना आदि नए राज्यों के निर्माण के लिए कई तरह की सियासती चालें देश में चल रही हैं। इस मुद्दे पर चौधरी रणबीर सिंह सबसे हटकर विचार रखते थे। 1 अगस्त, 1949 को भारतीय संविधान सभा में उन्होंने एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि, ‘‘छोटे-छोटे टुकड़ों को अलहदा सूबों की शक्ल में रखना देश के हित में नहीं है। अगर हम इन्हें अलहदा रखेंगे तो हमें इतना ही भारी प्रशासनिक ढ़ाचा खड़ा करने के लिए भी मजबूर होना पड़ेगा।’’ हालांकि उन्होंने 2 अगस्त, 1949 की बहस में यह स्वीकार किया था कि, ‘‘उत्तर प्रदेश बहुत बड़ा प्रान्त है और इतने बड़े प्रान्त का राज्य आसानी से नहीं चल सकेगा। इसलिए एक न एक दिन उनको उसके दो हिस्से करने ही होंगे।’’ उनकी यह भविष्यवाणी पूर्णतः सही साबित हुई हो चुकी है और उत्तर प्रदेश का दूसरा हिस्सा उत्तराखण्ड बन चुका है। गाँव में स्वास्थ्य सुविधाओं पर भी चौधरी साहब ने जो स्थिति बयां की वह आज भी जस की तस नजर आती है। उन्होंने 10 मार्च, 1948 को संविधान सभा में इस मुद्दे पर बोलते हुए कहा था कि, ‘‘देहातों के अन्दर हजारों ऐसे आदमी हैं, जो अपने आपको वैद्य कहते हैं और देहातियों की जिन्दगियों से खेलते हैं। हर कोई आदमी किसी वैद्य के पास जाता है और एक दिन में ही देहात के लोगों के लिए वैद्य बनकर बैठ जाता है। एलोपैथ डाक्टरों की तर्ज पर उन वैद्यों को रजिस्टर्ड किया जाना चाहिए और आपसे सर्टिफाइड वैद्यों को ही चिकित्सा की इजाजत मिले।’’ इन दिनों जमीन अधिग्रहहण के मसले पर देशभर में बवाल मच रहा है। इस मुद्दे पर किसान व सरकार के बीच सीधा टकराव सामने आ चुका है। जमीन अधिग्रहण से विस्थापित होने वाले लोग अपने दर्द को बयां करने के लिए धरनों, प्रदर्शनों और रैलियों का सहारा ले रहे हैं, लेकिन, उनके दर्द को कोई सुनने वाला नहीं है। जमीन अधिग्रहण के कारण विस्थापित होने वाले लोगों के प्रति चौधरी रणबीर सिंह के हृदय में अत्यन्त सहानुभूति थी। इस मसले पर उन्होंने 6 सितम्बर, 1948 को संविधान सभा (विधायी) में विस्थापितों की पैरवी करते हुए दो टूक शब्दों में कहा था, ‘‘जहां पर आज हम बैठे हैं, यहां कुछ लोग आबाद थे। 25-30 साल पहले उनकीं जमीनें ले ली गईं थीं और उन्हें बेघर कर दिया गया था। उनमें से आज भी बहुत सारे बेघर हैं। मैं एक किसान और खेती करने वाला होने के नाते इस बात को अच्छी तरह समझता हूँ कि जमीन का मुआवजा क्या होता है? आप उसको मुआवजा दीजियेगा, मगर उसका जो पेशा है, वह इन रूपयों से पूरा नहीं होगा। अगर आप उसको दूसरा पेशा नहीं देते हैं तो आप उसे जमीन के बदले जमीन दें। बिल के अन्दर जो पैसे की शर्त है, उसको छोड़ दिया जाए और उसकी जगह यह रख दिया जाए कि उसको जमीन के बदले में उसी कीमत के बराबर की जमीन दी जाएगी।’’

चौधरी रणबीर सिंह ने जमीन अधिग्रहण से संबंधित मुद्दे पर अपनी बेबाक राय प्रस्तुत करते हुए सुझाव दिए थे कि, ‘‘जहां तक हो सके कृषि भूमि को छोड़ दें, क्योंकि, वहां काफी अन्न पैदा होता है। उसके बदले, जहां तक हो सके परती भूमि में से जमीन लें और उपजाऊ जमीन को छोड़ दें। परती जमीन पर जो सरकारी चीज बनाना हो वहां बनायें। अगर, किसी जरूरत के लिए वह समझें कि वे उस उपजाऊ कृषि भूमि को नहीं छोड़ सकते, तभी वे ऐसी जमीन पर अपना हाथ रखें या डालें, अन्यथा नहीं। लेकिन, उसके साथ-साथ, जैसाकि अधिग्रहण कानून में दर्ज है, बहुत मामूली सा मुआवजा देकर काश्तकार से अपना पल्ला छुटाना कोई अच्छी नीति नहीं है।’’ यदि चौधरी साहब के इन सुझावों पर गंभीरता से गौर किया जाए तो जमीन अधिग्रहण के विवादों को सहज हल किया जा सकता है। आजकल सगोत्र विवाह और ऑनर किलिंग का मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर चिंता एवं चुनौती का विषय बना हुआ है। देहात के लोग इस मुद्दे के हल के लिए ‘हिन्दु विवाह अधिनियम’ में संशोधन करने का अभियान चलाए हुए हैं और दूसरी तरफ सरकार इस रूख पर उदासीन नजर आ रही है। ‘हिन्दू विवाह वैधता अधिनियम’ के प्रस्ताव पर 11 फरवरी, 1949 को बहस करते हुए चौधरी रणबीर सिंह ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि, ‘‘यह हिन्दू कोड बिल देश के अन्दर कुछ सुधार करने के लिये या सामाजिक कुरीतियों को दूर करने के लिये, उनमें तबदीली करने के लिये, लाया जाता रहा है। आज जिस तरीके से जिस बैक डोर से यह बढ़ा है, वह कोई बहुत अच्छा ढ़ंग नहीं है। हमारा समाज इतनी उन्नति नहीं कर पाया है कि हम मान जायें कि यह सगोत्र विवाह ठीक है। इसको आप दस साल के लिये अपनी किताब में जमा रखें। दस साल बाद उस पर फिर गौर कर लिया जाएगा। अगर ठीक होगा तो मान लेंगे और अगर उस समय तक समाज की उतनी तरक्की नहीं हुई तो वह कायदा किताब में ही रहेगा।’’ कुल मिलाकर चौधरी रणबीर सिंह ग्रामीण भारत की बुलन्द आवाज थे और देहातियों के जबरदस्त पैरवीकार थे। वे धरती से जुड़े आदमी थे और दिखावे की बजाय यथार्थ में यकीन रखते थे। उनकी दूरदर्शिता बड़ी लाजवाब थी। उन्होंने जो भी सुझाव, विचार अथवा चेतावनी दी, वो दूरगामी सिद्ध हुए और सच साबित हुए। यदि उनके दिखाए मार्ग पर आज भी चलने का प्रयास किया जाए तो निसन्देह बेहद प्रभावी और सकारात्मक परिणाम हासिल होंगे। राष्ट्र के प्रति उनकी अनमोल देनों को देखते हुए कुरूक्षेत्र विष्वविद्यालय कुरूक्षेत्र ने उन्हें वर्ष 2007 में डी.लिट की उपाधि से विभूषित किया। 1 फरवरी, 2009 को ये ग्रामीण भारत के प्रखर प्रहरी अपनी सांसारिक यात्रा पूरी करके हमेशा के लिए परमपिता परमात्मा के पावन चरणों में जा विराजे। पूरा देश उनके सिद्धान्तों, अनूठे कार्यों, महत्वपूर्ण देनों और दूरदर्शी विचारों का कायल रहा और हमेशा रहेगा। उन्हें कोटि-कोटि नमन है।

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