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भरतचन्द नायक

एशिया में लोकतंत्र का उदय उन्नीसवीं शताब्दी की महत्वपूर्ण घटना है। लेकिन इससे भी विस्मयकारी यह है कि प्रायद्वीप में लोकतंत्र में जितनी गतिशीलता और परिपक्वता भारत में आयी है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। तथापि भारतीय लोकतंत्र विकृतियों का अपवाद है यह दावा भी नहीं किया जा सकता है। भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति सहिष्णुता और राष्ट्रीय मुद्दो पर सहमति रही हे। हाल के वर्षो में इस शक्ति का क्षरण बढती असहिष्णुता के साथ हुआ है। इसका कारण सत्तासीन दलों का अपनी विफलता छिपाने के लिए सत्ता का वेजा इस्तेमाल करना रहा है। जिससे अधिनायकवादी प्रवृत्ति हावी हुई है। सत्तर के दशक में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जी अपने विपक्षी दलों पर राजनैतिक अस्थिरता पैदा करने और अमेरिकी खुफिया एजेन्सी के हस्तक्षेप करने का आरोप चस्पा करती रही और अन्तत: उन्होनें देश पर आपातकाल थोप दिया। जनता ने उन्हें आईना दिखाया। जयप्रकाश नारायण की समग्र क्रांति इसकी परिणति बनी जिसने लोकतंत्र वहाल किया। तब भी संपूर्ण क्रांति का नारा भ्रष्टाचार से परेशान जनता की विवशता थी। आज हालात कुछ भिन्न है। देश में भ्रष्टाचार शिष्टाचार बन चुका है। कालेधन के रूप में लाखों, करो$डों रूपये विदेशी बैंकों में जमा होते हुए केन्द्र में कुर्सी पर बैठी सरकार की उदासीनता जनता को असे बन चुकी है। आर्थिक उदारीकरण में आम आदमी का चेहरा गुम हो चुका है।

इंदिरा गांधी तब अपनी विफलता के ढकने के लिए मीडिया पर भी दोष थोप रही थी। मौजूदा दौर में जब अन्ना हजारे का आन्दोलन भ्रष्टाचार की रोकथाम के लिए जनलोकपाल विधेयक की स्थापना के समर्थन में शिखर पर पहुंचा तो प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह और कांग्रेस के नेता इस जन आन्दोलन को लोकतंत्र पर प्रहार और संसद की अवमानना बताकर जनता को भ्रमित करने लगे। यहां यह बात कहीं जा सकती है कि जिस तरह जनलोकपाल विधेयक को कानून बनाने के लिए समय सीमा की बात की जा रही है उसे समग्र नही माना जा सकता है। कुछ लोग इस तरह की बहस को नकारात्मक प्रयास भी कह रहे है। ऐसे समय में जनचेतना यात्रा के आयोजन की उपयोगिता, सार्थकता के बारे में दो मत नही हो सकते है। क्योंकि यह एक रचनात्मक और सार्थक पहल है। यह सही है कि संसद में बहस के साथ देश में संस्थागत बदलाव की आशा की जाती है। लेकिन व्यवस्था में मूलभूत परिवर्तन बिना जन मत बनाये नही आ सकता है। इस दृष्टि से जनचेतना यात्रा की सफलता के बारे में दो राय नही हो सकती है। गांधी और लोकनायक ने देश में अनैतिकता के विरूद्घ विगुल बजाया था। उनकी आवाज देश की प्रज्ञा बनी थी। जिस तरह लोकनायक की समग्र क्रांति एक सोच परिर्वतन की बयार बहाने में सफल हुई। जनचेतना यात्रा के विषय में भी यह अपेक्षा करना अतिश्योक्ति नहीं होगी। यात्रा राष्ट्रीय प्रजा के रूप में स्वीकार्य होगी। क्योंकि यह तो सभी जानते है कि महज कानून का बन जाना समाज और व्यवस्था की चिंतन की धारा, व्यवहार और आचरण में बदलाव, बेहतरी लाने के लिए पर्याप्त नहीं है। लिहाजा यदि जनचेतना यात्रा देश में भ्रष्टाचार उन्मूलन और व्यवस्था में वांछित क्रमिक सुधार की आवश्यकता के बारे में जनमत तैयार करने का गैर राजनैतिक मंत्र बनती है तो यह लोकतंत्र की गरिमा बढाने का सोपान सिद्घ होगा। परिर्वतन के अनुरूप जनमानस बनाने की आवश्यकता को इसी बात से समझा जा सकता है कि देश के राजनैतिक दलों ने अतीत से सबक सीखने का साहस नहीं दिखाया। एक समय था जब देवकान्त बरूआ इंदिरा इज इंडिया कहने में गर्व का अनुभव करते थें।

आज देश में भ्रम फैलाने की चेष्‍टा की जा रही है और चाटुकारिता इस हद तक पहुंच गई है कि राहुल गांधी को कांगे्रस का भविष्य बताते हुए यह भी जो$डा जा रहा है कि कांग्रेस ही देश का भविष्य है। सवाल यह उठता है कि इस कथन को यदि सत्तासीन दल का बौद्घिक प्रतिबिंव माना जाये तो देश में लोकतंत्र के भविष्य की क्या आशा की जा सकती है। हकीकत में देखा जाये तो इस मानसिकता में नीति और विवेक दोनों का खोखलापन है जिसमें जन सरोकार कही नहीं झलकता।

ऐसे समय जब देश में सियासत की परिभाषा वोटों के मुनाफा और घाटे के बीच सिमट चुकी है जनचेतना यात्रा को लेकर भ्रम पैदा करने की संभावना भी कम नहीं है। लेकिन जब जनचेतना यात्रा सभी दलों के सहयोग का आह्वान करती है तो इसे परिवर्तन का संवाहक ही माना जायेगा। यात्रा का प्रयोजन जो लोग राजनीति से जो$डते है उनकी सोच पर तरस ही खाया जायेगा। यात्रा ने मुख्य रूप से जनमानस को रचनात्मक दिशा में आन्दोलित करने का सीमित एजेंडा रखा है और देश में राजनैतिक, चुनावी, व्यवस्था और न्यायिक सुधारों की आवश्यकता रेखांकित की है। गौरतलब तथ्य यह है कि इस राष्ट्रीय मिशन को लेकर एक ऐसा मनीषि ४० दिन की यात्रा पर निकला है जिसने राजनैतिक, सामाजिक कसौटियों पर अपने को खरा सिद्घ किया है। लोकतंत्र में हर परीक्षा से गुजरा, कुन्दन बनकर निखरा है। पूर्व उपप्रधानमंत्री और भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी का नाम जब हवाला कांड में घसीटा गया उन्होनें संसद से त्यागपत्र देने में क्षण भर का समय नहीं गंवाया और कसम ली कि जब तक वे इस कांड में बेदाग सिद्घ नही होते वे कोई चुनाव भी नहीं लडेगें। सांच को आंच क्या। वें अपने उपर लगी कालिख को पोंछने में सफल हुए। जनचेतना यात्रा में भ्रष्टाचार और कालेधन का मुद्दा प्रमुख है। यदि देश में व्यवस्था परिवर्तन की बात रखी जाना है तो किसी भी दल को अपराध बोध से ग्रसित हुए बगैर यात्रा का स्वागत करना चाहिए। क्योंकि राष्ट्रीय फलक पर परिवर्तन लाने के लिए जो चार सुधार आवश्यक है उनमें प्रशासनिक सुधार, चुनाव सुधार, न्यायिक सुधार और राजनैतिक सुधार की आवश्यकता किसी से छिपी नहीं है। सवाल यह उठता है कि मसाजिद में रोशनी करने से पहले अपने घर को भी रोशन करके दिखाने का साहस होना चाहिए। इस मामलें में भारतीय जनता पार्टी पर कोई दोषारोपण करना वास्तव में नाईन्साफी ही होगी।

आर्थिक मामले में देश में राजनैतिक दलों की निर्भरता औद्योगिक घरानों के चंदा पर आजादी के बाद से ही रही है। लेकिन भारतीय जनता पार्टी ही एकमात्र दल है जिसनें वित्तीय पोषण में आत्म निर्भरता का देश को पाठ पढ़ाया है। उसने आजीवन सहयोग निधि कारपस फंड १९९३ में ही बनाकर दिखा दिया था जिसमें पार्टी के सदस्य और हित चिन्तक मुक्त हस्त से सहयोग करते है। पार्टी का संचालन, चुनाव भी इसी कोष से पूरा होता है। भारत के पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त लिंगडोह ने राजनैतिक दलों को निर्वाचन आयोग की परिधि में लाने की बात कही है। उससे राजनैतिक दल सहमत और असहमत हो सकते है। लेकिन भारतीय जनता पार्टी के संविधान की पारदर्शिता पहले ही उनकी कसौटी पर खरी उतरी है। पार्टी ने सुशासन और साफ सुथरी राजनीति की दिशा में पहले ही काफी कुछ कदम उठाये है। भले ही यह पूरी मंजिल न हो। लेकिन इन्हें अच्छा पड़ाव तो माना जा सकता है। यही लालकृष्ण आडवाणी की जनचेतना यात्रा का नायक बनने का नैतिक अधिकार प्रदान करती है। देश में परिवर्तन की लहर के लिए यह राजनैतिक दल ध्वजवाहक बन सकता है।

भारतीय जनता पार्टी ने देश में गठबंधन सरकार का शिल्प तैयार करके संविधान की संघीय भावना को मूर्त रूप तो दिया ही राजग के कार्यकाल में महत्वपूर्ण राजनैतिक, चुनावी सुधार करने की प्रतिवद्घता भी पूरी की है। संविधान में संशोधन करके २००३ में मंत्रिमंडल की सीमा मर्यादित करके दलबदल रोकने का साहस भी दिखाया। मंत्रिमंडल की सदस्य संख्या विधायकों के अंकवल का १५ प्रतिशत सीमित की गई है। इसी तरह राज्यसभा के चुनाव में खरीद-फरोख्त समाप्त करने के लिए गुप्त मतदान की जगह खुला मतदान का प्रावधान जन प्रतिनिधित्व कानून में किया। भाजपा को केन्द्र में सरकार बनाने के तीन अवसर मिले। एक वोट से सरकार गंवाने का सौभाग्य तो मिला लेकिन उस पर कांग्रेस की तरह संसद को सांसदों की मंडी बनाने का आरोप कभी नहीं लगा। राजनैतिक दलों द्वारा चंदा वसूले जाने से लोकतंत्र को अपमानित होने से बचाने के लिए खुलापन लाने हेतु वित्तिय पोषण विधेयक भी पारित किया। भाजपा की जिन प्रदेशों में सरकारे है वहां विकास को फोकस में लाकर लोकायुक्त कानून पर अमल करने का उदारहण पेश करने के साथ स्वराज में सुराज का सपना पूरा करके भाजपा ने दिखाया है।

राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार का २००४ में समापन होने के बाद से २०११ के बीच देश की संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा का जितना क्षरण हुआ है उसमें दुनिया में देश की साख गिरी है। यह कांग्रेसनीत यूपीए सरकार का कार्यकाल है। इसकी जिम्मेदारी लेने की यूपीए अध्यक्ष और यूपीए सरकार के प्रधानमंत्री ने कभी भी इच्छा शक्ति नही दिखायी। संसद को न तो विश्वास में लेने की आवश्यकता समझी और न गलतियों का परिष्कार, सुधार करने की जहमत उठायी। इसी का नतीजा है कि प्रधानमंत्री को बार बार सर्वोच्च न्यायालय की तलख झिड़किया सुनना पडी और लोकसभा में भी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति का सामना करना पडा। २-जी स्पेक्ट्रम घोटाला में तो सौ जूते और सौ प्याज की कहावत चरितार्थ हो चुकी है।

जनचेतना यात्रा का प्रारंभ जिस गरिमा के साथ लोकनायक जयप्रकाश की जंयती पर उनके गृह राज्य बिहार से किया गया उसके पीछे भावना कोई राजनैतिक लाभ उठानें की नहीं अपितु लोकनायक की भावना, उनके सपनों के अनुरूप राजनीति में शुचिता लाना और लोक व्यवस्था में जन आंकाक्षा का प्रतिबिंव देखने की ललक है। यात्रा ११ अक्टूबर से देश के १८ राज्यों, ८ केन्द्र शासित राज्यों में फेले १०० से अधिक जिलों में पहुंच रही है। यात्रा देश में जनचेतना जाग्रत करने में सफल हो सकी तो भारतीय लोकतंत्र में एक सुनहरा अध्याय जुडेगा। जनचेतना यात्रा एक ऐतिहासिक उपलब्धि बनेगी। देश की जनता को उसके सूचना के अधिकार की चाहत स्वंय स्फूर्त पूरी हो जायेगी। क्योंकि जनता देश को ग्रसित करने वाले संकटों से परिचित हो सकेगी। जनचेतना यात्रा लोकशिक्षण और लोकरंजन का सशक्त माध्यम बनेगी। इसमें कतई संदेह नहीं रह गया है।

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