लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

शिक्षा : एम.ए. राजनीति शास्त्र, मेरठ विश्वविद्यालय जीवन यात्रा : जन्म 1956, संघ प्रवेश 1965, आपातकाल में चार माह मेरठ कारावास में, 1980 से संघ का प्रचारक। 2000-09 तक सहायक सम्पादक, राष्ट्रधर्म (मासिक)। सम्प्रति : विश्व हिन्दू परिषद में प्रकाशन विभाग से सम्बद्ध एवं स्वतन्त्र लेखन पता : संकटमोचन आश्रम, रामकृष्णपुरम्, सेक्टर - 6, नई दिल्ली - 110022

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शर्मा जी को बचपन से ही रेडियो सुनने का बड़ा शौक था। किसी जमाने में उनके घर में एक बड़ा रेडियो हुआ करता था। अतः वे खुद को कुछ खास समझते थे और बड़ी ठसक के साथ उसके पास बैठे रहते थे। रात में पौने नौ बजे वाले समाचारों के समय आसपास के लोग वहां आ जाते थे। नौ चालीस होते ही लोग कहते, ‘‘बेटा, समाचार आने वाले हैं। रेडियो खोल दो।’’ लेकिन शर्मा जी बड़ी शान से कहते, ‘‘नहीं काका, अभी पांच मिनट बाकी हैं।’’ काफी मान-मनुहार के बाद ही वे रेडियो की घुंडी घुमाते थे।
शर्मा जी को देश-विदेश की राजनीति तब पल्ले नहीं पड़ती थीं। कौन विदेश गया और कौन वहां से भारत आया, इससे भी उन्हें कुछ लेना-देना नहीं था। क्रिकेट का बुखार तब तक चढ़ा नहीं था। हॉकी में हार-जीत की खबरें कभी-कभी जरूर आती थीं; पर वे उनके सिर के ऊपर से निकल जाती थीं। चूंकि खेल के नाम पर उनकी रुचि कंचे, पतंग, लट्टू और गुल्ली-डंडे तक ही सीमित थी।
लेकिन शर्मा जी ‘मौसम का हाल’ बड़े ध्यान से सुनते थे। देश में कहां का तापमान सबसे अधिक रहा और कहां का सबसे कम ? कहां वर्षा हुई और कहां नहीं ? मानसून कहां तक आ गया; वह उनके गांव में कब पहुंचेगा ? हिमपात कहां और कितना हुआ ? बाढ़, सूखा, तूफान आदि की बातें वे केवल सुनते ही नहीं, याद भी रखते थे। इस पर कई लोग उनके पिताजी से कहते थे कि इस बच्चे को भूगोल और खगोल शास्त्र पढ़ाइये। क्योंकि इसकी रुचि ग्रह, नक्षत्र और बादलों की गति को समझने में है। यदि भाग्य ने साथ दिया, तो ये अंतरिक्ष या मौसम वैज्ञानिक बन जाएगा।
लेकिन किसी संत ने कहा है कि ‘‘तेरे मन कुछ और है, दाता के कुछ और।’’ शर्मा जी न तो अंतरिक्ष में गये और न ही मौसम विज्ञानी बन सकेे। हां, परिवार पालने के लिए वे नगर निगम के जल-कल और मल विभाग में ‘फील्ड क्लर्क’ जरूर हो गये। वे तो बड़ी-बड़ी दूरबीनों से ग्रह और नक्षत्रों की हलचल देखना चाहते थे; पर भाग्य ने उन्हें घर-घर जाकर पानी के मीटर देखने के काम में लगा दिया। वे आकाश में खूब ऊंचा जाने की बात सोचते थे; पर अब उन्हें सीवर के गड्ढे जांचने के लिए कभी-कभी नीचे भी उतरना पड़ता था। शुरू में तो उन्हें बुरा लगा; पर नौकरी पक्की और सरकारी थी। अतः दो-तीन साल में उन्होंने इससे तालमेल बैठा लिया। इससे घर और दफ्तर, दोनों गाड़ियां ठीक से चलने लगीं।
अगले चालीस साल तक शर्मा जी इन कामों में इतने व्यस्त रहे कि ‘मौसम का हाल’ सुनने की फुर्सत ही नहीं मिली; लेकिन अवकाश प्राप्ति के बाद उनका यह पुराना शौक फिर जाग गया। अब बड़े वाले रेडियो का जमाना तो रहा नहीं। अब तो हर जेब में मोबाइल और उसमें रेडियो मौजूद है; लेकिन शर्मा जी दहेज में मिले पुराने मरफी ट्रांजिस्टर का ही उपयोग करते हैं। उसे देखकर उन्हें अपनी जवानी के वे पुराने दिन याद आ जाते हैं, जब उनके सिर पर भी काले, घने और घुंघराले बाल हुआ करते थे। अब भी कभी-कभी वे उस सफाचट मैदान पर हाथ फेरते हैं, तो मुंह से ठंडी सांस के साथ ‘‘खंडहर बता रहे हैं, इमारत बुलंद थी’’ जैसे शेर निकल जाते हैं।
लेकिन रेडियो सुनने के इस दूसरे दौर में शर्मा जी की रुचि वर्षा, आंधी, बाढ़ आदि के समाचारों में नहीं रही। अब वे दिन में कई बार ‘राजनीतिक मौसम’ का हाल सुनना पसंद करते हैं। और फिर वह मसालेदार खिचड़ी सुबह या शाम को पार्क की महफिल में अपनी विशेषज्ञ टिप्पणियों के साथ वे हमें भी परोस देते हैं।
पिछले लोकसभा चुनाव के समय शर्मा जी का उत्साह चरम पर था। उन्हें विश्वास था कि मोदी चाहे जितने हाथ-पैर पटके, पर सरकार कांग्रेस ही बनाएगी और राहुल बाबा का पूरे तामझाम के साथ राज्याभिषेक होगा। उन्होंने अपने ट्रांजिस्टर पर आगे और पीछे, दोनों ओर कांग्रेस के चुनाव चिन्ह ‘हाथ’ के बड़े स्टिकर भी लगा लिये। कभी-कभी वे उस ट्रांजिस्टर के साथ ही पार्क में आ जाते थे; पर न जाने किस ‘इटैलियन बिल्ली’ ने रास्ता काटा कि कांग्रेस की पूरी पारी 44 रन पर ही सिमट गयी। ये तो कुछ कृपा मुलायम सिंह की हुई कि उन्होंने बाबा और मम्मीश्री के विरुद्ध प्रत्याशी नहीं उतारे, वरना इन्हें विपक्ष में बैठना भी नसीब न होता। बेचारे शर्मा जी कई महीने तक गहन उदासी में डूबे रहे। अब वे पार्क में आते, तो कुछ देर एक कोने में बैठकर ही वापस चले जाते थे।
लेकिन धीरे-धीरे उनका गम कम हुआ। दिल्ली विधानसभा के चुनाव की गरमी बढ़ी, तो शर्मा जी फिर ‘मौसम का हाल’ सुनने लगे; लेकिन इस बार उनके अरमानों पर ऐसी झाड़ू लगी कि बेचारे मुंह दिखाने लायक भी नहीं रहे। जो कांग्रेस राज्य की सत्ता में थी, उसे एक भी सीट नहीं मिली। शर्मा जी की हालत ऐसी हो गयी, जैसे कोमा में पड़ा मरीज। उसे मरा हुआ मानें या जिन्दा, इस पर न डॉक्टर कुछ कहने को तैयार हैं और न घर वाले।
कुछ दिन बाद मैडम सोनिया और राहुल बाबा समझ गये कि ‘साफ’ होने से तो ‘हाफ’ होना ही अच्छा है। अतः बिहार में उन्होंने लालू और नीतीश बाबू की दुम बनना स्वीकार कर लिया। इससे उन्हें बिहार में कुछ सीट मिल गयीं। फिर क्या था, शर्मा जी की टूटती सांसों में जान पड़ गयी। उन्होंने घोषणा कर दी कि कांग्रेस पूरी आन, बान और शान के साथ वापस आ रही है।
लेकिन पांच राज्यों के चुनाव में फिर वही हुआ, जो गत दो-ढाई साल से हो रहा है। अब तो शर्मा जी हिम्मत टूट गयी और उन्होंने ‘मौसम का हाल’ न सुनने की कसम खा ली। एक दिन कबाड़ी आया, तो उन्होंने वह दहेजी ट्रांजिस्टर उसे ही थमा दिया। कबाड़ी ने उसे उल्टा-पल्टा, और शर्मा जी के हाथ में दस का नोट रख दिया।
शर्मा जी गुस्से से उबल पड़े – तुझे इस पुराने ट्रांजिस्टर की कीमत दस रु. ही नजर आती है ?
– बाबू जी, ये इसकी नहीं, उन स्टिकरों की कीमत है, जो इसके आगे और पीछे लगे हैं ?
– क्या मतलब ?
– मतलब ये कि कांग्रेस का जो हाल है, उससे लगता है कि अगली बार दो अंगूठे, यानि सोनिया और राहुल बाबा के साथ आठ उंगलियां ही लोकसभा में पहुंचेगी। ये दस रु. उनके शगुन के लिए हैं।
शर्मा जी ने वह नोट वापस कबाड़ी की जेब में ही ठूंस दिया। अपना ट्रांजिस्टर उठाया और चुपचाप अंदर जाकर लेट गये।
– विजय कुमार,

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