लेखक परिचय

प्रियंका सिंह

प्रियंका सिंह

स्वतंत्र लेखक व् टिप्पणीकार नॉएडा

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प्रियंका सिंह

आधुनिकरण के साथ साथ लगता है जैसे लोगो में इंसानियत कम होती जा रही है किसी काम को करने की वजह मात्र ‘’जरुरत और फ़ायदे’’ भर रह गयी है. गावों की बात हो या शहरों की जिस तेज़ी से सामाजिक स्तर बढ़ाता जा रहा है उससे कहीं तेज़ी से मानसिक स्तर कम होता जा रहा है.

गये दिनों को पर नज़र डाले तो लोगो की दोहरी और खोखली सोच ये सोचने पर मजबूर करती हैं की आज भी हम बातें बनाने में आगे है और व्यवहारिक रूप से उन्हें समझने और समझाने में बहुत पीछे हैं.

गुज़रे सप्ताह नवरात्रे मनाये गये. जगह-जगह पंडाल, भंडारा, दान-पूण्य, कन्या-पूजन चलता रहा और उसके साथ ही लगभग देश के हर कोने से बलात्कार, दुष्कर्म और अपहरण की वारदातें सामने आती रहीं. छोटी बच्चियों से ले कर बड़ी उम्रदराज़ महिलाओं तक को नहीं बक्शा गया. घरों में, स्कूल में, दफ्तरों में और बाज़ारों में हर जगह यह वैहशी खेल चलता रहा. यहाँ तक देवी के जागरण में भी

जरा सोचें ये कैसी देवी की पूजा है जहाँ 9 दिन तक एक स्त्री स्वरूप को देवी रूप में पूजा जाता है और उन्ही दिनों किसी दूसरी देवी स्वरूप स्त्री का बलात्कार/दुष्कर्म और अपहरण किया जाता है. ये किस तरह के और कैसी सोच के लोग है जो एक ही अर्थ को अपनी जरुरत के हिसाब से समझते हैं.

लोगों ने नवरात्रे के शोर-शराबे में इन बलात्कार/दुष्कर्म और अपहरण जैसी घटनाओं को लगभग नज़रंदाज़ किया और कहीं कोई विरोध के स्वर नहीं सुनाई दिए….कारण वही ‘’देवी पूजन में कोई व्यवधान न हो’’. ये हैं आधुनिक समाज की आधुनिक सोच वाली पूजा शैली जिसमें अपने आँगन में दीप जले और दूजे के घर आग लगे तो अपने घर के दिए को दोष नहीं दिया जाता बल्कि दुसरे के घर में दोष निकाला जाता है.

इसी बीच मोदी जी ने अपनी तरफ ध्यान खींचने के लिए 2 अक्टूबर के दिन जब ‘’शास्त्री जी और गांधी जी की जयन्ती’’ मनायी जाती है उसी दिन ये कह कर ‘’झाड़ू अभियान’’ शुरू किया की स्वच्छ भारत गांधी जी की दबी इच्छा थी जिसे आज तक किसी ने पूरा करने की कोशिश नहीं की. अमेरिका में अपने लोगो के बीच अपना गुण-गान करके लौटे मोदी जी ने सोचा यही वक़्त है एक के बाद एक तीर चलाने का और सोच समझ कर चलाया भी…..वो बात अलग है की इसकी सार्थकता उनके अमेरिका शगुफे सी सिद्ध न हो सकी.

हालाकि ये पहल अच्छी थी पर दिन गलत चुना गया या कहें की मोदी जी हर बड़े यादगार दिन को अपने नाम करना चाहते है इसलिए उन्हें ये बहाने सही लगे. जो मोदियाये लोग थे उन्होंने आँख बंद कर झाड़ू हाथ में ली और हर साफ़ जगह खूब झाड़ू मारी और फोटो भी खिंचवायें और पुरे दिन टीवी और पेपरों में छाए रहे पर नतीजा कुछ नहीं निकला…..निकलेगा भी कैसे? एक दिन की सफाई से देश कहाँ साफ़ होने वाला है. लोग खुश हो कर मोदिगान में लगे रहे और इसे अनोखी पहल बताया गया पर कोई ये बताये की इस एक दिन में सभी ने मिल कर कितने गरीबों के पेट पर लात मारी और कितनों का रोज़गार छीन लिया. अच्छा तो तब होता जब इसी दिन गरीबों को सफाई कार्य पर लगा कर उनके लिए रोज़गार की व्यवस्था करायी जाती और झुगी-झोपड़ियों में बरपी गन्दगी को साफ़ किया जाता लेकिन ऐसा क्यूँ करना ऐसा करने से ‘’फुल कवरेज’’ नहीं मिलती ना.

खैर इसी साफ़-सफाई की चर्चा दिवाली की वजह से भी खूब रही और मॉडर्न महिलाओं को तो बहाना मिल गया अपने पतियों से सफाई करवाने का और जहाँ सभी श्रीमतियाँ अपने करवाचौथ के व्रत में व्यस्त रहेंगी वहीँ उनके ऑफिसीया पति सफाई कर लेंगे तो क्या हो जायेगा उनकी पत्नियाँ भी तो पुरे एक दिन बिना अन्न-जल के मात्र ‘’जूस और फ्रूट्स’’ खा कर पुरे दिन उनके लिए पार्लर में सुबह से शाम तक बैठी रहती हैं, खास एक दिन के लिए पुरे साल दुकानों में खुबसूरत जोड़े तलाशा करती हैं, डायमंड और महँगे से महंगे तोहफे सपनो में देखा करती हैं, पूजा-पाढ़ ‘’IS OK’’ पर सजी-धजी फोटो खिंचवाने की तमन्ना दिल में लिए रहती हैं. तो क्या उनके लिए उनके पति सफाई जैसा छोटा काम भी नहीं कर सकते….

 

एक तरफ जहाँ करवाचौथ के दो दिन पहले से ही मेहँदी लगाने वालों ने अपने दाम दुगने चोगुने कर रखे है वही हाथों पर एक गोल चन्दा बना कर मुस्कुराती बन्नो भी अपने पति की राह तकती नज़र आएगी. उसका पति लाख उसे मारे-पिटे, गलियां दें पर वो हर साल की तरह इस साल भी अपने निकम्मे, नाकारा पति की लम्बी आयु के लिए करवाचौथ का व्रत रखेंगी और हर बार की तरह अपने पति की लातें खा कर अपना व्रत पूरा करेगी और फिर अलगे साल इसी दिन के लिए हाथों पर गोल चन्दा रखेगी.

 

कितनी अजीब बात हैं नवरात्रे हो या करवाचौथ लोग अपनी जरूरतों और सोच के हिसाब से इसके मायने तय करते हैं और वही उनका अपना तरीका है कोई भी त्यौहार मानाने का पर इस दोहरी मानसिकता के चलते जो सच है उसको क्यूँ दबाना?….क्यूँ अनदेखा करना?…क्यूँ उससे मुंह मोड़ना?

सिर्फ साफ़-सफाई घर की मन की नहीं, विचारों की नहीं फिर किसी भी देवी पूजन की सार्थकता कैसे? जब मन मैला हो, सोच गन्दी हो, जब देवी घर से निकाली जाये…मारी जाये…पिटी जाये….बेची जाये….कुचली जाये….उसके साथ बलात्कार और अपहरण जैसी घिनौनी साजिशें की जाएँ. फिर कैसे कोई देवी प्रसन्न हो और कैसे कोई देवी घर में आये? कैसे ?

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