लेखक परिचय

लिमटी खरे

लिमटी खरे

हमने मध्य प्रदेश के सिवनी जैसे छोटे जिले से निकलकर न जाने कितने शहरो की खाक छानने के बाद दिल्ली जैसे समंदर में गोते लगाने आरंभ किए हैं। हमने पत्रकारिता 1983 से आरंभ की, न जाने कितने पड़ाव देखने के उपरांत आज दिल्ली को अपना बसेरा बनाए हुए हैं। देश भर के न जाने कितने अखबारों, पत्रिकाओं, राजनेताओं की नौकरी करने के बाद अब फ्री लांसर पत्रकार के तौर पर जीवन यापन कर रहे हैं। हमारा अब तक का जीवन यायावर की भांति ही बीता है। पत्रकारिता को हमने पेशा बनाया है, किन्तु वर्तमान समय में पत्रकारिता के हालात पर रोना ही आता है। आज पत्रकारिता सेठ साहूकारों की लौंडी बनकर रह गई है। हमें इसे मुक्त कराना ही होगा, वरना आजाद हिन्दुस्तान में प्रजातंत्र का यह चौथा स्तंभ धराशायी होने में वक्त नहीं लगेगा. . . .

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लिमटी खरे

अमर से डरा दुनिया का चौधरी

सियासी गलियारों में इन दिनों यह चर्चा जोरों पर है कि चलो दुनिया के चौधरी को किसी से डर तो लगा। अमेरिका को डर है तो बड़बोले राजनेता अमर सिंह से। दरअसल अमर सिंह के पास कुछ एसे राज हैं जिनके उजागर होते ही भारत के टॉप राजनेताओं के साथ ही साथ अमेरिका की साख पर भी बट्टा लग सकता है। न्यूक्लीयर डील में भारत के समर्थन को पाने के लिए अमेरिका के सैम अंकल यानी ओबामा ने साम दाम दण्ड भेद की जो नीति अपनाई उससे वह तो मीर हो गया किन्तु संसद में नोट उछाले गए जिससे देश की सबसे बड़ी पंचायत शर्मसार हो गई। कहा जा रहा है कि अगर अमर सिंह ने मुंह खोला तो कांग्रेस के आला नेताओं के कपड़े उतर सकते हैं। ‘बात निकली है तो दूर तलक जाएगी‘ की तर्ज पर इसके तार सीधे अमेरिका से जा जुड़ेंगे। अगर एसा हुआ तो दुनिया भर में अमेरिका की भद्द पिटना स्वाभाविक ही है।

घर का जोगी जोगड़ा आन गांव का सिद्ध

पुरानी कहावत है कि घर का जोगी जोगड़ा आन गांव का सिद्ध। अर्थात जो दूर गांव में सिद्ध कहलाता है उसकी अपने घर में कोई पूछ परख नहीं होती है। इस बात को दो तरह से लिया जा सकता है एक तो वह वाकई सिद्ध है या फिर घर वाले उसकी हकीकत जानते हैं। दूसरी बात उत्तर प्रदेश में लागू होती दिख रही है। लगभग डेढ़ दशकों से कांग्रेस की बागड़ोर संभालने वाली राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी और उनके युवराज पुत्र राहुल गांधी दोनों के संसदीय क्षेत्र उत्तर प्रदेश में हैं। देश को सबसे अधिक प्रधानमंत्री भी उत्तर प्रदेश ने ही दिए हैं। पिछले एक दशक से ज्यादा समय से उत्तर प्रदेश में कांग्रेस बीमार और आक्सीजन पर है। कांग्रेसियों को भरोसा है कि सोनिया और राहुल के भरोसे वे 2014 के आम चुनावों के अलावा सूबाई चुनावों में विजयश्री का वरण कर पाएंगे। एक जिम्मेदार कांग्रेसी ने पहचान गुप्त रखने की शर्त पर टिप्पणी की ‘कांग्रेसी मुगालते में हैं जब मां बेटे अपना घर ही नहीं संभाल पा रहे तो देश को क्या खाक संभालेंगे?‘

वास्तविक गरीब, सरकारी गरीब

सरकार भी अजीब है। कभी कहती है कि आधी से ज्यादा आबादी को एक टाईम का खाना नसीब नहीं। कभी करोपति सांसदों विधायकों की बढ़ती तादाद बताती है। कभी गरीबी का कुछ पैमाना बताती है कभी गरीबी रेखा के नीचे वालों की तादाद को कम करने के लिए गरीबी की परिभाषा ही बदल देती है। हाल ही में योजना आयोग ने नया कारनामा किया है। अब कहा जा रहा है कि गांव में प्रतिदिन 26 और शहरों में 32 रूपए खर्च करने वाला गरीब नहीं। दरअसल जो इस तरह की बात करते हैं उनकी एक एक पार्टी ही लाखों रूपयों से ज्यादा की होती है। ये क्या जाने गरीबी का स्वाद क्या होता है। सरकार ने वातानुकूलित कमरों में बैठकर गढ़ ली गरीबी की नई परिभाषा। सरकार के इस कथन पर शोर शराबा हुआ। सरकार तो खामोश बैठी रही जवाब दिया कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता ने। भई वाह!

एसे में कैसे बचेगी बेटी!

भारतवर्ष में लिंगभेद आदि अनादि काल से चला आया है। भारत को वैसे भी पुरूष प्रधान देश ही माना जाता है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान कन्याओं पर खासे मेहरबान रहे हैं। उनके मन में स्त्री के प्रति अगाध श्रद्धा और प्यार है। सांसद रहते वे सामूहिक विवाहों को अंजाम देते आए हैं। मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने महिलाओं विशेषकर कन्याओं के हितों के संरक्षक के प्रति अनेक प्रयास किए हैं। मध्य प्रदेश द्वारा आरंभ की गई लाड़ली लक्ष्मी योजना को अन्य सूबों द्वारा अंगीकार किया गया है। एक आंकड़े के अनुसार मध्य प्रदेश में 2556 करोड़ अब तक इसमें खर्च हो चुके हैं। बावजूद इसके लिंगानुपात आज भी मध्य प्रदेश की बड़ी समस्या बना हुआ है। हालात देखकर लगने लगा है कि शिवराज सिंह तो पूरी कोशिश कर रहे हैं पर उनके गण ही उनकी इच्छाओं का सम्मान नही कर पा रहे हैं। दिल्ली में शीला दीक्षित ने भी महलाओं के मामले में शिवराज की राह पकड़नी चाही है। दिल्ली में महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं। पर शीला हैं कि चैन से बंसी बजा रही हैं।

सबसे भ्रष्ट है रेल महकमा

भारतीय रेल इक्कीसवीं सदी में चर्चाओं में रहा है। कभी स्वयंभू प्रबंधन गुरू लालू प्रसाद यादव की कारस्तानी से तो कभी ममता बनर्जी की अनदेखी के चलते यह चर्चाओं में रहा। अब दिनेश त्रिवेदी भारतीय रेल के चालक बने हैं। केंद्रीय सतर्कता आयोग को मिली कुल शिकायतों में एक तिहाई से अधिक शिकायतें सिर्फ भारतीय रेल की ही मिली हैं। वर्ष 2010 की वार्षिक रिपोर्ट में इस बात का खुलासा हुआ है। सीवीसी को मिली 25 हजार 359 शिकायतों में से आठ हजार 330 शिकायतें रेल्वे की हैं। प्रतिवेदन दर्शाता है कि इन 8 हजार 330 शिकायतों में अधिकांश शिकायतें कर्तव्य के निर्वहन न करने की हैं। आयोग द्वारा जिन 1646 मामलों में कार्यवाही के निर्देश दिए हैं उनमें से 321 मामले रेल्वे के खिलाफ वाले हैं। अब भारतीय रेल की सेहत का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है कि लालू, ममता के राज में रेल किस तरह दिशाहीन होकर पटरी पर दौड़ रही थी।

एमपी है बंग्लादेशियों की पहली पसंद

देश का हृदय प्रदेश कहलाता है मध्य प्रदेश। मध्य प्रदेश की पुलिस का भी अपना तौर तरीका है। जांच के नाम पर वह चाहे किसी को भी मुर्गा बना दे। केंद्रीय गृह मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार देश में अवैध तरीके से घुसपैठ करने वाले बंग्लादेशी नागरिकों की शरण स्थली के रूप में मध्य प्रदेश की पहचान हो रही है। दरअसल लचर पुलिस व्यवस्था के चलते यहां बाहर से आने वाले अनजान लोगों के लिए बसने में बहुत आसानी होती है। जल्द ही अपना परिचय का दायरा बढ़ाकर रिश्वत के बल पर ये अपना राशन कार्ड, वोटर आईडी, यहां तक कि चालक अनुज्ञा पत्र भी बनवा लेते हैं। हालात देखकर यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि मध्य प्रदेश के पुलिस मैन्युअल से अब बाहर से आकर यहां रहने वालों की मुसाफिरी दर्ज कराने का कालम हटा दिया गया है।

उखड़ने लगी भूरिया की सांसें

केंद्रीय मंत्री रहे कांतिलाल भूरिया को मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया है। आज भी वे अपना ज्यादातर समय दिल्ली की राजनीति में बिता रहे हैं। शायद भूरिया को लग रहा है कि इस कांटों भरे ताज से बेहतर तो केंद्र की लाल बत्ती ही थी। भूरिया उस समय असहाय लगने लगे जब मध्य प्रदेश में जिलों की कांग्रेस कमेटी के अध्यक्षों को बनाया जाना था। रतलाम, झाबुआ और अलीराजपुर भूरिया के प्रभाव वाला माना जाता है। शेष मध्य प्रदेश में भूरिया का नामलेवा भी नहीं है। इन परिस्थितियों में भूरिया को अपने आका दिग्विजय सिंह पर ही भरोसा जताने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा था। दिग्गी राजा ने अपनों को चीन्ह चीन्ह कर रेवड़ी बांट दी गई। फिर क्या था, कमल नाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया, सुरेश पचौरी, अरूण यादव, सत्यव्रत चतुर्वेदी सरीखे क्षत्रपों के निशाने पर आ गए हैं भूरिया।

भाजपा में एन वर्सेस एन

एल.के.आड़वाणी को संघ की फटकार के बाद उनके हौसले पस्त हो गए। आड़वाणी ने तत्काल अपने आप को पीएम इन वेटिंग की दौड़ से बाहर कर लिया। उधर अमेरिका की पहली पसंद बनकर उभरे गुजरात के निजाम नरेंद्र मोदी। नरेंद्र मोदी के बारे में कहा जा रहा है कि वे राजग के अगले पीएम इन वेटिंग हो सकते हैं। श्राद्ध पक्ष में भी उपवास कर मोदी ने कट्र हिन्दुत्व के सिद्धांतों को ही चुनौती दे डाली। उसके बाद एक मौलाना की टोपी को इन्कार कर वे विवादों से घिर गए। उधर 7 रेसकोर्स रोड़ (प्रधानमंत्री का सरकारी आवास) को आशियान बनाने का सपना बिहार के निजाम नितिश कुमार के मन में भी डोल रहा है। वे सधे कदमों से इस तरफ बढ़ रहे हैं। कहते हैं कि भारत का प्रधानमंत्री वही बन सकता है जिसके नाम में र अक्षर आए। डॉक्टर मनमोहन सिंह भी अपने नाम में र का समावेश रखते हैं।

खण्डूरी का राजनैतिक भविष्य दांव पर

उत्तराखण्ड में मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल को बड़े ही नाटकीय तरीके से सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। उनके स्थान पर सेना के रिटायर्ड अफसर भुवन चंद खण्डूरी के कांधों पर डाल दी गई सूबे की जवाबदारी। उत्तराखण्ड में भाजपा की हालत पतली ही दिख रही है। उत्तराखण्ड में अगले साल चुनाव हैं। तीज त्योहारों के चलते खण्डूरी को काम करने का समय ही नहीं मिलने वाला है। दिसंबर तक आचार संहिता का डंडा घूम सकता है। इन परिस्थितियों में अगर सत्ता भाजपा के हाथ से फिसली तो खण्डूरी की सियासी कैरियर की हत्या सुनिश्चित है। निशंक वैसे भी हाशिए पर आ चुके हैं। अब राज्य में इकलौते बचेंगे कोश्यारी। अगर विपक्ष में भाजपा बैठी तब भी कोश्यारी के लिए अपनी मुगलई चलाना आसान ही होगा।

सरकार के पास नहीं गुरू पर खर्च का हिसाब

‘अफजल गुरू‘ को सरकार का दमाद कहा जाने लगा है। संसद पर हमले का मुजरिम अफजल गुरू दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद है। अफजल 13 दिसंबर 2001 को संसद पर हुए हमले का मुजरिम है। इस हमले के मास्टर माईंड अफजल गुरू के बारे में न जाने कितनी तरह की बातें आरोप प्रत्यारोप सामने आ चुके हैं। लोग कह रहे हैं कि सरकार इसे आखिर पाल क्यों रही है? अफजल पर हो रहे खर्च को आखिर कहां से वसूला जा रहा है। जाहिर है जनता के गाढ़े पसीने की कमाई से संचित राजस्व से ही अफजल को पाला जा रहा है। सूचना के अधिकार के एक आवेदन में यह जानकारी सामने आई है कि अफजल पर खर्च की गई रकम के बारे में तिहाड़ जेल प्रशासन के पास कोई रिकार्ड ही नहीं है।

कटोरा कट से मिली जवानों को निजात

भारतीय सेना और सुरक्षा बलों के जवानों की हेयर स्टाईल देखकर लोग इसे कटोरा कट की संज्ञा देते आए हैं। नौजवानों के रोष को देखकर सेना के आला अधिकारियों ने जवानों के लुक को मार्डन बनाने का फैसला किया है। अब सेना के जवान अपनी चैंती अर्थात कनपटी पर सामान्य बाल रख सकते हैं। अब तक जवानों की यह पीड़ा थी कि जब वे शहरों में निकलते थे तो लोग उन्हें छुला मुर्गा कहकर चिढ़ाया करते थे। साथ ही साथ जवान आम लोगों के बीच अलग ही पहचाने जा सकते थे। सेना के इस निर्णय से जवानों में खुशी की लहर दौड़ गई है। सेना ने इसकी शुरूआत अपनी देहरादून स्थित सेन्य अकादम से कर भी दी है। हो सकता है राज्यों के सुरक्षा बल भी सेना के इस फैसले से इत्तेफाक रखते हुए अपने जवानों को भी मार्डन बना दें।

पुच्छल तारा

देश में भ्रष्टाचार का घुन पूरी तरह से लग चुका है। एक के बाद एक घपले घोटाले सामने आ रहे हैं। एक एक कर सांसद तिहाड़ जेल पहुंचने लगे हैं। इस व्यवस्था पर चोट करते हुए केरल से पियूषिका नायर ने एक ईमेल भेजा है। पियूषिका लिखती हैं ‘‘जय पलनिअप्पम चिदम्बरम। अपराधी और नेता में अब फर्क नहीं रह गया है। इन दोनों ही कौमों के बीच फासला कम हो गया है। सजा ही कहीं मजा न बन जाए। सारे नेता एक एक कर चले आ रहे हैं तिहाड़ जेल की शरण में। डर तो इस बात का है कि कहीं तिहाड़ जेल ही संसद न बन जाए!

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