लेखक परिचय

लोकेन्द्र सिंह राजपूत

लोकेन्द्र सिंह राजपूत

युवा साहित्यकार लोकेन्द्र सिंह माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में पदस्थ हैं। वे स्वदेश ग्वालियर, दैनिक भास्कर, पत्रिका और नईदुनिया जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में अपनी सेवाएं दे चुके हैं। देशभर के समाचार पत्र-पत्रिकाओं में समसाययिक विषयों पर आलेख, कहानी, कविता और यात्रा वृतांत प्रकाशित। उनके राजनीतिक आलेखों का संग्रह 'देश कठपुतलियों के हाथ में' प्रकाशित हो चुका है।

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-लोकेन्‍द्र सिंह राजपूत

लगता है सरकार और सरकार के लोग पगलाय गए हैं? हमने कई बार अपने से बड़ी उम्र या हमउम्र लोगों से सुना होगा कि तेरी मति फिर गई है क्या? जो इस तरह का काम कर रहा है। दूसरा वाक्य बदल भी सकता है। जैसे तेरी मति फिर गई है क्या? जो वहां मरने के लिए जा रहा है। अपन ने भी कई बार सुना है और हर बार सोचा है कि मति कैसे फिरती है? मति चकरी की तरह गोल-गोल फिरती है क्या? या फिर बावरे मन की तरह यहां-वहां फिरता है? नहीं तो यह होता होगा कि मति पहले खोपड़ी के आगे वाले हिस्से में होती होगी बाद में फिर कर पीछे चली जाती होगी, तब कहते होंगे मति फिर गई। जो भी हो अपन तो समझे नहीं उस समय, क्योंकि तब अपन बच्चे थे सो थोड़े कच्चे थे जी। अब केंद्रीय सरकार के एक कानून के बारे में सुनकर समझ आ गया है। पता चला है कि केंद्र एक नए कानून को व्यवहार में लाने की सोच रहा है, जिससे बच्चों पर हो रहा अत्याचार रुकेगा। कानून में तय किया जा रहा है कि गुरुजन ही नहीं माता-पिता भी अपने बच्चे को पिटाई नहीं कर सकेंगे। अगर वे बच्चों को पीटते हैं तो उन्हें जेल की हवा खानी पड़ेगी।

लगता है केंद्र में बैठे लोगों की मति ही फिरी होगी तभी इस कानून को लाने का विचार किया गया। अब भला सज्जन पुरुषों से यह पूछो कौन माता-पिता अपने बच्चे को जान-बूझकर मारना चाहते हैं और क्या उनकी मार में अत्याचार होता है? क्या वह मां बच्चे पर अत्याचार कर सकती है जो खुद नौ माह कष्ट में रह कर उसे जन्म देती है? पैदा होने के बाद उसे अपने कलेजे से चिपकाकर रखती है। क्या वह मां उस पर बेवजह लाठी चला सकती है? जिसे वह बड़े लाड़ से पालती है, बिझौना जब बच्चे के सूसू से गीला हो जाता है तो वह ममता की मूर्ति स्वयं गीले में सो जाती है और अपने कलेजे के टुकड़े को सूखे में सुलाती है। पिता की बात करें तो वह भी बच्चे को प्रेम करने में मां से कहीं पीछे नहीं रहता। बाहर से कठोर दिखने वाला पिता अंदर से मां सा ही कोमल होता है। उसका बच्चा सुख से जी सके इसके लिए ही तो पिता सारे जतन करता है। क्या ये माता-पिता बच्चे पर अत्याचार कर सकते हैं? मुझे तो लगता है नहीं कर सकते। यह लिखने से पहले मैं कई लोगों से इस विषय पर बहुत लोगों से चर्चा कर चुका हूं। सबने ऐसे कानून की उपयोगिता पर आश्चर्य व्यक्त किया। तो क्या केंद्र सरकार में बैठे लोगों की मति फिर गई है? लगता तो यही है। वे जो कानून बना रहे हैं उसके तहत अगर माता-पिता बच्चे को मारते हैं तो उन्हें जेल हो सकती है, जुर्माना भी देना होगा। जो कानून बनने चाहिए उन पर तो सरकार ध्यान नहीं दे रही, लेकिन ऐसे हास्यपद कानूनों की तैयारी में जुटी है। आतंकवाद रुके, नक्सलवाद को नकेल लगे, महंगाई डायन के अत्याचार से जनता को कैसे बचाएं, लगातार बढ़ रहे अपराध को कैसे रोका जाए। इन सब पर तो कुछ काम नहीं किया जा रहा।

मेरा मत है कोई भी गुरुजन व माता-पिता अपने बच्चे को शिक्षा देने के लिए थोड़ा-बहुत पीट सकता है, जो अत्याचार की श्रेणी में नहीं आता। यह जरूरी भी है वरना बच्चों को बिगडऩे से कोई नहीं रोक सकेगा। मान लो सरकार यह कानून कठोरता से लागू कर देती है तो क्या स्थितियां निर्मित होंगी।

– बच्चे का मन स्कूल जाने का नहीं हो रहा, माता-पिता उसे पिटाई का डर तो दिखा नहीं सकते। ऐसे में हो सकता है वे उसे स्कूल जाने के लिए कोई लालच दें, अगर ऐसा होता है तो बच्चे में रिश्वत लेने की आदत बचपन से ही पैदा हो जाएगी।

– बच्चा स्कूल का होमवर्क ले जाए या नहीं टीचर उसे पीट तो सकता नहीं है। माता-पिता से शिकायत करके भी क्या फायदा। क्लास रूम में धमा-चौकड़ी मचाते हैं तो भी शिक्षक कुछ न कर सकेंगे।

– माना वह शिक्षक उसे डांट और बालक इसका बदला लेने के लिए शिक्षक के मुंह पर थूक दे, चांटा मार दे, धूल फेंक दे या फिर शिक्षक रास्ते से जा रहा हो और वह उन्हें पत्थर मार दे। तब क्या किया जाए?

– बच्चा सुबह से कार्टून चैनल देख रहा है। मना करने और समझाने पर मान नहीं रहा, तब माता-पिता क्या करें? क्या जेल जाने के भय से उसे अपना भविष्य खराब करते रहने दें। उसे लगातार टीवी देखकर अपनी आंखे खराब करते रहने दिया जाए।

– वह गली-मोहल्ले में किसी दूसरे बच्चे से मारपीट करके आता है, तब क्या करें परिजन की वह भविष्य में ऐसा न करें।

– पत्थरों से वह पड़ोसियों के खिड़की के कांच तोड़ दे, तब पिता उसे कैसे समझाए और समझाने के बाद बार-बार वह ऐसा करे तब क्या करें?

– मान लो वह कहीं से गंदी-गंदी गालियां सीखकर आता है और जोर-जोर से बकता है। आपकी लड़की को भी वह अपशब्द कहे तो क्या करोगे?

लगता है यह सब केंद्र सरकार ने सोचा ही नहीं। लगता है मति फिरने के बाद दिमाग सोचना बंद कर देता होगा। ऐसे में तो बच्चों का वर्तमान ही नहीं भविष्य भी खराब हो जाएगा। सरल-सी बात है कि कोई भी माता-पिता अपने बच्चों को बेवजह नहीं मारता। उनकी मार में भी सीख होती है। उपरोक्त स्थितियों में बच्चा समझाने से न समझेगा तो दण्ड स्वरूप उसकी पिटाई करनी ही पड़ेगी वरना वह उद्ण्ड़ होकर समाज के लिए समस्या बन जाएगा। सरकार को चाहिए बादम (इसे खाने से दिमाग ठीक रहता है और सही काम करता है) खाए और जरूरत की जगह बुद्धि का इस्तेमाल करे। आतंकवाद, उग्रवाद, धर्मांतरण, घुसपैठ, अपराध पर रोक लगाने और देश की तरक्की में सहायक कानूनों का मसौदा तैयार करने पर ध्यान दे।

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1 Comment on "इसे कहते हैं मति फिरना"

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Anil Sehgal
Guest
The issue for consideration is : (1) Can corporal punishment ever lead to improvement in intended growth of children and be in their well being ? (2) Are proposed penal provisions directed for deterrence against physical punishment by well intended parents ? The remedy for ideal growth / character building of children must come from persons who are experts in the area. It is not in the jurisdiction of police / magistrates / legislators. The best education that can be provided by parents is by their own practices / behavior, life style, spending quality time with children and not by… Read more »
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